The Intelligent Investor. BENJAMIN GRAHAM Books Hindi Summary

The Intelligent Investor. BENJAMIN GRAHAM इंट्रोडक्शन इन्वेस्टमेंट पर लिखी ये बुक खुद वॉरेन बफेट रेकमंड करते हैं तो ज़ाहिर है ये बुक ऐसे ही लोगों की फेवरेट ये बुक नहीं है. बेंजमिन ग्राहम जो इस बुक के ऑथर है और जो फादर ऑफ़ वैल्यू इन्वेस्टिंग भी कहे जाते है, उन्होंने अपनी इस बुक को कई ऐसी स्ट्रेटेज़ी शेयर की है ताकि इसे पढ़ने के बाद आप भी स्टॉक मार्केट को मात देकर बेहतर परफॉर्म कर सकते है. इस समरी में सब कुछ दिया है, bond से लेकर स्टॉक्स, स्ट्रेटेज़ी, टैक्टिस, रिस्क और रिपोर्ट तक सब कुछ! साथ ही ग्राहम ने अपनी थ्योरीज़ और आईडियाज़ को समझाने के लिए कई सारे रियल लाइफ एक्सपीरियेंस भी शेयर किए है. ये जानी-मानी बुक किसी फाईनेंस मार्केट बाईबल से कम नहीं है जो हर इंवेस्टर को कम से कम एक बार जरूर पढ़नी चाहिए! Investment versus Speculation: Results To Be Expected By The Intelligent Investor Chapter 1 बेंजमिन ग्राहम इसमें इन्वेस्टर्स और स्पेकुलेटर्स की बात करते है और बताते है कि कैसे ये दोनों टर्म एक-दूसरे . Investment versus Speculation: Results To Be Expected By The Intelligent Investor Chapter 1 बेंजमिन ग्राहम इसमें इन्वेस्टर्स और स्पेकुलेटर्स की बात करते है और बताते है कि कैसे ये दोनों टर्म एक-दूसरे के opposite जाते है. साथ ही वो कुछ लेसन भी देते हैं ताकि रीडर्स कंफ्यूज़ होकर दोनों को एक ही ना समझ ले. ये दोनों टर्म काफी इम्पोर्टेट है क्योंकि फाईनेंस मार्केट में आप अक्सर लोगों को या आप खुद भी इन दोनों के बीच कंफ्यूज़ होते हुए देख सकते है. तो हम बताते है, एक स्पेकुलेटर वो होता है जिसकी खुद की वेल्थ बिल्ड होने के चांस कम होते है क्योंकि वो दूसरों की वेल्थ बिल्ड करता है. ये लोग प्रॉफिट कमाने के लिए रिस्क लेने को तैयार रहते है और अपनी एजुकेशन और नॉलेज के बेसिस पर अंदाजे लगाते है कि मार्केट का रुख किस तरफ होगा. अब बात करते है इंवेस्टर की. एक इंवेस्टर इसके एकदम opposite करता है. वो इन्वेस्ट करने से पहले स्टॉक्स को केलकुलेट कर लेता है. वो अपने लिए वेल्थ बिल्ड करता है नाकि दूसरे के लिए. वो जानता है कि स्टॉक के प्राइस ऊपर जा सकते है क्योंकि कोई और प्राइस से ज़्यादा पे करने वाला है. इंवेस्टर खुद के लिए पैसा कमाते है जबकि स्पेकुलेटर ब्रोकर के लिए पैसा कमाते है. स्पेकुलेटर short पीरियड के लिए इन्वेस्ट करते है और अगर वो मार्केट बीट भी कर ले तो डिसीजन सही निकलने पर स्पेकुलेटर ब्रोकर के लिए पैसा कमाते है. स्पेकुलेटर short पीरियड के लिए इन्वेस्ट करते है और अगर वो मार्केट बीट भी कर ले तो डिसीजन सही निकलने पर बड़ी-बड़ी हांकने लगते है.चाहे उनकी स्ट्रेटेज़ी कितनी ही डम्ब या डेंजरस क्यों ना हो, फिर भी वो अपना टेम्परेरी प्रॉफिट का दिखावा करने से बाज़ नहीं आते. वही दूसरी तरफ इंवेस्टर कुछ साबित नहीं करना चाहते. उन्हें टेम्परेरी प्रॉफिट में कोई इंटरेस्ट नहीं है और ना ही वो जल्दबाजी में कोई डेंजरस स्टेप लेते है. मान लो आपको कहीं जाना है, तो आप ये सोचकर 65 की स्पीड से कार ड्राइव करते हो कि दो घंटे में तो आप पहुँच ही जाओगे. लेकिन क्या आप और जल्दी के चक्कर में 130 की स्पीड से ड्राइव करके अपनी लाइफ को रिस्क में डालेंगे? नहीं ना! स्पेकुलेटर्स भी असल में यही करते है. ऑनलाइन ट्रेडिंग स्पेकुलेटिंग का ही एक पहलू है. 