THE STARTUP OWNER’S MANUAL -A Step By Step… Steve Blank Books In Hindi Summary

THE STARTUP OWNER’S
MANUAL -A Step By Step…
Steve Blank
इंट्रोडक्शन

स्टार्ट-अप क्या होता है? क्या आप जानते हैं, स्टार्ट-अप और एक कंपनी के बीच क्या फ़र्क है? क्यों सिर्फ कुछ गिने-चुने स्टार्ट-अप ही सक्सेसफुल रहते है जबकि ज़्यादातर फेल हो जाते है? क्या आप जानना चाहेंगे कि किस तरह प्रोडक्ट बनाये जाएँ ताकि वो बिक सकें? अगर आप इन सारे सवालों के जवाब जानना चाहते है तो ये समरी आपके लिए एक परफेक्ट गाईड है. स्टीव ब्लैंक अपनी इस किताब में रीडर्स को बताएँगे कि
एक स्टार्ट-अप बिजनेस के बेसिक फंडामेंटल क्या होते है और कैसा बिजनेस प्लान बनाया जाए जो वाकई में काम कर सके.
The Path To Disaster: A Startup Is Not A Small Version Of A Big Company
(एक स्टार्ट-अप बिजनेस किसी बड़ी कंपनी का छोटा रूप नहीं होता है)

पुराने टाइम में ज़्यादातर कंपनीज़ कोई भी नया प्रोडक्ट बनाने के लिए और उसे मार्केट में launch करने
के लिए प्रोडक्ट सेण्टर्ड अप्रोच फॉलो किया करती थी. इस मॉडल में किसी जाने माने मार्केट के लिए
पोदकस बनाये जाते थे और उन प्रोडक्टस के कस्टमर कौन होंगे, ये पहले से तय होता था. लेकिन आज के वक्त में स्टार्ट-अप बिजनेस का ट्रेंड है. स्टार्ट-अप बिजनेस एक जुआ है. बिना किसी क्लाइंट बेस के किसी एकदम नए मार्केट में नए प्रोडक्ट्स उतारने में और एक वेल एस्टेबिलिश्ड मार्केट में प्रोडक्ट launch करने में बड़ा फर्क है.

इसलिए मॉडर्न टाइम के हिसाब से एक नया इम्प्रूव्ड प्रोडक्ट इंट्रोडक्शन मॉडल एकदम फिट बैठता है.
ये नया मॉडल चार स्टेज पर बेस्ड है. पहला स्टेज है कांसेप्ट स्टेज, जहाँ स्टार्ट-अप का फाउन्डर अपने
विज़न को लेकर कुछ आईडिया सोचेगा. दूसरा स्टेज: फर्स्ट स्टेज के सारे आईडिया को ओर्गेनाइज़ किया जाएगा, फिर उसके बाद टीम टास्क डिवाइड करेगी और डेवलपमेंट प्रोसेस की तरफ बढ़ेगी. थर्ड स्टेज: टीम नए प्रोडक्ट्स को टेस्ट करेगी. टीम कुछ ऐसे लोगों को चुनेगी जो उनके पहले कस्टमर्स बनकर ये चेक करेंगे कि वो प्रोडक्ट्स उनकी ज़रूरतों को पूरा करते हैं या नहीं. चौथा स्टेज: स्टार्ट-अप मार्केटिंग कैंपेन्स करने के बाद प्रोडक्ट्स मार्केट में launch कर देगा. चलिए इसे एक एक्जाम्पल के जरिये समझने की
कोशिश करते है. 20वी सदी के अंत में Webvan नाम का एक ऐसा स्टार्ट-अप आया था जिसकी सफलता की उम्मीद सबको थी. ये स्टार्ट-अप शुरुवात से ही काफी प्रोमिसिंग लग रहा था और इनके पास ऐसे आईडियाज़ थे जो उस वक्त यूनाइटेड स्टेट्स में रहने वाले सभी लोगों की लाइफस्टाइल में एक बदलाव ला सकते थे.

