The Upside of Irrationality Dan Ariely Books In Hindi Summary

The Upside of Irrationality Dan Ariely इंट्रोडक्शन डैन ने अपनी बुक ‘ प्रेडिक्टिबली इर्रेशनल’ में डिसकस किया हैं कि हम कंस्यूमर्स (consumers) के तौर पर बेवकूफी भरा डिसिशन लेते हैं. वहीं दूसरी तरफ, अपने बुक ‘अपसाइड ऑफ इर्रेशनेलिटी ‘ में, उन्होंने बिना सोचे समझे लिए हमारे इन फैसलों के पॉजिटिव साइड के बारे में बताया हैं. इस समरी में आप जानेंगे कि कैसे हम कम सैलरी पर ज़्यादा काम करना चाहते हैं, कैसे हम मुफ्त में चीजें हासिल करने के बजाय उसे अपनी कोशिश से हासिल करना चाहते हैं. आप सीखेंगे कि कैसे हम अपने काम में अपना पर्सनल टच देना पसंद करते हैं और जितना हो सकें हम बदला, यानि रिवेंज लेने से बचना चाहते हैं. Behavioral economics के फील्ड में डैन एरिएली और उनके कलीग्स हमारे इंसान होने के बारे में स्टडी करते हैं, जैसे कि कैसे हम ऐसे डिसीज़न ले लेते हैं जिसकी हमें समझ नहीं होती. लेकिन यही इर्रेशनेलिटी ही तो इस स्टडी को इंटरेस्टिंग बनाती है . कम के लिए ज़्यादा कीमत चुकाना मान लीजिए कि जैसे आप एक लैब के मोटे और खुश चूहे हैं. एक दिन, रिसर्चर आपको अपने कम्फर्टेबल बॉक्स से बाहर निकालता हैं और आपको एक भलभलैया वाले नए बॉक्स में डाल देता हैं. आदत से भूलभुलैया वाले नए बॉक्स में डाल देता हैं. आदत से मजबूर आप अपने आसपास के माहौल को जानना चाहेंगे, आप अपनी मूंछों के साथ यहाँ-वहाँ घूमते हैं और सूंघते हैं. आप नोटिस करते हैं कि भूलभुलैया के कुछ हिस्से सफेद हैं और कुछ काले हैं. जब आप काले हिस्से के ऊपर से गुज़रते हैं, तो आपको एक इलेक्ट्रिक शॉक लगता हैं. हर दिन, आपको एक अलग ही भूलभुलैया में डाला जाता हैं. रंग और पैटर्न भी रोज बदलते हैं. आप हर दिन सीखते हैं कि कौन सा कोना शॉक देता हैं और कौन सा नहीं. कभी-कभी लाल दीवार में शॉक लगता हैं, तो कभी पोल्का डॉट वाली दीवार में. तो आपको क्या लगता हैं, आप कितनी अच्छी तरह से घूमना सीख लेंगे? लगभग दो सौ साल पहले, दो साइकोलॉजिस्ट, रॉबर्ट यरकेस और जॉन डोडसन ने स्टडी किया था कि क्या इलेक्ट्रिक शॉक बढ़ाने से लैब के चूहे जल्दी सीखेंगे? मतलब, अगर हम चूहों को ज़्यादा मोटीवेट करते हैं, तो क्या उनका परफॉरमेंस बेहतर होगा? यरकेस और डोडसन ने पाया कि अगर इलेक्ट्रिक शॉक के झटके कमजोर हो, तो चूहों को इससे ज़्यादा फर्क नहीं पड़ रहा था और वो low परफॉरमेंस दे रहे थे. लेकिन अगर medium शॉक दिया गया, तो वे जल्दी सीख कर प्रोग्रेस दिखा रहे थे. इसलिए हमें लगेगा कि जब शॉक को तेज़ कर दिया जाए, तो चूहे बस कुछ ही वक्त में भूलभुलैया को पार कर देंगे. वे अपना बेस्ट परफॉरमेंस देंगे. पर ये सच नहीं हैं. लेंगे? लगभग दो सौ साल पहले, दो साइकोलॉजिस्ट, रॉबर्ट यरकेस और जॉन डोडसन ने स्टडी किया था कि क्या इलेक्ट्रिक शॉक बढ़ाने से लैब के चूहे जल्दी सीखेंगे? मतलब, अगर हम चूहों को ज़्यादा मोटीवेट करते हैं, तो क्या उनका परफॉरमेंस बेहतर होगा? यरकेस और डोडसन ने पाया कि अगर इलेक्ट्रिक शॉक के झटके कमजोर हो, तो चूहों को इससे ज़्यादा फर्क नहीं पड़ रहा था और वो low परफॉरमेंस दे रहे थे. लेकिन अगर medium शॉक दिया गया, तो वे जल्दी सीख कर प्रोग्रेस दिखा रहे थे. इसलिए हमें लगेगा कि जब शॉक को तेज़ कर दिया जाए, तो चूहे बस कुछ ही वक्त में भूलभुलैया को पार कर देंगे. वे अपना बेस्ट परफॉरमेंस देंगे. पर ये सच नहीं हैं. इससे चूहों का परफॉरमेंस सबसे बुरा था. वे शॉक से घबरा गए थे और वे बस शॉक के बारे में ही सोच पा रहे थे. चूहें डर के मारे सहम गए और वे भूलभुलैया के अगले स्टेज में नहीं जा सके. “ओवरमोटिवेटेड” का एक कांसेप्ट होता हैं. ये कांसेप्ट इंसानों पर