The Little Book of Common Sense Investin… John C. Bogle Books In Hindi Summary

The Little Book of Common Sense Investin… John C. Bogle इंट्रोडक्शन(Introduction) क्या आप एक ऐसे इंसान के इनवेस्टमेंट प्रिन्सिप्ल को सीखना चाहेंगे जो इन्वेस्टमेंट कंपनी “The Vanguard Group” के फाउंडर थे? ये इन्वेस्टमेंट कंपनी 5.3 ट्रिलियन डॉलर का asset मैनेज करती है.जी हाँ, आपने बिलकुल ठीक सुना, मिलियन नहीं, बिलियन भी नहीं बल्कि 5.3 ट्रिलियन डॉलर. इस समरी में आप सीखेंगे कि इंडेक्स फंड्स क्या होता है और एक आम आदमी को म्यूच्यूअल फंड के बजाय इंडेक्स फंड में पैसा क्यों लगाना चाहिए. वैसे क्या आपको पता है कि जॉन बौगल के इस प्रिन्सिप्ल पर वॉरेन बफ़े को भी इतना भरोसा है कि उन्होंने Protege Partners नाम की कंपनी से ] मिलियन डॉलर की शर्त लगा ली थी कि हेज फंड्स इंडेक्स फंड्स से ज़्यादा रिटर्न नहीं दे सकते. अब आप सोच रहे होंगे कि ये हेज फंड, इंडेक्स फंड क्या बला है तो चिंता मत कीजिये, हम ये सब आपको इस समरी में एक्सप्लेन करने वाले हैं. ये आपके लाइफ की सबसे इम्पोर्टेन्ट समरी हो सकती है इसलिए इसे ध्यान से और पूरी सुनिएगा. “डोंट अलाऊ अ विनर्स गेम तो चेंज ईंटो अ लूज़र्स “डोंट अलाऊ अविनर्स गेम तो चेंज ईंटो अ लूज़र्स गेम”. इस बुक में हम ये जानेंगे कि इंडेक्स फंड कैसे म्यूच्यूअल फंड से बेहतर परफॉर्म करते हैं. पहले हम आपको इंडेक्स फंड, फंड मैनेजर और म्यूच्यूअल फंड के बारे में बताएँगे. तो बिना देर किये शुरू से शुरू करते हैं. देखिये जब भी एक कंपनी बनती है तो उसे ग्रो करने के लिए पैसा चाहिए होता है. पैसा इकट्ठा करने का एक तरीका ये है कि वो कंपनी अपना कुछ हिस्सा शेयर में कन्वर्ट कर सकता है. मान लीजिये कि कंपनी का 10% एक लाख शेयर में बदल दिया जाए तो इसका मतलब है कि अगर कोई उस एक लाख शेयर को खरीदता है तो वो कंपनी का 10% मालिक बन जाता है. अब ज़ाहिर सी बात है कि इन शेयर्स को बहुत सारे लोग खरीदते हैं ये सोचकर कि किसी दिन इन शेयर्स की वैल्यू बैंक के इंटरेस्ट रेट के मुकाबले ज़्यादा बढ़ेगी तो वो शेयर्स को बेच कर अपनी इनकम बढ़ा सकेंगे. अब जो लोग ऐसी इंडिविजुअल कंपनी ख़ुद नहीं ढूंढ पाते वो फंड मैनेजर के पास जाते हैं यानी एक ऐसे इंसान के पास जिसे इन कंपनियों के बारे में नॉलेज है. ये लोग ऐसी कंपनी ढूँढने में माहिर होते हैं जो फ्यूचर में अच्छा रिटर्न दे सके.