Webvan अपने इस नए आईडिया के लिए करीब $800 मिलियन से भी ज्यादा इन्वेस्ट करने जा रही
थी. और उनका गोल था: इस रकम से एक $450 बिलियन की कंपनी खड़ी करने का जिसकी वजह से
कई लोगों को जिंदगी बदलने वाली थी. दरअसल Webvan का आईडिया था ऑनलाइन डिलीवरी करने का. उन्होंने सोचा क्यों ना एक ऐसा एप बनाया जाए जहाँ कस्टमर्स सिर्फ एक क्लिक से अपनी जरूरत की हर चीज़ घर बैठे ऑर्डर करके मंगा सके. इस स्टार्ट-अप बिजनेस को अपने इस आईडिया पर इतना ज्यादा कांफिडेंस था कि Webvan के सीईओ ने फोर्ब्स मैगेजीन को इंटरव्यू में कहा कि वो लोग दुनिया को बदल कर रख देंगे” तो, अपने इन्वेस्टर्स से पैसा कलेक्ट करने के बाद Webvan ने वेयरहाउस बनाया जहाँ उनकी डिलीवरी वैन खड़ी रहती थी और कंपनी ने अपने बिजेनस आईडिया शेयर करने के लिए एक वेबसाईट भी बनाई. शुरू-शुरू में हर किसी को ये आईडिया बड़ा पसंद आया. लेकिन एक साल बाद ही Webvan का
दिवालिया निकल गया और बिजेनस ठप्प पड गया दरअसल Webvan एक बड़ी गलती ये कर रही थी

कि वो ट्रेडिशनल प्रोडक्ट क्रिएशन मॉडल को फॉलो कर रही थी. उन्हें अपने बिजनेस आईडिया को मार्केट
में उतारने की इतनी जल्दी थी कि टेस्टिंग और मार्केट स्टडी किये बिना ही वो लोग मार्केट में कूद पड़े.
उन्होंने ना तो अपने कस्टमर्स को जानने-समझने की कोशिश की और ना ही कोई फीडबैक ही लिया जिसका नतीजा ये निकला कि Webvan एक ही साल के अंदर बुरी तरह फेल हो गई. अगर आपके पास भी कोई बिजनेस आईडिया है, बेशक आपको लगे कि ऐसा आईडिया आज तक किसी को नहीं आया होगा, इसके बावजूद आपको सक्सेस की गारंटी नहीं मिल सकती. क्योंकि स्टार्ट-अप बिजनेस में कुछ भी श्योर नहीं होता. और इसीलिए बैटर यही होगा कि शुरुवात में ही धडाधड प्रोडक्शन करने के बजाए टेस्टिंग और डिमांड के हिसाब से प्लान में चेंजेस लाने के बाद ही कोई एक्शन लिया जाए.

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The Path To The Epiphany: The
Customer Development Model

सबसे बड़ी और कॉमन गलती जो सारे स्टार्ट-अप करते है कि उन्हें पता नहीं होता कि वो कौन है यानी उन्हें
खुद नहीं पता कि वो किस टाइप का बिजनेस कर है. उन्हें लगता है कि स्टार्ट-अप एक कंपनी का छोटा
वर्जन है ,जोकि उनकी गलतफहमी है. हमने पहले के चैप्टर में पढ़ा कि स्टार्ट-अप एक ऐसा बिजनेस मॉडल
होता है जो एक रीपीटेबल और स्केलेबल रिजल्ट अचीव करना चाहता है. हर स्टार्ट-अप बिजनेस दो प्रोसेस से होकर गुजरता है: पहला: द अननोन फेज, यानी इस पीरियड में एक्स्प्लोर किया जाता है और फिर हाइपोथीसिस बिल्ड की जाती है या अनुमान लगाया जाता है . दूसरा है: नोन स्टेज जहाँ इन हाइपोथीसिस की टेस्टिंग और एक्जिक्यूशन होता है. आपका स्टार्ट-अप अगर एक्जीक्यूशन स्टेज पर पहुँच गया तो उसके बाद आपको प्लान और बाकि के मैनेजमेंट टूल्स की जरूरत पड़ती है. यहाँ आप फिर दो प्रोसेस की जरूरत होगी.
फर्स्ट प्रोसेस के लिए आपको कस्टमर डेवलपमेंट मॉडल चाहिए जो चार सिंपल स्टेज के जरिये आपको अपने कस्टमर्स को समझने में हेल्प करेगा. पहला: आपको अपने कस्टमर्स ढूँढने होंगे और अपना