भी अप्लाई होता हैं. एग्जाम्पल के लिए, अगर आप एम्पलॉईस को मैक्सिमम सैलरी देते हैं, फिर भी उनका परफॉरमेंस मैक्सिमम नहीं होगा. अगर आप उन पर ज़रूरत से ज़्यादा प्रेशर डालेंगे तो उन चूहों की तरह ही सहम जाएंगे. A < The Upside of Irrationality Dan Ariely आइए, इंडिया के Madurai में डैन एरिएली और उनके कलीग्स द्वारा किए गए इस सोशल एक्सपेरिमेंट के बारे में जानते हैं. इसमें ये देखना था कि अगर पार्टिसिपेंट्स को ज़्यादा बोनस और इन्सेन्टिव दिया जाए, तो क्या वे ज़्यादा मोटिवेटेड होंगे और बेहतर वे परफॉरमेंस देंगे. लेकिन इस स्टडी ने साबित किया कि ये सच नहीं हैं. डैन और उनके कलीग्स ने पार्टिसिपेंट्स के लिए 6 अलग-अलग माइंड गेम्स चुने. इसमें भूलभुलैया, डार्ट बॉल, और लास्ट तीन नंबरों को याद करना शामिल था. उन्होंने कुछ ग्रेजुएट स्टूडेंट्स को इस एक्सपेरिमेंट को ऑर्गनाइज़ करने के लिए बुलाया था. रमेश, सेकंड इयर ग्रेजुएशन का स्टूडेंट था. उसने कम्युनिटी सेंटर में इन गेम्स को ऑर्गनाइज़ करने का फैसला किया. उसने वॉलिंटियर्स से कहा- “हम यहां कुछ मजेदार गेम्स खेलेंगे. क्या आप इस एक्सपेरिमेंट का हिस्सा बनना चाहेंगे? अगर आप खेलते हैं तो आप कुछ पैसे भी कमा सकते हैं.” और इसलिए, पहला पार्टिसिपेंट शामिल हुआ और उसका नाम नितिन था. फिर, उन्होंने ये डिसाइड करने के लिए एक डाइस फेंका कि नितिन को कितने पैसे मिलने चाहिए. डाइस पर चार आया जिसका मतलब था मिड-लेवल की पेमेंट. नितिन मैक्सिमम 240 रुपये तक जीत सकता था था मिड-लेवल की पेमेंट. नितिन मैक्सिमम 240 रुपये तक जीत सकता था. रमेश ने समझाया कि हर खेल के लिए मीडियम लेवल परफॉर्मेंस और हाई लेवल परफॉर्मेंस होता हैं. नितिन को हर मिड-लेवल परफॉर्मेंस के लिए 20 रुपये और हर हाई-लेवल परफॉर्मेंस के लिए 40 रुपये मिलेंगे. और, अगर उसका परफॉर्मेंस लौ लेवल का रहा, तो उसे कुछ नहीं मिलेगा. अब नितिन साइमन नाम का गेम खेलना शुरू करता हैं. वहाँ चार बटन थे, हरेक को दबाने पर वो जल उठते थे और एक अलग आवाज़ निकलती थी. नितिन को इन बटन्स से निकलते आवाज़ और लाइट के पैटर्न को समझना था. सबसे पहले एक बटन जलता था फिर दूसरा, तीसरा और चौथा. नितिन को इनके सीक्वेंस को याद करना था. अगर नितिन को लगातार 6 बटन के सीक्वेंस याद रहें, तो ये एक अच्छा परफॉर्मेंस होगा. वो 20 रुपये कमाएगा. अगर उसे 8 बटन याद रहें, तो वो हाई लेवल परफॉर्मेंस हैं और उसे 40 रूपए मिलेंगे. सबसे पहले, नीला बटन जला जिसे नितिन ने सही पकड़ा. दूसरा, नीला फिर पीला जला. ये बिलकुल मुश्किल नहीं था. दूसरा सीक्वेंस था नीला-पीला-हरा. वो भी नितिन ने सही बताया. पांचवें राउंड में नितिन को 7 बटन याद रहें और छठे राउंड में उसे 8 बटनों का सीक्वेंस याद रहा. नितिन खुशी-खुशी 40 रुपये लेकर घर चला गया. आइए नितिन के एक्सपीरियंस को अनुपम नाम के खुशी-खुशी 40 रुपये लेकर घर चला गया. आइए नितिन के एक्सपीरियंस को अनुपम नाम के एक दूसरे पार्टिसिपेंट से कम्पेयर करें. जब उसने डाइस फेंका, तो अनुपम को 5 नंबर मिले, जिसका मतलब था कि उसे हाई लेवल का प्राइज दिया जाएगा. अच्छे लेवल के परफॉरमेंस के लिए उसे 200 रुपये मिलेंगे. हाई लेवल परफॉरमेंस के लिए उन्हें उसे 400 रुपये मिलेंगे. और, अगर अनुपम ने सभी छह मैचों में अच्छा परफॉरमेंस किया, तो उसके पास 2400 होंगे. ये उसके पांच महीने के सैलरी के बराबर हैं ! अनुपम ने जो पहला गेम खेला वो लेबरिंथ था. छोटी सी बॉल भूलभुलैया में कहां जाएगी, इसे कंट्रोल करने के लिए अनुपम ने दो नॉब का इस्तेमाल किया. अगर बॉल सातवें गड्डे से गुज़र कर जाती हैं तो ये अच्छा परफॉरमेंस होगा और अनुपम 200 रुपये जीत जाएगा. अगर बॉल नौवें गड्डे से होकर जाती हैं तो उसे 400 रुपये मिलेंगे. अनुपम ने खुद से कहा, “ये बहुत ज़रूरी हैं. मुझे कामयाब होना हैं.” लेकिन वो पहली कोशिश में ही फेल हो गया. उसके हाथ कांप रहे थे. और वो बहुत बौखला गया था. ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसके सिर पर बंदूक तान रहा हो. अनुपम फोकस नहीं कर सका. उसने लेबिरिंथ में और अगले दो गेम्स में भी खराब परफॉरमेंस किया. अनुपम ने साइमन गेम भी खेला, वो जिसमें नितिन ने पहले 40 रुपए जीते थे. इसमें, अनुपम लगातार सात रंग के सीक्वेंस को याद रख पाया था. लेकिन वो कामयाब होना हैं.” लेकिन वो पहली कोशिश में ही फेल हो गया. उसके हाथ कांप रहे थे. और वो बहुत बौखला गया था. ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसके सिर पर बंदूक तान रहा हो. अनुपम फोकस नहीं कर सका. उसने लेबिरिंथ और अगले दो गेम्स में भी खराब परफॉरमेंस किया. अनुपम ने साइमन गेम भी खेला, वो जिसमें नितिन ने पहले 40 रुपए जीते थे. इसमें, अनुपम लगातार सात रंग के सीक्वेंस को याद रख पाया था. लेकिन वो आठवां सीक्वेंस नहीं बता पाया. उसका मिड-लेवल परफॉर्मेंस रहा और उसे 200 रुपये दिए गए. सिर्फ दो गेम बचे थे. ज़्यादा पैसा जीतने के लिए ये उसके आखिरी मौके थे. अनुपम ने एक ब्रेक लेने का फैसला किया क्योंकि वो बहुत प्रेशर महसूस कर रहा था. उसने ब्रीथिंग एक्सरसाइज़ करने कोशिश की और थोड़ी देर के लिए रिलैक्स किया. अफ़सोस, अनुपम आखिरी दो मैचों में बुरी तरह नाकाम रहा. उसे अब भी 200 रुपये मिलेंगे, लेकिन फिर भी वो बहुत निराश महसूस हुआ था. उसके 2400 रुपये जीतने का मौका खत्म हो गया था. मोटिवेशन और रिवॉर्ड बढ़ाने से परफॉरमेंस भी हाई लेवल का हो जाएगा, ऐसा नहीं हैं. मिड-लेवल कंपनसेशन देना बेहतर हैं ताकि किसी शख्स या टीम पर प्रेशर न पड़े और वे काम पर फोकस रख सकें. , The Upside of Irrationality Dan Ariely मेहनत का मतलब हम हमेशा इनाम में पैसे मिलने से खुश नहीं होते. लोग काम को बस काम समझकर ही करने की फिराक में होते हैं. हमें काम करने में तसल्ली मिलती हैं. ये बात इंसानों और जानवरों दोनों का सच हैं . डैन एरिएली का एक स्टूडेंट था, डेविड, जो अब एक कॉर्पोरेट फर्म के लिए काम करता हैं . उसे एक प्रेजेंटेशन बनाने और डिलीवर करने का काम दिया गया. डेविड ने स्लाइड्स पर रिसर्च और डिजाइन करने में अपनी पूरी कोशिश लगा दी . लेकिन जब डेविड ने अपने बॉस को प्रेजेंटेशन दिखाया तो बॉस ने कहा कि अब इसकी जरूरत नहीं हैं. डेविड को अपने इतने मेहनत से किए काम को बेकार हुए देख बहुत फ्रस्ट्रेशन हुआ. हालांकि उसे सैलरी मिलती हैं और उसके बॉस ने उसके काम की तारीफ की कि उसने बहुत अच्छा काम किया हैं , फिर भी डेविड को बुरा लगा कि उसके प्रेजेंटेशन को नहीं देखा जाएगा. इस तरह, हम अपने काम में खुद को डुबो देते हैं. हमें हमारे काम के लिए पे किया जाता हो, हमें इसकी शाबाशी मिलती हो, हम अपने काम में सबकुछ लगा देते हैं. डैन एरिएली डेवरा नाम के एक एडिटर को भी जानते थे जो यूनिवर्सिटी प्रेस में काम करता था. उसे एक हिस्टी बक को एडिट करने का काम दिया गया था उसे लगा दतह. डैन एरिएली डेवरा नाम के एक एडिटर को भी जानते थे जो यूनिवर्सिटी प्रेस में काम करता था. उसे एक हिस्ट्री बुक को एडिट करने का काम दिया गया था. उसे इसके काफी पैसे दिए गए और उसे अपना काम करने में मज़ा आया था. हालांकि, फाइनल मैनुस्क्रिप्ट जमा करने से तीन हफ्ते पहले, हेड एडिटर ने कहा कि वो बुक अब और प्रिंट नहीं की जाएगी. डेवरा को पे किया गया और हेड एडिटर ने उसके मेहनत की तारीफ की. लेकिन फिर भी ये frustrating था उसका काम बेकार चला गया. क्या आप कभी इस सिचुएशन से गुज़रे हैं? जानवर भी ऐसा ही एक्सपीरियंस करते हैं. रिसर्चर्स ने पाया कि तोते, लैब के चूहे, मछली, बंदर, सबको तभी रिवॉर्ड ज़्यादा पसंद आते हैं जब वे इसके लिए काम करते हैं. इस कांसेप्ट को contrafreeloading कहा जाता हैं. इसका मतलब हैं कि जानवर मुफ्त में खाना पाने के बजाय अपनी कोशिश से खाना कमाना पसंद करते हैं. ग्लेन जेनसन, जानवरों के एक साइकोलॉजिस्ट थे जिन्होंने इस contrafreeloading शब्द का यूज़ पहली बार किया था. 