अब आप सोच रहे होंगे कि अगर हमारा पैसा डूब गया तो? तो इसका रिस्क कम करने के लिए फंड मैनेजर लोगों के रूपए को एक कंपनी में नहीं बल्कि कई अलग अलग कम्पनी में इन्वेस्ट करते हैं. गानी टों पिया देना है A हमारा पैसा डूब गया तो? तो इसका रिस्क कम करने के लिए फंड मैनेजर लोगों के रूपए को एक कंपनी में नहीं बल्कि कई अलग अलग कम्पनी में इन्वेस्ट करते हैं. यानी हमें सिर्फ़ पैसा देना है. मान लीजिये कि आपने 1 लाख दिया, मैंने दो लाख दिया और भी दूसरे लोगों ने अपने हिसाब से पैसे दिए, तो फंड मेनेजर सारे पैसों को अलग अलग कंपनी में लगा देता है. और उससे जितना भी फ़ायदा या नुक्सान होगा वो हम सब मिलकर झेलेंगे. इसे ही म्यूच्यूअल फंड कहा जाता है. इंडेक्स फंड भी कुछ कुछ म्यूच्यूअल फंड की तरह होता है लेकिन उसमें पैसा फंड मैनेजर की मर्जी की कंपनी में नहीं बल्कि पहले से बनाए गए कुछ रूल्स के बेसिस पर पैसा लगाया जाता है. जैसे अगर हम अमेरिका के इंडेक्स S&P500 की बात करें तो इस इंडेक्स फंड में पैसा हमेशा अमेरिका की टॉप 500 कंपनियों में उनकी मार्केट कैप के हिस्साब से ही लगाए जाते हैं. वैसे ही इंडिया में NIFTY50 नाम का इंडेक्स फंड है यानी अगर हम इस इंडेक्स फंड में पैसा लगाते हैं तो वो हमारे पैसे को इंडिया की टॉप 50 कंपनियों में उनके मार्केट कैप के हिसाब से लगा देंगे. हम्म, तो ये सब समझना इतना भी मुश्किल नहीं है, है ना? इस बुक में जॉन ने ये बताया है कि कोई भी म्यूच्यूअल फंड लोंग रन में किसी भी इंडेक्स फंड को मात देकर आगे नहीं निकल सकता इसलिए हमें अपना पैसा हमेशा इंडेक्स फंड में लगाना चाहिए. आइये जानते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा. The Little Book of Common Sense Investin… John C. Bogle 3TURICA (A Parable) गोट्रोक्स नाम का एक रईस भरा पूरा परिवार था. उन लोगों ने अमेरिका के मार्केट के सारे शेयर्स खरीद लिए थे. जब भी कोई कंपनी ग्रो करने के लिए अपना शेयर मार्केट में निकालती तो वो उसमें पैसे इन्वेस्ट कर देते. इस तरह वो और अमीर होते जा रहे थे. इस परिवार का हर मेंबर अमीर हो रहा था और बहुत खुश था. लेकिन कुछ समय बाद परिवार के कुछ मेंबर्स एक्सपर्ट की सलाह पर डिसिशन लेने लगे. क्योंकि सारे शेयर्स गोट्रोक्स परिवार में ही थे तो एक्सपर्ट्स ने उनसे कहा कि वो कुछ शेयर्स अपने cousins को बेच दे और बदले में उनसे दूसरी कंपनी के शेयर खरीद लें. इससे ये फ़ायदा होगा कि जो कंपनी अच्छा परफॉर्म कर रही हैं उसके शेयर्स से उनके cousins को नहीं बल्कि उन्हें फ़ायदा होगा. उन लोगों ने बिलकुल वैसा ही किया लेकिन रिटर्न बढ़ने के बजाय कम होने लगे. अब आप पूछेगे ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि ये एक्सपर्ट्स जो एडवाइस देते थे उसके लिए कमीशन चार्ज करते थे.