हाइपोथीसिस टेस्ट करने के लिए कोई प्लान बनाना अपने कस्टमर्स को टेस्ट करके इन हाइपोथीसिस को वेलिडेट करना. तीसरा: आपको अब एक्जीक्यूशन प्लान पर एक्शन लेना है, इसके लिए आपको अपने प्रोडक्ट की मैन्युफैक्चरिंग स्टार्ट करनी होगी जिससे आपके कस्टमर्स आपके क्लाइंट्स में बदल जाएँ और आखिर में आता है ट्रांजीशन फेज़ यानी स्टार्ट-अप से एक कंपनी बनने तक का सफर. एक्जीक्यूशन के लिए आपको एक कस्टमर डेवलपमेंट मॉडल की जरूरत पड़ेगी. इस मॉडल में प्रोसेस लीनियर नहीं है बल्कि स्टार्ट-अप ऊपर बताये गए चारो स्टेप्स के चारो तरफ तब तक घूमता रहता है जब तक कि एक ऐसे बिजनेस मॉडल तक ना पहुंच जाए जो काम करे. जून 2004, में विल हार्वे को एक नया बिजनेस आईडिया आया जिसे उसने स्टीव ब्लैंक के साथ डिस्कस किया. ये दोनों दोस्त साथ में पहले भी काम कर चुके थे. स्टीव विल की पहले वाली कंपनी में एक इन्वेस्टर हुआ करते थे और विल स्टीव की विडियो गेम कंपनी में एक इंजीनियर थे. जब स्टीव ने सुना कि विल के पास को नया बिजेनस आईडिया है तो उन्होंने डिटेल्स सुने बिना ही डायरेक्ट चेक तक रेडी कर लिया था.

एक नए सोशल नेटवर्क जिसमें एक 3D अवतार बेस्ड इंस्टेंट मैसेजिंग था, को लेकर विल के पास एक
नया आईडिया था, विल अपनी डेवलपमेंट स्किल्स को लेकर बड़ा फेमस था, सिर्फ 15 साल की उम्र में ही
उसने अपना पहला वीडियोगेम क्रिएट कर लिया था. विल ने इससे पहले भी एक ऑनलाइन रिक्रूटिंग कंपनी क्रिएट करने की कोशिश की थी. इस मॉडल पर वो अपने दोस्त एरिक के साथ मिलकर तीन साल तक काम करते रहे और एक बार एक्जीक्यूशन स्टेज तक पहुँचने के बाद उन्होंने देखा कि उनके ज्यादातर नए मॉडल के फीचर कस्टमर्स को पसंद नहीं आये है. स्टीव अपने इस नए आईडिया के साथ सेम गलती नहीं
दोहराना चाहते थे इसलिए उन्होंने विल को कहा कि उन्हें कस्टमर डेवलपमेंट के बारे में जानने के लिए चेक
की जरूरत नहीं है. तो विल और एरिक ने मिलकर ये डिसाइड किया कि उन्हें एक ऐसा प्रोडक्ट बनाना है जो
कस्टमर्स की जरूरत पूरा करे और उन्हें पसंद आये. इस बार सबसे पहले उन्होंने हाइपोथीसिस यानि प्रोडक्ट
किस तरह का होगा ये प्लान किया, फिर अपने उस हाइपोथीसिस को टेस्ट किया, जो गलती नजर आई,
उसे दूर किया और फिर सेम स्टेप्स तब तक रिपीट करते गये जब तक कि उन्हें अपना राईट प्रोडक्ट नहीं मिल गया. नतीजा ये हुआ कि विल और स्टीव ने मिलकर एक सक्सेसफुल कंपनी चलाई.

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MANUAL -A Step By Step…
Steve Blank
The Customer Development Manifesto

पहले चैप्टर में आपने सीखा कि कस्टमर डेवलपमेंट मॉडल इन चार स्टेप्स को फॉलो करके स्टार्ट-अप
की शुरुवात से लेकर एक कंपनी चलाने तक मूव होता है. और ये चार स्टेप्स है: कस्टमर डिस्कवरी, कस्टमर
validation , कस्टमर क्रिएशन और बिल्डिंग अ कंपनी. अब इस कस्टमर डेवलपमेंट मॉडल में एक मेनीफेस्टो है. इसमें 14 प्रिंसिपल शामिल है जो आपको सीखने होंगे और अपने बिजनेस मॉडल में अप्लाई करने होंगे. सबसे पहले, अपने स्टार्ट-अप के अंदर ही अंदर फैक्ट्स ढूँढने की कोशिश मत करो बल्कि मार्केट में जाकर असली कस्टमर्स को समझने की कोशिश करो. 

दूसरी चीज़: आप चाहते हो कि ये मॉडल काम करे तो आपको तुरंत एडजस्टमेंट करने होंगे और अगर कोई प्रॉब्लम है तो वो भी जल्द से जल्द फिक्स करने होंगे. 

तीसरी चीज़: ज़्यादातर स्टार्ट-अप्स फेल होते है, इसलिए अगर आप भी फेल हुए है तो निराश मत
होना. जो प्रॉब्लम आई है, उसे फिक्स करके दोबारा कोशिश करो. 

