World of Business Hindi

World of Business

दोस्तों काफी लोगों का बिजनेस के बारे में यह पर्सपेक्टिव रहता है कि बिजनेस की कोई थ्योरी नहीं है
यह लक पर डिपेंड है लेकिन ऐसा नहीं है बिजनेस की प्रॉपर थ्योरी है जो आज हम इस बुक में देखेंगे । दूसरा
में मैंने यह भी देखा है कि लोगों ने बिजनेस को जानने के लिए कई बुक पढ़ते हैं उन्हें थोड़ा बहुत पता भी चलता है लेकिन उनके ब्रेन में एक कंपलीट थ्योरी बिल्ड है। मेरा बुक को लिखने का मेन मोटिव यही है कि हम एक से डेढ़ घंटे में बिजनेस की थ्योरी को ओवर ऑल समझ जाएं और एक बिग पिक्चर क्रियेट करें।
इसलिए इस बुक में मैंने टॉप बिजनेसमैन की बुक को कंपाइल करके कनेक्ट किया है यह एक तरीके
का कोर्स ही है जो इतने कम टाइम में हमें काफी कुछ सिखा सकता है मेरी ओपिनियन में हमें यह बुक चार
से पांच बार सुननी चाहिए उम्मीद है यह आजकल के हजारों रुपए के पेड कोर्स से कही ज्यादा आपको
नॉलेज देगी और बिजनेस जर्नी में आपकी हेल्प करेगी तो अब आप सोच रहे होंगे कि हम इस बुक में क्या-क्या डिस्कस करेंगे इसमें हम सबसे पहले देखेंगे कि हम खुद को व अपनी फैमिली को अच्छी लाइफ कैसे दे सकते हैं ओबीसयली हमें अपनी पैसे कमाने की स्किल को इंप्रूव करना पड़ेगा ज्यादातर लोग एक अच्छे पैकेज की नौकरी चाहते हैं आओबीयसली इसका यह मतलब है हम एक एम्पलोई ही बनना चाहते हैं.

अनफॉर्च्नेटली जब हम एम्पलोई होते हैं तो हमारे पास इतना टाइम नहीं होता और हम अपने अकोर्डिंग फ्री
टाइम स्लॉट नहीं बना सकते ना ही उतने ज्यादा पैसे कमा सकते एक्चुली हमारे पास दो तरीके हैं जिससे
हम पैसे कमा सकते हैं या तो हमें अपनी इन्वेस्टिंग की स्किल को इंप्रूव करना पड़ेगा या फिर बिजनेस स्किल्स को. इस बुक में हम बिजनेस स्किल्स की डिटेल में जाएंगे लेकिन आपको पता है कि बिजनेस खोलने की भी दो फ्लोस्पी हैं और दोनों बिलिनियर लोगों ने दी है एक फिलॉस्फी कहती है कि दूसरे के सक्सेसफुल आइडियाज को कॉपी करो और अपन एक्सपेरिमेंट मत करो। ताकि हमें जल्दी से जल्दी डिमांड का पता चल जाए लेकिन दूसरी फ्लोसफी बोलती है कि कंपलीटली डिफरेंट आइडिया लेकर आओ वैसे सक्सेस हमें दोनों तरीकों से ही मिल सकती है इन दोनों मेथड को हम बुक में डिटेल से देखेंगे. नेक्स्ट शायद कई लोगों से आपने यह शब्द सुने होंगे सोलो प्रीमिनयोर बनो यानी एक आदमी का बिजनेस करो या वीडियो प्रीमिनयोर बनो यानी अकेले वीडियो बनाओ या ऑडियो प्रीमिनयोर बनो आदि आदि…… यह सब बकवास है…. बिजनेस एक इंडिविजुअल सपोर्ट नहीं है यह एक टीम सपोर्ट है इसलिए हम इस बुक में देखेंगे कि बिजनेस के लिए एक टीम बनाना क्यों जरूरी है एक और बात देखें बिजनेस सक्सेसफुल तब होता है जब एक ही कस्टमर से बार-बार इनकम आए और वह तब होगा जब हम परमानेंट कस्टमर बनाएं और परमानेंट कस्टमर तब बनेंगे जब हम ब्रांडिंग के प्रिंसिपल को समझेगेग। इस बुक में हम पैसों को सेफ रखने के प्रिंसिपल के बारे में भी जानेंगे तो आई होप आप एक्साइटिड होंगे बिजनेस के रुल को समझने के लिये तो चलिए हम तो हैं। अब आगे की जर्नी में रूबी आपको ले जायेगी ये पूरी फ्लोसपी डिटेल में बतायेगी.


ईबीएसआई (EBSI)?

ईबीएसआई वर्ड्स पढकर आपके माइंड में सबसे पहले क्या चीज़ आई? वेल, ये वर्ड यूरोपियन बिजनेस स्कूल
इंटरनेशनल के लिए यूज़ होता है. यूरोपियन बिजनेस स्कूल इंटरनेशनल के पीछे जो आईडिया है…..Just
kidding
हम इस बुक में बिजनेस को इन्टरस्टिंग वे में सिखेंगे ना की एक लेक्चर की तरह , तो दोबारा
से स्टार्ट करते है ईबीएसआई एक्चुअल में एम्प्लोई, बिजनेसमेन, सेल्फ एम्पलॉयड और इवेस्टर्स के लिए
यूज़ होता है. इसे और सिंपल वे में बोले तो एम्प्लोई वो है..जो किसी के लिए काम करता है हर रोज़ 8 घंटे,
हफ्ते में 5 दिन 9 से 5 की जाँब करता है, और सेल्फ एम्पलॉयड भी almost सेम चीज़ है. इसमें भी आप उतने ही घंटे काम करते है लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि आप खुद अपने बॉस है. लेकिन फिर भी आपको बाकी के options के मुकाबले जॉब में ज्यादा टाइम स्पेंड करना पड़ता है और पैसे भी कम मिलते है.. जैसे की एक डेन्टिस्ट या फिर एक नोर्मल छोटा दुकानदार ओके अब हमारे पास दो और आँप्शन है जिसमें रियल सक्सेस छुपी है. I know अब आप सोच रहे होगें की वो दो आँप्शन जल्दी बताओ? तो वो दो आप्शन है या तो आप बिजनेस करो या इन्वेस्टर बन जाओ. क्योंकि ये दोनों ही आप्शन आपको कम टाइम में ज्यादा पैसे कमाने का चांस देते है. और यहाँ हम इन दोनों तरीको को डिस्कस करेंगे.

पार्ट |: क्यों सिर्फ कुछ लोग ही अमीर है जबकि बाकी लोग गरीब है ?
चैप्टर : पैसो से काम करवाना सीखो चलो, इस रूट को एक यंग जेंटलमेन रोबर्ट कियोसाकी की स्टोरी से शुरू करते है. रोबर्ट ने एक बुक लिखी है “रिच डैड पूअर डैड”. इस बुक में रोबर्ट ने हमे बताया कि बचपन में उनके दो डैड थे एक तो रियल फादर जोकि एक वेल एजुकेटेड आदमी थे, उन्होंने पी.एच.डी की हुई थी लेकिन उसके बावजूद वो लाइफ टाइम गरीब रहे. जबकि उनके दुसरे डैड थे उनके फ्रेंड माइक के पापा.
वो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे बल्कि अगर हम आज की एजुकेशन के हिसाब से बोले तो वो एकदम अनएजूकेटेड पर्सन थे लेकिन फिर भी वो अपने टाउन के सबसे अमीर इंसान थे. रोबर्ट के फर्स्ट डैड हमेशा
रोबर्ट को पढ़ाई करने और अच्छे ग्रेड्स लाने पर जोर देते थे ताकि वो बड़ा होकर कोई स्टेबल जॉब कर सके. उनका मानना था कि पैसे कमाने के लिए सिर्फ एजुकेशन ही एक सेफ और सही तरीका है. रोबर्ट के सेकंड डैड ने रोबर्ट को हमेशा यही समझाया कि लाइफ के सारे लेसन हमे स्कूल में नहीं मिलते हैं. एजुकेशन इम्पोर्टेट है लेकिन अमीर बनने का सिर्फ यही एक रास्ता नहीं है.

रोबर्ट के सेकंड डैड बिजनेसमेन रूट को मानते थे, वो रूट जिसमे हमे स्कूल से ज्यादा लेसंस सीखने को
मिलते है. एक गधे के सामने अगर गाजर लटका दो तो वो उसे खाने के लिए भागेगा क्योंकि उसे लगता है कि अगर वो स्पीड से दौड़ेगा तो अपने गोल यानी गाजर तक पहुंच जाएगा.लेकिन असल में गाजर सिर्फ एक
धोखा है, ठीक इसी तरह पैसा भी एक धोखा है. हम जितना इसके पीछे भागते है वो हमसे उतनी दूर भागता
है. तो क्यों ना पैसे के पीछे भागने के बजाये पैसे को अपने पीछे भगाया जाए? क्या आप सुबह 6 बजे उठते है फिर 2 या 3 तीन बजे तक काम करते है, एक्स्ट्रा पैसों के लिए कभी एक्स्ट्रा शिफ्ट भी कर लेते है. है ना? एक तरह से आप एक रेट रेस में ट्रेप हो जाते है. आप ये सोचकर खूब मेहनत करते है कि कहीं आप पीछे ना रह जाए या बैंकरप्ट ना हो जाए. और फिर आप इमेजिन करते है कि खूब पैसे कमा कर आप अपने कितने सपने पूरे कर सकते है. फिर जितनी कमाई उतना खर्च, और फिर से पॉइंट जीरो. इस तरह आप कभी भी रिच नहीं बन सकते. इसलिए आपको मनी के लिए काम करने का आईडिया ही खत्म करना होगा.

रिच लोग कभी पैसो के लिए काम नहीं करते बल्कि पैसा उनके लिए काम करता है. रोबर्ट ने इस बुक
में मेंशन किया है कि उनके रिच डैड उन्हें यही बात सिखाना चाहते थे कि पैसे के लिए काम मत करो बल्कि
उसे अपने लिए काम करवाओ. उन्होंने रोबर्ट को एक स्टोर में काम पर रखवा दिया जहाँ उन्हें फ्री में काम
करना था. रोबर्ट और उनका फ्रेंड माइक वहां काम करते रहे, उन्हें पता था कि उन्हें इस काम के कोई पैसे
नहीं मिलने वाले इसलिए फ्री टाइम में वो दोनो पैसे कमाने के नए-नए आईडिया सोचते रहते थे. उस स्टोर
में क्लर्क थी जो कॉमिक बुक्स के फ्रंट पेज को दो टुकडो में कटती थी. वो एक हाफ रख लेती थी और दूसरा हाफ फेंक देती थी. फिर शाम को एक डिस्ट्रीब्यूटर आता था जो बुक का टॉप हाफ क्रेडिट के लिए ले जाता था और स्टोर में नयी कॉमिक्स दे जाता था. एक दिन दोनों ने डिस्ट्रीब्यूटर के आने पर उससे पुछा कि क्या ओल्ड कॉमिक्स बुक रख सकते है. डिस्ट्रीब्यूटर इस शर्त पर मान गया कि वो लोग उन कॉमिक बुक्स को बेचेंगे नहीं. उसके बाद दोनों ने डिस्ट्रीब्यूटर से ओल्ड कॉमिक बुक्स लेकर माइक के गैराज में एक लाइब्रेरी स्टार्ट कर दी. बहुत से बच्चे लाइब्रेरी में आने लगे. लाईब्रेरी में कोई भी बच्चा 10 सेंट्स देखकर 2 घंटे तक पढ सकता था. कॉमिक्स पढने के बाद उसे रिटर्न करना होता था. तो एक टेक्निकली वो लोग कॉमिक्स बेच नहीं रहे थे बल्कि उसे रेंट पर दे रहे थे. और उन्हें Library में काम भी नहीं करना पड़ता था क्योंकि उन्होंने माइक की सिस्टर को इस काम के लिए हायर किया जिसे वो हर वीक एक डॉलर पे करते थे. दोनों ने एक हफ्ते में 9.5 डॉलर कमाए. और इस तरह फाइनली उन्हें समझ आ गया कि हमे पैसे के लिए काम नहीं करना है बल्कि वो हमारे लिए काम करेगा.

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चैप्टर 2: पैसे कमाने का कोई फायदा नही अगर हम उसे अपने पास नही रख सकते  ज्यादातर अमीर लोग अक्सर या तो बैंक रप्ट जो जाते है या फिर सुसाइड करके अपनी जान दे देते है. लेकिन ऐसा होता क्यों है? शायद इसलिए कि क्योंकि वो पैसे कमाने में अपनी सारी एनेर्जी और टाइम लगा देते है लेकिन उस पैसे को संभालना भूल जाते है. और जब सब कुछ लुट जाता है तो सर पीटने लगते है. लेकिन इस सिचुएशन को अवॉयड करने के लिए हमे लाएबिलिटीज और एसेट्स के बीच का डिफ़रेंस समझना होगा. एसेट्स बेसिकली वो चीज़ है जो आपकी होती है और आपके लिए पैसा कमाती है. एसेट्स के उपर आप या तो बिलकुल काम नहीं करते या फिर थोडा बहुत करते है. जैसे आप घर खरीदते हो, उसे रेंट पे देते हो तो वो आपके लिए एक एसेट है क्योंकि रेंट से आपकी प्रोपर्टी की कॉस्ट भी कवर हो जायेगी और लाइफ टाइम आपको रेंट भी मिलता रहेगा. लोन्स जैसी चीज़े लाएबिलिटी के अंदर आती है. इनसे आपको एक पैसे की भी अर्निंग नहीं होती बल्कि उलटे ये आपका सारा पैसा खाती है. जैसे आप जब कार या घर लेते है लेते है तो उसकी मेंटेनेस या घर की मेंटेनेस के लिए आपका पैसा खर्च होता है. मिडल क्लास लोगो की फिक्स इनकम होती है मान लो आपकी दनकम 50000 है जिसमे से आप 15000 रुपये रेंट पे खर्च करते है, 20000 लोंस पर खर्च करते है. अब बचे 15000 जिसमे आपको पूरा महीना चलाना होता है. फिर खर्चे पूरे करने के लिए आप पैसा उधार लेते है जिससे आपके ऊपर और कर्जा चढ़ जाता है और इस तरह आप कभी भी पैसा सेव नहीं कर पाते. आप जिंदगी भर मिडल क्लास बने रहेंगे या क्या पता और भी गरीब हो जायेंगे.

तो अब सवाला आता है कि रिच लोग क्या डिफरेंट करते है? तो आपको बता दे कि उनके पास बहुत
सारा एसेट्स होता है. उन्हें पता है कि अभी इसी वक्त उनकी जॉब भी छूट जाए तो उन्हें फर्क नहीं पड़ेगा
क्योंकि उनके एसेट्स उन्हें इतना पैसा कमा कर देंगे कि उनके सारे खर्चे, सारे टैक्स, रेंट और डेली एक्सप्रेस
सब चुकता हो जायेंगे. सिंपलली बोले तो पैसा उनके लिए काम करता है, और फाइनली यही उनकी और
मिडल क्लास मेंटेलेटी का डिफ़रेंस है. तो एक बार फिर सोचो, जब भी आप बड़ा घर लेना चाहते हो तो उसे
एसेट समझ कर लो और उस एसेट को अपना खर्चा खुद निकालने दो. और ये हो सकता है उस घर के कुछ
कमरे रेन्ट पर दे सकते है। इस तरह आप नए घर में भी स्पेंड नहीं करेंगे बल्कि आपका एसेट आपको
और पैसे कमा कर देगा!
चैप्टर 3: अपने काम से काम रखो स्टोरी टाइम: चलो आपको 1974 में लेके चलते है. रे क्रोक, वर्ल्ड के सबसे बड़े और मोस्ट सक्सेसफुल फूड चेन मैक डोनाल्डस के फाउन्डर एक एमबीए क्लास में एक स्पीच दे रहे थे. उनकी स्पीच खत्म होने के बाद क्लास में मौजूद स्टूडेंट्स उनसे सवाल पूछने लगे. थोड़ी देर बाद रे ने अचानक उन्हें एक बोल्ड लुक दिया और उनसे एक ऐसा सवाल पुछा जो उनकी पूरी लाइफ चेंज करने वाला था” आपको क्या लगता है कि मै क्या बिजनेस करता हूँ”. इस पर क्लास के ऑलमोस्ट हर स्टूडेंट ने एक ही जवाब दिया कि बेशक उन्हें पता है कि वो हैमबर्गेर का बिजनेस करते है. रे हंसने लगे. स्टूडेंट्स को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्यों हंस रहे है. आफ्टर आल वो मैक डोनाल्डस के फाउन्डर जो थे. तो अगर वो हैमबर्गेर नहीं बेचते थे तो और क्या करते थे?