थोड़ा समय बीतने के बाद गोट्रोक्स परिवार को लगा कि उनका ये प्लान काम नहीं कर रहा है. इसलिए उन्होंने सोचा कि उन्हें और भी ज़्यादा एक्सपर्ट लोगों की ज़रुरत है जिन्हें और भी ज़्यादा नॉलेज हो ——– इसलिए उन्होंने सोचा कि उन्हें और भी ज़्यादा एक्सपर्ट लोगों की ज़रुरत है जिन्हें और भी ज़्यादा नॉलेज हो और जो बेहतर तरीके से उनके शेयर्स को मैनेज कर सकें. अब वो और managers को हायर करने लगे. अबी उन्हें इन managers को भी फीस देनी पड़ती थी इसके साथ साथ जब भी शेयर्स खरीदा या बेचा जाता हैतो उसके लिए उन्हें कमीशन भी देना पड़ता था. इन managers ने अपनी कमाई को बढ़ाने के लिए ज़रुरत ना होने के बावजूद भी शेयर्स खरीदना और बेचना शुरू कर दिया. इन सब की वजह से गोट्रोक्स परिवारको अपनी इन्वेस्टमेंट पर कम रिटर्न मिलने लगा यहाँ तक कि कई बार तो उन्हें भारी नुक्सान भी हुआ. तब उन्हें एहसास हुआ कि उन सारे एक्सपर्ट्स और managers की सलाह एकदम बेकार थी और उन्हें पहले की तरह अमेरिका की कंपनी में इन्वेस्ट करना जारी रखना चाहिए ताकि जब जब किसी कंपनी को फ़ायदा हो तब उन्हें भी उसका फ़ायदा मिल सके. जॉन का भी यही मानना है कि अगर एक आम आदमी इधर उधर के बजाय अपने देश के इंडेक्स फंड में पैसा लगाए यानी अपने देश की टॉप कंपनियों में पैसा लगाए और उसे लंबे समय तक होल्ड कर के रखे तो उसे ज़्यादा फ़ायदा होगा. मार्केट बिहेवियर (Market Behavior) हम सब जानते हैं कि किसी भी कंपनी के शेयर की वैल्यू कभी बढ़ जाती है तो कभी कम हो जाती है. क्या आपके मन में सवाल नहीं आता कि ऐसा क्यों होता है? A < आपके मन में सवाल नहीं आता कि ऐसा क्यों होता है? तो जॉन का कहना है कि ऐसा दो कारण से होता है. पहला तो है उस कंपनी की अर्निंग यानी कंपनी असल में कितना प्रॉफिट कमा रही है. अगर अर्निंग बढ़ेगी तो शेयर का दाम भी बढ़ना चाहिए और अगर अर्निंग कम होगी तो शेयर का दाम भी गिरना चाहिए और देखा जाए तो एक शेयर के दाम पर सिर्फ़ इसका ही असर पड़ना चाहिए. लेकिन असल जिंदगी में ऐसा नहीं होता. शेयर के दाम पर अलग अलग चीज़ों का काफ़ी असर पड़ता है. लोगों के इमोशन यानी भावनाओं का भी इस पर असर होता है. इस इमोशन को P/E ratio से measure किया जा सकता है यानी price to earning ratio से, आइए पहले इसे समझते हैं. मान लीजिये कि आप एक कंपनी में 100 रूपए इन्वेस्ट करते हैं औरएक साल के बाद वो कंपनी आपको 5 रुपय कमा कर देती है तो इस कंपनी का P/E ratio हुआ price dividedby earning an ple ratio: 100/5= 20. P/E ratio 20 का मतलब हुआ कि लोग एक साल में एक रूपए कमाने के लिए उस कंपनी में 20 रूपए लगाने को तैयार हैं. अगर इसी कंपनी का P/E 50 हो जाए तो इसका मतलब है कि लोगों को भरोसा है कि कंपनी अच्छा परफॉर्म करेगी और एक साल में एक रुपया कमाने के लिए वो इसमें 50 रूपए इन्वेस्ट करने को तैयार हैं.