चौथी चीज़: एक बार आपने एक्सेप्ट कर लिया कि आप फेल हुए है तो उसे अपनी हार मत समझो बल्कि उससे कुछ सीखने की कोशिश करो. आपको जब तक अपना गोल अचीव नहीं होता, लगातार इम्पूटमेंट करते रहो.

पांचवी चीज़: एक मत समझना कि एक बार आपने अपना बिजनेस प्लान टेस्ट कर लिया तो आपको
हर चीज़ अपने प्लान के हिसाब से मिलेगी. लिए डायनामिक बनो और अपने कस्टमर्स की नीड्स के बारे
में सोचो. ऐसे ही किसी भी बिजनेस प्लान को फॉलो मत करो.
छठी चीज़: आपको अपनी हाइपोथीसिस फील्ड यानी मार्केट में टेस्ट करनी है और अपने विजन को
validate करना है.

सातंवी चीज़: ये समझ लो कि हर मार्केट अलग होती है, तो जो मार्केट आपके टारगेट में है, उसी के हिसाब
से आपको प्रोडक्ट भी बनाना होगा. ऐसे ही हर किसी मार्केट में आपका प्रोडक्ट नहीं चलेगा.

आठवी चीज़: कोई भी फैसला लेने से पहले हमेशा जानकारी इक्ठठा कर लो.

नौंवी चीज़: अगर कोई प्रॉब्लम आती है तो तुरंत डेटा कलेक्ट करके उस इश्यू को फिक्स करो और वापस
ट्रेक पर आ जाओ.

दसवी चीज़: आप जो कर रहे हो, उसके लेकर आपके दिल में पैशन होना चाहिए.

ग्यारहवी चीज़: एक स्टार्ट-अप शुरू करने और एक कंपनी खोलने में फर्क है. स्टार्ट-अप में ऐसे मेंबर्स होने
चाहिए जो हर तरह के चेंज को एक्स्पेट कर सके और रिस्क लेने के लिए तैयार रहे.

बारहवी चीज़: अपने स्टार्ट-अप से आपको जो भी कमाई हो रही है, उसे जमा करे जब तक कि आप एक
रीपीटेबल और स्केलेबल बिजनेस मॉडल ना डेवलप कर ले. उसके बाद ही आप स्टार्ट-अप के पैसे को हाथ
लगा सकते है. 

तेरहवी चीज़: जो भी आपको फील्ड में सीखने को मिले उसे अपनी पूरी टीम से जरूर शेयर करे.
और आखिर में, इस बात को एक्स्पेट कर ले कि कस्टमर डेवेलपमेंट मॉडल एक ट्रेडिशनल मॉडल से
अलग होता है. बजाये इसके कि आप डायरेक्ट एक ऐसा प्रोडक्ट बना ले जिसकी आपको जरूरत नहीं है,
बेहतर यही होगा कि आप प्रोसेस के हिसाब से चले. इस चैप्टर में हम आपको एक सटीक और छोटा सा
एक्जाम्पल देना चाहेंगे जो Groupon कंपनी के बारे में है. इस कंपनी की शुरुवात “The Point” से हुई थी. ये
एक सोशल मिडिया प्लेटफॉर्म था जो कभी सुबह का उजाला नहीं देख पाया. कंपनी का दिवालिया निकलने
जा रहा था कि अचानक कंपनी एक ड्रामेटिक चेंज लेकर आई.

सेम बिजनेस मॉडल फॉलो करने के बजाए” The Point” ने कुछ रूल्स फॉलो करने की कोशिश की
जो हमने अभी आपसे शेयर किये थे. इसका नतीजा ये निकला कि उन्होंने कुछ ऐसा क्रिएट कर दिया जिसे
आज हम बंडल परचेज बोलते है जैसे एक के साथ एक पित्ज़ा फ्री वाला ऑफर. इस चेंज की वजह से उनके पहले बीस कस्टमर्स बने और यही से उनकी एक $12 बिलियन की कंपनी बनने की शुरुवात हुई जिसे Groupon कहा जाता है. ये कंपनी बुरी तरह फेल हो गई थी पर अपनी हार से काफी कुछ सीखकर कंपनी बाउंस बैक हुई और दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की.


