The Most Important Thing: Uncommon Sense for th… Howard S. Marks Books In Hindi Summary

The Most Important Thing: Uncommon Sense for th… Howard S. Marks इंट्रोडक्शन क्या आप इंवेस्टिंग की फील्ड में अभी नए-नए है? या फिर इस फील्ड में काफी लंबे समय से होने के बावजूद अभी तक आपको अच्छे रीजल्ट नहीं मिल पाए है? इससे पहले कि हम इंवेस्टिंग की फील्ड में “मोस्ट इम्पोर्टेट थिंग” की चर्चा करे, आप पहले ये समझ लो कि यहाँ हम किसी एक आईडिया या कांसेप्ट की बात नहीं कर रहे है. “मोस्ट इम्पोर्टेट थिंग” उन bricks यानी ईंटो की तरह है जिन्हें हम इकट्ठा करके इंवेस्टिंग की फील्ड में एक बेहद मजबूत दिवार बनाने के लिए इस्तेमाल करेंगे. इंवेस्टिंग कोई आसान काम नहीं है इसलिए ये मत समझिए कि ये किताब आपको इंवेस्टिंग पर कोई short -कट या कोई जादुई ट्रिक बताने वाली है जो आपको रात-रात सक्सेस दिला दे. बल्कि इस किताब का मेन गोल है आपको ये शो करना कि इंवेस्टिंग बेहद कॉम्प्लेक्स सब्जेक्ट है और कैसे आप उन चेलेंजेस को पार कर सकते है जो इंवेस्टिंग के दौरान पेश आती है. इस किताब में आपको वो सारी फंडामेंटल जानकारीयाँ दी जाएंगी जो इंवेस्टिंग शुरू करने से पहले आपको मेरा पररा जाता है. इस किताब में आपको वो सारी फंडामेंटल जानकारीयाँ दी जाएँगी जो इंवेस्टिंग शुरू करने से पहले आपको मालूम होनी चाहिए. इसे पढ़कर आप ये भी सीखोगे कि एक ग्रेट इंवेस्टर इस फील्ड में सक्सेस पाने के लिए किस तरह का माइंडसेट लेकर चलता है. साथ ही इस किताब में आप ये भी पढोगे कि सक्सेसफुल इंवेस्टिंग की राह में एक ही बड़ा दुश्मन जो है रिस्क. रिस्क के बारे में हम किताब में डिटेल में चर्चा करेंगे ताकि आप समझ जाओ कि रिस्क कितने टाइप के होते है, उन्हें कैसे पहचाने और कैसे उन्हें कंट्रोल किया जाए. आप ये भी पढोगे कि ये रिस्क आते कहाँ से है और इनके पीछे कौन-कौन से मुख्य कारण है. ‘द मोस्ट इम्पोर्टेन्ट थिंग’ कोई गोल्डन रेसिपी नहीं है जिसे इंवेस्टर यूज़ करके तुंरत सक्सेसफुल बन जाएगा. ये किताब आपको सही डिसीजन लेने में मदद करेगी और साथी ही आपको उन खतरों से भी सावधान करेगी जिनके जाल में बहुत से लोग फंस जाते है. SECOND-LEVEL THINKING किसी भी रीजनेबल इंवेस्टमेंट अप्रोच की सबसे अहम पहचान है इंवेस्टर का एडाप्टिव और इंट्यूटिव होना, नाकि रोबोटिक और फिक्स्ड होना. क्योंकि इंवेस्टिंग में हमेशा एक गोल रखो कि आपको बाकियों से बेहतर बनना है, ये नहीं कि आप भी बाकियों की तरह सेम में हमेशा एक गोल रखो कि आपको बाकियों से बेहतर बनना है, ये नहीं कि आप भी बाकियों की तरह सेम लेवल पर रहो और उसी में खुश