इसी तरह अगर इसका P/E कम हो जाता है यानी लोगों को कंपनी से ज़्यादा उम्मीद नहीं है तो वो इसमें कम पैसा लगाना चाहेंगे.इस तरह P/E ratio A . बाद वो कंपनी आपको 5 रुपय कमा कर देती है तो इस कंपनी का P/E ratio हुआ price dividedby earning en ple ratio: 100/5= 20. P/E ratio 20 का मतलब हुआ कि लोग एक साल में एक रूपए कमाने के लिए उस कंपनी में 20 रूपए लगाने को तैयार हैं. अगर इसी कंपनी का P/E 50 हो जाए तो इसका मतलब है कि लोगों को भरोसा है कि कंपनी अच्छा परफॉर्म करेगी और एक साल में एक रुपया कमाने के लिए वो इसमें 50 रूपए इन्वेस्ट करने को तैयार हैं.इसी तरह अगर इसका P/E कम हो जाता है यानी लोगों को कंपनी से ज़्यादा उम्मीद नहीं है तो वो इसमें कम पैसा लगाना चाहेंगे.इस तरह P/E ratio का भी शेयर के दाम पर बहुत असर होता है. तो हमने देखा कि शेयर के दाम दो वजह से कम या ज़्यादा हो सकते हैं. कंपनी की अर्निंग से और लोगों के इमोशन से. जब कंपनी कोई प्रोडक्ट या सर्विस ऑफर करके प्रोफिट कमाती है तो उसका असर शेयर के दाम पर होता है और जब लोगों की उम्मीद कंपनी के प्रति बढ़ती या कम होती है तो इसका भी असर होता है जिसे हमने P/E ratio के ज़रिए समझा. लेकिन लॉन्ग रन में P/E से ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि कंपनी की असली वैल्यू उसके अर्निंग पॉवर से डिसाइड होती है और शेयर का फाइनल प्राइस लंबे समय में कंपनी की अर्निंग पॉवर को दिखाता है. The Little Book of Common Sense Investin… John C. Bogle हाउ मोस्ट इन्वेस्टर्स टर्न अ विनर्सगेम इन्टू अ लूज़र्स गेम (How Most investors turna winners game into a losers game) जॉन कहते हैं कि अगर हम अपने देश के सारे इन्वेस्टर्स का रिटर्न देखें यानी उन्होंने कितना परसेंट कमाया है तो वो मिलाकर उतना ही रिटर्न होगा जितना कि मार्केट ने उन्हें दिया है. लेकिन अगर इनमें से कुछ इन्वेस्टर्स ने इन्वेस्ट करने के लिए फंड managers की मदद ली है तो उन्हें उनकी कमीशन भी देनी पड़ेगी और बिलकुल उतना ही उन्हें कम रिटर्न मिलेगा. उनका रिटार्न उतना ही कम हो जाएगा जितना उन्होंने कमीशन दिया है. आइए एक एक्जाम्पल से समझते हैं कि अगर हम कमीशन देते हैं या नहीं देते तो इसका हमारे रिटर्न पर कितना असर होगा. इमेजिन कीजिये कि एक स्टॉक मार्केट है जो कभी ज़्यादा रिटर्न देती और कभी कम लेकिन एवरेज में हमें 50 साल के लिए 8% रिटर्न मिल जाता है. सोचिये कि एक इंसान है जो 22 साल की उम्र से इसमें इन्वेस्ट करना शुरू करता है और 65 साल की उम्र तक इन्वेस्ट करता रहता है. अब आप बोलेंगे इतनी लंबी इन्वेस्टमेंट…..