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Steve Blank
An Introduction To Customer
Discovery

कस्टमर डेवलपमेंट मॉडल में हमने सीखा कि किसी भी स्टार्ट-अप बिजनेस का पहला स्टेप है कस्टमर
डिस्कवरी स्टेप जो हमे फॉलो करना चाहिए. इस चैप्टर में हम इस स्टेप को और भी डिटेल से समझाने
की कोशिश करेंगे. ये तो आप जानते ही है कि हर बिजनेस की शुरुवात एक आईडिया से होती है. आमतौर पर किसी भी कंपनी का फाउंडर अपने माइंड में एक प्रोडक्ट का विजन लेकर चलता है. फिर वो एक प्लान बनाता है कि उस विजन को कैसे अचीव करना है. Hypothesis और विजन को रियेलिटी में उतारने में
कस्टमर डिस्कवरी का इम्पोर्टेट रोल है. स्टार्ट-अप के फाउंडर को चाहिए कि वो रियल लाइफ के कस्टमर्स
की जरूरतों को स्टडी करे फिर उसे अपने प्रोडक्ट में उन फीचर्स की एक लिस्ट बनानी होगी जो उसके
टारगेट कस्टमर्स उस प्रोडक्ट के अंदर देखना चाहते है. ये सब होने के बाद फाउंडर शुरुवात में कुछ गिने-चुने
कस्टमर्स के लिए ही जिन्हें फोकस ग्रुप कहा जाता है, प्रोडक्ट बनाएगा और टेस्ट करेगा. किसी भी नए स्टार्ट-अप के लिए ये ज्यादा आसान रहेगा कि एक बड़ी मार्केट के लिए प्रोडक्ट बनाने के बजाये पहले कुछ गिने-चुने कस्टमर्स के लिए ही प्रोडक्ट बनाया जाए. और एक बार जब आपके फोकस ग्रुप ने अप्रूवल दे दिया तो फिर आप बड़े लेवल पर प्रोडक्शन शुरू कर सकते है.

अब तक का सबसे ज्यादा सिग्निफिकेंट स्टार्ट-अप रिस्क का एक एक्जाम्पल है Iridium. इस कंपनी
की फाउंडर थी मोटोरोला जिसके साथ 18 और कंपनीज की पार्टनरशिप थी. Iridium एक ऐसा
फ़ोन सिस्टम बनाना चाहती थी जो धरती पर कहीं से भी काम कर सके, चाहे सेल पॉवर हो या ना हो.
हालांकि ये आईडिया कुछ अनप्रेक्टिकल और अजीब था. Iridium ने एक स्पेशल बिजनेस प्लान भी
ने क्रिएट किया. सबसे पहले उन्होंने रशिया, यू.एस और चाइना से 15 रॉकेट्स खरीदे. फिर उन्होंने दुनिया भर में मैं सेजेस सेंड और रीसीव करने के लिए सेल टावर के तौर पर 72 सैटेलाईट्स स्पेस में launch किए.
इस प्लान को एक्जिक्यूट करने में सात साल लगे. लेकिन नौ महीने बाद ही Iridium कंपनी का
दिवाला निकल गया. दुनिया की सबसे सक्सेसफुल कंपनी बनने के बजाए Iridium स्टार्ट-अप हिस्ट्री की
सबसे फेमस फेलर बनकर रह गयी. हुआ ये कि Iridium ने खुद अपनी मर्जी से कस्टमर की पसंद का अंदाजा लगाकर एक पूरी कंपनी ही बना डाली. उनके कुछ विजंस और hypothesis थे पर बिना ये टेस्ट किये कि उनके आईडिया के लिए मार्केट है या नहीं, Iridium एक फुल मोड एक्जीक्यूशन पर चली गई.

उनके फेल होने की एक और वजह थी कि उन्हें अपना प्लान एक्जीक्यूट करने के काफी वक्त लग गया.
क्योंकि पूरे सात साल के गैप में काफी कुछ हो सकता था, और उन्हें ये नहीं पता था कि जब तक वो अपना
मोबाइल फ़ोन सिस्टम launch करेंगे, तब तक दुनिया में हर जगह सेल टावर्स लग चुके होंगे. बेशक जब पहली बार ये आईडिया उनके दिमाग में आया, तब शायद उन्हें अपने कस्टमर्स मिल भी जाते, पर सात साल बाद उनके कस्टमर बेस की ज़रुरत और डिमांड बदल चुकी थी. Iridium के फेल होने की एक और वजह थी कि इन सात सालो के वक्त में सेल फोन्स में काफी बदलाव आ चुके थे, जो सेल फोन इरीडियम ने बनाये थे, काफी बड़े और ईंट जैसे भारी थे और साथ ही कफी महंगे भी. जबकि सात साल बाद मार्केट में जो सेल फोंस
आये वो काफी हल्के और छोटे थे और Iridium के मुकाबले काफी सस्ते थे. Iridium ने 1991 में एक विजन देखा था, पर उन्होंने अपने बिजनेस मॉडल में कोई इम्प्रूवमेंट नहीं किया. दुनिया काफी आगे निकल चुकी थी जबकि Iridium 1997 में ही अटका हुआ था और उन्हें लगा कि उनका कस्टमर्स भी उनके साथ ही अटका हुआ है. हलाकि पूरी दुनिया बदल चुकी थी पर Iridium इसलिए फेल हुआ क्योंकि उन्होंने अपने रियल कस्टमर्स को जानने और समझने की कभी कोशिश ही नहीं की थी.