रहो. तकरीबन सारे इंवेस्ट से पढ़े-लिखे लोग होते है इसलिए अपनी अलग पहचान बनाने का कोई तरीका ढूंढो. खुद की अलग पहचान होने के भी अपने फायदे होते है, कुछ ऐसा करो जो बाकि ना कर रहे हो, जो करो औरो से हटकर करो. आपका बिहेव भी डिफरेंट होना चाहिए. ये तो आप जानते ही है कि इन्वेस्टिग दिमाग लगाने का खेल है, दूसरों से ज्यादा एफिशिएंट होने का खेल है. आपनी सोच में कुछ अलग बात होनी चाहिए, इंवेस्टिंग में दो टाइप की थिंकिंग चलती है, फर्स्ट लेवल थिंकिंग और सेकंड लेवल थिंकिंग. फर्स्ट लेवल थिंकर्स हमेशा आसान और सिंपल जवाब तलाशते है, वही सेकंड लेवल थिंकर्स जानते है कि इंवेस्टमेंट सिंपल तो बिल्कुल भी नहीं है. , लोग आपको क्या डिफरेंट चीज़े बताएँगे, ये उनके एजेंडा पर डिपेंड करता है, जैसे एक्जाम्पल के लिए ब्रोकरेज फर्म आपको ये यकीन दिलाने की कोशिश करेंगे कि सिर्फ $10 पर transaction पर भी लोग इंवेस्ट कर सकते है, यानी इंवेस्टमेंट इतनी सिंपल चीज़ है कि हर कोई इंवेस्टर बन सकता है. अब वही म्यूचल फंड मैनेजर्स आपको ये यकीन दिलाएंगे कि इंवेस्टिंग बड़ी कोम्प्लिकेट चीज़ है और वो इसके एक्सपर्ट्स है इसलिए उनकी सलाह के बिना आप इंवेस्टमेंट कर ही नहीं सकते, इसलिए अपने पैसे भी उन्हें दे दो और उन्हें फ़ीस भी दो. फर्स्ट लेवल और सेकंड लेवल थिंकर्स कैसे काम करते है, इसे और डिटेल में जानने के लिए हम एक एक्जाम्पल के जरिये समझने की कोशिश करेंगे. जब भी कोई अच्छी कंपनी अच्छी परफॉरमेंस देना स्टार्ट करती है और पोपुलर होने लगती है, तो फर्स्ट लेवल थिंकर्स यही सोचोंगे कि चलो इस कंपनी के स्टॉक्स खरीद लेते है क्योंकि ये काफी प्रॉफिटेबल इंवेस्टमेंट लग रही है. हालाँकि सेकंड लेवल थिंकर्स डिफरेंट वे में सोचेंगे, वो सोचेंगे कि क्योंकि हर कोई इस कंपनी के स्टॉक्स खरीद रहा है तो कॉम्पटीशन भी बढ़ जाएगा और स्टॉक्स वैल्यू भी आज नहीं तो कल गिर ही जायेगी. और यही बेस्ट टाइम होगा जब स्टॉक्स खरीदे जाए. जब किसी कंपनी की ग्रोथ लो होती है और इन्फ्लेशन लगातार बढ़ रही हो तो फर्स्ट लेवल थिंकर्स loss ये सोचकर अपने स्टॉक्स बेचना चाहेंगे कि कहीं उन्हें loss ना हो जाए. जबकि सेकंड लेवल थिंकर्स इसके अपोजिट कम प्राइस में एसेट्स खरीदते रहेंगे चाहे बेशक मार्किट में हर कोई पेनिक कर रहा हो. फर्स्ट लेवल थिंकर्स स्ट्रेटफॉरवर्ड और आईडियलिस्टिक होते है, ये वो लोग होते है जो हमेशा इंवेस्टिंग करते वक्त मेजोरोटी की तरफ देखते है, यानी जो सब कर रहे है, वही ये भी करते है. ये खुद कोई रीसर्च नहीं करते बल्कि बड़ी जल्दी दूसरो की ओपिनियन और प्रेडिक्शन पर भरोसा कर लेते है. यहाँ एक