ऑफ़ कोर्स रे अपने फ़ास्ट फूड में बिकने वाले फूड को लेकर सिरियस थे लेकिन यही उनका मेन बिजनेस
नहीं था. ये उनका असली बिजनेस नहीं था, उनका रियल बिजनेस था रियेल एस्टेट. मैक डोनाल्ड के हर
एक आउटलेट के लिए काफी सोच समझ कर लैंड चूज़ किया जाता था. अगर किसी को मैकडोनाल्ड की
फ्रेंचाईज़ी लेनी होती तो उसे उस लैंड के लिए एक्स्ट्रा पैसे देने पड़ते थे. स्कूल में अक्सर टीचर हमसे पूछते है
कि हम बड़े होकर क्या बनना चाहते है. और ऑलमोस्ट हर कोई यही बोलता है कि वो डॉक्टर या लॉयर बनेगा. डॉक्टर या लॉयर एक प्रोफेशन है बिजनेस नहीं. कोई भी मोशन पक जॉत है जहाँ आज किसी और के लिए काम करते है. या तो आप किसी के लिए काम करते है या गवर्नमेंट एम्प्लोई होते है. लेकिन बिजनेस ऐसी चीज़ है जहाँ आप दूसरो के लिए नहीं बल्कि खुद के लिए काम करते है और यहाँ आपका पैसा भी आपके लिए काम करता है. ये क्या था ? मैंने कुछ सुना, ओह, तो

क्या आप ये बोल रहे है कि मै अपनी डे-टाइम की जॉब छोड़ दूं? जी नहीं! रोबर्ट आपको ऐसा करने को नहीं
बोल रहा, वो सिर्फ यही समझाना चाहता है कि अपनी डे-टाइम की जॉब से कमाए हुए पैसे को किसी एसेट्स
में इन्वेस्ट करो जो आपकी लाइफस्टाइल के खर्चे कवर कर सके. अब अगर आपकी डे-टाइम जॉब छूट भी
जाए तो आपको टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है. अब सवाल आता है कि हमे किस टाइप के एसेट्स लेने चाहिए? हम आपकी हेल्प के लिए यहाँ कुछ एक्जाम्पल दे रहे है:
ऐसे बिजनेस शुरू करो जहाँ आप टाइम ना भी दो तो चलेगा, जिसे दूसरे लोग चलाए क्योंकि अगर
आपको टाइम देना पड़ेगा तो वो बिजनेस नहीं है, जॉब रियेल एस्टेट में इन्वेस्ट करो जहाँ से रेंट वगैरह
मिलता रहे. स्टॉक्स और बांड्स में इन्वेस्टमेंट करो ताकि बिजनेस कोई और चलाये और उसके शेयर के
डिविडेन्ड आप लो.

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चैप्टर 4: द कैशफ्लो क्वाड्रेट (Chapter 4: The cashflow quadrant)

एक बार जब आप पैसे कमाना शुरू कर दोगे तो आपके पास सिर्फ एक ही बड़ा खर्चा होगा और वो है टैक्स. आपको ये मोस्ट इम्पोर्टेट टॉपिक समझना होगा. वर्ना आपके इनकम का आधा पैसा governmentle ले लेगी। टैक्स पे करना देशभक्ति की निशानी नहीं है. ये कोई ड्यूटी नहीं है जो आपको मजबूरी में करनी पड़े. इसे समझने से पहले हमको वर्ल्ड वॉर । की हिस्ट्री में जाना होगा जब यू.एस. गवर्नमेंट ने वॉर फंड के लिए पब्लिक पर टैक्स लगाना स्टार्ट किया था. और तभी से ये कॉमन मिसकंसेप्शन क्रियेट हो गया कि टैक्स पे करना एक पेट्रियोटिक जॉब है. वर्ल्ड वार तो खत्म हो गयी थी लेकिन यू.एस. गवर्नमेंट ने लोगो से टैक्स कलेक्ट करना कंटीन्यू रखा. इसे और अच्छे से समझने के लिए हम फिर से अपने ईबीएसआई पर आते है जैसा कि हमने पहले भी एक्सप्लेन किया था. ई स्टैंड करता है एम्प्लोईज के लिए, बी स्टैंड करता है बिग बिजनेस के लिए जिसमे 500 या इससे ज्यादा एम्प्लोईज हो. “एस” स्टैंड करता है स्माल बिजनेस या सेल्फ एम्प्लोईड के लिए और “आई’ का मतलब है इन्वेस्टर. अब इनके हर लैटर को एक क्वेडेन्ट के तौर पर इमेजिन करते है जहाँ हर क्वेड्रेन्ट एक लैटर को होल्ड करता है और हम इसे कैशफ्लो क्वेड्रेन्टबोलेंगे.

अब हम में से हर एक एट लीस्ट इनमे से किसी एक क्वेड्रेन्टमें है. एक पर्सन जो “ई” क्वेड्रेन्टमें है और एक
पर्सन जो “बी” क्वेड्रेन्टमें है उसके बीच का डिफ़रेंस है कि उनका कैश फ्लो कहाँ से आता है. एक सिंगल
पर्सन के मल्टीपल स्ट्री of income हो सकते है और इसलिए वो एक से ज्यादा क्वेड्रेन्ट में आता है. “ई”
क्वेड्रेन्टमें वो लोग आते है जिन्हें एक स्टेडी और सेफ मन्थली पे-चेक मिलता है. इसके बाद” एस” क्वेड्रेन्ट
आता है जहाँ पर ज्यादातर डॉक्टर्स, इंजीनियर्स वगैरह आते है. इन लोगो ने अपना छोटा सा ओर्गेनाइजेशन
स्टार्ट किया है जिसे वो बिजनेस बोलते है लेकिन रोबर्ट मानते है कि ये लोग बिजनेसमैन नहीं है बल्कि सेल्फ एम्प्लोएड है. “बी” क्वेड्रेन्टमें स्टीव जॉब्स और बिल गेट्स जैसे बिजनेसमेन और एंटप्रेन्योर्स आते है.
फाइनली है “आई” क्वेड्रेन्टजिसमे प्रोफेशनल इवेस्टर्स आते है जैसे कि वारेन बुफे. अब शायद आप ये पूछे
कि क्या हम सब भी किसी ना किसी चीज़ में इन्वेस्ट नहीं कर रहे? हाँ बेशक हम सब करते है लेकिन उनके
और हमारे बीच प्रोफेशन लिज्म का डिफ़रेंस है. हम लोग पैसिव इन्वेस्टर्स है और इसीलिए हम प्रोफेशनल
इवेस्टर्स से ज्यादा टैक्स पे करते है. आपको क्या लगता है कि ज्यादातर सीईओ कहाँ पर आते है? “बी” क्वेड्रेन्टमें, राईट? वेल, ये गलत जबाब है. ज्यादातर सीईओ सिर्फ एम्प्लोईज होते है. “ई”

क्वेड्रेन्ट में एम्प्लोईज उन बिजनेसमैन के लिए काम करते है जो कि स्टीव जॉब्स और मार्क जुच्केन की
तरह “बी” क्वेड्रेन्ट में आते है। स्कूल से हमे तैयार करते है कि हम एस से ई कवेड्रेन्ट में आये या तो हमें ऐसी
कोई जाँब मिले कि आप सेफ फील करें और “ई” क्वेड्रेन्ट मह रहे या “एस” क्वेड्रेन्ट में आ जाये यानि कि
डॉक्टर या लॉयर बन कर अपना कोई आँफिस खोल ले और सेल्फ एम्पलायड बन जाए तो चलिये अब फिर से टैक्स पर चलते है. “ई” क्वेड्रेन्ट के लोग 40% टैक्स के करीब पे करते है, “एस” क्वेड्रेन्ट के लोग 60% टैक्स देते है (ज़रा सोचो आप 1000$ कमाते हो और 600 डॉलर आप गवर्नमेंट को देते हो— Hey Bhagwaan) जबकि “बी” क्वेड्रेन्टके लोग 20% पे करते है और “आई” क्वेड्रेन्टमें आने वाले ना के बराबर यानी 0% पे करते है. तो अब आप समझे कि जब भी लोग गवर्नमेंट को “टैक्स द रिच’ बोलते है यानी अमीरों पर टैक्स बढाने को बोलते है तो इसका सीधा इफेक्ट “ई” और “एस” क्वेड्रेन्ट में आने वाले लोगो पर होता है यानी डॉक्टर्स, इंजीनियर्स और सीईओ जो ज्यादा टैक्स पे करते है. जबकि “बी” और “आई’ के रियेल कैपिटलिस्ट अब भी कम से कम टैक्स दे रहे है क्योंकि वो स्मार्ट है और उन्हें पता है कि अपने फायदे के लिए गवर्नमेंट लॉज को कैसे यज़ करना है. और उन्हे ये भी पता है कि अगर टेक्स की बुक में 1000 पाने है तो उन में से 900 पाने इस पर लिखे गये है कि टेक्स कैसे बचे.

चैप्टर 5: अब आखिर अमीर लोग टैक्स देने से बचते कैसे हैं इस सवाल का जवाब देने के लिए हमें देखना होगा कि लोग कुछ फाइनेशियल वर्ड्स को डिफरेंटली कैसे बोलते है : ek Accountants jo ki ek Employee hai kuch aise shabd use karta hai.

ओर्डीनेरी इनकम Ordinary Income
पोर्टफोलियो इनकम Portfolio Income
पैसिव इनकम Passive Income
जबकि एक इन्वेस्टर कुछ ऐसे शब्द प्रयोग करता है
Earned Income
Capital Gains Income
Cash Flow Income

जो वोकाबुलेरी, जो शब्द हमने यूज़ की उसका डिफ़रेंस हमे एम्प्लोईज और इन्वेस्टर्स के डिफरेंट वे ऑफ़
थिंकिंग में दिखता है. इसे थोडा ज्यादा सिंपल करते हुए बोले तो, हमारे ऑथर रोबर्ट टी, कियोसाकी कहते है कि वो इतना पैसा कमाते है जितना कि ज्यादातर लॉयर्स नहीं कमा पाते हालाँकि यूनाईटेड स्टेट्स में लॉयर्स
हाएस्ट पेड लोगो में आते है. क्यों? क्योंकि ज्यादातर lawyers employee की तरह सोचते है उन्हें पैसे की लेंगुएज नहीं आती. वो बोलते है” मै घंटे के 250$ चार्ज करता हूँ” लेकिन प्रोब्लम ये है कि ये इन्वेस्टर्स की लेंगुएज नहीं है, ये सिर्फ उनके काम का प्राइस है, उनके लेबर की कॉस्ट. इसीलिए इन्वेस्टर बनने के लिए आपको भी इन्वेस्टर की लेंगुएज सीखनी होगी, यानी कि लेंगुएज ऑफ़ मनी. इसे और सिंपल वे में समझने के लिए हम अपनी सोसाईटी के डिफरेंट क्लास के लोगो के कैश फ्लो पर नजर डालते है.

1) पूअर पीपल’स इनकम: गरीब लोगो की इनकम (Poor people’s income )
या फिर जैसे वो लोग बोलते है, ओर्डीनेरी इनकम. इस टाइप की इनकम के साथ प्रोब्लम ये है कि जितना ये
लोग कमाते है, उतना ही कम सेव कर पाते है क्योकि इन्हे टैक्स भी ज्यादा देना पडता है और जब उन्हें लगता है कि इतना काफी नहीं है तो वो पैसे के चक्कर में और ज्यादा काम करते है या स्टडी करते है. लेकिन उन्हें ये नही मालूम कि जितना ज्यादा वो अर्न करेंगे उतना ही ज्यादा स्पेंड करेंगे. और फिर रिजल्ट वही, कम सेविंग. कमाई जितनी ज्यादा होगी टैक्स भी उतना ही पे करना होगा. अब होगा ये कि ये आगे चलकर अपने बच्चो को भी ये सीख देगे उन्हें स्कूल जाने के लिए मोटिवेट करके, इसलिये नही कि इनके बच्चे स्कूल में कुछ नया सीखे बल्कि इसलिये ताकि वो बड़े होकर कोई अच्छी स्टेबल जॉब करे और पैसा सेव करे और फिर आने वाली जेनरेशन भी सेम मिस्टेक करेगी जो उनके पेरेंट्स ने की. फिर रिजल्ट वही, हमेशा गरीबी.

2) मिडल क्लास इनकम: मिडल क्लास लोगो की इनकम (Middle-class’ income )
इस इन्कम को पोर्टफोलियो इनकम या मिडल क्लास भी बोला जाता है, मेनली मिडल क्लास लोग स्टॉक मार्किट पर डिपेंड रहते है, इस कैटेगरी की इनकम में गवर्नमेंट एम्प्लोईज़ भी आते है जो अपने रिटायरमेंट फंड के भरोसे रहते है. इस कैटेगरी के साथ प्रोब्लम ये है कि ये लोग ज्यादा टैक्स पे करते है जबकि इनकी जॉब भी रिस्की होती है. इन्हें हर रोज़ जॉब छूटने का डर रहता है. मिडिल क्लास लोग ये नही सोचते की भला मै क्यों स्टॉक मार्किट में इन्वेस्ट करूँ और टैक्स पे करूँ जबकि मै इस पैसे को एक टैक्स फ्री इन्वेस्टमेंट में यूज़ कर सकता हूँ जिसमे कम रिस्क हो और हायर रीटर्न हो? यो लोग ये भी नही सोचते कि मै ज्यादा टैक्स क्यों पे करूँ जब मै कम अमाउंट पे कर सकता हूँ या और भी अच्छा होगा कि अगर मै टैक्स पे ही ना करूँ? ऐसी चीज सिर्फ रिच लोग सोचते है चलो इसका जवाब नेक्स्ट पॉइंट में देते है.

3) रिच इनकम : अमीर लोगो की इनकम (Rich income)
इसे पैसिव इनकम बोलते है जिसमे टैक्सेस काफी कम या ना के बराबर होते है लेकिन इस टाइप की इनकम किसके पास है? इसका आन्सवर है स्टीव जॉब्स. स्टीव जॉब्स की ओर्डीनेरी सेलरी सिर्फ 1$ थी, और
हमारी सोसाइटी के टर्म के हिसाब से उन्हें एक गरीब इंसान माना जायेगा. लेकिन असलियत एकदम डिफरेंट है, रियेलिटी में वो एक मल्टी बिलेनियर है. क्यों/ क्योंकि एक प्रोफेशनल इन्वेस्टर के तौर पर वो “बी” और “आई” क्वेड्रेन्टके लोगो की तरह स्टॉक खरीदते या बेचते नहीं बल्कि उन्होंने अपनी खुद की कंपनी क्रियेट की जिसमे उनके स्टॉक्स का एक बड़ा अमाउंट है और इसीलिए वो इतने रिच है. फाइनली, अब आपको रिच डैड का कैश फ्लो और उनकी वेल्थ का सीक्रेट समझ आ गया होगा. तो अब हम नेक्स्ट पार्ट में कॉपीकेटिंग के बारे में सीखेंगे कि ये हमेशा बुरी चीज़ नहीं होती है बल्कि कभी-कभी किसी आलरेडी सक्सेसफुल बिजनेस मॉडल को कॉपी करना भी अमीर होने का सीक्रेट होता

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पार्ट ||: पैसे कमाने के लिये हम बिजनेसमैन भी बन सकते है.
इंट्रो: चूज़ Intro: Choose बिजनेसमेन रूट फोलो करने के लिए और फाइनली उस कैश फ्लो के लिए जो “बी” क्वेड्रेन्टमें है, हमारे पास दो options है.
option 1:- या तो वर्ल्ड के मोस्ट सक्सेसफुल लोगो को कॉपी करो
या option 2:-जीरो से स्टार्ट करो यानि एक नए untested आईडिया से शुरुवात करो.
इन दोनों चॉइस के अपने एडवांटेजेस और डिसएडवांटेजेस है, कोई किसी से कम नहीं लेकिन फिर भी आप अपने दिल की सुनो. तो इसलिए पहले हम सक्सेसफुल लोगो को कॉपी करने के बारे में बात
करते है.
चैप्टर 1: सक्सेसफुल लोगो को कॉपी करने में शरमाये नही
करीब 40 की उम्र वाला एक बिजनेस अपनी मिड लाइफ क्राइसिस से गुजर रहा था, उसे वाकई में पैसे
की बड़ी तंगी थी तो इसलिए उसने एक फाईनेंशियल एडवाईजर के साथ मीटिंग फिक्स की. अपोइन्टमेंट
वाले दिन वो एडवाइजर के ऑफिस गया तो देखा वहां दो दरवाजे थे. एक दरवाजे के बाहर लिखा था”
एमलोर्दद” और दसरे पर लिखा था ‘सेल्फ एमलोईड” उसने एम्प्लोइड वाला दरवाजा ओपन किया क्योंकि वो भी एक एम्प्लोई था. और जब उसने वो दरवाजा खोला तो अंदर फिर से दो दरवाजे मिले. एक में लिखा था” साल में 20 लाख से कम पैसे कमाते है” और दुसरे डोर पे लिखा था” साल में 20 लाख से ज्यादा कमाते है”.