1990 के दौर में ये पैसे कमाने का एक ईज़ी जरिया माना जाता था. इसके लिए कई सारे ad भी आया करते थे जो लोगों को ऑनलाइन ट्रेड के लिए एनकरेज करते थे. 1999 का दौर आते-आते करीब 6 मिलियन लोग ऑनलाइन ट्रेडिंग से जुड़ चुके थे. दिसम्बर और जनवरी के टाइम में छोटे स्टॉक्स बड़े प्रॉफिट कमाया करते थे. ऑनलाइन ट्रेडिंग को लोग काफी बड़े पैमाने पर प्रोमोट किया करते थे और दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए कहते थे. लेकिन जब ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें जुड़ने लगे तो रिटर्न भी कम मिलने लगा. एक और टेक्नीक हैं “Foolish Four” मा ।। माना जाना को भी ऐसा ही करने के लिए कहते थे. लेकिन जब ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें जुड़ने लगे तो रिटर्न भी कम मिलने लगा. एक और टेक्नीक हैं “Foolish Four” जिसे 1990 के टाइम में बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया था. इसमें आपको सिर्फ ये करना होता है कि एक फाईनेन्स इंडेक्स में लिस्टेड 5 स्टॉक को choose करो, सबसे कम प्राइस वाले स्टॉक को हटा दो, सेकंड लोवेस्ट वाले स्टॉक में 40% पैसा लगाओ और बाकि बचे तीनों स्टॉक में 20-20% पैसा लगाना चाहिए. ये प्रोसेस तब तक रिपीट करो जब तक कि आप अच्छा ख़ासा पैसा नहीं कम लेते. बेशक, ये तरीका उतना काम नहीं आया जितना कि लोगों को उम्मीद थी. मार्केट को गिराने के बजाय के उन हजारो लोगों की जिंदगी बर्बाद हो गई जिन्होंने इस स्कीम के हिसाब से अपना पैसा इन्वेस्ट किया था. तो जब स्पेकूलेटिंग और इन्वेस्टिंग की बात आये तो आपका किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? बस तीन चीज़े याद रखना, जब आप सिर्फ स्पेकुलेट कर रहे होते है तो ये कभी मत सोचना कि आप इन्वेस्ट कर रहे है. जैसे ही आप स्पेकुलेंटिंग को सीरियसली लेना शुरू करते हो, ये आपके लिए खतरनाक हो जाता है. इसलिए आपको स्पेकुलेटिंग में काफी सोच-समझकर ही पैसा लगाना चाहिए. जैसे एक इंटेलिजेंट गैम्बलर कसिनो में अपना सारा पैसा ना लगाकर थोडा-बहुत लगाता है, इसी तरह आपको भी स्पेकुलेटिंग में 10% से ज्यादा पैसा कभी नहीं लगाना चाहिए गैम्बलिंग यानि प्रोसेस तब तक रिपीट करो जब तक कि आप अच्छा ख़ासा पैसा नहीं कम लेते. बेशक, ये तरीका उतना काम नहीं आया जितना कि लोगों को उम्मीद थी. मार्केट को गिराने के बजाय के उन हजारो लोगों की जिंदगी बर्बाद हो गई जिन्होंने इस स्कीम के हिसाब से अपना पैसा इन्वेस्ट किया था. तो जब स्पेकूलेटिंग और इन्वेस्टिंग की बात आये तो आपका किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? बस तीन चीज़े याद रखना. जब आप सिर्फ स्पेकुलेट कर रहे होते है तो ये कभी मत सोचना कि आप इन्वेस्ट कर रहे है. जैसे ही आप स्पेकुलेंटिंग को सीरियसली लेना शुरू करते हो, ये आपके लिए खतरनाक हो जाता है. इसलिए आपको स्पेकुलेटिंग में काफी सोच-समझकर ही पैसा लगाना चाहिए. जैसे एक इंटेलिजेंट गैम्बलर कसिनो में अपना सारा पैसा ना लगाकर थोडा-बहुत लगाता है, इसी तरह आपको भी स्पेकुलेटिंग में 10% से ज्यादा पैसा कभी नहीं लगाना चाहिए. गैम्बलिंग यानि सट्टा खेलना इन्सान की एक फितरत है जिसे लोग चाह कर भी नहीं दबा पाते. लेकिन फिर भी आपको इसकी लत से बचना चाहिए, जितना हो सके खुद पर कण्ट्रोल करने की कोशिश करे. सिर्फ यही एक तरीका है जो हमे स्पेकुलेशन और इन्वेस्टमेंट के बीच कंफ्यूज़ होने से बचा सकता है. The Intelligent Investor. BENJAMIN GRAHAM The Investor and Inflation बेंजमिन ग्राहम इन्फ्लेशन की बात