चीज़ हम शेयर करेंगे, अगर आप भीड़ में अलग पहचान बनाते हो और हाएस्ट रिटर्न्स अचीव कर रहे हो तो आपको कभी भी दूसरो की देखा-देखी सेम चीज़ नहीं करनी चाहिए. क्योंकि सेकंड लेवल थिंकर्स यही करते है, वो हमेशा पहले सिचुएशन को एनालाईज़ करते है और उसके बाद कुछ भी डिसाइड करने से पहले दिमाग में एक बड़ी पिक्चर रखकर सोचते है. एक सेकंड लेवल थिंकर को बेस्ट डिसक्राइब करे तो हम यही बोलेंगे कि वो औरो से अलग होता है और बैटर होता है. कई लोग सोचते है कि कोई भी ग्रेट और पॉवरफुल इंवेस्टर बन सकता है लेकिन ऐसा नहीं है, एक ग्रेट और सक्सेसफुल इंवेस्टर बनने की काबिलियत हर किसी में नहीं होती. और कई सारे लोगों को ये भी गलतफहमी है कि हर कोई सक्सेसफूली इंवेस्टिंग कर सकता है और इंवेस्टिंग बाएं हाथ का खेल है. और इंवेस्टिंग में loss होने का सबसे बड़ा रीजन भी यही माइंडसेट है. जब तक लोग इंवेस्टिंग को सिंपल और ईजी समझते चीज़ नहीं करनी चाहिए. क्योंकि सेकंड लेवल थिंकर्स यही करते है, वो हमेशा पहले सिचुएशन को एनालाईज़ करते है और उसके बाद कुछ भी डिसाइड करने से पहले दिमाग में एक बड़ी पिक्चर रखकर सोचते है. एक सेकंड लेवल थिंकर को बेस्ट डिसक्राइब करे तो हम यही बोलेंगे कि वो औरो से अलग होता है और बैटर होता है. कई लोग सोचते है कि कोई भी ग्रेट और पॉवरफुल इंवेस्टर बन सकता है लेकिन ऐसा नहीं है, एक ग्रेट और सक्सेसफुल इंवेस्टर बनने की काबिलियत हर किसी में नहीं होती. और कई सारे लोगों को ये भी गलतफहमी है कि हर कोई सक्सेसफूली इंवेस्टिंग कर सकता है और इंवेस्टिंग बाएं हाथ का खेल है. और इंवेस्टिंग में loss होने का सबसे बड़ा रीजन भी यही माइंडसेट है. जब तक लोग इंवेस्टिंग को सिंपल और ईजी समझते रहेंगे, सेकंड लेवल थिंकर्स औरों से ज्यादा प्रॉफिट गेन करते रहेंगे. इंवेस्टिंग से पहले एनालाईज करो और समझो. अपनी सफलता के लिए आपको खुद को मेहनत करनी होगी. वो करो जो कोई ना कर रहा हो, जो सब करते है वो भेडचाल है और भेडचाल से कभी सफलता नहीं मिलती. The Most Important Thing: Uncommon Sense for th… Howard S. Marks UNDERSTANDING RISK इंवेस्टिंग में सक्सेस पाने के बेस्ट तरीका है एकदम सही-सही फ्यूचर प्रेडिक्ट कर पाना, हालाँकि किसी के पास भी ऐसी सुपरपॉवर नहीं होती. इसीलिए तो फ्यूचर हमेशा अनसन रहता है, कोई दावे से नहीं कह सकता कि कल क्या होगा, और इसी को हम रिस्क कहते है. अगर आप इंवेस्टिंग का मन बना रहे हो तो आपको मार्किट में कई ऐसे हाई पोटेंशियल स्टॉक्स मिलेंगे लेकिन अगर आप सिर्फ इसी एक चीज़ पर फोकस करते हुए अपने इंट्यूशन और फर्स्ट लेवल थिंकिंग यूज़ करते हुए इंवेस्ट