अब वो साल के 20 lakh से कम कमाता था तो उसने वो डोर खोल दिया. उसे अंदर फिर से दो दरवाजे मिले.
एक में लिखा था “साल में 5 lakh से ज्यादा सेव करते है’ और दूसरे में लिखा था” साल में 5 लाख से कम सेव करते है”, उसने दूसरा डोर खोला क्योंकि उसकी सेविंग ज्यादा नहीं थी और उस टाइम तो उसके अकाउंट में सिर्फ 1 लाख थे. ये डोर खोलने के बाद वो अंदर गया तो देखा कि वो फिर से वही पहुँच गया है जहाँ से वो
अंदर आया था! इस स्टोरी से हमने क्या सीखा? हमने सीखा कि अगर हम सेम चॉइस बार-बार चूज़ करते है तो हम एक ही जगह पर अटक कर रह जायेगें जहाँ से हमने शुरुवात की थी. आप कभी आगे मूव नहीं कर पाओगे. आगे बढ़ने का एक ही तरीका है कि डिफरेंट डोर चूज़ करो ताकि डिफरेंट रिजल्ट्स मिले. लेकिन डिफरेंट डोर हम चूज़ कैसे करे: एक तरीका ये है कि हम उनको कॉपी करे जो लोग सक्सेसफुल है, लाइफ के 30 साल लगाकर किसी चीज़ को सीखने से बैटर है कि हम साल भर में ही दूसरे के एस्पिरियेश से वो चीज़ सीख जाए. जानना चाहते है ये कैसे होगा? तो चलो कॉपीकेट की इस दुनिया के बारे में सुनते है.

Chapter 2: दूसरो के आईडियाज से कैसे सीखे इंसान से बढकर कॉपी केट भला और कौन होगा?
जिस दिन से पैदा होता है, कॉपी करना शुरू कर देता है. हम लोग हर चीज़ कॉपी करते है. हम अपने
पेरेंट्स की लेंगुएज कॉपी करते है, उनका एक्सेंट, उनके बोलने का ढंग, उनके चलते का ढंग, हम स्कूल
जाते है तो लैटर्स कॉपी करते है फिर तब जाके हम लिखना सीखते है. हम लोगो से ड्राइव करना सीखते है,
कहने का मतलब है कि हम लोग ऑलमोस्ट हर चीज़ दूसरो से कॉपी करते है लेकिन अब तक हमने वेल्थ
क्रियेट करने का कोई कॉपी केट तरीका नहीं सीखा. कॉपीकेट मार्केटिंग 101 के ऑथर बुर्के हेजेज (Burke
Hedges,) कहते है कि उनके ग्रेट ग्रैंडफादर यानि उनके डैड ने अपने बेटो को एक स्टोरी सुनाई थी जो
आगे की जेनरेशन ने अपने बच्चो को सुनाई और इस तरह वो स्टोरी हेजेज ने भी सुनी. Hedges के ग्रेट ग्रैंड फादर की एक छोटी सी शॉप थी जहाँ वो क्लोक् यानी घडियां बेचते थे. हर रोज़ एक अजनबी उस शॉप से गुजरता. वो शॉप के सामने रुककर अपनी घड़ी निकाल कर देखता और अपने रास्ते चला जाता. हेजेज के ग्रेट ग्रैंडफादर को थोड़ी हैरानी हुई. नेक्स्ट डे जब वही आदमी फिर से उनकी शॉप के सामने आया तो उन्होंने उससे पुछा कि वो रोज़ उनकी शॉप के सामने आपनी घड़ी क्यों चेक करता है.

इस पर उस आदमी ने जवाब दिया कि” मै हर रोज़ 5 बजे व्हिसल ब्लो करता हूँ इसलिए आपकी शॉप की
घड़ियों को देखकर मै श्योर कर लेता हूँ कि टाइम सही है”. अब क्योंकि वो हर रोज़ वही काम एक्जेक्टली 5 बजे करता था इसलिए वो उनकी शॉप पे आके अपनी घड़ी का टाइम चैक कर लेता था. हेजेज के ग्रेट ग्रांडफादर इस बात पे हंस पड़े क्योंकि वो भी उस अजनबी के आने का टाइम चैक करके अपनी घड़ियों का टाइम सेट करते थे. असल में दोनों एक दुसरे को कॉपी केट कर रहे थे और उन्हें इस बात का पता भी नहीं था. इस स्टोरी से ये बात साफ ज़ाहिर होती है कि लोगो को ब्लाइंडली कॉपीकेट करने के कुछ नुकसान भी है. क्योंकी बगैर सोचे समझे कॉपी करना महंगा भी पड़ सकता है. इसलिए खुद से एक सिंपल सा सवाल करो, क्या आप दुनिया के 95% लोगो को काँपो करोगे, एक स्टेबल और अच्छी जॉब और फिर 65 की उम्र में
बैंकरप्ट ? या फिर आप उन 5% लोगो को कॉपी करना चाहेंगे जिन्होंने खुद अपने लिए वेल्थ क्रियेट करने के रास्ते इन्वेंट किये है ? वेल्थ, वेल्थ, वेल्थ. लेकिन एक मिनट रुको, असली वेल्थ आखिर है क्या? क्या कभी सोचा है आपने इस बारे में? असली वेल्थ का मतलब क्या ये है कि आप जो चाहे वो खरीद ले? एक्चुअल में असली वेल्थ का मतलब है कि आपके अंदर इतनी एबिलिटी हो कि

आपके पास जब चाहे, जितना चाहे उतना पैसा और टाइम हो . देखा आपने ? बात सिर्फ पैसे की नहीं है मेरे
फ्रेंड, बल्कि टाइम की भी है. डॉक्टर्स की जॉब हाईएस्ट पेड प्रोफेशन में से एक है लेकिन उनके पास टाइम ही
नहीं कि वो अपनी फेमिली के साथ टाइम स्पेंड करे या फिर उस पैसे को एन्जॉय कर सके. उन्हें मालूम है कि
जिस दिन वो जॉब छोड़ देंगे देंगे तो उनकी कमाई भी रुक जायेगी! तो आप इस “टाइम-फॉर-मनी” ट्रेप को कैसे अवॉयड करेंगे? आपका बेस्ट आप्शन है रेजीड्यूएल इनकम? अब हम में से कई लोग सोचेंगे कि ये है क्या? बेसिकली रेजीड्यूएल इनकम वो इनकम है जो आपकी अर्निंग का सोर्स होती है चाहे आप पर्सनली इन्वोल्व हो या ना हो या फिर ये इनडायरेक्टली दूसरा नाम है…गेस करो? जी हाँ, पैसिव इनकम का यानि बिना काम करे या बहुत कम काम करे हम इन्कम कैसे कमा सकते है.

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चैप्टर 3: अपने टाईम को पैसो के लिये बेचना बन्द करो

हम में से ज्यादातर लोग जिसमे आप भी शामिल है, हम सबके पास एक 50/50/50/50 प्लान होता है.
हम वीक में 50 आवर काम करते है, साल के 50 वीक्स काम करते है, 50 सालो तक काम करते है
और जब हम रिटायर होते है तो हमको 50% पेंशन मिलती है उस अर्निंग की जो आपने आज तक कमाई
है. गवर्नमेंट अब और पेंशन नहीं देगी आपको, और प्रोब्लम ये है कि जो आप कमाते थे, वो काफी नहीं था
इसलिए इमेजिन करो कि अगर ये सिर्फ 50% ही है तो रिटायर होने के बाद आप क्या करोगे? लेकिन टेंशन
मत लो. इस बारे में logically सोचो. ये हमारे साथ होगा अगर हम आज भी अपने टाइम को पैसे के लिए
ट्रेड कर रहे है. ज़रा इस इक्वेशन को एक्जामिन करते है: हमें एक आँवर में कितने पैसे मिलते है X हम कितने आँवर काम करते है = हमारी इन्कम इस इक्वेशन का सिंपल मतलब है कि हमको वही मिलता है जितना टाईम हम देते है, इसलिए अगर हम कम टाईम देते है तो हमारी इन्कम भी कम होगी और ज्यादा टाईम देंगे तो इन्कम ज्यादा मिलेगी. ओके, इसे एक एक्जाम्पल से समझने की कोशिश करते है तो लोग जिनकी डिफरेंट जॉब्स है पहले का नाम है जॉन, जॉन के पास एक शॉप है जहाँ वो फ्लावर(phul) बेचता है. ट्रांसपोर्ट का खर्चा निकाल कर वो इस काम से करीब हर घंटे के 10$ तक कमा लेता है. और अगर किस्मत अच्छी हुई तो दिन के 10 घंटे और हफ्ते में 6 दिन काम करने के बाद वो करीब 600% पर-वीक कमा लेता है. अगर वो हर साल 50 वीक्स काम करे तो उसकी इनकम साल की 30,000$ होगी. यानी काफी अच्छा अमाउंट है. कई लोग इतने के लिए भी तरसते है.

हालाँकि 30,000$ जॉन की साल की मैक्सिमम इनकम है. इससे ज्यादा वो कमा भी नहीं सकता. मेन
बात तो ये है कि ना तो उसके पास फेमिली के लिए टाइम है और ना ही वो कभी ब्रेक लेता है. और उसकी
इनकम भी लीनियर ग्रोथ पर बेस्ड है. उसे एक ही बार पैसे मिलते है और एक बार पैसे मिलने के बाद फिर से
वही रेट रेस शुरू हो जाती है यानी कि “पैसो के लिये टाईम बेचो रेस”. उसके पास और कोई ऑप्शन भी
नहीं है. जिस दिन वो अपने लिए टाइम निकालने की सोचेगा उसकी अर्निंग बंद हो जायेगी. अर्निंग नहीं होगी
तो ज़ाहिर है उसे और उसकी फेमिली को प्रोब्लम्स फेस करनी पड़ेगी. अब दुसरा एक्जाम्पल लेते है आपका, मान लो आप एक surgeon doctor है और आप साल का 150,000$ कमाते हो, वैसे तो ये काफी बड़ा अमाउंट है फिर भी आपको डेली 10 घंटे और हफ्ते 6 दिन काम करना पड़ेगा, यानी कि आप अपनी नौकरी के गुलाम है. डेली 10 घंटे काम करने के बाद आप इतने थक जाते है कि अपने बच्चो के लिए भी टाइम नहीं निकाल पाते. अब मेरे ख्याल से ये आपकी ड्रीम लाइफ तो बिलकुल नहीं है. राईट? तो देखा आपने कि प्रोब्लम एक्चुअल में है कहाँ पर? आप चाहे कितनी भी कोशिश कर ले, चाहे साल के 30,000$ हो या 150,000$, अगर एक बार आपने जॉब छोड़ी या काम करना बंद किया तो आपकी इनकम रुक जायेगी.

एक एंटप्रेन्योर्स की इनकम काफी ज्यादा होती है, शायद 3 मिलियन डॉलर साल के आस पास, जबकि
उसके एम्प्लोईज सिर्फ 20,000$ तक कमाते है. लेकिन सवाल ये है कि ऐसा क्यों है? क्योंकि एक
बिजनेस मैन जानता है कि अपने पैसे से कैसे काम करवाया जाए. उसके एम्प्लोईज ही उसके लेवरेज है जो
उसके लिये काम करते है, वो खुद के 100% एफोर्ट के बजाये अपने 100 एम्प्लोईज से 1% एफोर्ट करवायेगा
से कमाई कर लेगा और यही उसकी लेवरेज है, सिक्ल है. लेकिन वेट, मतलब कि लेवरेज का होना ही काफी है क्या? बिलकुल भी नहीं, क्यों? क्योंकि अगर आपके पास कुछ है मगर आपको उसका यूज़ करना नहीं आता तो वो बेकार होगा. आपको अगर अपनी लेवरेज यूज़ करनी नहीं आती तो कोई फायदा नहीं. आपके लिए उसका होना ना होना बराबर है. तो आप लेवरेज यूज़ कैसे करेंगे? ये होगा समार्ट वर्क से ना कि हार्ड वर्क से इसे और अच्छे से समझने के लिए, मै आपको 1888 के टाइम में ले जाता हूँ, अगस्त की बात थी. असा कैंडलर (Asa Candler) ने 2,300$ में कोका कोला नाम की एक कार्बोनेटेड ड्रिंक के फाउंटेन के एक्सक्ल्यूसिव राइट्स खरीदे.

ये ड्रिंक काफी पोपुलर हुई, ऑलमोस्ट हर ड्रग स्टोर में एक ड्रिंक फाउंटेन होता था जहाँ लोग आते और
5 सेंट्स में कोका कोला पी सकते थे. फिर एक दिन कैंडलर (Candler) ने एक हिस्ट्री चेंजिंग डिसीजन
लिया. कैंडलर का एक फ्रेंड उनके ऑफिस में मिलने आया. उसने कैंडलर से बोला कि मै तुम्हे एक कुछ पैसे
के बदले एक एडवाईज दे सकता हूँ जिस से तुम्हारी दे कम्पनी कई गुना बढ जायेगी। कैंडलर कुछ देर तो
सोचते रहे फिर मान गया उनका दोस्च उनके करीब आया और बोला” coca cola को फाउनटेन में नही
बोतल में डालकर बेचो” और फिर बस हिस्ट्री क्रियेट हो गयी. कोका कोला की बोटलिंग से पहले लोगो को कोका कोला पीने ड्रग स्टोर जाना पड़ता था. तो कंपनी का प्रॉफिट सिर्फ इस बात पे डिपेंड था कि कितने लोग टाइम और एफर्ट लगाकर कोका कोला पीने ड्रग स्टोर तक आयेंगे. लेकिन इसकी जब बोटलिंग शुरू हुई तो एक लेवरेज क्रियेट हुआ. कंपनी ने टाइम, एफोर्ट और लोकेशन को लेवरेज किया था. अब कोई भी ईजिली जब चाहे कोका कोला की

बोटल्स खरीद कर अपने घर में एन्जॉय कर सकता था. जैसे मान लो किसी ने 6 पैक ले ली तो उसके पास खुद का कोका कोला फाउन्टेन घर पे ही अवलेबल हो गया. यही लेवरेज है, यानी स्मार्ट तरीके से किसी काम को करना. आप मेहनत से ज्यादा दिमाग लगाकर कोई काम करते है तो आप उसे लेवरेज कर रहे है. यानी सिंपल वर्ड्स में कम टाइम और एफोर्ट में ज्यादा पैसे कमाने का तरीका. । कंपनी को लेवरेजिंग करने
का एक दूसरा तरीका देखते है, यानी फ्रेंचाईजी के श्रू. आज पूरे वर्ल्ड में फ्रेंचाइजिंग एक मोस्ट कॉमन बिजनेस है, आज दुनिया की आधी से ज्यादा चीज़े हमे फ्रेंचाईजी बिजनेस के श्रू अवलेबल होती है. ये काफी अच्छा बिजनेस है लेकिन इसका एक बहुत बड़ा डाउनसाइड भी है. और वो है इसकी स्टार्ट-अप कॉस्ट बहुत ज्यादा है. क्योंकि हर एक के पास 1 मिलियन डॉलर नहीं होता कि वो मैकडोनाल्ड की फ्रेंचाईजी ले सके. और अगर किसी के पास इतना पैसा है भी तो सिर्फ एक शॉप खोलने से काम नहीं चलने वाला. आपके पास जितनी ज्यादा शॉप्स होंगी, अर्निंग उतनी ही ज्यादा होगी और उसी में आपकी सक्सेस छुपी है. लेकिन, हमारा सवाल ये है कि इतना पैसा क्यों खर्च करे जब सिर्फ 500$ से हम एक स्टार्ट-अप खोल सकते है? और इसके सक्सेस के चांस भी काफी है. आप पूछेगे वो कैसे? तो हम बताते है. आप जो काम एक बार में करते है उसके लिए आप 1000 गुना ज्यादा कमा सकते है बजाये इसके कि आप वही काम 1000 बार करे. जैसे मान लो, आपने 25 साल पहले अपनी सेविंग में से 10,000$ निकाले और किसी स्टार्ट-अप कंपनी में जैसे reliance में इन्वेस्ट कर दिए. ध्यान रहे मैंने इन्वेस्टिंग बोला है स्पेंडिंग नहीं. खैर, अब 10,000$ जो आपने 25 साल पहले इन्वेस्ट किये थे, आज उसकी कीमत 40 मिलियन डॉलर हो चुकी है. ये कंपाउंडिंग है

और इस तरह आपने अपने 500$ स्टार्ट-अप को कुछ सालो बाद मिलियन में बदल सकते है. तो बेसिकली कई डिफरेंट तरीके है जो हम आज जीरो रिस्क पर मिनिमम इन्वेस्ट करके किसी सक्सेसफुल बिजनेस को कॉपीकेट कर सकते है. इनमे से एक तरीका है इंटरनेट मिलेनियर्स को कॉपी करना जिन्होंने पहले से ही सक्सेसफुल बिजनेस खड़े किये है. ये मेरा फेवरेट मेथड है क्योंकि हमे ज्यादा कुछ इन्वेस्ट नहीं करना पड़ता. अपनी जॉब इनकम का एक छोटा सा पोर्शन यूज़ करके भी हम इस तरह का बिजनेस शुरू कर सकते है.
और अगर हम फेल भी हो जाते है तो भी ये हमे उस ट्यूशन फीस से तो सस्ता ही पड़ेगा जो आजकल ट्यूटर
पांचवी के बच्चे को पढ़ाने का ले रहे है. इस तरह के मेथड्स में ड्राप-शिपिंग, यू-ट्यूब चैनल क्रिएटिंग या
डिजिटल प्रोडक्ट क्रिएट करने जैसी चीज़े आती है. मुझे लगता है आपको मेरा पॉइंट समझ में आ गया होगा.
तो अब अगर आप वाकई में डिजिटल स्पेस में इंटरेस्टेड है तो आपको इस एरिया में थोडा एक्सप्लोर करना होगा.