1960 के दशक में, उन्होंने एडल्ट male अल्बिनो चूहों पर स्टडी की. ये चूहे मेहनत करना पसंद करते हैं, इसके बारे में भी स्टडी की गई. ये चूहे आम पिंजरों में रहते थे. दस दिनों तक, रिसर्चर्स इन चूहों को ठीक दोपहर को खाने में 10 ग्राम पुरीना ग्राउंड क्रैकर देते. चूहों को इस रूटीन की आदत हो नाती है और ते नान नाते हैं कि ताना टर दिन टाटा A < यह आम पिजराम रहत य. दस दिना तक, रसचस इन चूहों को ठीक दोपहर को खाने में 10 ग्राम पुरीना ग्राउंड क्रैकर देते. चूहों को इस रूटीन की आदत हो जाती है और वे जान जाते हैं कि खाना हर दिन दोपहर में आएगा. दस दिन बाद रिसर्चर्स खाना थोड़ी देर से देते हैं. लैब कोट वाला शख्स जो दोपहर को 12 बजे खाना लेकर आता था, वो दोपहर 1 बजे आता हैं. इसके अलावा, वो चूहों को “स्किनर बॉक्स” नाम के एक नए बॉक्स में रखता हैं जिसे साइकोलॉजिस्ट बी एफ स्किनर (BF Skinner) ने डिजाइन किया था. दोपहर के 1 बज चुके थे और चूहे बहुत भूखे थे. स्किनर बॉक्स एक आम पिंजरे की तरह ही होता हैं. लेकिन इसके दो अलग फीचर्स हैं. एक हैं ऑटोमैटिक फूड डिस्पेंसर जो हर 30 सेकंड में खाना गिराता हैं. दूसरा हैं एक फट्टा जो टिन के शील्ड से ढका हुआ हैं . ये फट्टा मज़ेदार नहीं था, लेकिन फूड डिस्पेंसर इंटरेस्टिंग था और चूहे अपना ज्यादा टाइम वही बिताते थे. पचास दाने खाने के बाद चूहों को उनके ओरिजिनल पिंजरे में वापस शिफ्ट किया जाता हैं. अगले दिन, रिसर्चर एक बार फिर दोपहर 1 बजे आता हैं चूहे को स्किनर बॉक्स में ले जाता हैं और वो फूड डिस्पेंसर पर धक्का मारने लगते हैं. लेकिन वहाँ से खाने की गोलियाँ नहीं निकलती. चूहे फिर से कोशिश करते हैं और फिर भी डिस्पेंसर से कुछ नहीं निकलता. वो स्किनर बॉक्स के चारों ओर तब तक भागते हैं जब तक कि वो गलती से टिन शील्ड के फट्टे को दबा नहीं देते. ना नाउ मनांगे नागा मिलता हैं नाते ना तो नारे स्किनर बॉक्स के चारों ओर तब तक भागते हैं जब तक कि वो गलती से टिन शील्ड के फट्टे को दबा नहीं देते. इस बार यहां से खाना निकलता हैं. चूहे खुश हो जाते हैं. वो फट्टे को दबाते हैं और खाना खाते हैं फिर लाइट चली जाती हैं. चूहे जान जाते हैं कि जब लाइट बुझती हैं, तो खाना नहीं आएगा फिर चाहे वो कितना भी उस फट्टे को दबा दे. इसके बाद, रिसर्चर पिंजरे का ऊपर का हिस्सा खोलता हैं और एक कोने में टिन का कप अंदर रखता हैं लेकिन चूहे अभी भी फट्टे को दबाने में बिज़ी हैं. चूहे एक बार फिर से इधर-उधर घुमने लगते हैं और वो टिन के कप में चले जाते हैं. वो देखते हैं कि कप खाने से भरा हैं . यहाँ उन्हें बिना मेहनत किए ही खाना मिल रहा हैं. यहाँ खाना आसान हैं. अब वो टिन के कप से और फट्टे को दबाने से, दोनों जगह से खाना हासिल कर सकते हैं. आपको क्या लगता हैं कि चूहे कहाँ से खाना ज़्यादा पसंद करेंगे? जेन्सेन ने 200 चूहों पर इस स्टडी को आजमाया था. उनमें से 44% ने फट्टे को दबाकर खाना पसंद किया. हां, टिन के कप से खाना फ्री था, बिना मेहनत के. लेकिन चूहों को खाना तभी ज़्यादा पसंद आता हैं जब वे अपनी कोशिश से इसे हासिल करते हैं. दूसरे कई सारे स्टडीज़ ने अलग-अलग जानवरों जैसे मछली, पक्षियों, बंदरों और चिंपैंजी के साथ भी ऐसा ही एक्सपेरिमेंट किया और उनमें भी यही नतीजा निकला. जानवर