करते है कि ये bond को किस तरह से इम्पैक्ट करता है. साथ ही वो स्टॉक्स और bond के बीच इन्वेस्टिंग के फर्क को भी समझाते है और ये भी कि दोनों के फ़ायदे और नुक्सान क्या है. डॉलर की वैल्यू कम हो रही है. जो चीज़ आज से 50 साल पहले आप एक सेंट में ले सकते थे वो आज आपको 5 डॉलर से कम में नहीं मिलेगी. जिनकी इनकम फिक्स्ड है उन्हें इस इन्फ्लेशन की वजह से काफी प्रॉब्लम फेस करनी पड़ती है. मान लो आज आप 2 डॉलर में ब्रेड लेते हो और आप 5000 डॉलर कमाते हो जोकि आपकी फिक्स्ड इनकम है और आगे बढ़ने वाली नहीं है. अब जैसा कि हमने कहा डॉलर की वैल्यू घटती जा रही है तो आज जो बेंड 2 डॉलर की है वही कल 3, 4 या 5 की भी हो सकती है. लेकिन आपकी इनकम तो वही रहेगी ना, तो आपको आगे चलकर महंगाई की मार झेलनी पड़ सकती है. इसलिए बैटर है कि स्टॉक्स में इन्वेस्ट किया जाये, ये bonds में इन्वेस्ट करने से बैटर होता है. Bond वो इन्वेस्टमेंट है जहाँ आप पैसे लेने वाले यानी borrower को एक स्पेशिफिक अमाउंट उधार पर देते हो जो आपको कुछ फिक्स टाइम के बाद इंटरेस्ट के साथ वापस मिल जाता है. अब क्योंकि डॉलर की वैल्यू नीचे जा रही है तो इसका मतलब आप भी तो नक्सान देते हो जो आपको कुछ फिक्स टाइम के बाद इंटरेस्ट के साथ वापस मिल जाता है. अब क्योंकि डॉलर की वैल्यू नीचे जा रही है तो इसका मतलब आप भी तो नुक्सान की तरफ जा रहे हो. है ना? तो नतीजन कुछ फाईनेंशीयल ऑथोरीटीज़, ऐसे पोर्टफोलियो एडवाईज करते है जहाँ 100% स्टॉक्स हो और bond ना हो. पर क्या ये सही डिसीजन होगा? सबसे पहले तो इन्फ्लेशन पर ध्यान दो और ये देखो कि डॉलर की वैल्यू कैसे कम हो रही है क्योंकि इन्वेस्टर्स के लिए ये ज्यादा लॉजिकल और reasonable रहेगा कि वो फ्यूचर इन्फ्लेशन रेट के हिसाब से अपने डिसीजन ले. हालाँकि स्टेटिसस्टिक के हिसाब से डॉलर की गिरती वैल्यू आपको स्टॉक्स की तरफ खींच सकती है, पर जब प्राइस कम हुए थे तो स्टॉक के रिटर्न बेहद खराब रहे थे. ये एक चौंकाने वाला फैक्ट है ना? तो आपका प्लान ऑफ़ एक्शन क्या होना चाहिए? REITS BİR TIPS! REITs रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट होते है यानी वो कंपनी जो प्रोपर्टी से रेंट कलेक्ट करती है. इन्फ्लेशन के टाइम पर ये कंपनी अच्छा परफोर्म करती है. TIPS यानी ट्रेजरी इन्फ्लेशन प्रोटेक्टेड सिक्योरीटीज़ या गवर्नमेंट bond. जब इन्फ्लेशन आती है तो इनकी वैल्यू ऑटोमेटिकली ऊपर चली जाती है और इनमे जरा भी रिस्क शामिल नहीं है. एक इंटेलीजेंट इंवेस्टर के तौर पर आपसे उम्मीद की जाती है कि आप सोच समझकर और लॉजिकल डिसीजन लेंगे जो सिर्फ के तौर पर आपसे उम्मीद की जाती है कि आप सोच समझकर और लॉजिकल डिसीजन लेंगे जो सिर्फ पास्ट एक्सपीरिएंस पर बेस्ड ना हो. लोग दावा करते रहते है कि स्टॉक्स पहले से ही bond से ज्यादा पोपुलर है, लेकिन ये डेटा जिस अमाउंट पर बेस्ड है वो 7 स्टॉक्स से भी कम का है! इसी बीच 1800 के दशक में 300 से भी ज्यादा कंपनी दिवालिया हो गई थी! और जे. पी. मॉर्गन जैसी कंपनी किसी तरह सर्वाइव करती आई है. ये बड़ी हैरत की बात है पर सच तो ये है कि हर बार सर्वाइव करने के लिए भी उन्हें कई बार फाईनेंशियल नुक्सान झेलने पड़े! तो आखिर हम क्यों उम्मीद करे कि स्टॉक के फ्यूचर रिटर्न हमेशा पास्ट जैसे मिलने चाहिए और अगर हर स्टॉक इंवेस्टर इसी तरीके से सोचता रहा तो क्या स्टॉक्स ओवरप्राइस नहीं हो जाएंगे ? अगर आपको ये चीज़ समझ नहीं आई तो इसे कुछ इस तरीके से समझो. माइकल जॉर्डन अपने