तो दोस्तो डिजिटल स्पेस बेसिकली एक कॉपीकेटिंग मार्केटिंग है, ये आपका फर्स्ट आप्शन है अर्निंग का जहाँ
आप “ई” या “एस” क्वेड्रेन्ट के बजाए “बी” क्वेड्रेन्ट से स्टार्ट करेंगे लेकिन वेट, ये आपका फर्स्ट आप्शन ही है.
सेकंड आप्शन होगा किसी ऐसे आईडिया से स्टार्टिंग करना जो एकदम नया हो. मगर ध्यान रहे जब भी आप
कोई न्यू आईडिया लाये तो इसे टेस्ट करते रहे. अब आप पूछेगे कैसे? तो अपने नेक्स्ट पार्ट में हम इसका
तरीका आपको बताएँगे.

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Part 3:- द लीन स्टार्ट-अप ( The lean startup)

चैप्टर 1 : स्टार्ट-अप्स (Chapter 1: Startups)
“स्टार्ट-अप” वर्ड सुनते ही फर्स्ट चीज़ आपके माइंड में क्या आती है? एक पुराना सा गैराज जहाँ कुछ
टीनएजर्स अपने किसी न्यू आईडिया पर काम कर रहे हो? वेल, एप्पल भी ठीक ऐसे ही स्टार्ट हुआ था लेकिन
मेरी बात थोडा ध्यान से सुनो. जीरो से स्टार्ट-अप ओपन किया जा सकता है मगर क्या आपको पता है कि आप किसी कंपनी से भी कोई नया स्टार्ट-अप शुरू कर सकते हो? जब भी मार्किट में कोई नया प्रोडक्ट आता है, तो हमे एक प्रॉपर मेथड यूज़ करना होता है ताकि हमारा प्रोडक्ट मार्किट में चल सके और वो भी कम से कम इन्वेस्टमेंट के साथ. इस मेथड को हम”द लीन स्टार्ट-अप” बोलते है. और अपने आगे के चैप्टर्स में हम इसी पर बात करने वाले है.
चैप्टर 2: बडा सोचो लेकिन स्टार्ट छोटे से करो एरिक रिएस ने अपने कुछ कॉलेज फ्रेंड्स के साथ मिलकर एक स्टार्ट-अप खोला. उनका प्रोडक्ट था एक ऑनलाइन वेबसाईट जहाँ लोग अपने प्रोफाइल्स, एक्सपिरिएंस और क्वालिफिकेशंस शेयर कर सकते थे ताकि कंपनी एम्प्लोयर वेबसाईट पे जाकर अपनी
रिक्वायरमेंट के हिसाब से लोगो को हायर कर सके. ये प्रोडक्ट एकदम परफेक्ट था. एकदम नया. स्मार् और एक वंडरफुल आईडिया. और उनकी टीम में भी एक्स्पेश्न्ल लोग थे. और टेक्नोलोजी जो उन्होंने यूज़ की थी वो भी परफेक्ट थी. लॉन्ग स्टोरी को शोर्ट में बोले तो इस स्टार्ट-अप बिजनेस की हर चीज़ परफेक्ट थी. लेकिन आपको मालूम है हुआ क्या? ये स्टार्ट-अप फेल हो गया.

लेकिन ये हुआ कैसे? क्योंकि हर स्टार्ट-अप सक्सेसफुल नहीं होता. हालाँकि कुछ ऐसे श्योर वेज़ है जिन्हें
अप्लाई करके स्टार्ट-अप को सक्सेसफुल बनाया जा सकता है. और यही एरिक ने भी किया जब उसने एक
और स्टार्टअप शुरु किया जिसका नाम था आईएम्वीयू (IMVU) IMVU एक सोशल नेटवर्क था जहाँ पर लोग फ्रेंड्स बना सकते है, अपने लिए कोई अवतार चूज़ कर सकते है और अपने केरेक्टर के लुक्स 3 डी में कस्टमाईज कर सकते है. हालाँकि इस टाइम उन्होंने अपना प्रोडक्ट लॉन्च करने के लिए खुद का मेथड इन्वेंट किया जिसे ट्रेडिशनल सेन्स में एक यूज़ मिस्टेक माना जाएगा. एरिक ने अपनी टीम के साथ मिलकर शुरुवात में ही मिस्टेक कर ली थी, इन्होने एक बीटा प्रोडक्ट बनाया और उसे तुरंत ही पब्लिक को बेच दिया. जोकि एक बड़ी मिस्टेक थी ट्रेडिशनल सेन्स में, क्योंकि प्रोडक्ट मार्किट में आने से पहले फूली कम्प्लीट होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि ये सक्सेसफुल हो गया.

क्यों?
क्योंकि ये नया बिजनेस मॉडल है, एक न्यू स्ट्रेटेजी जो एरिक ने डिस्कवर की थी और इसी का नाम है लीन
स्टार्ट-अप. लेकिन ये लीन स्टार्ट-अप आखिर है क्या? लीन स्टार्ट-अप मेनली ट्रायल और एरर पर बेस्ड होते
है. आप अपना स्टार्ट-अप का पहला वर्जन बनते ही शुरू कर देंगे, एक मिनट भी लेट नहीं, और शुरुवात
के दौरान ही आपको अपनी मिस्टेक्स पता लग जायेगी जिन्हें आप तुरंत करेक्ट भी कर लेंगे और इम्प्रूव
भी. और ये बेस्ट वे है स्टार्टअप स्टार्ट करने का क्योंकि इससे आपकी कोंटीन्यूएस इम्प्रूटमेंट्स होती रहती है
फिर चाहे जो भी आपका प्रोडक्ट हो. और यही वजह है कि 2011 में आईएम्वीयू ने 50 मिलियन डॉलर कमाए
थे. अब हम में ये कई लोग सोचेगें कि लीन स्टार्टअप का एक्जेट रुल क्या है रूल्स, हर चीज़ रूल्स से चलती है. तो चलो, लीन स्टार्ट-अप के रूल्स की बात करते है. हम मोस्ट इम्पोर्टेट वाले से शुरू करेंगे. ज़रूरी नहीं कि हर न्यू बिजनेस आईडिया किसी गैराज से शुरू हो. आप कहीं से भी, कभी भी स्टार्ट कर सकते हो, कोई एक्चुअल प्लेस ना हो तो भी चलेगा. ऑनलाइन भी स्टार्टिंग की जा सकती है. और यही हमारा फर्स्ट रुल है, आपको अपने माइंड को ओपन रखना होगा ताकि आपको कई सारी पोसिबिलीटीज नजर आ सके.
सबसे बढ़िया बात तो यही है कि लीन स्टार्ट-अप किसी भी कंपनी में अप्लाई कर सकते है. चाहे कंपनी बडी हो या छोटी, किस टाइप का प्रोडक्ट है, क्या ऑफर करता है, हर सिचुएशन में लीन स्टार्ट-अप अप्लाई किया जा सकता है. हमारा सेकंड रुल है मैनेज करना, मैनेजमेंट मोस्ट इम्पोर्टेट रुल है, अगर आप अपने लोगो, अपने वर्कर्स को मैनेज नहीं कर पा रहे तो आप अपना स्टार्ट-अप कभी मैनेज नहीं कर सकते.

और हमारा थर्ड रुल है: हम एक्सपेरिमेंट कर सके जहाँ हम टेस्ट कर सके कि हमारे स्टार्ट-अप के लिए
क्या काम करेगा और क्या नहीं. कहाँ पर इम्प्रूवमेंट की ज़रूरत है और क्या चीज़ सस्टेनेबल है और डेवलपमेंट की गुंजाइश रखती है. ये वेळीडेशन लर्निंग है. हमारे फोर्थ रुल में थ्री मेन थिंग्स है जिनसे हम अपने आईडियाज को प्रोडक्ट में टर्न करेंगे और अपने कस्टमर्स के फीडबैक से प्रोडक्ट को जज करेंगे.
इसे हम बोलते है बिल्ड-मेजर-लर्न लूप. और हमारा लास्ट बट नॉट लीस्ट रुल है प्रोग्रेस. आपको, आपकी
टीम को और आपके प्रोडक्ट को साइकल ऑफ़ बिल्ड-मेजर-लर्न लूप से गुज़रना पड़ता है तो इसकी
हैबिट बना लो क्योंकि इसके बिना कोई पोग्रेस नहीं होगी. और प्रोग्रेस नहीं होगी तो आपका स्टार्ट-अप
successful नही हो पाएगा. मुझे लगता है कि शायद अभी आपको लीन स्टार्ट-अप थोडा और समझने की जरूरत है. मगर टेंशन मत लो हम अपने नेस्क्ट चैप्टर में एक और स्टोरी के श्रू इसे एक्सप्लेन करने की कोशिश करेंगे.

चैप्टर 3: ये MVP क्या है
मुझे नहीं पता कि आपने इसका नाम सुना है या नहीं मगर शूज़ का एक ऑनलाइन स्टोर है जिसका
नाम है (zappos) ज़प्पोस जोकि शूज़ की लार्जेस्ट ऑनलाइन शॉप है. इन फैक्ट ये काफी सक्सेसफुल
स्टोर है जिसकी एनुअल सेल्स 1 बिलियन यू.एस. डॉलर है इसलिए चलो देखते है कि ज़प्पोस कैसे काम
करता है. निक स्विनमर्न (Nick Swinmurn,) ज़प्पोस के फाउन्डर ने जब ये वेबसाईट स्टार्ट की थी
तो उन्होंने सिर्फ उस चीज़ पर फोकस किया जो उन्हें चाहिए और सबसे इम्पोर्टेट जो लोगो को चाहिए. लोगो
को एक ऐसी रिलाएबल ऑनलाइन शॉप चाहिए थी जहाँ उन्हें डिफरेंट ब्रांड के शूज़ अवलेबल हो. एक
ऐसी ऑनलाइन शॉप जहाँ लोग घर बैठे मनपसन्द जूते खरीद सके और पंसद ना आने पर रीटर्न भी सके.
लेकिन निक को ऐसी कोई शॉप नहीं मिली तो उन्हें एक आईडिया आया कि क्यों ना वो खुद का एक ऑनलाइन शू स्टोर खोले. लेकिन उन्होंने शुरु कैसे किया? ऑफकोर्स स्माल लेवल पर. उसने अपनी वेबसाईट के लिए सबकुछ खुद क्रियेट करने का वेट नहीं किया बल्कि वो शू स्टोर्स में गया, ओनर की परमिशन लेकर जूतों की photos ली और वो पिक्चर्स अपनी वेबसाईट पे अपलोड कर दी. और जब कोई वेबसाईट विजिट करता और उसे कोई जूता पंसद आता तो निक खुद दूकान से जाकर वो जूता खरीद लेता और उस कस्टमर को बेच देता. उसने अपने इस स्टार्ट-अप में एक एक्सपेरीमेंट किया और लॉन्ग टर्म प्लानिंग के बिना ही स्टार्टिंग कर दी.

उसके बाद रियल कस्टमर्स से बात करने के बाद उसे इस बात का जवाब मिल गया कि क्या लोग वाकई में
जूते ऑनलाइन खरीदना चाहते है या नहीं. उसे हैरानी हुई कि ज्यादातर लोग ऑनलाइन शू स्टोर ढूंढ रहे थे.
रियल कस्टमर्स से बात करके ही उसे रिलाएबल जवाब मिला. लेकिन अगर वो रियल कस्टमर्स से बात करने के बदले मार्किट रीसर्च करता तो क्या होता? ज़ाहिर सी बात है कि तब उसे उतना एक्यूरेट डेटा नहीं मिलता जितना कि रियल लोगो से बात करने के बाद मिला. ये स्टोरी लीन स्टार्ट-अप की एफिशिएंसी प्रूव करती है. और साथ ही कंपनी का काफी सारा टाइम, मनी, और एफर्ट भी बचता है. और फाइनली 2009 में अमेज़ोन ने ज़प्पोस को 1.2 बिलियन डॉलर में खरीद लिया. तो, एमवीपी है क्या?
ये बड़ी सिंपल चीज़ है जो निक ने की थी, एमवीपी का मतलब है मिनिमम वाएबल प्रोडक्ट, ये उस प्रोडक्ट
का इनिशियल वर्जन है जो आप बेचना चाहते है. ये बहुत चीप और ईजी है और बड़ी जल्दी डेवलप
होता है. टाइम के साथ ये खुद ही इम्प्रूव होता है और अल्टीमेटली एक परफेक्ट फाइनल प्रोडक्ट बन जाता है, आपके एक्सपेरीमेंट का परफेक्ट रिजल्ट. तो चलो, लीन स्टार्ट-अप के रूल्स अप्लाई करते है जैसे निक ने किये थे. फर्स्ट, उसने बड़ी अनसर्टेनिटी से शुरुवात की, उसे तो ये भी नहीं पता था कि उसका एक्चुअल प्रोडक्ट चलेगा भी या नहीं. लेकिन उसने एक्स्पेरिमेंल साईट बिल्ड करने के लिए और अपना अज्यूम्प्शन टेस्ट करने के लिए वेलीडेशन लर्निंग अप्लाई की. उसके बाद उसने बिल्ड-मेजर-लर्न अप्लाई किया जहाँ रियल कस्टमर्स से उसका इंटरएक्शन हुआ और फाईनली उसने ये सीखा कि कौन से फीचर्स प्रीजेर्व किये जाए, क्या इम्प्रूव करना है और क्या डीलीट करना

PART 4:- गोइंग फ्रॉम जीरो टू वन (Going from Zero to One)
अगर आप दूसरो को कॉपी नहीं करना चाहते तो कोई बात नहीं, एक और रास्ता है जो आपको बिजनेसमेन
रूट तक ले जा सकता है और जिसमे कॉपीइंग की बिलकुल भी ज़रूरत नहीं. इन फैक्ट, ये इसके एकदम
अपोजिट है. आपको जीरो से वन की तरफ जाना होगा. यानि कोई ऐसा प्रोडेक्ट लाना होगा जो existing
product से कम से कम 10 गुना बढिया हो आईये इसे डिटेल में समझते है।
चैप्टर 1: बिजनेस में हर चीज सिर्फ एक बार होती (Chapter 1: Everything is business happens only once)
आईडिया ये है कि नेक्स्ट बिल गेट्स फिर से ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं बनाएगा, और ना ही नेक्स्ट लैरी पेज
या सेर्जी ब्रिन सर्च इंजिन बनायेगें. अगर कभी नेक्स्ट मार्क जुकरबर्ग हुआ तो वो एक और सोशल नेटवर्किंग
साईट तो बिलकुल नहीं बनाएगा. इस आईडिया according business A monopoly business एक ही बार बनते है . ये principle कहता है कि सक्सेसफुल लोगो को कॉपी करना एक बात है,लेकिन उनके आईडियाज भी कॉपी करना यूजलेस होगा. आजकल का बिजनेस वर्ल्ड ऐसे नही चलता बल्कि आपको जीरो टू वन से स्टार्ट करना होगा. यानी आपको टोटलली न्यू चीज़ क्रियेट करनी पडेगी,

एक नया प्रोडक्ट जो अब तक मार्किट में नहीं आया. अब हम में से ज्यादा लोगो को लगेगा कि यार ये थोडा
रिस्की नही है क्या? बेशक है, क्योंकि आप एकदम नयी चीज़ मार्किट में ला रहे है और आपको ये तक नहीं मालूम कि ये न्यू प्रोडक्ट चलेगा भी या नहीं.कुछ नया, सोचकर ही डर लगता है ना? लेकिन टेंशन मत लो. कुछ ऐसे रूल्स है जो आपको गोल अचीव करने में हेल्प करेंगे. लेकिन सबसे पहले हम जीरो टू वन और वन टू एन के बीच का डिफ़रेंस समझते है. जीरो टू वन तब होता है जब आप कुछ नया क्रियेट करते है जबकि वन टू एन तब होता है जब आप पहले से क्रियेट की गयी चीज़ में इम्प्रूवमेंट करेंगे.
0 to 1
जैसे चाइना को ही ले लो, चाइना का काम है डवलपड वर्ड की हर चीज को कॉपी करना और फिर उसके साथ डूपलिकेट बनाना. इसे globalization कहते है यानि 1 से n की तरफ जाना. चाइना वाले बनी बनाई
चीज़ को लेकर उसमें कुछ मोडीफिकेशन करके उसे इम्प्रूव कर लेते है. लेकिन एक बात हेमशा याद रखो,
किसी भी स्टार्ट-अप की सबसे बड़ी ताकत एक यूनीक थौट ही है. यही जीरो टू वन जाने का स्टेपिंग स्टोन है.
कुछ डिफरेंट सोचो, अगर आप भी जीरो टू वन जाना चाहते है तो सबसे पहले कुछ डिफरेंट सोचो, खुद से
पूछो” ऐसा कौन सा वैल्यूएबल बिजनेस है जो अब तक किसी ने नहीं खोला?”