वही खाना पसंद करते हैं जिसके लिए वे हैं, तो खाना नहीं आएगा फिर चाहे वो कितना भी उस फट्टे को दबा दे. इसके बाद, रिसर्चर पिंजरे का ऊपर का हिस्सा खोलता हैं और एक कोने में टिन का कप अंदर रखता हैं लेकिन चूहे अभी भी फट्टे को दबाने में बिज़ी हैं. चूहे एक बार फिर से इधर-उधर घुमने लगते हैं और वो टिन के कप में चले जाते हैं . वो देखते हैं कि कप खाने से भरा हैं . यहाँ उन्हें बिना मेहनत किए ही खाना मिल रहा हैं. यहाँ खाना आसान हैं. अब वो टिन के कप से और फट्टे को दबाने से, दोनों जगह से खाना हासिल कर सकते हैं. आपको क्या लगता हैं कि चूहे कहाँ से खाना ज़्यादा पसंद करेंगे? जेन्सेन ने 200 चूहों पर इस स्टडी को आजमाया था. उनमें से 44% ने फट्टे को दबाकर खाना पसंद किया. हां, टिन के कप से खाना फ्री था, बिना मेहनत के. लेकिन चूहों को खाना तभी ज़्यादा पसंद आता हैं जब वे अपनी कोशिश से इसे हासिल करते हैं. दूसरे कई सारे स्टडीज़ ने अलग-अलग जानवरों जैसे मछली, पक्षियों, बंदरों और चिंपैंजी के साथ भी ऐसा ही एक्सपेरिमेंट किया और उनमें भी यही नतीजा निकला. जानवर वही खाना पसंद करते हैं जिसके लिए वे मेहनत करते हैं. एक जानवर जो बिना किसी कोशिश के ही ज्यादातर मुफ्त खाना खुशी-खुशी खा सकता हैं , वो हैं बिल्ली. A < The Upside of Irrationality Dan Ariely द आइकिया इफ़ेक्ट डैन ने एक बार आइकिया से एक टॉय ट्रंक यानी डब्बा खरीदा था. उन्हें इसके अलग-अलग टुकड़े को खुद ही जोड़ने का आइडिया बहुत अच्छा लगा. उन्होंने डब्बा खोला, उसके टुकड़े निकाले और इंस्ट्रक्शन को पढ़ा. डैन को इस टॉय को बनाने में कुछ परेशानी हुई. ये प्रोसेस उतना आसान नहीं था जितना कि डायग्राम में बताया गया था. उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि लकड़ी के टुकड़े या स्क्रू को कहाँ लगाना था. डैन को इस प्रोसेस को काफी बार फिर से शुरू करना पड़ा. लेकिन, आखिर में उन्होंने इस पहेली हो सुलझा ही लिया था और उस डब्बे के टुकड़ों को जोड़ लिया. उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे कि ये उनकी अपनी ही रचना हैं, अपनी ही क्रिएशन हैं. अब, जब भी वो उसको देखते तो खुश हो जाते. डैन ने न लकड़ी काटी, न आरी चलाई, या हथौड़े से कीलें ठोंकी, लेकिन टुकड़ों को जोड़ने में उन्होंने जो कोशिश की, उससे वो अपने घर में रखे किसी भी दूसरे फर्नीचर से ज़्यादा जुड़ा हुआ महसूस करने लगे थे. हम इंसान ओनरशिप और क्रिएशन को अपने गरूर से जोड़कर देखते हैं. जब हम एक-एक तैयारी कर खुद खाना पकाते हैं, या बुकशेल्फ़ को टुकड़ों से जोड़कर बनाते हैं, तो हमें उस पर बहुत गरूर होता है, प्राउड फील होता हैं लेकिन आज हमारे पास घटपट तैयार खाना पकाते हैं, या बुकशेल्फ़ को टुकड़ों से जोड़कर बनाते हैं, तो हमें उस पर बहुत गरूर होता है, प्राउड फील होता हैं. लेकिन आज, हमारे पास झटपट तैयार होने वाले इंस्टेंट प्रोडक्ट्स की भरमार हैं जो हमें कंफ्यूज करती हैं. हम इन्हें देखकर समझ नहीं पाते कि इसमें से कितना हमारा कंट्रीब्यूशन हैं या कितना नहीं हैं? एग्ज़ाम्पल के लिए, इंस्टेंट नूडल्स, इंस्टेंट केक मिक्स, या स्टेंट पेस्ट्री? आप माइक्रोवेव से केक या पॉपकॉर्न या कुछ भी आसानी से पका सकते हैं लेकिन ये आपकी दादा के घर में पके हुए कोई भी खाने से कोसों दूर हैं. हम ये कैसे दावा कर सकते हैं कि कोई रेसिपी हमारी हैं या उसे हमने शुरू से ही पकाया हैं जब हम बहुत सारे इंस्टेंट मिक्स खाने बनाते हैं? आधा पकाया हुआ खाना अमेरिका में 1940 के आसपास आ गया था. बिस्किट और पाईक्रस्ट को लोगों ने आसानी से अपना लिया था और वे खूब बिकते थे, लेकिन ये बात केक मिक्स के लिए नहीं था. औरतें इन केक मिक्स को अपने हाथों