टाइम के बेहतरीन बास्केटबॉल प्लेयर्स में एक से थे . शिकागो बुल्स ने उन्हें एक साल $34 मिलियन पे किया था और वो deserve भी करते थे. लेकिन क्या उन्हें साल के $340 मिलियन या साल का $3.4 बिलियन पे करना सही डिसीजन होता? नहीं! इसी तरह अगर आपको लगता भी है कि स्टॉक्स अच्छा परफोर्म करेंगे तो भी जो लोग उनमे इन्वेस्ट कर रहे होंगे, लाखो की तादात में होंगे! स्टॉक्स overvalued रहेंगे और आपके हाथ कुछ नहीं लगने वाला. किसी तरह सर्वाइव करती आई है. ये बड़ी हैरत की बात है पर सच तो ये है कि हर बार सर्वाइव करने के लिए भी उन्हें कई बार फाईनेंशियल नुक्सान झेलने पड़े! तो आखिर हम क्यों उम्मीद करे कि स्टॉक के फ्यूचर रिटर्न हमेशा पास्ट जैसे मिलने चाहिए और अगर हर स्टॉक इंवेस्टर इसी तरीके से सोचता रहा तो क्या स्टॉक्स ओवरप्राइस नहीं हो जाएंगे? अगर आपको ये चीज़ समझ नहीं आई तो इसे कुछ इस तरीके से समझो. माइकल जॉर्डन अपने टाइम के बेहतरीन बास्केटबॉल प्लेयर्स में एक से थे . शिकागो बुल्स ने उन्हें एक साल $34 मिलियन पे किया था और वो deserve भी करते थे. लेकिन क्या उन्हें साल के $340 मिलियन या साल का $3.4 बिलियन पे करना सही डिसीजन होता? नहीं ! इसी तरह अगर आपको लगता भी है कि स्टॉक्स अच्छा परफोर्म करेंगे तो भी जो लोग उनमे इन्वेस्ट कर रहे होंगे, लाखो की तादात में होंगे! स्टॉक्स overvalued रहेंगे और आपके हाथ कुछ नहीं लगने वाला. स्टॉक्स और bonds दोनों अलग है और दोनों के अपने फायदे-नुकसान है और ये दोनों एक दूसरे के alternate भी कभी नहीं हो सकते इसलिए एक की खातिर दूसरे को पूरी तरह अवॉयड करना समझदारी नहीं होगी. The Intelligent Investor. BENJAMIN GRAHAM . 1 General Portfolio Policy इस चैप्टर में बेंजमिन ग्राहम दो तरह की स्ट्रेटेजी के बीच का फ़र्क समझाते है ताकि आपका पोर्टफ़ोलीयो एक्टिव और पैसिव बना रहे. वो ये भी डिसक्राइब करते है कि अगर कोई bonds में इन्वेस्ट कर रहा है तो उसे स्टॉक्स में कैसे इन्वेस्ट करना चाहिए और कैसे स्ट्रेटेजी बनानी चाहिए. पोर्टफोलियो बनाने के लिए दो तरह की स्ट्रेटेज़ी यूज़ होती है. पहले है एक्टिव या एंटरप्राईजिंग और दूसरी है पैसिव या डिफेंसिव. एक्टिव स्ट्रेटेज़ी में हम कई तरह के bond , mutual फंड और स्टॉक्स को रिसर्च करके सिलेक्ट करते रहते है. पर अगर आप पैसिव स्ट्रेटेज़ी चूज़ करते है तो आप एक परमानेंट पोर्टफोलियो क्रिएट करेंगे जिसे एक बार क्रिएट करने के बाद आपको और आगे एफर्ट करने की जरूरत नहीं पडती. फिजिकली एक्टिव अप्रोच ज्यादा मुश्किल होता है क्योंकि इसमें आपको काफी काम करना पड़ता है. ईमोशनली डिफेंसिव स्ट्रेटेज़ी काफी डिमांडिंग हो सकती है क्योंकि इसमें कई तरह के उतार चढ़ाव फेस करने पड़ सकते है. अगर आप डिफेंसिव इंवेस्टर बनना चूज़ करते है तो सबसे पहले ये डिसाइड कर लो कि आपकी इन्वेस्टमेंट का कितना परसेंट स्टॉक्स में जाएगा और कितना bond में पर इसे करने का एक दफेक्टिव तरीका सबसे पहले ये डिसाइड कर लो कि आपकी इन्वेस्टमेंट का कितना परसेंट स्टॉक्स में जाएगा और कितना bond में. पर इसे करने का एक इफेक्टिव तरीका है: अपनी एज को 100 से माईनस कर लो, जो बचता है उतने परसेंट स्टॉक्स में रखो और बाकि bond में. आप शायद सोच रहे होंगे कि इसका आपकी एज से क्या लेना-देना है ? वैसे आपने अच्छा सवाल पूछा. एक 80 साल का आदमी जिसे अच्छी पेंशन मिल रही है, उसके पास एक अच्छा घर है, बच्चे है जो उसका ध्यान रखते है, तो ऐसा आदमी अगर अपना सारा पैसा