तो इसका जवाब ये है कि वैसे भी तो हर कोई लॉन्ग टर्म के लिए कुछ ना कुछ सेव करता ही है तो इस इंसान ने बैंक के तानाग सॉन्सालेट में टनेर कर दिया तो ये 20/ कुछ ना कुछ सेव करता ही है तो इस इंसान ने बैंक के बजाय स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट कर दिया जो उसे 8% का रिटर्न दे रही थी. अब इसके बजाय वो म्यूच्यूअल फंड में पैसा इन्वेस्ट करे तो फंड मैनेजर उससे 2.5% लेगा जिसके कारण हर साल उसका रिटर्न 8-2.5 = 5.5% का हो जाएगा. अब अगर ये इंसान एक ही बार में एक लाख रुपया 50 साल के लिए 5.5% पर इन्वेस्ट कर देता तो उसे फाइनल रिटर्न 14 लाख मिलेगा लेकिन इतना ही पैसा अगर वो बिना किसी फंड मैनेजर को फीस दिए 8% पर इन्वेस्ट करता तो उसे फाइनल रिटर्न 46 लाख मिलता यानी पहले केस से 300% ज़्यादा. टैक्सेज आर कास्ट्स टू (Taxes are costs too) स्टॉक मार्केट में एक कहावत है कि जितना ज़्यादा मोशन होगा रिटर्न उतना ही कम होगा. यानी हम जितनी बार फंड में से पैसा निकालते हैं हमें उतनी बार गवर्नमेंट को टैक्स देना पड़ता है क्योंकि उसे हमारी इनकम ही माना जाता है. ये एक काफ़ी बड़ा ख़र्चा होता ये है. ऐसे फंड्स जिन्हें actively मैनेज किया जा रहा है उसमें शेयर्स बार बार खरीदे और बेचे जाते हैं. अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि जब जब फंड मैनेजर को लगता है कि कोई दूसरी कंपनी अच्छा परफॉर्म कर सकती है तो वो पुरानी कंपनी के शेयर बेच कर आपका पैसा नई कंपनी में लगा देता है. लेकिन अगर हम इंडेक्स फंड में इन्वेस्ट करते हैं और .. लेकिन अगर हम इंडेक्स फंड में इन्वेस्ट करते हैं और लंबे समय तक उस इन्वेस्टमेंट को वैसे ही बरकरार रखते हैं तो हमें पता है कि हमारा पैसा ज़्यादा मूव नहीं करेगा इसलिए इन्वेस्टर्स को टैक्स भी काफ़ी कम देना पड़ता है. आइए एक एक्जाम्पल से समझते हैं. जॉन बताते हैं कि पिछले 25 सालों में इक्विटी फंड का एवरेज रिटर्न 10% रहा है जबकि अमेरिका के इंडेक्स S&P 500 का रिटर्न 12.3% रहा है. अब ये जो च्यूअल फंड हैं जिन्हें बड़ी actively मैनेज किया जाता है इसमें बार बार शेयर खरीदे और बेचे जाते हैं जिसकी वजह से इन्वेस्टर को एवरेज में 1.5% टैक्स देना पड़ता है. इस वजह से फंड का रिटर्न 10-1.5= 8.5% रह जाता है. अगर हम S&P 500 की बात करें तो उसमें टैक्स 0.6% के करीब है. ये रेट इसलिए कम है क्योंकि इस इंडेक्स में शेयर्स बहुत ज़्यादा खरीदे या बेचे नहीं जाते. इसलिए इनका रिटर्न|2.3-0.6= ]].7% के करीब आता है. इसका मतलब अगर कोई एक लाख रुपया 25 सालों के लिए म्यूच्यूअल फंड में इन्वेस्ट करता है तो उसे अंत में 6 लाख 17 हज़ार रूपए ही मिलेंगे. लेकिन