से बनाया हुआ कहना नहीं चाहती थी. रिसर्चर्स का कहना हैं कि बिस्किट और पाई क्रस्ट के ठीक उल्टा, केक के साथ हमारा इमोशनल रिश्ता होता हैं क्योकिं ये हमारे लिए किसी ख़ास मौके या ख़ास त्योहारों से जुड़े हैं. औरतें इंस्टेंट मिक्स वाले बर्थडे केक परोसने पर खट को दोषी महसस कर सकती हैं. वो हैं क्योकिं ये हमारे लिए किसी ख़ास मौके या ख़ास त्योहारों से जुड़े हैं. औरतें इंस्टेंट मिक्स वाले बर्थडे केक परोसने पर खुद को दोषी महसूस कर सकती हैं. वो अपने गेस्ट को निराश करने और अपने बेइज़्ज़त होने से डरती हैं. अर्नेस्ट डिचर नाम के एक साइकोलॉजिस्ट ने इस मुद्दे का हल ढूंढ निकाला. इसे अंडा या ‘एग थ्योरी’ कहा जाता हैं. पिल्सबरी कंपनी ने इंस्टेंट केक मिक्स बेचना शुरू किया जिसमें अर्नेस्ट के सजेस्ट करने पर, सूखे अंडे को इसके रेसिपी से निकाल दिया गया था. औरतों को सिर्फ पानी के बजाय इस मिक्सचर पर ताजे अंडे, साथ ही दूध और तेल मिलाने का इंस्ट्रक्शन दिया गया था. इस रेसिपी के साथ, केक मिक्स के सेल्स में तेजी आई. 1950 के दशक में, केक मिक्स बहुत अच्छी तरह से बिक रहे थे. औरतें सिर्फ मिक्सचर में पानी डालकर, केक को अपने हाथों से बना हुआ नहीं मान पा रही थीं. ताजे अंडे, दूध और तेल मिलाने से सबकुछ बदल गया था. “सेमी-होममेड” कम्पनी के मालकिन सैंड्रा ली के पास और भी मॉडर्न सोल्यूशन था. औरतों को रेसिपी में पर्सनल टच महसूस कराने के लिए, उन्होंने एक यूनिक फार्मूला निकाला. ये था 70/30 सेमी-होममेड फिलॉसफी. सैंड्रा के हिसाब से, सबसे अच्छा बैलेंस होगा 70/30 का. रेसिपी का 70% इंस्टेंट या रेडी-मेड हो सकता हैं, जैसे दूकान से ख़रीदा हुआ केक मिक्स. लेकिन 30% हैं क्योकिं ये हमारे लिए किसी ख़ास मौके या ख़ास त्योहारों से जुड़े हैं. औरतें इंस्टेंट मिक्स वाले बर्थडे केक परोसने पर खुद को दोषी महसूस कर सकती हैं. वो अपने गेस्ट को निराश करने और अपने बेइज़्ज़त होने से डरती हैं. अर्नेस्ट डिचर नाम के एक साइकोलॉजिस्ट ने इस मुद्दे का हल ढूंढ निकाला. इसे अंडा या ‘एग थ्योरी’ कहा जाता हैं. पिल्सबरी कंपनी ने इंस्टेंट केक मिक्स बेचना शुरू किया जिसमें अर्नेस्ट के सजेस्ट करने पर, सूखे अंडे को इसके रेसिपी से निकाल दिया गया था. औरतों को सिर्फ पानी के बजाय इस मिक्सचर पर ताजे अंडे, साथ ही दूध और तेल मिलाने का इंस्ट्रक्शन दिया गया था. इस रेसिपी के साथ, केक मिक्स के सेल्स में तेजी आई. 1950 के दशक में, केक मिक्स बहुत अच्छी तरह से बिक रहे थे. औरतें सिर्फ मिक्सचर में पानी डालकर, केक को अपने हाथों से बना हुआ नहीं मान पा रही थीं. ताजे अंडे, दूध और तेल मिलाने से सबकुछ बदल गया था. “सेमी-होममेड” कम्पनी के मालकिन सैंड्रा ली के पास और भी मॉडर्न सोल्यूशन था. औरतों को रेसिपी में पर्सनल टच महसूस कराने के लिए, उन्होंने एक यूनिक फार्मूला निकाला. ये था 70/30 सेमी-होममेड फिलॉसफी. सैंड्रा के हिसाब से, सबसे अच्छा बैलेंस होगा 70/30 का. रेसिपी का 70% इंस्टेंट या रेडी-मेड हो सकता हैं, जैसे दूकान से ख़रीदा हुआ केक मिक्स. लेकिन 30% रेसिपी के साथ, केक मिक्स के सेल्स में तेजी आई. 1950 के दशक में, केक मिक्स बहुत अच्छी तरह से बिक रहे थे. औरतें सिर्फ मिक्सचर में पानी डालकर, केक को अपने हाथों से बना हुआ नहीं मान पा रही थीं. ताजे अंडे, दूध और तेल मिलाने से सबकुछ बदल गया था. “सेमी-होममेड” कम्पनी के मालकिन सैंड्रा ली के पास और भी मॉडर्न सोल्यूशन था. औरतों को रेसिपी में पर्सनल टच महसूस कराने के लिए, उन्होंने एक यूनिक फार्मूला निकाला. ये था 70/30 सेमी-होममेड फिलॉसफी. सैंड्रा के हिसाब से, सबसे अच्छा बैलेंस होगा 70/30 का. रेसिपी का 70% इंस्टेंट या रेडी-मेड हो सकता हैं, जैसे