bond में लगाएगा तो ये उसकी बेवकूफी होगी. वही दूसरी तरफ एक 25 साल का यंग आदमी जो अपनी शादी और घर की डाउन पेमेंट के लिए सेविंग कर रहा है, वो इस तरह का रिस्क ले ही नहीं सकता क्योंकि अगर स्टॉक मार्केट में कोई भी उथल-पुथल हुई तो उसका सारा पैसा डूब जाएगा. तो बात ये है कि इन्वेस्टमेंट करने से पहले अपनी करंट सिचुएशन पर भी गौर करना जरूरी है. आपकी फाईनेंशीयल कंडिशन और जिम्मेदारियां डिसाइड करेंगी कि आपको अपना पैसा कहाँ लगाना चाहिए. क्या आप सिंगल है? आपका पार्टनर क्या करता है? क्या आपके बच्चे है? क्या आपको कोई खानदानी पैसा मिलने की उम्मीद है? आप इन्वेस्टमेंट में ज्यादा से ज्यादा कितने तक का नुक्सान बर्दाश्त कर सकते है? ये ऐसे इम्पोर्टेट सवाल है जो आपको इन्वेस्टमेंट का रिस्क लेने से पहले एक बार खुद से पूछ लेने चाहिए. तो अगर आप अभी कम उम्र के है फिर भी रिस्क लेने रिस्क लेने से पहले एक बार खुद से पूछ लेने चाहिए. तो अगर आप अभी कम उम्र के है फिर भी रिस्क लेने से घबराते है तो आपको bond में इन्वेस्ट करना चाहिए. लेकिन bond एक तरह के नहीं होते. तो क्या ये टैक्सेबल होने चाहिए या टैक्स फ्री? शोर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म? bond या bond fund ? तो जवाब है कि सिर्फ टैक्स फ्री bond खरीदना ही सही रहेगा! टैक्सेबल bond खरीदने से आपकी मेहनत की कमाई गोवेर्नमेंट के हाथो में चली जाएगी . intermediate यानी बीच के टर्म वाले bond में इन्वेस्ट करोगे तो बैटर रहेगा जो 5 से 10 साल में मैच्योर हो जाए. लेकिन शोर्ट टर्म bond में इन्वेस्ट कभी मत करना और bond fund या कई सारे bond का एक कलेक्शन ज्यादा बैटर ऑप्शन है. ये सस्ते और डाइवर्स होते है. 2000-2002 के दौरान मार्केट में बड़ा क्रैश देखने को मिला जिसकी वजह से इन्वेस्टर्स को यकीन हो चला था कि स्टॉक मार्केट बेहद रिस्की है. लेकिन अब क्योंकि लोगों ने पहले की तरह इन्वेस्टिंग करनी कम कर दी थी तो रिस्क फैक्टर भी कम हो गया. तो अगर आप स्टॉक्स ज्यादा prefer करते हो तो आप कौन से स्टॉक लेना पसंद करोगे? पीटर लिंच जोकी एक फेमस mutual फंड इंवेस्टर है, “buy what you know” यानी आप जिसके बारे में जानते हैं वो ख़रीदें, के कांसेप्ट पर जोर देते है. वो इन्वेस्टर्स को ये मैसेज देना चाहते है कि उन्हें कॉमन नॉलेज के बेस पर स्टॉक्स डिस्कवर करने चाहिए. जैसे रिस्क लेने से पहले एक बार खुद से पूछ लेने चाहिए. तो अगर आप अभी कम उम्र के है फिर भी रिस्क लेने से घबराते है तो आपको bond में इन्वेस्ट करना चाहिए. लेकिन bond एक तरह के नहीं होते. तो क्या ये टैक्सेबल होने चाहिए या टैक्स फ्री? शोर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म? bond या bond fund ? तो जवाब है कि सिर्फ टैक्स फ्री bond खरीदना ही सही रहेगा! टैक्सेबल bond खरीदने से आपकी मेहनत की कमाई गोवेर्नमेंट के हाथो में चली जाएगी . intermediate यानी बीच के टर्म वाले bond में इन्वेस्ट करोगे तो बैटर रहेगा जो 5 से 10 साल में मैच्योर हो जाए. लेकिन शोर्ट टर्म bond में इन्वेस्ट कभी मत करना और bond fund या कई सारे bond का एक कलेक्शन ज्यादा बैटर ऑप्शन है. ये सस्ते और डाइवर्स होते है. 