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और बाद
Introduction to Customer Validation

पहले सेल्सपर्सन हर सेल के हिसाब से किसी प्रोडक्ट की क्वालिटी डिसाइड करते थे. कंपनी सेल्स स्ट्रेटेज़ी
प्लान करने के लिए सेल्स टीम हायर करती थी और बिना चेक किये कि उनके प्रोडक्ट की मार्केट है भी या
नहीं, प्लान फॉलो करने लग जाती थी. लेकिन स्टार्ट-अप बिजनेस अलग है. इससे पहले कि आप एक सेल्स प्लान बनाये, आपको कस्टमर validation स्टेप फॉलो करना होगा. मान लो आपने डायरेक्ट प्रोडक्ट बनाकर बेचना शुरू कर दिया पता चला कि किसी को आपका प्रोडक्ट पसंद ही नहीं आया. कस्टमर validation स्टेज में आप जैसे ही इम्प्लीमेंटेशन स्टार्ट करते हो, उससे पहले आपको अपने बिजनेस मॉडल की हर डिटेल टेस्ट करनी पड़ेगी. जैसे आपने कोई एप डेवलप किया, तो जितना जल्दी हो सके पहले ये टेस्ट करो कि कस्टमर्स आपके एप को क्या रीस्पोंस दे रहे है. आपका गोल शुरुवात में ही ज्यादा से ज्यादा कस्टमर्स बनाना नहीं है बल्कि एक रीपीटेबल और स्केलेबल सेल्स प्लान है जो आपके बिजनेस मॉडल की तरह काम कर सके. एक बार अपने ये सेल्स प्लान डिसाइड कर लिया तो फिर आप अपने प्रोडक्ट में और भी फीचर्स जोड़ सकते हो या फिर कोई एक और न्यू प्रोडक्ट भी बना सकते हो.

1990 में E.Piphany के फाउंडर को एक आईडिया आया था. उस समय ज़्यादातर सॉफ्टवेयर कंपनीज़ लगभग हर एक चीज़ को ऑटोमेट बनाने में लगी हुई थी. जैसे एक्जाम्पल के लिए, स्टार्ट-अप्स सेल
प्रोसेसेस, नेटवर्क सिक्योरिटी और यहाँ तक कि वाइन सेलर इन्वेंट्रीज़ को भी ऑटोमेट करने की कोशिश कर रही थी. और तभी E.Piphany के फाउंडर को एक ऐसा सॉफ्टवेयर क्रिएट करने का आईडिया आया जो
मार्केटिंग प्रोसेसेस को कंपनीज़ के लिए ऑटोमेट बना सके. टीम ने आपस में आईडिया डिस्कस किया और
उन्होंने एक ऐसा प्रोडक्ट बनाया जो उनके फाउंडर के विजन पर बेस्ड था. अब क्योंकि उन्होंने पहले अपने कस्टमर्स की जरूरतों को समझने की कोशिश नहीं की तो उनकी पहली कोशिश बुरी तरह से फेल हुई.
90 के दौरान E.Piphany के सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में कोई इश्यू आ गया. हर एक डिपार्टमेंट सिर्फ अपने
ही डिपार्टमेंट से कलेक्ट किये हुए डेटा पर काम कर रहा था, जैसे सेल्स सॉफ्टवेयर के पास सिर्फ सेल्स टीम
का डेटा था और फाइनेंस सॉफ्टवेयर के पास सिर्फ फाइनेंस टीम का डेटा था. अब इन डिपार्टमेंट्स का आपस में कोई रिलेशन नहीं था तो जो भी सॉफ्टवेयर तब बनाया गया परफोर्मेंस और क्वालिटी में काफी लिमिटेड थे. इससे वो प्रोसेसेस जहाँ दो या तीन डिपार्टमेंट्स के बीच का डेटा इन्क्ल्यूड होता था, काफी कॉम्प्लेक्स हो गए जिसमें काफी वक्त लग जाता था और ये बिल्कुल भी आसान भी नहीं था.