ये सवाल जिना मुश्किल लग रहा है ये उस से कही ज्यादा मुश्किल है. क्योकि हो सकता है कि आपने
कस्टमर के लिये बहुत ज्यादा वेल्यू प्रोवाईड कर रहे हो लेकिन आप खुद उस वेल्यू को केपचर ना कर पाओ
Kyunki value create karna aur value capture karna 2 alag alag baate hai. Udharanketaur pe, U.S. ke airline business apne passengers ko har saal billions ki value provide karte hai. Lekin 2012 me, jab ek airplane ki ticket lag bhag $178 thi isme se
har passenger par airlines ne sirf 37 cents kamaaye. Aur 2012 me airlines ne 160 billion dollars ka business kiyatha ab agar aapise google ke saath compare kare to google ne sirf 50 billion ka business kiya tha lekin phir bhi 21% ka profit kamaya, jo ki airline business ke profit margin se 100 times tha. Agar aaps aari airline business industries ko milabhi de to bhi google ne us saal sab se 3 times zaada kamaya tha. Ye isiliye hai kyunki saare airline business ekdusre se compete karte hai lekin google ek monopoly create karke apne ko sabse alag rakhta hai. Ek perfet competition me har same products bnati hai. Aur isiliye unhe apne products us keemat par bechne padte hai jo market me bikega. Agar aisi market me profit ho rha ho to nayi firm aayegi aur product ke prices ko aur kam daamo me beech degi. Aur agar bhut saari firm in competitive market me aa jaati hai to vo prices aur kam ho jayenge. Ek perfect competition me koi bhi profit nhi kamaata.

Lekinek monopoly business mein, monopoly, market me complete control rakhti hai. Kyunki inke paas koi competition nahi hai isiliye ye maximum profit kamaate hai.
Monopoly apneaap ko bachane ke liye hamesha jhooth bolti. Agar koi company apni monopoly ko accept karti hai to iska matlab hai vo market ka maximum profit earn kar rhe hai aur isiliye government agency unpar regulations laga dengi. Agar hum google ki bat kare to google ka bhi apne ko monopolynhi bolti. Agar google apne ko sirf ek
search engine bole to government use monopoly samjhegi. Kyunki 2014 me saari searches ke mukaable google me 68% searches hui hai.

Google ke closest competitors Mircrosoft ke Bing me sirf 19% aur Yahoo me 10% searches hui. Itna hi nahi ab google OXFORD ENGLISH DICTIONARY me enter kiyajaa
chukka hai as a VERB. Lekin agar google apneaap ko ek advertising company bole to..?
U.S. ki search advertising market hai $17 billion. Aur U.S. ki puri advertising market hai $150 billion. Aur puri duniya ek $495 billion ki advertising market hai. Aur ab google apne ko itne competitive world me ek chotta sa player bol sakta hai jaha par uska
market share ab sirf 3.4% hai. Lekin Ek non-monopoly company bhi jhuth bolti hai taaki vo apne ko alag bata sake. Maan lijiye aap ek restraunt ka business khol rhe hai. To
aap bol sakte hai ki ye “KOI BHI NHI KAR RHA.” Hum to ek north INDIA me SOUTH INDIAN restraint hai. Lekin aise jhooth hum apne aap se ya apne investors se bolte hai. Kyunki
hum ek competitive market me hai aur ek monopoly nhi ban sakte.

Lekin sawaal ye hai ki hame apne startup ko ek monopoly ki tarah kholna chahiye ya phir ek competitive environment mein? Agar ek startup apni market me monopoly create kar sakta hai to ye uske liye sabse zaada fayedemand hai. Agar hum google ki baat kare to use competition ki koi chinta nhi hai. Vo apne workers ki chinta kar sakta
hai ,apne products ko improve kar sakta hai, Innovation kar sakta hai aur puri duniya me impact daal sakta hai. Lekin aisa karna competitive market me bilkul possible nhi hai. Ek monopoly me naye products bante hai jo ki uske owner ko lagataar profit kama kar dete hai. Jabki competition me profit bhut hi kam hota hai jaha par company ke owners ko apna business sustain karne ke liye bhi struggle karna padta hai. Hum jitna ek dusre se compete karenge hume utna hi nuksaan hoga. Lekin haraini ki baat ye hai ki hamara education system bhi isi theory par chalta hai. 

Itne tezki 8th grade me hi unke dost ne unhe bol diya tha ki chaar saal ke baad teri admission STANFORD me ho jaayegi. Aur aisa hi hua unhone Stanford law school me admission le li aur waha par bhi baaki students kesaath compete karne lag gaye.
Aur unka ab final goal Supreme court me jaana reh gaya tha. Vo is last competition me reh gaye. Lekin peter bolte hai ki agar mein vo last battle jeet jata to aaj mein aur logo ke liye unki business deals bna rha hota. Lein jab unhone apni company paypal start kari to vo logo ke saath compete nhi karna chahte the. Balki kuch different karna chahte the, zero to one jann achahte the. Unka aur unki team ka sapna tha ki vo paiso ko emails ke through transfer karvaaye. 1999 me paise ek jagah se dusri jagah
transfer karna ek bhaut badi problem thi. Aurvo sab isko solve karna chahte the. Aur unhone isi mentality ki vajah se $1.5 billion dollar ki company bhi bna di.

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monopoly business Kaise khol sakte hai:-
to Monopoly business me ye chaar cheese dekhi ja sakti hai:-
1) Proprietary technology:- Agar aap aisa product bna dete hai jise copy karna dusre ke liye bhaut hi mushkil ho jaaye to aap ek monopoly create kar sakte hai Iske liye aapko kam se kam existing technology ko 10 guna improve karna hoga. us mein sudhar karna hoga.to Is se kam sudhar ek chotti sudhar hi maani jayegi aur easily copy bhi ki ja sakti hai. Jab 1995 yani ki nineteen ninety five mai amazon launch hua tha tab vo duniya ka sabse bada book store mana jaata tha. Kyunki agar aap us se kisi aur book store ke saath compare kare to zaada se zaada vol lakh different books apne pass rakh
sakta tha. Lekin amazon sirf supplier se books ki list hi leta tha aur book sirf tabhi khareed ta tha jab customer se order milta. Ye itna effective tha ki Barnes and noble ne amazon ki IPO ke teen din pehle amazon par case kar diya aur kaha “ki amazon apne ko ek book store kehta hai lekin vo ek book broker hai”.

2) Network effects:- Network effect aapke product ko customer ke liye bhut usefull bna deta hai. Agar aapka koi bhi dost facebook par na ho to bhut kam chances hai ki aap
facebook ko use karenge. Aur kyun ki aaj aapka har dost facebook use karta hai to aapko bhi facebook hi use karna padega.Agar aap koi aur social site use karte hai to aapke dost aapko pagal samjhenge.
3) Economies of scale:-Ek bhut hi strong monopoly business create kiya jaa sakta hai agar aap apne busiess ko scale kar sake. Service business ko scale karna bhut mushkil hai. Maan lijiye ki aap yoga classes dete hai to aap limited customers ko hi serve
kar payenge chahe aap zaada yoga instructers ko hire bhi kar le. Apne zyada institutes bhi khol le.Software start-ups ko ye advantage hai ki vo apna business bhaut jaldi scale kar sakte hai. Kyunki software ki ek aur  copy banne aur use bechne le liye almost zero cost lagegi.

4) Branding:-Ek strong famous brand create karna aapko monopoly create karne me madat kar sakta hai. Apple bhut hi carefully apne har product ke liye material khreedta
hai chahe vo iphone ho ya ad. Inke products customers ko itna achcha user experience deta hai ki log maanke chalte hai ki apple Brand ka har product acha hi Hoga. Ab sawaal ye aata hai ki kya monopoly business ko create karne ka koi process hai.
Brand,scale, technology aur network effects ke ellava jab bhi aap startup khole to market ko analyze karke khole aur phir vaha se apna business expand karna shuru kare.
Step one:-Chotte se shuru karo aur phir monopoly bna lo. Aapko hamesha business chotti market se shuru karna hai. Kaaran simple hai, ek chotti market ko kabu karna aur usme monopoly create karnaa bhot a asan hai. Lekin badi market me ye sab karna mushkil hai kyu ki koi bhi bada player aapko apni existing market me ye nhi karne dega. Jab peter ne paypal ka startup start kiya tha to har market me e-wallet ka concept lane ke bajaye ebay ke existing sellers ko apna product offer kiya. Kyunki ye log paise cheque se pay karte the jiski processing ke liye bhut time lag jaata tha. Aur Kyunki ye market bade players ke liye chotti thi, isiliye is market me koi dhyaan bhi nhi de rha tha. Aur teen mahine ke andar paypal ne 25% logo ko apna customer bna liya tha.

Step two :- Apne business ko scale karna.
Jaise hi aap chotti market ko dominate kar do. Phir aap dheere dheere dusri related markets ko dominate kar sakte ho. Agar hum amazon ki baat kare to Jeff Bezos,
amazon ke founder ne, amazon me sirf books bechana shuru kiya tha. Jaha par ek aam dukaandar kam bikne vaali kitaab apni dukano me nhi rakhte the. Amazon hi puri
duniya me ek aisa source ban gaya tha iaha par duniva ki har keetab mil sakti thi. Aur aisa isiliye tha kyunki amazon apni kitaab enni bechta tha balki baaki dukaandaroke ki kitabo ko apni site par dikhata tha. Aur jab customer order dete the tabhi vo kitaab bechta.

Jab amazon ne is market me monopoly bna li uske baad usne softwares, CD, DVD bechna bhi shuru  kar diya. Aur aise hi dheere dheere baaki other categories ko apni
website me jod ta gaya. Isiliye aaj vo duniya ka sabse bda online store hai aur Jeff bezoz duniya ke sabse ameer aadmi.
Step 3:-Shuru me kabhi bhi kisi bade business ko DISRUPT naa kare. Startups ke paas itni funding nhi hoti ki vo ek badi company ko challenge karke use compete kar sake. Agar aap ye galti karte hai to bhut hi jald aap business se bahar ho jaaege.

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WIE 5 Aisa business bnaaye jo logo par nhi system par dependent ho aage baat karte hai aisa business bnaiye jo logo par nahi system par dependent ho.ji haaye concept
kehta hai ki hum business banane koi bhi method choose kare chahe ham starting me dusre businesses ko copy karne ka soche ya phir bilkul shurvaat se ek naya product
laaye..Hame ek cheez to karni hi padegi… aap jaante hai vo kya hai.. Vo hai ki hame business bnana padega yaani aisi team bnani padegi jo khud kaam kar sake.Aaiye ise thoda sa detail me samajhte hai.. kya aap jaante hai ki maximum log jo business karte hai unhe ye hi nhi pata ki business aakhir hota kya hai. Is myth ko samajhne ke liye pehle hum us insaan ko samajhte hai jo business shuru karta hai. Aur hum pehle ye dekhte hai ki vo business se pehle kya kar rha hota hai. Maximum log jo business shuru karte hai vo pehle kisi aur ke liye kaam kar rhe hote hai.

Ab aap puchenge Kya kaam? Koi bhi Technical kaam. Shayad carpenter, mechanic, typist, doctor, plumber, sales person ya phir ek computer programmer. Magar aap kuch bhi kar rhe hote to vo TECHNICAL kaam hi hai .Aur shayad aap usme bhut ache bhi ho gye the. Phir aapke dimaag me khayaal aya. Mein is aadmi ke liye kyu kaam kar
rha hu? Jitna ye is business ke bare me jaanta hai utna to mein bhi jaanta hu. Isse acha business to mein chala sakta hu. to Aap is idea se itne impress ho gaye ki aapne apna business khol diya. Aur ye business khula sabse badi galat fehmi ke saath.ek bhot badi galat fehmi ke saath. Aur vo thi KYUNKI MEIN IS BUSINESS KA TECHNICAL KAAM jaanta hu isiliye KAR SAKTA HU…..ISILIYE MEIN EK AISA BUSINESS BANA SAKTA HUJO VO
TECHNICAL KAAM KAR SAKTA HAI. Ek business ka TECHICAL KAAM aur ek business io vo technical kaam kar sakta hai bilkul alag alag baate hai. LEKIN AAPKO ISKI SAMAJH NHI THI.

Ek hair dresser apna beauty salon ka business start kar deta hai. Ek musician music store khol leta hai. Ek doctor apna clinic khol leta hai. Aap business ka TECHNICAL kaam
jaante the aur ye aapka sabse bada vardaan tha. Lekin ab yahi aapka sabse bada shraap hai. Kyunki acha hota ki aap vo technical kaam karna hi nhi jaante jisse aap VO TECHNICAL KAAM KISI AUR SE KARVA LETE AUR EK BUSINESS BANA LETE. Ab aap yaha par sabse bade bevkoof ke liye kaam karne lag jaate hai. Jo ki hai “aap khud”. Ab aap ko sirf us business ka technical kaam hi nhi karna hai balki uske saath saath 100 aur kaam karne hai jo aapko aate nhi hai. To ab sawaal aata hai ham kare kya… To aaiye ise ham ek example se samajhte hai. Maan lijiye do bhai ek pastry shop ka business kholte hai Eishan aur Siddhant. Ye do bhai ab business partners ban chukke hai. Ye dono ek dusre ka kaam bhi kar lete hai.

kyuki YE BHAI JO HAI. Jab eishan pastry nhi bna rha hota to siddhant bna leta hai. jab siddhant customer ko nhi dekh pata to eishan dekh leta hai. Shuru me business bhaut ache tareeke se kaam kar rha hai ek nayi machine ki tarah. Dukaan bilkul saaf. Sheeshe chamak rhe hai. Customers ko pastries pasand aa rhi hai. Monday ko eishan shop khol deta hai. Tuesday ko siddhant. Wednesday ko eishan. aur fir ye silsila chalta rehta hai.
Ab business badhne laga hai. Ye ek naya employee hire karte hai Sandeep to Sandeep inka bhateeja bhi hai. Ab ye teeno kaam kar rhe hai. jab eishan customer ko nhi dekh
pata to sandeep dekh leta hai. jab sandeep safai nhi kar pata to siddhant kar leta hai.jab siddhant pastry nhi bna paata to eishan bna leta hai. Thode dino ke baad ek aur employee hire kiya jaata hai Kuldeep. Ab charo mil kar ke kaam kar rhe hai

Chaaro safai kar rhe hai, pastry bna rhe hai, customer se baat kar rhe hai, telephone par order le rhe hai aur subha dukaaan khol rhe hai. Lekin suddenly ab pastry ka taste
puraane jaisa nhi rha. Customers complaint kar rhe hai. Eishan siddhant ko dekhta hai siddhant sandeep ko dekhta hai aur sandeep kuldeep ko. Dukaan me theek se safaai nhi ho rhi hai. Dukaan ke sheeshe saaf nhi hai. Ab sabko gussa aa rha hai. LEKIN
SAWAAL YE HAI KI GALTI KISKI HAI. KISNE APNA KAAM theek tareeke se NHI KIYA.
Isme jo eishan aur siddhant ko samajh mai nhi aaya vo ye hai ki is tareeke ke business ka ant aise hi hota hai. Jaha par business logo par nirbhar karta hai na ki systems par.
Jaha par positions define nhi hoti, jaha par har position ka kaam define nhi hota aise business kabhi organize nhi hote. LEKIN AB AAP PUCHENGE KI KYA ISKA SOLUTION HAI??? koi samadhaan hai?BILKUL iska subha dukaaan khol rhe hai.

Lekin suddenly ab pastry ka taste puraane jaisa nhi rha. Customers complaint kar rhe hai. Eishan siddhant ko dekhta hai siddhant sandeep ko dekhta hai aur sandeep kuldeep ko. Dukaan me theek se safaai nhi ho rhi hai. Dukaan ke sheeshe saaf nhi hai.
Ab sabko gussa aa rha hai. LEKIN SAWAAL YE HAI KI GALTI KISKI HAI. KISNE APNA KAAM theek tareeke se NHI KIYA. Isme jo eishan aur siddhant ko samajh mai nhi aaya vo ye hai ki is tareeke ke business ka ant aise hi hota hai. Jaha par business logo par
nirbhar karta hai na ki systems par. Jaha par positions define nhi hoti, jaha par har position ka kaam define nhi hota aise business kabhi organize nhi hote. LEKIN AB AAP PUCHENGE KI KYA ISKA SOLUTION HAI??? koi samadhaan hai?BILKUL ,iska
samadhaan HAI…!!!!! AUR VO HAL ORGAIZATION CHART.