2000-2002 के दौरान मार्केट में बड़ा क्रैश देखने को मिला जिसकी वजह से इन्वेस्टर्स को यकीन हो चला था कि स्टॉक मार्केट बेहद रिस्की है. लेकिन अब क्योंकि लोगों ने पहले की तरह इन्वेस्टिंग करनी कम कर दी थी तो रिस्क फैक्टर भी कम हो गया. तो अगर आप स्टॉक्स ज्यादा prefer करते हो तो आप कौन से स्टॉक लेना पसंद करोगे? पीटर लिंच जोकी एक फेमस mutual फंड इंवेस्टर है, “buy what you know” यानी आप जिसके बारे में जानते हैं वो ख़रीदें, के कांसेप्ट पर जोर देते है. वो इन्वेस्टर्स को ये मैसेज देना चाहते है कि उन्हें कॉमन नॉलेज के बेस पर स्टॉक्स डिस्कवर करने चाहिए. जैसे वाइन्वस्टस काय मसज दना चाहत ह कि उन्ह कामन नॉलेज के बेस पर स्टॉक्स डिस्कवर करने चाहिए. जैसे मान लो आपको कभी कोई बढ़िया रेस्टोरेंट मिल गया, या एक अच्छा जींस का ब्रैड या कोई अच्छा टूथपेस्ट मिला तो आप ऐसी कंपनीज़ के स्टॉक्स में इन्वेस्ट कर सकते हो. वैसे ये आईडिया भी एक हद तक सही है; कई सारे इन्वेस्टर्स इसलिए भी मार्केट को बीट कर पाए क्योंकि उन्होंने उन्ही चीजों में इन्वेस्ट किया था जिनके बारे में वो अच्छे से जानते थे. लेकिन लिंच का रुल तभी काम करेगा जब आप इसे इसके रिजल्ट के साथ फॉलो कर पाएंगे यानी एक promising कंपनी ढूंढना तो पहला स्टेप है, दूसरा स्टेप है रिसर्च करना. बदकिस्मती से कई सारे स्टॉक खरीदने वाले लोग सेकंड पार्ट के बारे में भूल ही जाते है. एक अमेरिकन सिंगर, बारबरा स्ट्रीसैंड का कहना था कि वो रोज़ स्टारबक्स जाया करती थी और रोज़ स्टॉक्स खरीदा करती थी. लेकिन वो बेचारी उसके फाईनेंशीयल स्टेटमेंट देखना भूल गई थी. कई लोग Amazon.com में भी इन्वेस्ट करते है क्योंकि वो इस साईट को फ बहुत बार विज़िट करते है, हालाँकि उन्हें इसकी रिपोर्ट की कोई नॉलेज नहीं होती. जिस चीज़ के बारे में आपको पता है, उसे खरीदना एक अच्छी स्ट्रेटेज़ी है लेकिन तभी जब आप फाईनेंशीयल स्टेटमेंट देखने का कष्ट उठाते है. इसलिए टेक्निकल एज होना इम्पोर्टेट है और हमेशा फैक्ट्स के बेसिस परलॉजिकल डिसीजन लो. The Intelligent Investor. BENJAMIN GRAHAM Portfolio Policy for the Enterprising Investor: Negative Approach ग्राहम रिस्की bond के बारे में बात करते है जिनसे एक इंवेस्टर को बच के रहना चाहिए. साथ ही IPO के बारे में डिटेल से बताते है और उनमें इन्वेस्ट करने की स्ट्रेटेजी पर भी बात करते है. लास्ट में ग्राहम ये भी डिटेल से समझाने की कोशिश करते है कि मार्केट प्रेडिक्ट करना बेस्ट टैक्टिक क्यों नहीं मानी जाती. हाई यील्ड bond ऐसे bond होते है जिन्हें ऑफर करने वाली कंपनीज़ की लो क्रेडिट रेटिंग होती है. अब इसका क्या मतलब है ? इसका मतलब है कि अपने उधार को चुकाने करने की वजह से ही इन कंपनीज़ की रेपूटेशन खराब मानी जाती है और इसकी वजह से इन्हें जंक bond कहा जाता है. इन्वेस्टिंग में होने वाले रिस्क पहले ही काफी ज्यादा होते है इसलिए और ज्यादा रिस्क में पड़ना कोई अच्छी स्ट्रेटेज़ी नहीं मानी जाएगी और उनमे भी बुरे होते है फॉरेन bond. अक्सर लोग दूसरे देशों जैसे ब्रज़ील, मेक्सिको, नाईजीरिया, रशिया और venezuela जैसी कंट्रीज़ के bond में इन्वेस्ट करना पसंद करते है, लेकिन अगर आप अपनी टोटल इन्वेस्टमेंट का 10% से ज्यादा फॉरेन bond में ना लगाए तो ही अच्छा होगा. एक और चीज़ आपको हमेशा याद रखनी चाहिए, वो ये कि स्टॉक्स को बार-बार खरीदना और बेचना यानी ट्रेड कि स्टॉक्स को बार-बार खरीदना और बेचना यानी ट्रेड नहीं करना चाहिए. मार्केट में हमेशा उतार-चढाव आते रहते है तो आप स्टॉक्स बेचते-खरीदते रहना चाहेंगे. पर इसका फायदा सिर्फ आपके ब्रोकर को होने वाला है. स्टॉक को खरीदने और बेचने के लिए ट्रेडिंग कॉस्ट देना पड़ता है और ये आपको फायदे के बजाए और ज्यादा नुकसान में डाल देगी. आपको मार्केट को लेकर जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए बल्कि यहाँ तो पेशन्स ही सक्सेस दिला सकती है. 