करोगे तो इस बात का पूरा chance है कि बगैर रिस्क फैक्टर के बारे में सोचते हुए आप उस स्टॉक पर पैसा लगाने को तैयार हो जाओगे. अगर आप सिर्फ अपने अंदाजे और प्रेडिक्शन पर डिपेंड रहते हो और आपको ये नहीं पता कि रिस्क कैसे मैनेज करना है तो ये समझ लो कि आप इंवेस्टिंग में कभी प्रॉफिट नहीं कमा सकते उल्टा आप loss में जा सकते हो. इंवेस्टिंग के बारे में एक बड़ी फेमस अफवाह ये है कि । हाई रिस्क का मतलब हाई रिटर्न्स होगा और लो रिस्क में लो रिटर्न्स मिलेगा. इसी गलतफहमी के चलते कई सारे लोग बड़े प्रॉफिट के चक्कर में बड़ा रिस्क लेने को तैयार हो जाते है. पर यही मेन रीजन भी है जिसकी वजह से सेकंड लेवल थिंकर्स बाजी पलट देते है, ज्यादातर फर्स्ट लेवल थिंकर्स रिस्क फैक्टर्स पर ना तो ज्यादा ध्यान देते है और ना ही उन्हें रिस्क मैनेज करना आता यहाँ तक सिंपल ट्रिक है, जो आप अप्लाई कर सकते हो, अगर हाई रिस्क वाली इंवेस्टमेंट हाई रिटर्न दे रही है तो इसका मतलब इस टाइप की इंवेस्टमेंट बिल्कुल भी रिस्की नहीं है. हाई रिस्क इंवेस्टमेंट वो इंवेस्टमेंट होती है जहाँ रिटर्न्स का भरोसा नहीं होता, जहाँ रीजल्ट पहले से प्रेडिक्ट करना मुश्किल है. बेशक इस तरह की इंवेस्ट मेंट्स के हाई होने के चांसेस ज्यादा रहते है पर उतना ही जल्दी ये डाउन भी हो जाते है, और सबसे डिसअपोइन्टिंग तो ये है कि कभी-कभी इसमें कुछ भी हाथ नहीं आता. यहाँ हम आपको दो टाइप के रिस्क बताते है जो दो टाइप के लोगों के लिए है. पहले टाइप का रिस्क वो है जो आपको अफेक्ट करेगा और दूसरे टाइप का रिस्क बाकियों को तो अफेक्ट करेगा पर आपको बेनिफिट कोई कंपनी पहले कैसा परफोर्म कर चुकी है उसके बेस पर उसका फ्यूचर आउटकम क्या होगा, ये दावे से नहीं कहा जा सकता, कई बार बड़ी और सक्सेसफुल कंपनीज़ भी जो आज हाई रिटर्न्स दे रही है, कुछ सालों बाद घाटे में जा सकती है, और जब कंपनी को इस तरह का घाटा उठाना पड़ता है तो सेकंड लेवल थिंकर्स सस्ते यूनिट लेना शुरू कर देते है जब फर्स्ट लेवल इंवेस्टर्स की भीड़ डर के मारे अपने शेयर्स बेच रही होती है. रिस्क इनविजिबल है, इसे आप केलकुलेट नहीं कर सकते ना ही पहले से अंदाजा लगा सकते हो. यही चीज़ हम फ्यूचर के बारे में भी बोल सकते है, हम फ्यूचर को बदल तो नहीं सकते पर उसके लिए तैयार जरूर रह सकते है ऐसे ही हम रिस्क अवॉयड तो नहीं कर सकते पर उसे मैनेज करने का तरीका ढूंढ सकते है. रिस्क को समझने के लिए आपको ओपिनियंस पर डिपेंड रहना पड़ता है और ये ओपीनियन तुक्काबाज़ी नहीं है बल्कि काफी एजुकेटेड और वेल रीसर्ल्ड ओपिनियन है. रिस्क इंवेस्टिंग का अहम हिस्सा है, आप इसे इंवेस्टिंग