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ORGAIZATION CHART
Eishan aur siddhant ek ORGANIZATION CHART BNAATE HAl jisme sabse upper likha hai.
SHAREHOLDERS. Ye dono maante hai ki shareholder business se bahar rahenge aur ye business ke maalik hai. Business me sabse upper aata hai Chief operating officer(COO) jo pure business ko uske target ki taraf le jaayega aur shareholders ko report
karega. Chief operating officer ke under aate hai 3 vice president.
1) Vice president marketing. Jiska kaam hain aye customers ko laana. Customers ko satisfy karvaana aur saari reports Chief operating officer ko dena.
2) Dusrahai Vice president operations. Jiska kaam hai customers ko banayee rakhna. Unhe value deliver karna jo promise kiya gaya tha. Unhe acha experience dena
aur chief operating ofiicer ko saari infarmatiam alana KARTE HAI.

IS BUSINESS KE JAISE KAYLAISE BUSINESS KHOLTE HAI UNHE FRANCHISEE KE ROOP ME BAAKI
LOGO KO BECHTE HAI. LOG INSE INKA BUSINESS ISILIYE KHAREEDTE HAI KYUNKI YE CHALTA
HAI. AGAR VO IS BUSINESS KI FRACHISEE KHAREEDTE HAITO UNHE PASTRY KI RECIEPE SE LEKE,
IS BUSINESS ME KITNE LOG HONE CHAHIYE, UNKA KYA KYA KAAM HAI, VO KAAM KO KAISE KARENGE SAB BATAYA JAAYEGA. YAANI PURA BUSINESS MODEL SAMJHAYA JAYEGA. AUR YE POORA BUSINESS EK NAYI MACHINE KI TARAH CHALEGA. Umeed hai ki ab ham business ka
organization chart bnana seekh gaye hai.. To ab next step aata hai Branding… Branding bhi apne aap me ek puri science hai.. Ham apne product ki branding karne ka sabse aasan tareeka dekhenge…Aaiye ise samajhte hai…

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पार्ट 6: ब्रांडिंग योर प्रोडक्ट (Branding your product)
यानि की ब्राडिंग हमें अपने बिजनेस में चाहिये ही चाहिये ताकि हम लोंग टर्म के लिये कस्टमर क्रिऐट
कर सके। इसलिये हम इसे बहुत ही सिम्पल मेनर में एक्सप्लेन करेगें तो चलिए शुरू करते हैं एक कहानी
से जो शेवरले (Chevrolet,)के बारे में है. क्या आप जानते है कि शेवरले पहले एक डोमीनेटिंग कंपनी थी
फिर भी अगर आप देख पाएंगे कि शेवरले का कोई भी की-प्रोडक्ट नहीं है, ये अपने चीप, एक्सपेंसिव, बड़ी
छोटी कार और ट्रक के लिए फेमस है लेकिन कोई स्पेशिफिक प्रोडक्ट नहीं बनाती. तो आपको क्या लगता
है कि ये एक अच्छी चीज़ है या बुरी चीज़? मेरे साथ बने रहिये, इसका जवाब हम जरूर देंगे. आज की तारीख में फोर्ड यू.एस की एक लीडिंग कार कंपनी है और ये भी उसी आईडिया पर बेस्ड है,यानी इसका भी कोई की-प्रोडक्ट नहीं है. मगर अब ये अपनी प्रोडक्शंन को एक्सपेंड कर रही है लेकिन कोई main-प्रोडक्ट इनके भी माईन्ड में नही है. फोर्ड का एक्सपेंशन इसके कस्टमर्स को लॉन्ग रन में बेशक कन्फ्यूज़ करेगा. तो अगर आप फोर्ड के ओनर होते तो क्या करते? क्या आप ज्यादा प्रॉफिट के लिए अपने प्रोडक्ट्स लाइन को इनक्रीज करते जो कि थोडे टाईम के लिये चलता , या फिर लम्बे टाइम के लिए main प्रोडक्ट्स पर फोकस करते ? इस सवाल का जवाब ये है कि अपनी कंपनी के लाइन ऑफ़ प्रोडक्शंन को एक्सपेंड करना एक बहुत ही बुरा डिसीजन है, आपकी सारी पोसिबिलिटीज और ऑप्शन खत्म हो जायेंगे,

बेशक आप काफी बड़ा प्रॉफिट तो कमा लेंगे लेकिन बस शोर्ट टाइम के लिए. उसके बाद आपकी पॉवर कम
हो जाएगी. यही वो चीज़ है जो आज शेवरले फेस कर रही है. अब ज़रा एक नजर अमेरिकन एक्सप्रेस पर भी डालते है, अमेरिकन एक्सप्रेस मार्किट में एक लीडिंग प्रीमियर क्रेडिट कार्ड्स ऑफर करता था, इसका मार्किट में करीब 27% शेयर हुआ करता था. फिर कुछ टाइम बाद इन लोगो ने 15 डिफरेंट ऑप्शन वाले 15 क्रेडिट कार्ड्स निकाले जिससे मार्किट में उनका शेयर गिरकर के सिर्फ 18% तक रह गया था. तो बात ये है कि जब आप अपनी प्रोडक्शन लाइन एक्सपेंड करते है तो आप अपने कस्टमर्स का माइंड भी कन्फ्यूज़ कर देते है. हम लोग अक्सर किसी कंपनी को उसके किसी एक की-प्रोडक्ट से लिंक करते है और अगर कंपनी का कोई की-प्रोडक्ट नहीं होगा तो लोग कंपनी को याद तक नहीं रखेंगे. ये लॉ ऑफ़ एक्सपेंशन है, यही हमारी ब्रांडिंग का फर्स्ट लॉ है. और अब आता है हमारा सेकंड लॉ, लॉ ऑफ़ कांट्रेक्शन, इसे समझने के लिए कुछ एक्जाम्पल लेते

प्रोडक्ट्स लाइन को इनक्रीज करते जो कि थोडे टाईम के लिये चलता , या फिर लम्बे टाइम के लिए main
प्रोडक्ट्स पर फोकस करते ? इस सवाल का जवाब ये है कि अपनी कंपनी के लाइन ऑफ़ प्रोडक्शंन को
एक्सपेंड करना एक बहुत ही बुरा डिसीजन है, आपकी सारी पोसिबिलिटीज और ऑप्शन खत्म हो जायेंगे,
बेशक आप काफी बड़ा प्रॉफिट तो कमा लेंगे लेकिन बस शोर्ट टाइम के लिए. उसके बाद आपकी पॉवर कम
हो जाएगी. यही वो चीज़ है जो आज शेवरले फेस कर रही है. अब ज़रा एक नजर अमेरिकन एक्सप्रेस पर भी डालते है, अमेरिकन एक्सप्रेस मार्किट में एक लीडिंग प्रीमियर क्रेडिट कार्ड्स ऑफर करता था, इसका मार्किट में करीब 27% शेयर हुआ करता था. फिर कुछ टाइम बाद इन लोगो ने 15 डिफरेंट ऑप्शन वाले 15 क्रेडिट कार्ड्स निकाले जिससे मार्किट में उनका शेयर गिरकर के सिर्फ 18% तक रह गया था. तो बात ये है कि जब आप अपनी प्रोडक्शन लाइन एक्सपेंड करते है तो आप अपने कस्टमर्स का माइंड भी कन्फ्यूज़ कर देते है. हम लोग अक्सर किसी कंपनी को उसके किसी एक की-प्रोडक्ट से लिंक करते है और अगर कंपनी का कोई की-प्रोडक्ट नहीं होगा तो लोग कंपनी को याद तक नहीं रखेंगे. ये लॉ ऑफ़ एक्सपेंशन है, यही हमारी ब्रांडिंग का फर्स्ट लॉ है. और अब आता है हमारा सेकंड लॉ, लॉ ऑफ़ कांट्रेक्शन, इसे समझने के लिए कुछ एक्जाम्पल लेते है जैसे स्टारबक्स और सबवे. आज, हर गली में कॉफ़ी शॉप्स है जिनमे कॉफ़ी से लेकर के सैंडविच, ब्रेकफ़ास्ट और ड्रिंक सब कुछ मिलता है.

तो जब स्टारबक्स खुला था, इसमें सिर्फ एक ही चीज़ स्पेशीफिक्ली मिलती थी, और वो चीज़ थी कॉफ़ी.
क्यों? क्योंकि स्टारबक्स एक कॉफ़ीशॉप थी तो जाहिर है इसमें कॉफ़ी ही मिलेगी. तो भला इसे अपनी लाइन
ऑफ़ प्रोड्क्स को एक्सपेंड करने की क्या ज़रूरत है, क्या ज़रूरत है भला अपने कस्टमर्स को कन्फ्यूज़
करने की. ये कोई स्मार्ट डिसीजन नहीं होगा, राइट? आज की डेट में स्टारबक्स को देखो, मुझे नहीं लगता
कि मुझे कोई डेटा या मार्किट परसेंटेज प्रोवाइड करने की ज़रूरत है क्योंकि स्टारबक्स पूरे दुनिया की सबसे
ज्यादा जानी-मानी कॉफी शॉप है. सबवे भी सेम आईडिया पर चल रही है, उनकी स्पेशिएलिटी सिर्फ
सैंडविचेस है.और इसीलिए कस्टमर्स सबवे में आते है, अपनी चॉइस से हर चीज़ चूज़ करते है, ब्रेड से लेकर
के फिलिंग, और सौस तक सब कुछ अपने हिसाब से बनवाते है. और सबसे बढकर उन्होंने अपने ब्रांड का
नाम ऐसा रखा है जो कोई भी नही भूलेगा. सब वे. अब, मोस्ट ब्रांड्स के साथ प्रोब्लम ये है कि वो अमीरों
को कॉपी करने की कोशिश करते है और इसलिए एक्सपेंड कर लेते है. लेकिन सच तो ये है कि उन्हें

अमीरों को कॉपी नहीं करना चाहिए बल्कि उन्हें अमीर होने से पहले कॉपी करना चाहिए! इसीलिए हमने
आपको कॉपीकेटिंग मार्केटिंग का कांसेप्ट बताया. अब अपने थर्ड लॉ पर चलते है, द लॉ ऑफ़ पब्लिसिटी.
आजकल ज्यादातर कंपनीज सोचती है कि वो सिर्फ एडवरटाईजिंग से फेमस हो जायेंगे, जबकि ये बात उन
बड़ी कंपनीज के लिए अप्लाई होती है जो आलरेडी सक्सेसफुल है. लेकिन स्माल स्टार्ट-अप्स के लिए सेम
चीज़ अप्लाई हो ये ज़रूरी नहीं. इन फैक्ट, स्टारबक्स एडवरटाईजिंग पर साल का सिर्फ 10 मिलियन डॉलर
खर्च करती है जबकि अपने फर्स्ट 10 सालो में कंपनी में एनुअली 2.6 बिलियन डॉलर्स कमाए. क्या आपको पता है कि बहुत सी कंपनीज क्यों मार्केटिंग और एडवरटाईजिंग पर इतना बड़ा अमाउंट खर्च करती है उसके बाद भी उनके प्रोडक्ट्स बिल्कुल नहीं बिकते ? उनके पास बेस्ट डिज़ाइनर्स और ग्राफिक आर्टिस्ट होते है, उसके बावजूद कुछ भी नहीं बदलता. तो उनकी स्ट्रेटेजी एक्सैटली कहाँ पर गलत है? इन कंपनीज के साथ प्रोब्लम ये है कि ये सिर्फ खुद के बारे में बात करती है, कस्टमर्स के बारे में नही. वो ये बताना भूल जाती है कि उनके कस्टमर्स को उनका प्रोडक्ट खरीदने से क्या बेनिफिट होगा,क्या फायदा होगा? आपका मैसेज क्लियर होना चाहिए, लेकिन इन कंपनीज का एक और बड़ा प्रोब्लम होता है कि ये बहुत ज्यादा इन्फोर्मेशन प्रोवाइड करती है जिससे उनके कस्टमर्स कन्फ्यूज़ हो जाते है.

आपके प्रोडक्ट्स और मार्केटिंग स्ट्रेटेजी इतनी सिंपल होनी चाहिए कि ईजीली समझ में आये वर्ना लोग
कन्फयूज हो जायेगें और आपका प्रोडेक्ट नही खरीदेगें. अब जैसे स्टीव जॉब्स का एक्जाम्पल ले लीजिए,
उन्होंने अपने नए प्रोडक्ट कंप्यूटर लीज़ा के लिए न्यू यॉर्क टाइम्स में एक 9 पेज का एड दिया था. ये एड
प्लान बुरी तरीके से फ्लॉप हुआ था क्योंकि सिर्फ गीक्स और टेक्नीशियन्स ही इस एड की लेंगुएज समझ पाए. इसके बाद स्टीव जोब्स ने एप्पल छोड़ दी थी और पिक्सर में काम करने लगे थे. फिर वहां उनके साथ
कुछ हुआ, कुछ ऐसा जिसने उनका पूरा फ्यूचर ही चेंज कर दिया था.स्टीव जॉब्स, पिक्सर के स्टोरी टेलर्स के
साथ काफी वक्त गुज़ारने के बाद वापस एप्पल में आये. लेकिन इस बार उनकी मार्केटिंग कैपेंन में सिर्फ दो ही शब्द थे” थिंक डिफरेंट”. यानि कि अलग सोचिए. स्टोरीज की बात आई है तो क्या आप जानते है कि
एक अच्छी कहानी एक अच्छी स्टोरी कैसे बनती है? गेटिंग द मैसेज यानी अपना मैसेज देना. अगर देखने
वालो को तुरंत मैसेज समझ नही आएगा तो वो आपका पूरा कैन ही इग्नोर कर देंगे. लेकिन एक अच्छा
स्टोरीटेलर जानता है कि लोगो का अटेंशन कैसे ग्रेब किया जाता है. उन्हें पता होता है कि अटेंशन पाने के
लिए आपको लोगो की कहानी जाननी होगी और फिर उनकी कहानी में अपने प्रोडक्ट को फिट करना होगा. चाहे किसी भी तरीके से. किसी भी अच्छी कहानी के 7 एलिमेंट्स होते है, चाहे वो मूवी हो, सीरीज हो या कोई मार्केटिंग कैन, किसी भी अच्छी कहानी के ये 7 एलिमेंट्स है, केरेक्टर, द प्रोब्लम, अ गाइड, अ प्लान, टेकिंग एन एक्शन, अवॉयडिंग फेलियर, और लास्ट में है सक्सेस.

अपनी कोई फेवरेट मूवी देखिए और उसके प्लाट में चेक करो कि ये 7 एलिमेंट्स है कि नहीं. आपको डेफिनेटली ये सातों के सातों एलिमेंट्स मिलेंगे. अगर मूवी में ये 7 एलिमेंट्स नहीं है तो vo movie फ्लॉप
हो जायेगी.तो ये एलिमेंट्स किसी भी सक्सेसफुल ब्रांडिंग के मोस्ट इम्पोर्टेट फैक्टर होते है. आपका मैसेज
क्लियर होना चाहिए जिसके अंदर ये 7 एलिमेंट्स शामिल हो. जो चीज़ फिट नहीं हो रही उसे डिलीट
कर दीजिए. स्टोरी ब्रांड 7 अप्लाई करके आप लोगो की अटेंशन पा सकते है, जब उन्हें आपका मैसेज
क्लियरली समझ में आ जाएगा तभी वो आपके ब्रांड से जुड़ पाएंगे. मैसेज इतना सिंपल हो कि किसी अनपढ़ को भी समझ में आ जाए. फिर जब आपकी वेबसाइट उन्हें दिखेगी या आपका एड टीवी पे आएगा तो उन्हें देखते ही समझ आ जायेगा कि आपका प्रोडक्ट है क्या. सेकंड चीज़, उन्हें ये भी समझ में आ जायेगा कि आपका प्रोडक्ट कैसे उनकी इम्प्रूव कर सकता है और तीसरी बात, उन्हें वो प्रोडक्ट मिलेगा कैसे.
हम केरेक्टर से शुरू करेंगे, जो कि हमारा फर्स्ट  की-एलिमेंट है, जब आप मूवी देखने जाते हो तो शुरू के 10 (दस) मिनट क्या दिखाया जाता है? हीरो के बारे में, उसकी डिजायर, उसके एम्बिश्न्स के बारे में सेम यही चीज़ आपके प्रोडक्ट की मार्केटिंग में भी अप्लाई होती है. आप उसे कैसे प्रेजेंट करते है, कैसे उसकी नीडफुलनेस पब्लिक के सामने रखते है. तो सबसे पहले लोगो को बताए कि आप उनकी स्टोरी, उनकी प्रोब्लम्स और उनकी डिजायर्स को समझते है. इसे थोडा और अच्छे से समझते है. सोचो कि एक ल्क्ज्यूरियस होटल है जो अपनी ब्रांडिंग करना चाहता है. तो होटल वाले स्टाफ की पिक्चर्स लेने शुरू करते है, बढ़िया कपडे पहने हुए, शानदार स्टाफ. बस, प्रोब्लम यहीं पर है. यहीं वो फेल हो जाते है. आप पूछेगे भला क्यों? क्योंकि उनकी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी ही गलत है. वो अपनी स्टोरी में खुद को हीरो दिखा रहे है जबकि उनकी स्टोरी के हीरो वो लोग है जो उनके होटल में रिलेक्स करने या एक बढ़िया टाइम स्पेंड करने आते है. अगर कस्टमर्स है तभी तो होटल है. ज़रा सोचिए ,होटल में आने वाले लोगो की एम्बिश्न्स क्या होंगी?उन्हें तो भरपूर आराम और लक्जरी चाहिए जिसके लिए वो यहाँ आते है. तो अगर होटल अपने एड कैपेंन में स्टाफ के बजाये गेस्ट की रिलेक्स करते हुए या स्विमिंग पूल में एन्जॉय करते हुए पिक्चर्स डालेगा तो कस्टमर्स तक एक दम क्लियर मैसेज जाएगा.अगली बार जब भी उन्हें सुकून और आराम की ज़रूरत होगी, वो उसी होटल में स्टे तो था