E.Piphany ने इस प्रॉब्लम के सोल्यूशन के तौर एक वेब ब्राउज़र क्रिएट किया जो टीम्स को काम में
हेल्प कर सकता था और इस ब्राउज़र की हेल्प से कभी भी और कहीं से भी कोई प्रोसेस किया जा सकता था.
इस सॉफ्टवेयर का मेन पर्पज था कि कंपनीज़ को एक बड़ा कस्टमर बेस और बहुत सारे टूल्स प्रोवाइड करना जिससे सारे डेटाज़ प्रोसेस करके आसानी से मार्केटिंग कैंपेन क्रिएट की जा सके. फिर E.Piphany ने अपना ये आईडिया बाकि कंपनीज़ के साथ भी शेयर किया और इनमे से कुछ कंपनीज़ ने सबसे पहले उन्हें प्रोडक्ट खरीदे. और इन फर्स्ट कस्टमर्स के साथ जब फर्स्ट डेमो शेयर किया गया तब E.Piphany ने ये कहते हुए सॉफ्टवेयर रिजेक्ट कर दिया कि इसमें अभी कुछ फीचर्स मिसिंग है. E.Piphany ने लेकिन हार नहीं मानी बल्कि वो अपना प्रोडक्ट अपने पहले कस्टमर्स के हिसाब से तब तक इम्प्रूव करते रहे जब तक कि उन्होंने अपनी फर्स्ट सेल नहीं कर ली. अगर दस कंपनी ने टेस्टिंग और जरूरी चेंजेस लाने होते तो E.Piphany कभी ऐसा प्रोडक्ट बनाने में कामयाब नहीं हो पाती जिसकी हर कंपनी को ज़रूरत थी.

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Customer Validation: The Toughest
Questions Of All: Pivot Or Proceed ?

सबसे क्रिटिकल कस्टमर validation फेज है ये पता करना कि क्या आपका आईडिया या प्रोडक्ट के
रीपीटेबल और स्केलबल बिजनेस प्लान क्रिएट कर पायेगा या नहीं. इस पर और पैसा खर्च करने से पहले या और ज्यादा कस्टमर्स बनाने से पहले आपको ये सवाल खुद से पूछना होगा. क्या आपका प्रोडक्ट इस लायक है? क्या उस पर इतनी मेहनत की जा सकती है? क्या आप एक सक्सेसफुल कंपनी बना पायेंगे या नहीं? इन सवालों के जवाब जानने के लिए उन सारे डेटाज़ को चेक करो जो आपको स्टार्टिंग फेज़ में किये गए टेस्ट से मिले थे. क्योंकि अब तक आपके पास क इतना डेटा जमा हो गया होगा कि आपको समझ नहीं आ रहा होगा कि इसे हैंडल कैसे करे. तो डेटा को स्टडी करने का सबसे बेस्ट तरीका है कि आप और आपकी टीम उसे देखे और पढ़े, यहाँ ऑथर हमे एक वार रूम क्रिएट करने का सझाव देते है, यानी एक खाली कमरा जहाँ आप अपना सारा डेटा स्टोर करके रख सको और अपने हर एक टीम मेंबर् को एक ख़ास टाइप का डेटा स्टडी करने के लिए बोलो.

जब हर चीज़ ओर्गेनाइज़ और विजिबल हो जाएगी तो फिर मार्केट साइज़, कॉस्ट और कस्टमर फीडबैक जैसे
सवालों के जवाब ढूँढने में आसानी रहेगी. इन स्टेप्स को फॉलो करके आपको जो जवाब मिलेंगे वो एक्चुअल
फैक्ट्स पर बेस्ड होंगे नाकि अंदाजे पर. इससे आपके लिए डिसाइड करना आसान हो जायेगा कि अपने
प्लान के हिसाब से आगे बढ़ा जाए या कुछ नए बदलाव लाये जाए. जैसे एक्जाम्पल के लिए, मान लो आपको कोई मोबाइल एप बड़ा अच्छा लगा और आपने उसे अपनी टीम या दोस्तों के साथ डिस्कस किया. ठीक ऐसे ही आपको एक क्लियर विजन सेट करना है ताकि आपको अपने मनपसंद कस्टमर मिल सके.
आपने अपने मोबाइल एप का फर्स्ट डेमो क्रिएट करके अपने कुछ कस्टमर्स से शेयर करते हो जिन्हें आपका
एप अच्छा लगता है. फिर आप अपने फोकस ग्रुप की जरूरतों के हिसाब से अपने एप के फीचर्स एडजस्ट
करते हो. अब आपके पास कई सारे hypothesis है जिन्हें आपको validate करना है ताकि आपको ये पता लग सके कि आपको प्लान के हिसाब से चलना चाहिए या फिर कुछ और इम्प्रूवमेंट्स लाने होंगे.