दूकान से ख़रीदा हुआ केक मिक्स. लेकिन 30% ताजे प्रोडक्ट्स उसमें डाले जाने चाहिए जैसे कि हनी, तुलसी के पत्ते जो कूटे हुए न हो, सूखे न हो. ये सैंड्रा का मॉडर्न एग थ्योरी हैं . यही उनके टेलीविजन शो, मैगजीन और कुक बुक में उनकी फिलोसॉफी हैं. अगर आप 70/30 सेमि-मेड फिलोसॉफी को फॉलो करते हैं, तो आप इंग्रेडिएंट्स के साथ टाइम और एनर्जी भी बचाएंगे. लेकिन फिर भी आपको पूरी तसल्ली होगी कि आपने खुद अपना खाना बनाया हैं. और, ये आपके फैमिली के दूसरे लोगों, दोस्तों और मेहमानों को भी खुश करेगा. The Upside of Irrationality Dan Ariely बदला लेने का केस क्या आप ‘द काउंट ऑफ़ मोंटे क्रिस्टो’ की कहानी जानते हैं? कहानी के main कैरेक्टर का नाम एडमंड डेंस हैं. झूठे आरोपों की वजह से उसे कई सालों तक जेल में रखा गया था. आखिर में, वो भाग जाता हैं और उसे वो खजाना मिलता हैं जो उसके एक साथी कैद ने उसके लिए छोड़ा था. उस खजाने ने उसकी जिंदगी बदल दी . वो मोंटे क्रिस्टो का काउंट, वहाँ का मालिक बन गया. उसने अपनी सारी संपत्ति लगाकर उन लोगों से बदला लेने की ठानी जिसने उसे फंसाया था. आखिर में, उसने महसूस किया कि बदला लेते-लेते वो काफी दूर निकल आया था. क्या वाकई इंसान बदला लेने के लिए तैयार रहते हैं? क्या हम हमेशा बदले की भावना पालते हैं जब कोई हमारे साथ कुछ गलत करता हैं ? हम कितना माफ कर पाते हैं और अपनी जिंदगी में आगे बढ़ पाते हैं? स्वीडन के रिसर्चर, अर्स्ट फ़ेहर के एक स्टडी के बारे में जानते हैं. उन्होंने ‘ट्रस्ट गेम’ नाम के एक एक्सपेरिमेंट के बारे में सोचा. स्वाडन कारसचर, अन्स्ट फ़हर क एक स्टडाक बार में जानते हैं. उन्होंने ‘ट्रस्ट गेम’ नाम के एक एक्सपेरिमेंट के बारे में सोचा, इस गेम में, आपको एक दूसरे पार्टिसिपेंट के साथ जोड़ी बना दिया जाता हैं. आप दोनों ही अलग-अलग कमरे में हैं और आप एक दूसरे की आइडेंटिटी कभी नहीं जान पाएंगे. रिसर्चर आप दोनों को 10 डॉलर देता हैं. आपको पहला इंस्ट्रक्शन दिया गया और कहा गया कि आपको ये तय करना हैं कि 10 डॉलर को आप अपने पास रखना चाहेंगे या दूसरे पार्टिसिपेंट को देना चाहेंगे. अगर आप इसे रखते हैं, तो आप दोनों के पास 10 डॉलर होंगे और गेम खत्म. हालांकि, अगर आप दूसरे पार्टिसिपेंट को अपना 10 डॉलर देने का फैसला करते हैं, तो रिसर्चर उस पार्टिसिपेंट को 40 डॉलर और देगा, ताकि उसके पास 50 डॉलर हो जाए. अब, सारे पैसे रखने की बारी उसकी हैं, जिसका मतलब हैं कि या तो आपको कुछ नहीं मिलेगा, या वो आपके साथ पैसे बांटेगा तो आप दोनों ही 25 डॉलर के साथ घर जाएंगे. सवाल ये हैं कि क्या आप उस दूसरे शख्स पर इतना भरोसा करेंगे कि वो आपसे पैसे बांटेगा? आम अंदाज़ा ये हैं कि दूसरा पार्टिसिपेंट सारे पैसे ले लेगा. इसलिए कोई भी अपने 10 डॉलर देगा ही नहीं लेकिन रिसर्च में पता चला कि ज्यादातर लोग दसरे आम अंदाज़ा ये हैं कि दूसरा पार्टिसिपेंट सारे पैसे ले लेगा. इसलिए कोई भी अपने 10 डॉलर देगा ही नहीं.लेकिन रिसर्च में पता चला कि ज्यादातर लोग दूसरे पार्टिसिपेंट पर भरोसा करते हैं. ज़्यादातर लोगों का मानना हैं कि दूसरे शख्स में इतनी अच्छाई ज़रूर होगी कि वो 50 डॉलर्स ज़रूर बांटेगा. इस गेम में एक ट्विस्ट हैं. रिसर्चर्स ने एक नियम जोड़ा कि अगर दूसरे पार्टिसिपेंट ने पूरे 50 डॉलर रखने का फैसला किया, तो आपके पास उससे बदला लेने का मौका होगा. अगर आप अपने ] डॉलर रिसर्चर को देते हैं, तो दूसरे पार्टिसिपेंट को 2 डॉलर कम मिलेगा यानि वो सिर्फ 48 डॉलर लेकर घर जाएगा. और यदि आप 25 डॉलर रिसर्चर को देते हैं तो वो पार्टिसिपेंट खाली हाथ घर लौटेगा. फिर आपका बदला पूरा हो जाएगा. जिस शख्स ने आपको धोखा दिया हैं , क्या आप उससे बदला लेने के