के10 (दस) मिनट क्या दिखाया जाता है? हीरो के बारे में, उसकी डिजायर, उसके एम्बिश्न्स के बारे में.सेम
यही चीज़ आपके प्रोडक्ट की मार्केटिंग में भी अप्लाई होती है. आप उसे कैसे प्रेजेंट करते है, कैसे उसकी
नीडफुलनेस पब्लिक के सामने रखते है. तो सबसे पहले लोगो को बताए कि आप उनकी स्टोरी, उनकी प्रोब्लम्स और उनकी डिजायर्स को समझते है. इसे थोडा और अच्छे से समझते है. सोचो कि एक ल्क्ज्यूरियस होटल है जो अपनी ब्रांडिंग करना चाहता है. तो होटल वाले स्टाफ की पिक्चर्स लेने शुरू करते है, बढ़िया कपडे
पहने हुए, शानदार स्टाफ. बस, प्रोब्लम यहीं पर है. यहीं वो फेल हो जाते है. आप पूछेगे भला क्यों? क्योंकि
उनकी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी ही गलत है. वो अपनी स्टोरी में खुद को हीरो दिखा रहे है जबकि उनकी स्टोरी के
हीरो वो लोग है जो उनके होटल में रिलेक्स करने या एक बढ़िया टाइम स्पेंड करने आते है. अगर कस्टमर्स
है तभी तो होटल है. ज़रा सोचिए होटल में आने वाले लोगो की एम्बिश्न्स क्या होंगी?उन्हें तो भरपूर
आराम और लक्जरी चाहिए जिसके लिए वो यहाँ आते है. तो अगर होटल अपने एड कैपेंन में स्टाफ के बजाये
गेस्ट की रिलेक्स करते हुए या स्विमिंग पूल में एन्जॉय करते हुए पिक्चर्स डालेगा तो कस्टमर्स तक एक दम
क्लियर मैसेज जाएगा.अगली बार जब भी उन्हें सुकून और आराम की ज़रूरत होगी, वो उसी होटल में स्टे
करने आयेंगे.

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अब, आगे बढ़ते है. आपने अपने कस्टमर्स को अपनी ब्रांडिंग स्टोरी का हीरो बना लिया और उनका अटेंशन
भी आपकी तरफ है लेकिन अभी भी काफी कुछ करना बाकि है. लेकिन जल्दी बाजी ने नहीं बल्कि स्टेप बाई स्टेप करना है. वो आप पे ध्यान दे रहे है. राईट? गुड, अब आपको उनकी प्रोब्लम को आइडेंटीफाई करना है. और यही हर हीरो की प्रोब्लम होती है? यानी एक विलेन, हर स्टोरी में एक विलेन तो ज़रूर होता है.
सोचो अगर टोम एण्ड जैरी में टोम नहीं होता तो ये कार्टून किसी को पसन्द नही आता, अगर लगान मूवी
में वो अग्रेज नही होता तो क्या होता आँफकोर्स ये मूवी बहुत बोरिंग हो जाती और असल और असल
में विलेन जितना ईविल या बुरा होगा उतना ही लोग हीरो से जीतने की उम्मीद करते है. अब आप सोचेंगे
हीरो-विलेन की स्टोरी से प्रोडक्ट का क्या लेना-देना? वेल, आपका प्रोडक्ट एक हथियार है जो हीरो यानी
कस्टमर को विलेन यानी अपनी प्रोब्लम से लड़ने में हेल्प करता है. बिना हथियार के कोई लड़ाई नहीं जीती जाती. जैसे, बाथरूम क्लीनर के एड में विलेन है germs और हथियार है अपना बाथरूम क्लीनर. और हीरो के साथ एक्सटर्नल प्रोब्लम ये है कि वो इन जेर्स से छुटकारा चाहता है और इंटरनल प्रोब्लम ये है कि
हीरो हाएजेनिक रहना चाहता है और फिलोसिफीकल ? प्रोब्लम हो सकती है कि शायद हीरो अपनी फेमिली को बीमारियों से प्रोटेक्ट करना चाहता हो. अगर यही बात है तो आपकी मार्केटिंग ऐसी हो कि कस्टमर को यकीन हो जाए कि आप उन्हें उनकी तीनो प्रोब्लम्स का सोल्यूशन दे सकते है. हमारा थर्ड की-एलिमेंट याद है?

शुक्र है आपको याद है और ये थर्ड एलिमेन्ट है गाइड? चलो एक छोटी सी मजेदार स्टोरी से इस एलिमेंट को
एक्जामिन करते है. जे जी (Jay Z,) रैप आर्टिस्ट ने एक बार एक म्यूजिक स्ट्रीमिंग कंपनी स्टार्ट की थी,
जिसका नाम था टाईडल. जैसे स्पोटीफाई होती है वैसी ही, अब आप बोलेगे क्या? मैने तो ये नाम कभी नहीं
सुना? यस, आपने बिलकुल नहीं सुना होगा. लेकिन सवाल आता है क्यों? क्योंकि जे जी ने इस प्रोडक्ट का हीरो म्यूजिशिय्स को बना दिया था. उसने कस्टमर्स को बिलकुल इग्नोर ही कर दिया था. कंपनी का आईडिया था कि वो म्यूजिशियंस को अपना म्यूजिक खुद चलाने देगी ताकि उन्हें ज्यादा पैसे मिल सके क्योंकि इसमें कोई मिडलमेन नहीं था जो प्रॉफिट शेयर करता. लेकिन ये आईडिया ही फ्लॉप था, उसके
ब्रांड ने म्यूजिशियंस की हेल्प की, उन्हें स्टोरी का हीरो बना दिया जबकि हीरो कस्टमर्स को होना चाहिए था.
उसने प्रेस कांफ्रेस में अपनी कंपनी को इंट्रोड्यूस करते हुए बोला” अगर आप मोस्ट ब्यूटीफुल सोंग सुनना
चाहते हो तो आर्टिस्ट को सपोर्ट करो”. स्टार्टिंग se ही टाइडल ने रोंग मैसेज दिलीवर किया था इस बात का गलत इम्प्रेशन पड़ा. लग रहा था जैसे वो कस्टमर्स को म्यूजिक सुनने के लिए और और ज्यादा खर्च करने की डिमांड कर रहे हो.टाईडल का एक सिंगल पार्ट भी नही था जो कस्टमर्स को बताता कि उनका ब्रांड अपने एक्चुअल हीरोज यानी कस्टमर्स के लिए है, म्यूजिशियंस के लिए नहीं.

हमारा फोर्थ की-एलिमेंट है अपने कस्टमर्स को एक प्लान दे, उनका ट्रस्ट गेन करे. अगर कस्टमर आप पर
ट्रस्ट नहीं करेगा तो आपका प्रोडक्ट कैसे खरीदेगा. आपको ध्यान रखना होगा कि जब भी कस्टमर आपका
प्रोडक्ट लेता है, वो रिस्क ले रहा है. वो अपने पैसे का रिस्क ले रहा है. वो पैसा जो उन्होंने इतनी मेहनत से
कमाया है. और इसलिए कोई भी रिस्क लेने से पहले उन्हें आप पर ट्रस्ट करना होगा. ये ट्रस्ट करना होगा
कि आपका प्रोडक्ट उनके काम आएगा. और इसके लिए आपको उन्हें एक प्लान देना है, एक ऐसा प्लान
जो इंश्योर कर सके कि आपका प्रोडक्ट काम करेगा. जैसे सोचो कि आप कॉफ़ी मशीन्स बेचते हो. तो आपके
कस्टमर्स का पहला थौट यही होगा” क्या ये मेरे काम आएगी, और इसे यूज़ कैसे करना है”? तो बेसिकली
आपको उन्हें एक 3 स्टेप प्लान देना होगा जो उन्हें आपके प्रोडक्ट को समझने में हेल्प करेगा. और ये
कुछ इस तरह होगा:

स्टेप 1: प्लग द मशीन (Step 1: Plug the machine).
स्टेप 2: प्रेस द ओन बटन (Step 2: Press the ON button).
स्टेप 3: स्टार्ट मेकिंग कॉफ़ी (Step 3: Start making coffee).
ये 3 स्टेप्स शायद आपको बड़े ओबिविय्स और सिंपल लग सकते है लेकिन ये आपके कस्टमर्स के लिए इतने भी सिंपल नहीं होंगे. जब आप इन 3 स्टेप्स को ले आउट करते है यानी अप्लाई करते है तो बेसिकली आप उन्हें बोल रहे है कि हमारे ब्रांड पर ट्रस्ट करो. अब जबकि कस्टमर्स आपके प्रोडक्ट को लेकर इतने एक्साईटेड हो चुके है तो अब आपका नेक्स्ट स्टेप क्या होगा? चेलेंज! आप उन्हें चेलेंज करो एक्शन लेने के लिए. आपने देखा होगा मूवी में हीरो के सामने एक चेलेंज आता है तो वो उस पर एक्शन लेता है. अगर चेलेंज नहीं होगा तो स्टोरी भी नहीं चलेगी. तो चेलेंज होता क्या है ? काफी सिंपल है, आप एड में बोल सकते हो” बुक नाऊ, हरी!”इस तरह आप अपने कस्टमर्स को स्टेप लेने पर मजबूर कर सकते है, उन्हें फील कराओ कि अगर उन्हें ये चांस ग्रेब नहीं किया तो ऑफर उनके हाथ से निकल जायेगा. यही हमारा फिफ्थ की-एलिमेंट है. लोग क्यों मूवी के लास्ट सीन तक हॉल में रुकते है? क्यों कुछ लोग पूरी की पूरी वेब सीरीज एक ही बार में देख डालते है? क्योंकि वो जानना चाहते है कि आगे क्या होगा,

हीरो अपने मकसद में कामयाब होगा या नहीं. हीरो के सर पे खतरा होता है और यही खतरा स्टोरी को और
भी थ्रिलिंग बना देता है. और ये ज़रूरी है कि आपके कस्टमर्स भी उस थ्रेट को डीफीट करके सक्सेसफुल
बने. क्योंकि यही हमारा सिक्स्थ एलिमेंट है. आपकी स्टोरी में राईट अमाउंट ऑफ़ फियर होना चाहिए, ज्यादा
फियर नहीं. क्योंकि फियर ज्यादा होगा तो कस्टमर्स इग्नोर कर देंगे, कम हुआ तो कस्टमर्स की समझ में नहीं आएगा कि आपका प्रोडक्ट उनकी स्टोरी के थ्रेट से बचाने में उनकी हेल्प कैसे करेगा. मतलब एकदम राईट अमाउंट का फियर. मान लो कोई नया टूथपेस्ट मार्किट में आया. तो उसकी मार्केटिंग कैसे होगी ? आप कस्टमर्स को ये बोल के डरा सकते है कि अगर उन्होंने आपका टूथपेस्ट यूज़ नहीं किया तो उनके दांत टूट जायेंगे या बिलकुल खाली हो जायेंगे. और आपका टूथपेस्ट उनके दांत एकदम व्हाईट और शाइनी बना देगा. यहाँ हमारा लास्ट बट नोट लीस्ट एलिमेंट काम आएगा. स्टोरी के एंड में कस्टमर को यानी हमारे हीरो को जीतना है इसलिए आपका विजन क्लियर होना चाहिए कि आपका प्रोडक्ट यूज़ करने के बाद कस्टमर का क्या होगा? उनकी लाइफ में क्या चेंज आएगा? आपका प्रोडक्ट कैसे उनकी लाइफ बैटर बनाएगा? जैसे कि अगरआपका प्रोडक्ट टूथपेस्ट है तो आप लोगो को बताओ कि किसने उसे यूज़ किया और उनके टीथ व्हाइट हो गए, उनमे कैविटी नहीं आई और टीथ पहले से बैटर हो गए. लॉन्ग स्टोरी को शोर्ट में बोले तो आपकी ब्रांडिंग स्ट्रेटेजी कुछ ऐसी होनी चाहिए” हीरो की एक प्रोब्लम थी फिर वो एक आदमी से मिला जिसने उसे गाइड किया और प्लान बताया और फिर उस प्लान पे एक्शन लेने को बोला ताकि हीरो फेल होने से बच सके और सक्सेस अचीव कर सके”. फाइनली, हमने आपको ब्रांडिंग के मोस्ट इम्पोर्टेट लॉज़ बताये और hopefully itni knowledge se ham apne business ko ek above average business bna sakte hai.. Lekin ab sawaal aata hai ki is average business ko extraordinary business me kaise convert kiya jaaye.. To aaiye ise samajhte hai..

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पार्ट 7: गोइंग फ्रॉम गुड टू ग्रेट (Going from Good to Great)
क्या आपको पता है पूरी दुनिया में हर साल 150 मिलियन से भी ज्यादा कंपनीज खुलती है और उनमे
से ज्यादातर कुछ टाइम बाद बंद भी हो जाती है. इनमे से थोड़ी बहुत कंपनीज ऐसी भी है जो कुछ टाइम तक
तो चलती है मगर बाद में उनका भी वही हाल होता है. कुछ कंपनीज सर्वाइव कर जाती है, लेकिन सिर्फ
सर्वाइव, ये इतना ही प्रॉफिट कमा पाती है कि नेक्स्ट इयर तक चले जाए.अब बात करते है उन कंपनीज की
जो थ्राईव् करती है. ये मार्किट की बाकि कंपनियों से फास्ट ग्रो कर लेती है और सबको पीछे छोड़ देती है. तो
ऐसा कैसे हो जाता है? तो चलो आओ मिलकर समझने की कोशिश करते है.
चैप्टर 1 Hame great banna haina ki sirf good
जब इंसान किसी चीज़ में अच्छा होता है तो उसे इम्पूव करना छोड़ देता है.क्योंकि उन्हें लगता है” इस काम में
तो मै आलरेडी बढ़िया हूँ तो क्यों ज्यादा मेहनत करूँ”? और इसी वजह से बीइंग गुड आपका सबसे बड़ा दुश्मन
है. लेकिन सच तो ये है कि सक्सेस वन टाइम इवेंट नहीं होता. एक्चुअल में सक्सेस वन टाइम इवेंट नहीं होती, ये एक कंटीन्यूएस प्रोसेस है लर्निंग का जो कभी खत्म नहीं होता. बुक के इस पार्ट में हम इस बारे में डिस्कस करेंगे के कि कैसे एक कंपनी गुड टू ग्रेट बन सकती है. जिम कोलिन्स आयूं करते है कि अक्सर कंपनीज के ग्रेट ना बन पाने के पीछे एक मेन रीजन ये भी है कि वो आलरेडी गुड होती है. लेकिन अगर सक्सेस चाहिए तो सिर्फ गुड होना काफी नहीं है. आप ज्यादा लंबा सर्वाइव नहीं कर पाओगे. ग्रेट बनने के लिए पहले कंपनी को खुद पे ट्रस्ट रखना होगा कि एक दिन वो ग्रेट बन के रहेगी और साथ ही अपनी प्रोब्लम्स को एकनॉलेज करके अगर आप कुछ लॉन्ग टाइम के लिए प्लान करते हो तो ज़रूरी नहीं कि आप उसमे बेस्ट बनोगे. ग्रेटनेस और सक्सेस वन टाइम इवेंट नहीं है, बल्कि एक लॉन्ग प्रोसेस है जिसमे टाइम और एफर्ट दोनों लगता है.

चैप्टर 2 Leadership
डेविड मैक्सवेल, फन्नी एंड मे (Fannie and Mae ) के सीईओ है. उन्होंने अपनी कंपनी को ट्रांसफॉर्म किया . पहले उनकी कंपनी को हर रोज़ करीब वन मिलियन डॉलर का लोस होता था लेकिन आज यही कंपनी हर रोज़ का 4 मिलियन डॉलर कमाती है. रिटायरमेंट के बाद उन्हें डर था कि कंपनी को नुकसान उठाना पड़ेगा तो इसलिए उन्होंने अपनी ख़ुशी से अपनी रिटायरमेंट मनी का 5.5 मिलियन डॉलर कंपनी के एक प्रोजेक्ट के लिए डोनेट कर दिया. यही चीज़ है जो ग्रेट कंपनीज के लीडर्स में कॉमन होती है. वो खुद से पहले कंपनी के कंसर्न रखते है.