आमतौर पर हर एप डेवलपर के पास तीन मेन hypothesis होते है जिन्हें उसे validate करना होता है. सबसे पहले, आपको ये वेलिडेट करना होगा कि आपका एप ज्यादा से ज्यादा लोगों को अट्रेक्ट करता रहेगा या नहीं और इस hypothesis को आप इस सवाल का जवाब देकर validate कर सकते है” क्या ये एप अभी भी पहले की तरह लोगों को पसंद आ रहा है या लोगों का इंटरेस्ट कम हो गया है ?’ दूसरी बात, आपको ये validate करना है आपके क्लाइंट्स तब भी आपके साथ जुड़े रहेंगे जब आप अपने प्रोडक्ट के दाम बढ़ाएंगे? तीसरी बात, आपको ये validate करना है कि आपका कस्टमर बेस बढ़ा है या नहीं इस
हाइपोथेसिस को कन्फर्म करने के लिए इन सवालों के जवाब ढूंढो: क्या आपके करंट कस्टमर्स न्यू कस्टमर्स को आपका एप रेकमंड कर रहे है? क्या आपके कस्टमर्स रेगुलर आपका एप देखते है या सारा वक्त एक्टिव रहते है?

अब, मान लो कि आप वॉर रूम (War Room) टेक्नीक यूज़ करके अब तक अपना डेटा ओर्गेनाइज़
नहीं कर पाए तो इन सवालों का जवाब आप सिर्फ अंदाजे से दे सकते हो. अब ज़ाहिर है कि ये कोई
इफेक्टिव तरीका तो है नहीं ये जानने के लिए कि आपका बिजनेस मॉडल काम करेगे या नहीं.
वॉर रूम टेक्नीक यूज़ करने से और फैक्टस यूज़ करके ये डिसाइड करने से कि प्लान के हिसाब से आगे बढ़ा जाये या नहीं, आप फ्यूचर में होने वाली गलतियों से बच सकते है और ऐसा प्रोडक्ट बना सकते है जो
आपके टारगेट कस्टमर्स को लुभा पाए. याद रहे, आपको एक रीपीटेबल और स्केलेबल बिजनेस मॉडल चाहिए ताकि आपका स्टार्ट-अप एक ऊंची उड़ान भरने में कामयाब रहे.
Conclusion
स्टार्ट-अप बिजनेस की दुनिया का नया ट्रेंड है. आज के टाइम में कई सारे लोग अपनी रूटीन घिसी-पिटी जॉब छोड़कर अपना खुद का बिजनेस स्टार्ट करने की सोच रहे है. लेकिन वो बिजनेस इसलिए नहीं करना चाहते क्योंकि वो रिस्क लेने से डरते है. स्टीव ब्लैंक एक सक्सेसफुल एंटप्रेन्योर है. अपने खुद के अनुभवो से सीख कर उन्होंने ये किताब लिखी है जो -अप बिजनेस शुरू करने में आपकी मदद कर सकती है. आप भी अगर खुद का बिजनेस शुरू करने की सोच रहे है तो सबसे पहले आपको एक बिजनेस प्लान बनान होगा जिसे बार-बार रीपीट और डेवलप किया जा सके.

क्योंकि हर स्टार्ट-अप का मेन गोल यही होता है. ये किताब हमें सिखाती है कि अपने कस्टमर्स को कैसे
समझा जाए, कैसे अपने hypothesis validate किये जाए और कैसे एक सॉलिड बिजनेस स्ट्रेटेजी
बनाई जाए. तो एक नए स्टार्ट-अप फाउंडर के तौर पर आप क्या कर रहे है? ये फेज़ काफी एक्साईटिंग होता है, खासकर तब जब आपका ये पहला बिजनेस वेंचर हो. लेकिन जल्दबाजी मत कीजिये, एक-एक स्टेप करके चलिए. अगर फेल भी हुये तो कोई बात नहीं , फिर से कोशिश कीजिये. जब तक सक्सेस नहीं मिलती कोशिश करते रहिये. आपकी हर गलती एक सबक है, हर दिन एक नया प्रोसेस एन्जॉय कीजिये. फिर देखिये जल्दी ही सफलता आपके कदम चूमेगी.

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