से अलग नहीं कर सकते. और ये बात जितना जल्दी समझ लो उतना अच्छा है, अगर आप इसे समझ नहीं पाए तो इंवेस्टिंग की फील्ड में आप कदम नहीं जमा सकते. आपको ये समझना होगा कि रिस्क सिर्फ दो चीज़े कर का घाटा उठाना पड़ता है तो सेकंड लेवल थिंकर्स सस्ते यूनिट लेना शुरू कर देते है जब फर्स्ट लेवल इंवेस्टर्स की भीड़ डर के मारे अपने शेयर्स बेच रही होती है. रिस्क इनविजिबल है, इसे आप केलकुलेट नहीं कर सकते ना ही पहले से अंदाजा लगा सकते हो. यही चीज़ हम फ्यूचर के बारे में भी बोल सकते है, हम फ्यूचर को बदल तो नहीं सकते पर उसके लिए तैयार जरूर रह सकते है ऐसे ही हम रिस्क अवॉयड तो नहीं कर सकते पर उसे मैनेज करने का तरीका ढूंढ सकते है. रिस्क को समझने के लिए आपको ओपिनियंस पर डिपेंड रहना पड़ता है और ये ओपीनियन तुक्काबाज़ी नहीं है बल्कि काफी एजुकेटेड और वेल रीसर्ल्ड ओपिनियन है. रिस्क इंवेस्टिंग का अहम हिस्सा है, आप इसे इंवेस्टिंग से अलग नहीं कर सकते. और ये बात जितना जल्दी समझ लो उतना अच्छा है, अगर आप इसे समझ नहीं पाए तो इंवेस्टिंग की फील्ड में आप कदम नहीं जमा सकते. आपको ये समझना होगा कि रिस्क सिर्फ दो चीज़े कर सकता है, या तो ये आपको नुकसान पहुंचाएगा या फायदा और आपको ये श्योर करना होगा कि ये आपको सिर्फ और सिर्फ फायदा ही पहुंचाए. The Most Important Thing: Uncommon Sense for th… Howard S. Marks RECOGNIZING RISK पहले के चैप्टर्स में आपने सीखा कि रिस्क को पहचान कर, उसे समझ कर और उसे मैनेज करके हम हाई रिटर्न की उम्मीद कर सकते है. हालाँकि इससे पहले कि आप रिस्क को पूरी तरह से मैनेज और कंट्रोल कर सके, सबसे पहले इसे अच्छे से समझना भी उतना ही जरूरी है. रिस्क पहचाने में ये भी शामिल है कि हम प्राइस और वैल्यू के बीच का रिलेशन समझे. प्राइस वो अमाउंट है जो आप कंपनी के शेयर्स लेने के लिए पे करते है और वैल्यू यानी वो यूनिट्स जो आप खरीदते हो और उसकी वर्थ डिपेंड करती है उसकी करंट परफॉरमेंस पर. यानी प्राइस आप पे करते हो और वैल्यू कंपनी आपको देती है, ये कम या ज्यादा हो सकता है, डिपेंड करता है कि आप कैसे इसे मैनेज करते हो. अब, सवाल है कि ये होता कैसे है? जैसे एक्जाम्पल के लिए पहले के चैप्टर में आपने सीखा कि इंवेस्टर्स की भीड़ सोचती है कि हाई रिस्क इंवेस्टमेंट हाई रिटर्न्स देंगे. आपने ये भी पढ़ा कि इस टाइप की थिंकिंग के पीछे ना तो ठीक से एनालाईज़ किया जाता है और ना ही हमे रिस्क की सही-सही त्तिानकरी टोनी है टाइप की थिंकिंग के पीछे ना तो ठीक से एनालाईज़ किया जाता है और ना ही हमे रिस्क की सही-सही जानकरी होती है. वैसे भी जो लोग फ्यूचर की अनसर्टेनिटी