लीडरशिप के एक और क्वालिटी ये है कि लीडर्स हेमशा ये श्योर कर लेते है उनके रिटायरमेंट के बाद
कंपनी पहले जैसी ग्रेट बनी रहे चाहे आप उसके पार्ट हो या ना हो. एक टू लीडर बनने के लिए आपके पास
राईट लोगो की टीम होना भी उतना ही ज़रूरी है. क्योंकि राईट लोगो को मोटिवेट करने की उतनी ज़रूरत
नहीं पड़ती जितनी रोंग लोगो को पड़ती है. तो ज़ाहिर है राईट लोगो के होने से आपका एफोर्ट और टाइम बचेगा. वेल्स फ़ार्गो (Wells Fargo) के सीईओ ने अपनी कंपनी में बेस्ट लोगो को छांट कर रखा. इसका नतीजा ये हुआ कि उनके बैंक ने कुछ ही सालो में मार्किट को चार गुना पीछे छोड़ दिया था. कुछ कंपनीज की एक और स्ट्रेटेजी होती है, और first strategy to ये है कि ये कंपनीज क्या करना है इस पर इतना फोकस नही करती बल्कि किस के साथ काम करना है इस पर ज्यादा फोकस करती है। और सेकंड strategy ये है की “उन्हे कैसे पेय करें” के बजाये ” किसे पेय करें” पर हमें फोकस करना होगा . अगर हमारी टीम में राईट लोग है तो वो वही करेंगे जो कंपनी के लिए बेस्ट होगा, फिर चाहे उनकी इनकम कुछ भी हो. इसलिए बेस्ट लोगो को हायर करना ही सीक्रेट है. बेशक एक ग्रेट कंपनी मेहनती होती है, वो अपने एम्प्लोईज पर इतना प्रेशर डालती है कि उनका बेस्ट परफोर्मेंस अचीव हो लेकिन रूथलेस बिलकुल नहीं होती कि बिना वजह लोगो को जॉब से निकाल बाहर करे,और मेहनती बनने के लिए 3 प्रिंसिपल्स है जो आपको अप्लाई करने होंगे.

फर्स्ट है, अगर आपको डाउट है कि एम्पलोई कि performance capability में तो हायर मत करो. देखते रहो शायद कोई राईट एम्प्लोई मिल जाये. सेकंड प्रिंसिपल है कि जब आपको लगे कि आपको लोगो में चेंज लाने की ज़रूरत है तो तुरंत एक्शन लो. और फाइनली लास्ट प्रिंसिपल है अपना बेस्ट आपरचुनीटि को रियलटी के लिये दो ना की प्रोबलमस को डिसकस करने के लिये.
चैप्टर 3 Startups
क्या आपने कभी सोचा है क्यों ज्यादातर स्टार्ट-अप्स ग्रेट कंपनी नहीं बन पाती, यहाँ तक कि जो स्टार्ट-अप्स
सक्सेसफुल होते है वो भी सिर्फ गुड कंपनी बन के रह जाते है. और जैसा हमने पहले बोला, गुड इज नेवर
इन्फ़, अच्छा होना काफी नहीं है. तो ऐसा क्यों होता है कि ज्यादतर स्टार्ट-अप्स फेल हो जाते है? इसका जवाब है, लैक ऑफ़ क्रिएटीविटी की वजह से. इन स्टार्ट-अप्स की प्रोब्लम है कि जब उन्हें सक्सेस मिलनी शुरू होती है तो उनके कस्टमर्स बढ़ जाते है, फिर उनके लिए मैनेज करना मुश्किल हो जाता है. फिर कोई अचानक आकर मिसमैनेजमेंट दूर करने की कोशिश करता है और इस चक्कर में नए रूल्स और
स्ट्रेटेजी बनते है जो कंपनी को मिडीयोक्रिटी की तरफ ले जाते है. इसे अवॉयड करने के लिए सबसे पहले अपनी कंपनी में एक फ्रीडम और रीस्पोंसेबिलिटी का माहौल बनाये. और फिर ऐसे लोगो को हायर करे जो अपनी रीस्पोंसेबिलिटी से भागे नहीं, जो अपने गोल्स अचीव करने के लिए मीलो-मील जाने को तैयार हो,

बिना किसी हेजीटेशन के. लीडर को डिक्टेटर नहीं बल्कि डेमोक्रेटिक तरीके से चलना होगा.लेकिन सवाल ये आता है कि डेमोक्रेटिक कैसे बने? इसके लिये अपने एम्प्लोईज को उनके डेली रूटीन वर्क की एक चेक लिस्ट दो, लेकिन साथ ही इतनी फ्रीडम और रिस्पोंसेबिलिटी भी दो कि वो खुद इम्पोर्टेट डिसीजन ले सके. एक गुड टू ग्रेट कंपनी स्पेशिलिएटी पर फोकस करती है. वो कहती है कि अगर ये काम हमारा नहीं है तो हम नहीं करेंगे, उनके पास एक स्टॉप डूइंग लिस्ट होनी चाहिए जहाँ वो पता करेंगे कि कौन सी एक्टिविटी को फंड करना है और कौन सी एक्टिविटी आगे कंटीन्यू नहीं करनी. Magar ab sawaal ye aata hai ki
hamne businesses ke bhaut saare principles dekh liye, aur maan lijiye ki hamne puri jee jaan laga kar inhe implement bhi kar diya… Lekin agar hamari kismat hi bhaut buri nikli
to????? Agar ham phir bhi fail ho gaye to??? Kahi ye na ho jaaye ki ham ek average life bhi na jee paaye.. financially kahi broke na ho jaaye.. Don’t worry is book ko compile karte waqt hamne aapke is doubt ka bhi khyaal rakha hai… Aur ise hi ham next part me discuss karenge.

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पार्ट 8: In basic rules ko kabhi miss mat kare..
चैप्टर 1:
In saat money management ke basics ko yaad rakhna taaki agar hamaare business fail bhi ho jaaye to bhi hamari family secure rahe.
और ये 7 प्रिसिपल है:-
1. अपनी इनकम का कम से कम 10% सेव करो और उसे अपने फ्यूचर के लिए इन्वेस्ट करो. 10% बहुत
ज्यादा नहीं है, अभी भी आपके पास 90% इनकम बची है.
2. अपनी 90% इनकम के साथ आपको सर्वाइव करना होगा, और हो सके तो उसमे से भी कुछ सेव
करने की कोशिश करे..
3. ऐसे प्रोजेक्ट्स में पैसा इन्वेस्ट करो कि अगर आप जॉब छोड़ भी दो तो आपको एक सेफ और रेगुलर
इनकम मिलती रहे.
4. जिसके बारे में आपको नॉलेज ना हो उस चीज़ में इन्वेस्ट कभी मत करो. और अगर इन्वेस्ट करो भी तो
उसी एरिया में करो जिसमे आप एक्सपर्ट हो. या उन लोगो के साथ करो जो एक्सपर्ट है.

5. खुद का घर खरीदो या उससे भी बैटर एक छोटा घर लो, क्योंकि रेंट पे पैसे वेस्ट करना वर्ट आईडिया
होगा.
6. एक रिएलिस्टिक इन्श्योरेसं प्रोग्राम लो.
7. हमेशा अपने काम करने का तरीका अपडेट रखो, और ज्यादा पैसे कमाने के लिए मल्टीपल सोर्स ऑफ़
इनकम ढूंढो.
चैप्टर 2 पैसा सब कुछ नही है.
………या फिर है???
ये बात तो हर कोई मानता है कि पैसा सबकुछ नहीं है, आफ्टर आल पैसे से हर चीज़ नहीं खरीदी जाती.
लेकिन ये कडवी सच्चाई है कि पैसा ही सक्सेस को मेजर करने का एक तरीका है. आजकल लोग पैसे से
ही आपकी सक्सेस डीटरमाईन करते है. ये आपकी एबिलिटी पर बेस्ड है कि आप जब चाहे, जहाँ चाहे और
जो चाहे खरीद सकते है. क्या आपको लगता है कि अमीर लोग लकी है? पैसा सिर्फ तकदीर का खेल है?
आपके बैंक अकाउंट में अगर बिलियन डॉलर है तो ये सिर्फ क्या एक लक है? वेल, फिर से सोचो, अगर पैसे
को लेकर आपकी यही सोच है तो आपके अमीर होने के चांसेस उतने ही है जितने कि हाथी के वेट लूज़ करने
के. पैसे कमाने के लिए, और सबसे important उस पैसे को हमेशा अपने पास रखने के लिए, आपको सिर्फ
एक सिम्पल सेट ऑफ़ रूल्स को फोलो करना है. तो आईये इसे डिसकस करते है

चैप्टर 3: द स्टोरी ऑफ़ बेबीलोन (Chapter 3: The stories of Babylon)
रोडन (Rodan,) teer kamaan bnaata tha aur ise raja से सोने के 50 सिक्के ईनाम के तौर
पे मिले थे. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो इन पैसे का क्या करे, उसे डर था कि कहीं ये पैसे वेस्ट ना चले
जाए, इसलिए वो एडवाइस लेने एक आदमी के पास गया जिसका नाम था. माथोंन (Mathon,) माथोन लोगो को पैसे उधार देता था. लेकिन प्रोब्लम ये थी कि रोडन की सिस्टर ने उसे बोला कि वो ये पैसे
उसके हसबैंड को दे दे ताकि वो एक मर्चेट बन सके. अब रोडन को ये सोचना था कि वो पैसे का क्या करे.
तो माथोन ने उसे दो अलग-अलग स्टोरीज़ सुनाई जिससे उसे डिसीजन लेने में हेल्प मिल सके.
माथोन ने अपनी पहली स्टोरी सुनाई। एक फार्मर एक बार अपने फील्ड में काम कर रहा था कि तभी
उसने Raam और Shaam को बाते करते सुना. Shaam कम्प्लेंट कर रहा था कि उसे कितनी मेहनत
करनी पड़ती है, उसका काम तो raam के काम से भी ज्यादा हार्ड है. क्योंकि उसे फील्ड में सारा दिन चलना
पड़ता है, फार्मर उसे खेत जोतने के काम में लगाता है ताकि फील्ड तैयार हो सके और कई तरह की सब्जियां
और अनाज उग सके. जबकि raam तो सिर्फ फार्मर को घर से खेत और खेत से घर लेकर जाता है. ये
सुनकर raam ने shaam की हेल्प करने के लिए उसे एक एडवाइस दी. उसने shaam से बोला कि
वो अगले दिन बीमार होने का नाटक करे ताकि फार्मर उससे काम ना करवाए. shaam को raam की एडवाइज जंच गयी तो उसने नेक्स्ट डे वही किया जो राम ने बोला था.

लेकिन फार्मर ने तो उनकी बात सुन ली थी तो उसे पहले से ही मालूम था कि shaam नाटक कर रहा
है. तो फार्मर ने उस दिन raam को सबक सिखाने के लिए shaam को रेस्ट दे दिया और सारा काम
से करवाया. वो raam को सबक देना चाहता था कि अपने फ्रेंड की हेल्प करना अच्छी बात है लेकिन
उसका नेगेटिव इम्पेक्ट खुद पे नहीं पड़ना चाहिए. mathon ne apni second story sunai
सेकंड स्टोरी उन तीन टाइप के लोगो के बारे में थी जो हेमशा मथोन से पैसे उधार मांगते थे. फर्स्ट टाइप में
वो लोग आते है जो पैसे उधार लेते है और फिर नोर्मल  सर्कमस्टांसेस में वापस कर देते है. सेकंड टाइप के वो
लोग आते है जो एक सेफ अमाउंट ऑफ़ मनी उधार लेते है जिसे वो सेफली लौटा सके. और थर्ड टाइप के
लोग वो होते है जो पैसे तो ले लेते है लेकिन कभी लौटा नहीं पाते और इन लोगो से हमें हमेशा बचना चाहिये.
इस सेकंड स्टोरी का मोरल ये है कि लोगो को लोन देना बुरी बात नहीं है लेकिन ये ध्यान रहे कि आपका
पैसे वापस आप तक पहुंचे क्योकि ये हमारी मेहनत की कमायी है। और ये हमारा फर्ज है कि हम अपनी फैमली को फानेनसियली सेक्यूर रखे इसलिए अपने पैसे कभी थर्ड टाइप के लोगो को उधार मत दो.
Next ham paiso ke 7 rules dekhte hai jinhe ham agar follow karenge to ham hamesha financially apne ko aur apni family ko secure rakh paayenge

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चैप्टर 4:पैसे के 7 नियम
7 सीक्रेट्स है जो आपके वालेट को इतना फैट कर देंगे कि ये आपके बैक पॉकेट में फिट नहीं होगा.
फर्स्ट सीक्रेट है, Save atleast 10%. ये सीखने के लिए इमेजिन करते है कि आपके पास 10 कोइंस है.
आपको हर मन्थ 10 कोइंस मिलता है. तो ये सारे पैसे खर्च करने के बदले क्यों ना हर मन्थ ] कोइन अपने
पर्स में डाला जाए और बचे हुए 9 कोइंस से पूरा मन्थ निकाला जाये. कुछ मंथ्स बाद ही आपको पता चलेगा
कि 9 कोइंस में भी आपका काम मजे से चल रहा है. सेकंड सीक्रेट है, अपने kharcho पर कण्ट्रोल रखो.
आप सारी लाइफ ये मानते आये होंगे कि आपकी इनकम ही aapke kharche control karti
hai.
जब आपकी इनकम बढती है तो kharche भी badhne चाहिए और अगर इनकम कम होती
है तो खर्चा भी कम होगा. लेकिन सच तो ये है कि ये सब बेकार की बाते है. इसमें कोई सच्चाई नहीं है. अगर
आप अपनी डिजायर को कण्ट्रोल करना नहीं सीखेंगे तो आप कभी भी अमीर नहीं बन सकते फिर चाहे आपकी इनकम har मन्थ 10 lakh rupay hi kyu na ho. क्यों ना गोल्ड लिया जाये, किसी चीज में इन्वेस्ट किया जाए.

और इस बात की गारंटी है कि इन्वेस्ट किया गया पैसा बड़ी जल्दी मल्टीप्लाई होता है. ये हमारा थर्ड सीक्रेट है. गोल्ड बाकि चीजों से काफी बढ़िया इन्वेस्टमेंट है, इसमें गारंटी पूरी होती है और ये रिस्क फ्री भी है. दुबारा सोच लो, अगर आप सच में अमीर होना चाहते हो तो मोस्ट इम्पोर्टेट चीज़ होगी कि किसी भी इन्वेस्टमेंट से पहले दो-तीन बार अच्छे से सोच लो. आफ्टर आल, अगर आपके पास काफी बड़ी रकम है लेकिन आप उसे प्रोटेक्ट नहीं कर पाए तो फायदा क्या. जैसे आपके पास घर है या कोई स्टोर है जिसे आप अभी यूज़ नहीं कर रहे तो आपको नहीं लगता कि इसे रेंट पे देने से आपकी एक्स्ट्रा इनकम हो जायेगी.? ऑफ़ कोर्स होगी, और उस एक्स्ट्रा मनी को आप चाहे तो सेव कर लो या उसे कहीं इन्वेस्ट कर लो. ये हमारा फिफ्थ सीक्रेट है.
प्लान और इम्प्रूव हमारे सिक्स्थ और सेवंथ रूल्स है. आपके पास एक फ्यूचर प्लान होना चाहिए,magar
अगर आपका प्लान शोर्ट टर्म इनकम का है तो फेल होना पक्का है. प्लानिंग के बाद आपको सीखना है कि आज के फ़ास्ट चेंजिंग वर्ल्ड में अपनी स्किल्स को कैसे इम्प्रूव और अपग्रेड रखना है. Yaani hamesha kuch na kuch naya seekhte raho aur isiliye hamne aapke liye ye GIGL app. bnayi hai taaki aapko har mahine ham hazaaro logo ke ideas sunnate rahe, motivate karte rahe aur aapki skills ko ek completely next level me le jaaye.

कनक्ल्यूजन (Conclusion)
To dosto i hope is book se hame kaafi kuch seekhne ko mila hoga. Is book me hamne sabse pehle dekha ki ek employee or self employed me na to paise ki freedom hai na hi time ki. isiliye agar hame ameer ban na hai to hame businessman ya invester ka
path hi chose karna padega.. Next hamne dekha tha ki business ko start karne ki do philosphies hai pehli philosphy to ye hai ki ham successful idea ko copy kare ya phir sabse sasta product bna ke use customer ka feedback le le ke improve kare.. Taaki ham vohi product bnaye jiski demaand hai.

Next philosphy aati hai zero se one jaana yaani market me available product se kam se kam 10 guna better product bnana aur ye thoda capital intensive hai.. ISKE baad hamne ye bhi jaane ki ek organization chart business ko develop karne me kitni zaada
madat kar sakta hai…isiliye comoany me organization chart zarur hona chahiye..
Next hamne dekha tha ki apne product ki branding ka best tareeka story branding hai.. Aur ek average business ko ek extraordinary business bnane ke liye hame best team chose karni padegi jo salary se zaada kaam ko pyaar karti ho. Obviously iske liye
hame bhaut mehnat karni padegi but aise log exist karte hai.Aur end me hamne paiso ke principles dekhe jinhe hame throughout dollow karna hai chahe phir ham apna business bhi kyu na bna rahe ho..Kyunki tabhi ham hamesha apne ko secure reakh sakenge..


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