लिए अपने पैसे लगाना चाहेंगे? वो सज़ा भुगते, इसके लिए आप कितना खर्च करने को तैयार हैं? असल में, ऐसे पार्टिसिपेंट्स भी निकले जिन्होंने इस मौके का फायदा उठाया और दूसरे शख्स को कड़ी सजा दी . इन बदला लेने वाले पार्टिसिपेंट्स के दिमाग को PET से स्कैन किया गया और इससे पता चला कि मुगत, इसक लिए जाप कितना खच करतका तयार हैं? असल में, ऐसे पार्टिसिपेंट्स भी निकले जिन्होंने इस मौके का फायदा उठाया और दूसरे शख्स को कड़ी सजा दी . इन बदला लेने वाले पार्टिसिपेंट्स के दिमाग को PET से स्कैन किया गया और इससे पता चला कि उन्हें बदला लेने में बहुत हाई लेवल का मज़ा आया था और ये बात चिंपैंजी के लिए भी सच है. बदला लेने से हमें खुशी मिलती हैं. यहां एक और मज़ेदार कहानी हैं जिसे पको जानना चाहिए. जेफ़री कैटज़ेनबर्ग को डिज़्नी से निकाल दिया गया था. उन्होंने मुकदमे से 280 मिलियन डॉलर का मुआवज़ा (compensation) जीता. अंदाजा लगाइए कि जेफ़री ने अपने 280 मिलियन डॉलर का क्या किया? उन्होंने ड्रीमवर्क्स की शुरुवात की, जो अब डिज़्नी का बड़ा कॉम्पिटिटर हैं. जेफ़री और उनकी टीम ने ‘श्रेक’ फिल्म बनाई जो डिज़्नी की राजकुमारी और परियों की कहानियों की पैरोडी हैं इस कहानी का विलन जेफ़री के एक्स-बॉस, डिज़्नी के माइकल आइजनर से मिलता जुलता है. जेफ़री ने ‘कुंग-फू- पांडा’ और ‘हाउ टू ट्रेन यॉर ड्रैगन’ जैसी कई बेहतरीन एनिमेशन फिल्में बनाई. कन्क्लूज़न पार ड्रगन जसा फइ बहतरान एनिमरान फिल्म बनाइ. कन्क्लूज़न आपने नितिन और अनुपम के बारे में जाना. उनकी कहानी से पता चलता हैं कि अगर सैलरी मिड-लेवल का हैं तो लोग ज़्यादा फोकस और कॉन्सेंट्रेट कर पाते हैं. हाई-लेवल का मोटिवेशन लोगों को प्रेशर में ला सकती हैं और उनका फोकस कम हो जाता हैं. आपने लैब के चूहों के बारे में सीखा जो टिन के कप से आसानी से खाने के बजाय फट्टे को दबाकर उसमें से निकला खाना पसंद करते हैं. जानवर ही नहीं, हम भी चीजों को बिना मेहनत के हासिल करने के बजाय उसे कमाना पसंद करते हैं. आपने इंस्टेंट केक मिक्स और हाउस-वाइफ पर इसके असर के बारे में जाना. हमें पता चला कि लोग इंस्टेंट प्रोडक्ट के इस्तेमाल से कहीं ज़्यादा पर्सनल टच के साथ चीज़ों को पसंद करते हैं. हम खुद के बनाए हुए चीजों पर प्राउड महसूस करते हैं और उन चीज़ों को इतना नहीं पूछते जिन्हें हम आसानी से खरीद कर ला सकते हैं. आपने अजनबियों के बीच के स्टडी के बारे में भी जाना जिसमें ज़्यादातर पार्टिसिपेंट्स ने पैसे रखने के बजाय 50 डॉलर शेयर किया. लेकिन, हम इंसानों को बदला फमाना पसनफरतह. आपने इंस्टेंट केक मिक्स और हाउस-वाइफ पर इसके असर के बारे में जाना. हमें पता चला कि लोग इंस्टेंट प्रोडक्ट के इस्तेमाल से कहीं ज़्यादा पर्सनल टच के साथ चीज़ों को पसंद करते हैं. हम खुद के बनाए हुए चीजों पर प्राउड महसूस करते हैं और उन चीज़ों को इतना नहीं पूछते जिन्हें हम आसानी से खरीद कर ला सकते हैं. आपने अजनबियों के बीच के स्टडी के बारे में भी जा जिसमें ज़्यादातर पार्टिसिपेंट्स ने पैसे रखने के बजाय 50 डॉलर शेयर किया. लेकिन, हम इंसानों को बदला लेने में खुशी मिलती हैं. हम हमेशा इर्रेशनल रहेंगे, बिना किसी ठोस वजह या तर्क के ही रहेंगे. हम इससे बच नहीं सकते. हम इंसान हैं और हम गलतियाँ करने के लिए ही बने हैं. बिहैवियरीयल इकोनॉमिक्स इन्हीं बातों और पैटर्न को समझने के लिए इनकी स्टडी करता हैं. इसी वजह से ये फील्ड बहुत ही मजेदार और इंटरेस्टिंग बनता हैं. आपने जो सीखा हैं उससे आप खुद का एक्सपेरिमेंट बना सकते हैं या फिर अपनी जिंदगी में, अपने करियर में बेहतर फैसले लेने में इनका यूज़ कर सकते हैं.

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