से नहीं डरते तो इंवेस्टमेंट और रिस्क को जोड़कर देखते है और पैसा खर्च करते रहते है चाहे उन्हें हाई रिटर्न्स या कंपनसेशन मिले या ना मिले. असल में ये लोग रिस्क टोलरेंट हो जाते है यानी इन्हें रिस्क से फर्क नहीं पड़ता और ना ही ये टेंशन लेते है कि इंवेस्टमेंट का रिजल्ट क्या होगा, तो जाहिर है ना तो ये सक्सेसफुल इंवेस्टिंग कर पायेंगे और ना ही प्रॉफिट कमा पाते है. रिस्क क्रिएट करने के कोर एलिमेंट तब होता है जब लोग अपनी इंवेस्टमेंट को लेकर कुछ ज्यादा ही कॉफिडेंट हो जाते है, यही वो मौका होता है जब उन्हें लगता है रिस्क कम है क्योंकि कंपनी हाई रिटर्न्स ग्राफ में काफी ऊपर दिख रही है. ऐसे बेखबर और ओवरकॉफिडेंट इंवेस्टर्स को खींचने का सबसे इफेक्टिव तरीका है कि उनसे ग्लोबल टाइप की इंवेस्टमेंट करवाई जाए. यहाँ हम कुछ ऐसी स्टोरीज़ शेयर कर रहे है जो लोग इंवेस्ट र्स को सुनाते रहते है. पहली स्टोरी; अब क्योकि ये ग्लोबल फंड है तो जो भी 0 पहली स्टोरी; अब क्योकि ये ग्लोबल फंड है तो जो भी loss होगा उससे आपके अकाउंट से ज्यादा बड़ी रकम नहीं खर्च होगी क्योंकि ये loss तो पूरी दुनिया में हो रही है, किसी एक कंट्री या जगह तक लिमिट नहीं है. दूसरी स्टोरी: ग्लोबल फंड्स फीडर फंड्स की तरह होते है जो सिर्फ एक कंपनी पर फोकस नहीं करते बल्कि कई सारी सक्सेसफुल कंपनीज़ जैसे नेटफ्लिक्स और Amazon वगैरह को इन्वोल्व करके रखते है. यही वजह है कि एक कंपनी के loss की भरपाई दूसरी कंपनी से हो जाती है. क्योंकि ग्लोबल फंड्स अकेले एक ही कपनी पर फोकस नहीं करते, तो रिटर्न्स काफी अच्छे मिलते है क्योंकि ये डाईवर्स होते है. तीसरी स्टोरी: टेक्नोलोजी और डिजिटल केलकुलेशंस के कारण आज मार्केटर्स ईजिली हाई प्रॉफिट कमा सकते है इसलिए रिस्क काफी कम हो गया है. अब यहाँ मेन पॉइंट है कि ये सारे फैक्टर्स जरूरी नहीं है कि सच हो और सिक्योर इंवेस्टमेंट की गारंटी देते हो. रिस्क फैक्टर को हम पूरी तरह कभी नकार नहीं सकते ख़ासकर इस टाइप की इंवेस्टमेंट में. एक बार सिंगल इंवेस्टमेंट अपना रिस्क कम कर भी देगी तो दूसरी इंवेस्टमेंट हाई रिस्क की होगी. इंवेस्टमेंट कभी एलिमीनेट नहीं होती सिर्फ ट्रांसफर हो जाती है. ये भ्रम जो लोगों को सोचने पर मजबूर करता है कि ये भ्रम जो लोगों को सोचने पर मजबूर करता है कि रिस्क कम है, दुनिया को ज़्यादा रिस्क से भरा बनाता है, जबकि सच्चाई ये है कि डर, चिंता, शक और अनसर्टेनिटी ये सब वो इम्पोर्टेट फैक्टर्स है जो हर सक्सेसफुल इंवेस्टिंग में आपको फेस करने पड़ेंगे. ठीक ऐसे ही जैसे कि खतरा होने पर हमारी बॉडी और माइंड का रिएक्ट करना एकदम नैचुरल