इंडेक्स फंड में 14 लाख 90 हज़ार मिलेंगे यानी म्यूच्यूअल फंड वालों को करीब 8 लाख 37 हज़ार रूपए कम मिलेंगे. The Little Book of Common Sense Investin… John C. Bogle सेलेक्टिंग लॉन्ग टर्म विनर्स (Selecting Long term Winners) तो अब मुद्दे पर आते हैं कि हमें किस फंड में पैसा लगाना चाहिए. एक कहावत है कि “डोंट लुक फॉर द नीडल, बाय द हेस्टैक. जॉन कहते हैं कि घास ढेर में सुई मत ढूंढो बल्कि पूरा घास ही खरीद लो.अब इसे स्टॉक मार्केट के कॉन्टेक्स्ट में बोले तो, अगर हम सिर्फ उन कंपनियों को ढूँढने में लगे रहेंगे जो इंडेक्स फंड को बीट कर सकती है और उससे ज़्यादा रिटर्न दे सकती है तो ये तो एक लूज़र की गेम हुई. इसके बजाय ऐसी कम्पनीज में इन्वेस्ट करना चाहिए जो पहले से ही टॉप पर हैं. इन शोर्ट, अपने देश का इंडेक्स फंड ही खरीद लो. इस पॉइंट को प्रूव करने के लिए जॉन ने पिछले 36 साल का म्यूच्यूअल फंड का एक्जाम्पल दिया है. पिछले 36 साल में 355 नए म्यूच्यूअल फंड आए थे. लेकिन उनमें से 223 म्यूच्यूअल फंड्स बंद हो गए यानी 2/3rd से भी ज़्यादा आउट ऑफ़ बिज़नेस हो चुके थे. इतना ही नहीं, जो बचे थे उनमें से 60 ने इंडेक्स फंड के मुकाबले काफ़ी खराब पर फॉर्म किया.48 ने इंडेक्स फंड के आस पास परफॉर्म किया और सिर्फ़ 24 ने अपने इन्वेस्टर्स को इंडेक्स फंड से ज़्यादा प्रॉफिट कमा कर दिया A < क मुकाबल काफ़ा खराब पर फाम किया.48 न इडक्स फंड के आस पास परफॉर्म किया और सिर्फ़ 24 ने अपने इन्वेस्टर्स को इंडेक्स फंड से ज़्यादा प्रॉफिट कमा कर दिया. असल में इन 24 में से भी ज़्यादातर म्यूच्यूअल फंड्स ने शुरू शुरू में ही अच्छा परफॉर्म किया था जब इनका फंड साइज़ छोटा था. और जैसा कि वॉरेन बफे कहते हैं “अ फैट वॉलेट इज द एनिमी ऑफ़ सुपीरियर रिटर्न्स” यानी जिनकी जेब में ज़्यादा पैसा होता है वो बिना सोचे समझे लापरवाही से कहीं भी पैसा इन्वेस्ट कर देते हैं इसलिए उनके रिटर्न्स कम हो जाते हैं. इस तरह अंत में सिर्फ 3 ऐसे म्यूच्यूअल फंड थे जो बंद नहीं हुए और इंडेक्स फंड के रिटर्न को बीट कर पाए. यानी एक परसेंट म्यूच्यूअल फंड भी लॉन्ग टर्म में इंडेक्स फंड को मात नहीं दे सके.अब इससे पहले कि कोई सोचे चलो यार इन्हीं तीन म्यूच्यूअल फंड में इन्वेस्ट कर देते हैं तो रुक जाइए क्योंकि अभी बात पूरी नहीं हुई. असल में म्यूच्यूअल फंड managers को भी पता नहीं होता कि 355 म्यूच्यूअल फंड्स में से कौन अच्छा परफॉर्म करेंगे और आने वाले सालों में कौन अच्छा रिटर्न दे पाएँगे. तो क्या ये कॉमन सेंस नहीं है कि अगर सिर्फ एक परसेंट म्यूच्यूअल फंड ही इंडेक्स फंड को बीट कर पाते हैं तो क्यों ना पैसा इंडेक्स फंड में ही इन्वेस्ट