1990 के दशक में ये ट्रेंड चल पड़ा था कि जो कोई भी IPO के स्टॉक खरीदेगा रातो-रात करोड़पति बन जाएगा. IPO यानि इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग यानि किसी कंपनी के स्टॉक्स की पब्लिक में फर्स्ट सेल को कहा जाता है. अगर आपने माइक्रोसॉफ्ट के IPO सिर्फ $2100 में खरीदे होते तो वो आज बढ़कर $720,000 हो गए होते. पर लोग ये भूल जाते है कि माइक्रोसॉफ्ट सस्केस की उंचाईयों को छूने वाली हजारो में एक कंपनी है. हर कंपनी की किस्मत माइक्रोसॉफ्ट जैसी नहीं होती. फिर जब लिनक्स आई तो हर किसी को लगा कि ये दूसरी माइक्रोसॉफ्ट बनने वाली है. लेकिन अगर आप स्टेटिसस्टिक पर नज़र डाले तो लिनक्स को हर डॉलर का 70% लोस हो रहा था जो कंपनी में लगा था. पर फिर भी किसी तरह प्रोफेशनल इन्वेस्टर्स के हिसाब से कंपनी की वैल्यू करीब $12.7 बिलियन थी. अगर आपका पड़ोसी कभी आपसे आकर ये पूछे कि क्या आप उसके स्टगल कर रहे नए बिजनेस में $12.7 आपका पड़ोसी कभी आपसे आकर ये पूछे कि क्या आप उसके स्ट्रगल कर रहे नए बिजनेस में $72.7 बिलियन इन्वेस्ट करना चाहोगे, तो आपका जवाब क्या होगा? आप उसकी बात को सिरियसली लोगे या फिर उसे इग्नोर करते हुए अपने काम में लग जाओगे? आप इग्नोर ही करना चाहोगे क्योंकि कोई भी किसी के नए बिजनेस के लिए इतना बड़ा रिस्क क्यों लेगा भला? तो IPO भी हर कंपनी के लिए बेस्ट बेट नहीं होती है. एक आइडियल वर्ल्ड में इंवेस्टर को स्टॉक्स तब तक होल्ड करके रखने चाहिए जब तक उसकी कम प्राइस चल रही हो और तब बेचना चाहिए जब वो ओवरप्राईस्ड हो जाए. लेकिन आप ये कैसे डिसाइड करेंगे कि आने वाले दिनों में मार्केट और भी नीचे जा सकती है तो अभी अपने सारे स्टॉक्स बेचने सही रहेंगे? ज़ाहिर सी बात है, आप फ्यूचर प्रेडिक्ट तो नहीं कर सकते. आप तो क्या कई बार बड़े-बड़े प्रोफेशनल इन्वेस्टर्स की प्रेडिक्शन भी गलत निकल जाती है. अगर पास्ट एक्सपीरिएंस देखे तो हमे पता चल जायेगा की क्या बेचना चाहिए और क्या खरीदना. लेकिन रियल टाइम में चीज़े काफी अलग होती है. इसलिए पास्ट एक्सपीरिएंस के बेस पर प्रेडिक्शन करने की गलती कभी ना करे क्योंकि जो पास्ट में हुआ था जरूरी नहीं फ्यूचर में भी में होगा. क्या आपको मार्केट की डाइवर्स रेंज में इन्वेस्ट करना चाहिए? यानि अलग-अलग टाइप के स्टॉक्स में या फिर आप अपने सारे पैसे एक ही स्टॉक में इन्वेस्ट A < ज़ाहिर सी बात है, आप फ्यूचर प्रेडिक्ट तो नहीं कर सकते. आप तो क्या कई बार बड़े-बड़े प्रोफेशनल इन्वेस्टर्स की प्रेडिक्शन भी गलत निकल जाती है. अगर पास्ट एक्सपीरिएंस देखे तो हमे पता चल जायेगा की क्या बेचना चाहिए और क्या खरीदना. लेकिन रियल टाइम में चीज़े काफी अलग होती है. इसलिए पास्ट एक्सपीरिएंस के बेस पर प्रेडिक्शन करने की गलती कभी ना करे क्योंकि जो पास्ट में हुआ था जरूरी नहीं फ्यूचर में भी होगा. क्या आपको मार्केट की डाइवर्स रेंज में इन्वेस्ट करना चाहिए? यानि अलग-अलग टाइप के स्टॉक्स में या फिर आप अपने सारे पैसे एक ही स्टॉक में इन्वेस्ट करना पसंद करेंगे? आपको पता है, अमेरिका के अमीर लोगों ने तो एक सिंगल इन्वेस्टमेंट से ही अपनी सारी दौलत कमाई है. तो यानि अपने पैसे इधर-उधर डालने के बजाए एक सिंगल स्टॉक में लगाना ही वाइज़ डिसीजन होगा और बात जब स्टॉक की हो तो आपकी फॉरेन पालिसी क्या होनी चाहिए? US के बाहर