बात है. चिंता, डर और परेशानी हमें बेहतर डिसीजन लेने में हेल्प करते है जैसे कि रिस्की लोन्स अवॉयड करना. ये आपको अनफेवरेबल इंवेस्टमेंट करने और बिजनेस में loss होने से भी बचाता है. स्मार्ट इंवेस्टर्स ने एक बार अगर रिस्क पह्चानना सीख लिया और वो थोडा डरा हुआ भी होगा तो हर इंवेस्टमेंट से पहले उसे अच्छी तरह एनालाईज़ करेगा, वो खुद से ही सवाल करेगा कि ये इंवेस्टमेंट उसे करनी चाहिए या नहीं . वही दूसरी तरफ जिनके दिल में डर नहीं होता, वो इंवेस्ट र्स कुछ ज्यादा ही ओवरकॉफिडेंट होकर फैसले लेते है और बगैर सोचे समझे रिस्क लेने को तैयार रहते है. हाई प्राइस का मतलब हायर रिस्क तो है लेकिन जरूरी नहीं कि रिटर्न्स भी हाई मिलेगा, जबकि लो प्राइस को हम सेफ इंवेस्टमेंट मान कर चल सकते है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ये आपको हाई रिटर्न्स नहीं दे सकते. कुल मिलाकर इंवेस्टमेंट का मतलब है वैल्यू ऑफ़ A < चिंता, डर और परेशानी हमें बेहतर डिसीजन लेने में हेल्प करते है जैसे कि रिस्की लोन्स अवॉयड करना. ये आपको अनफेवरेबल इंवेस्टमेंट करने और बिजनेस में loss होने से भी बचाता है. स्मार्ट इंवेस्टर्स ने एक बार अगर रिस्क पहचानना सीख लिया और वो थोडा डरा हुआ भी होगा तो हर इंवेस्टमेंट से पहले उसे अच्छी तरह एनालाईज़ करेगा, वो खुद से ही सवाल करेगा कि ये इंवेस्टमेंट उसे करनी चाहिए या नहीं . वही दूसरी तरफ जिनके दिल में डर नहीं होता, वो इंवेस्ट र्स कुछ ज्यादा ही ओवरकॉफिडेंट होकर फैसले लेते है और बगैर सोचे समझे रिस्क लेने को तैयार रहते है. हाई प्राइस का मतलब हायर रिस्क तो है लेकिन जरूरी नहीं कि रिटर्न्स भी हाई मिलेगा, जबकि लो प्राइस को हम सेफ इंवेस्टमेंट मान कर चल सकते है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ये आपको हाई रिटर्न्स नहीं दे सकते. कुल मिलाकर इंवेस्टमेंट का मतलब है वैल्यू ऑफ़ रिटर्न्स यानी वो पैसा जो आपने कंपनी में लगाया उसे काटकर जो आपको मिलता है. भीड़ का हिस्सा बनकर और दुसरे इंवेस्टर्स की नकल करके ना सिर्फ आप लो-रिस्क रिटर्न्स से मरहूम रहेंगे बल्कि हाई रिस्क इंवेस्टमेंट के चक्कर में भी फंस सकते है. The Most Important Thing: Uncommon Sense for th… Howard S. Marks CONTROLLING RISK रिस्की इंवेस्टमेंट करना या हाई रिटर्न्स कमाने का ये मतलब नहीं कि आप ग्रेट इंवेस्टर बन गए हो, हाँ अगर आप कई सालो से ऐसा करते आ रहे हो तो और बात है. अगर आपको कोई इंवेस्टमेंट कई सालो से अच्छा रीटर्न दे रही हो और आप सक्सेसफुल हाई प्रॉफिट कमाते आ रहे हो तो इसके पीछे सिर्फ दो वजह हो सकती है. 