किया जाए. बात घूम कर वहीं आ गई कि घास के ढेर में सुई मत ढूंढो बल्कि पूरा घास ही खरीद लो. इसे इस तरह सोचें कि अगर आप एक डाइस भी रोल करते में 1-04 – 11/1A A८ तो क्या ये कॉमन सेंस नहीं है कि अगर सिर्फ एक परसेंट म्यूच्यूअल फंड ही इंडेक्स फंड को बीट कर पाते हैं तो क्यों ना पैसा इंडेक्स फंड में ही इन्वेस्ट किया जाए. बात घूम कर वहीँ आ गई कि घास के ढेर में सुई मत ढूंढो बल्कि पूरा घास ही खरीद लो. इसे इस तरह सोचें कि अगर आप एक डाइस भी रोल करते हैं तो किसी भी नंबर आने का चांस 1/6 होता है यानी 16.66% और यहाँ इंडेक्स फंड को बीट करने का चांस तो एक परसेंट से भी कम है. फोकस ओन द लोवेस्ट कास्ट फंड्स (Focus on the Lowest- Cost Funds) तो अब हम जानते हैं कि अगर आप किसी एक्सपर्ट या मैनेजर से इन्वेस्टमेंट की टिप लेते हैं तो आपको उन्हें फीस भी देनी होगी और वो आपसे जितना पैसा लेंगे आपका रिटर्न उतना ही कम होता रहेगा. किसी भी म्यूच्यूअल फंड की सबसे बड़ी कॉस्ट होती है “एक्सपेंस ratio” (expense ratio).एक्सपेंस ratio का मतलब है कि हमारे पैसों को मैनेज करने के लिए और advertisement करने के लिए हमसे जो कॉस्ट ली जाती है.म्यूच्यूअल फंड में मैनेजर ज़्यादा एक्सपेंस ratio चार्ज करते हैं इसलिए ये 1-2% तक चला जाता है लेकिन यही कॉस्ट इंडेक्स फंड में सिर्फ 0.7% के आस पास होता है. The Little Book of Common Sense Investin… John C. Bogle बेंजामिन ग्राहम इंडेक्स फंड्सके बारे में क्या बोलेंगे? इन्वेस्टमेंट पर लिखी गई सबसे popular बुक “The Intelligent Investor” और “Security Analysis” के ऑथर बेंजामिन ग्राहम के इंडेक्स फंड के बारे में क्या विचार हैं? वैसे तो बेंजामिन इंडेक्स फंड मार्केट में 1949 तक आए ही नहीं थे फ़िर भी उन्होंने एक बार एक बात कही थी जो indirectly इंडेक्स फंड्स के पक्ष में ही थी. उन्होंने कहा था कि “ज़्यादातर इन्वेस्टर्स के पास ना तो इतना वक़्त होता है और ना ही इतनी दिलचस्पी और लगन होती है कि वो हर वक़्त बिज़नेस के बारे में ही पढ़ते रहे”. इसलिए उन्हें अपने पैसे डिफेंसिव पोर्टफोलियो में इन्वेस्ट करना चाहिए और उससे जितना भी रिटर्न मिले उसी में संतुष्ट रहना चाहिए. जब आप अपना सारा पैसा किसी एक कंपनी में ना लगाकर अलग अलग कंपनी में लगाते हैं तो उसे पोर्टफोलियो कहा जाता है. अक्सर loss का रिस्क कम करने लिए कल ऐसे शेयर २५ पाना पाहिजार सताना ना।