111 पहला तो ये, कि ये कोई सो-काल्ड “रिस्की इंवेस्टमेंट ” होगी जो असल में जरा भी रिस्की नहीं है और दूसरा, रिस्क होगा भी तो ऐसा जिसे आराम से कंट्रोल और मैनेज़ किया जा सकता हो. आज के सक्सेसफुल इंवेस्टर्स रीमार्केबल होते है क्योंकि ना सिर्फ वो हाई रिटर्न्स गेन करते है बल्कि इसलिए भी कि वो किसी भी loss को अवॉयड करके लगातार ग्रो करत चले जाते है. पीटर लिंच, वॉरेन बुफे, जूलियन रॉबर्टसन और बिल मिलर जैसे कुछ एक्जाम्पल हैं जो कंसिस्टेंट इंवेस्टर्स कहे जा सकते है. इन्होने भी शुरुवात के साल-दो साल प्रोब्लम्स फेस की थी पर फिर ये बड़े ही स्मार्ट तरीके से इन सबसे उभरे और सारे रिस्क और रिटर्न हैंडल करने में सक्सेसफुल रहे. किसी भी तरह के रिस्क, loss की संभावना और फ्यूचर की अनसटॅनिटी, ये सारी चीज़े हमेशा छुपी रहती है. लेकिन जो नजर आता है वो है loss जो हमेशा ही बदकिस्मती से जोड़कर देखा जाता है. ये रिस्क आइडेंटीफाई करने का एक एसेंशियल पॉइंट है क्योंकि लोगों को हमेशा यही लगता है कि रिस्क सिर्फ नेगेटिव इवेंट में होता है. लेकिन सच तो ये है कि हम सिर्फ नेगेटिव इवेंट्स का ही रिस्क देख पाते है. इसलिए ये ध्यान रखना जरूरी है कि रिस्क तब भी है जब कोई नेगेटिव इवेंट या loss ना हो रहा हो, रिस्क फेवरेबल हालात में भी पॉसिबल है और ये ठीक से मैनेज किया जा सकता है. एक सक्सेसफुल इंवेस्टर होने का ये मतलब नहीं कि आपको किसी भी तरह का रिस्क या नेगेटिव इवेंट्स फेस नहीं करना पड़ेगा बल्कि इसका मतलब है आप एक सक्सेसफुल इंवेस्टर होने का ये मतलब नहीं कि आपको किसी भी तरह का रिस्क या नेगेटिव इवेंट्स फेस नहीं करना पड़ेगा बल्कि इसका मतलब है आप बहुत अच्छे से रिस्क कंट्रोल कर सकते हो. एक इंवेस्टर के तौर पर रिस्क को कंट्रोल करने से पहले उन्हें समझना और पहचानना जरूरी है. इससे पहले के चैप्टर्स में आपने रिस्क को जानने और समझने की इम्पोर्टेस के बारे में पढ़ा है. रिस्क को कंट्रोल करने के लिए एक स्मार्ट इंवेस्टर पहले ये जानने की कोशिश करता है कि रिस्क को हैंडल कैसे किया जाए. यही वो चीज़ है जो एक स्मार्ट इंवेस्टर्स को बाकियों से अलग करती है. अब जैसे इंश्योरेंस कंपनी का ही एक्जाम्पल लेते है. क्या आप जानते है, इस तरह की कंपनीयाँ प्रॉफिट कैसे कमाती है जबकि उन्हें पता है कि इन्श्योरेसं लेने वाले लोग कभी भी मर सकते है? किसी भी बिजनेस को स्टार्ट करने से पहले ये जान लेना बेहद जरूरी है कि उससे सोसाईटी को क्या फायदा होगा, क्यों लोग कोई एक खास कंपनी चूज़ करते है जबकि उन्हें पता है कि उन्हें इससे कुछ मिलने वाला नहीं है?

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