२८1 नि। उसी में संतुष्ट रहना चाहिए. जब आप अपना सारा पैसा किसी एक कंपनी में ना लगाकर अलग अलग कंपनी में लगाते हैं तो उसे पोर्टफोलियो कहा जाता है. अक्सर loss का रिस्क कम करने लिए कुछ ऐसे शेयर में पैसा लगाया जाता है जो ज़्यादा रिटर्न तो नहीं देते लेकिन उनमें पैसा डूबने का ख़तरा काफ़ी कम होता है. ऐसे पोर्टफोलियो को डिफेंसिव पोर्टफोलियो कहा जाता है जिसमें पैसा ज़्यादा रिस्की और कम रिस्की दोनों शेयर्स में लगाए जाते हैं. बेंजामिनने ये भी कहा था कि वॉल स्ट्रीट का मकसद बिज़नेस करना है और इन्वेस्टर्स से जो कमीशन मिलता है मार्किट उसी बेसिस पर चलता है जिसका मतलब है कि इस मार्केट का नेचर ही ऐसा है कि इन्वेस्टर को बहुत ज़्यादा रिटर्न नहीं मिल सकता. शोर्ट में इसका ये मतलब है कि बार बार स्टॉक खरीद और बेच कर ज़्यादा पैसा नहीं कमाया जा सकता बल्कि सबसे बेस्ट स्टॉक्स में लंबे समय तक पैसा इन्वेस्ट कर के ही अच्छा रिटर्न कमाया जा सकता है. charelagert (Conclusion) तो इस समरी में सबसे पहले हमने ये जाना कि फंड मैनेजर वो होता है जो हमारे पैसे अलग अलग कंपनी में इन्वेस्ट करता है. फ़िर हमने समझा कि म्यूच्यूअल कन्क्लूज़न (Conclusion) तो इस समरी में सबसे पहले हमने ये जाना कि फंड मैनेजर वो होता है जो हमारे पैसे अलग अलग कंपनी में इन्वेस्ट करता है. फ़िर हमने समझा कि म्यूच्यूअल फंड वो होता है जिसमें बहुत सारे लोग पैसा लगाते हैं और फंड मैनेजर अपनी कैलकुलेशन के हिसाब से उसे इन्वेस्ट कर देता है. यहाँ फंड मैनेजर को एक्टिव होकर इसे मैनेज करना पड़ता है. फ़िर हमने समझा कि इंडेक्स फंड भी म्यूच्यूअल फंड जैसा ही है लेकिन यहाँ पहले से कुछ रूल्स बनाए हुए होते हैं जिसके हिसाब से पैसे इन्वेस्ट किये जाते हैं इसलिए फंड मैनेजर को इसे ज़्यादा एक्टिव होकर मैनेज नहीं करना पड़ता जिसकी वजह से इंडेक्स फंड में एक्सपेंस ratio काफ़ी कम होता है. हमने ये भी देखा कि कोई भी म्यूच्यूअल फंड मैनेजर ये गैरंटी नहीं दे सकता कि कौन सा म्यूच्यूअल फंड इंडेक्स फंड को बीट कर पाएगा.और पिछले 35 साल के रिकॉर्ड के हिसाब से एक परसेंट से भी कम म्यूच्यूअल फंड्स ने इंडेक्स फंड के रिटर्न को बीट किया था. जिसका मतलब है कि अगर हम अपने देश के इंडेक्स फंड में पैसा लगाएं तो वो कई गुना बेहतर होगा. हमने इस टॉपिक पर बेंजामिन ग्राहम के नज़रिए को भी समझा. इस इन्वेस्टमेंट मार्केट का नेचर ही ऐसा है कि ये फंड में पैसा लगाएं तो वो कई गुना बेहतर होगा. हमने इस टॉपिक पर बेंजामिन ग्राहम के नज़रिए को भी समझा. इस इन्वेस्टमेंट मार्केट का नेचर ही ऐसा है कि ये तभी ग्रो करेगा जब managers को कमीशन मिलेगा और ज़्यादा कमीशन तब मिलेगा जब शेयर्स बार बार खरीदे और बेचे जाएंगे. जिसका सीधा साधा मतलब है कि इन्वेस्टर्स को रिटर्न कम मिलेगा. तो अब जब आप इस फ़र्क के लॉजिक को समझ गए हैं तो सोच समझ कर अपनी जमा पूँजी इन्वेस्ट करें.

Leave a Reply