इन्वेस्टमेंट करने में कोई हर्ज़ नहीं है. कोई नहीं बता सकता कि फ्यूचर में विदेश में क्या होगा या अपने देश में क्या होगा. इसलिए अच्छा यही होगा कि एक लेस रिस्की पोजीशन में रहा जाए क्योंकि ये जरूरी नहीं कि इन्वेस्टमेंट के लिए US मार्केट ही हमेशा बेस्ट चॉइस साबित होगी. The Intelligent Investor. BENJAMIN GRAHAM The Investment and Market Fluctuations मिस्टर मार्केट का फेमस मेटाफर इस चैप्टर में डिसक्राइब किया गया है जो हमे मार्केट को समझने में हेल्प करेगा. ग्राहम इंडेक्स और mutual fund की भी बात करते है और ये भी बताते है कि कौन सा ज्यादा बैटर ऑप्शन है. ज्यादातर टाइम मार्केट एकदम सही प्राइस्ड होते है पर कई बार प्राइस ठीक नहीं होता. कभी-कभी प्राइस काफी गलत होते है. ऐसे वक्त में मार्केट को एक इन्सान की तरह मान कर सोचे, मिस्टर मार्केट. अब ये जो मिस्टर मार्केट है, वो बायपोलर है और कई बार कुछ ज्यादा ही पॉजिटिव होकर मार्केट को कुछ ज्यादा ही वैल्यू दे बैठते है और कई बार ऐसा भी होता है जब मिस्टर मार्केट एकदम नेगेटिव होकर मार्केट को अंडरवैल्यू कर देते है. तो ऐसे में आपके पास एक ही ऑप्शन है, मिस्टर मार्केट को पूरी तरह नज़रंदाज़ करो! अब आप ही बताइए, क्या इस बात का कोई लॉजिक बनता है कि एक पागल हर पांच दिन बाद आकर आपसे कहे कि जो उसके साथ हो रहा है, जो उसे फील हो रहा है, एक्जेक्टली वही आपको भी फील करना चाहिए? नहीं ना, आप वही फील करोगे जो आप एक्सपीरियंस करोगे. किसी और के इमोशंस में आकर एक्सपीरियंस करोगे, किसी और के इमोशंस में आकर आप अपने ईमोश्न्स तो नहीं बदल सकते. तो फिर क्यों लाखो लोग मिस्टर मार्केट की बात सुनते है, जो उन्हें बताता है कि उन्हें कैसा फील करना चाहिए? साईंकोलोजिस्ट कहते है कि अगर आप लोगों को नंबर का एक रैंडम सिक्वेंस देकर उन्हें बताये कि अगला नंबर बता पाना नामुमकिन है तो वो कभी भी नेक्स्ट नंबर गेस करने के बारे में सोचेंगे तक नहीं. क्योंकि ह्यूमन नेचर कुछ ऐसा ही है, हमे जो बताया जाता है, हम उसी पर यकीन करते है. इन्वेस्टर्स ये सोचकर किसी ग्रो करने वाले फंड्स में इन्वेस्ट करते है कि वो आगे भी ग्रो करते रहेंगे. साईंकोलोजिस्ट का मानना है कि इन्सान ये समझता है कि शोर्ट टर्म रिजल्ट से हम लॉन्ग रन का रिजल्ट भी प्रेडिक्ट कर सकते है. हमे लगता है कि सिर्फ कुछ ही बेसबॉल प्लेयर्स होम रन हिट कर सकते है सारे नहीं और सिर्फ कुछ ही स्टूडेंट्स अच्छे ग्रेड्स ला सकते है, सारे नहीं. लेकिन बदकिस्मती से ये स्ट्रेटेज़ी फाईनेंशीयल मार्केट में बिल्कुल भी काम नहीं करती. दो तरह के फंड्स होते हैं जिनमे हम इन्वेस्ट कर सकते है: Mutual फंड्स और इंडेक्स फंड. Mutual फंड 1924 में इंट्रोड्यूस हुए थे. इन्हें प्रोफेशनली मैनेज किया जाता है, ये चीप और मैनेज करने में आसान होते है. वही दूसरी ओर इंडेक्स फंड अलग-अलग स्टॉक्स का पोर्टफोलियो होता है जो किसी फाईनेंशीयल मार्केट इंडेक्स जैसे कि S&P or Nasdaq की परफोर्मेंस के हिसाब से रिजल्ट दिखाता है. इंडेक्स फंड एक्सपीरियंस करोगे, किसी और के इमोशंस में आकर आप अपने ईमोश्न्स तो नहीं बदल सकते. तो फिर क्यों लाखो लोग मिस्टर मार्केट की बात सुनते है, जो उन्हें बताता है कि उन्हें कैसा फील करना चाहिए? साईंकोलोजिस्ट कहते है कि अगर आप लोगों को नंबर का एक रैंडम सिक्वेंस देकर उन्हें बताये कि अगला नंबर बता पाना नामुमकिन है तो वो कभी भी नेक्स्ट नंबर गेस करने के बारे में सोचेंगे तक नहीं. क्योंकि ह्यूमन नेचर कुछ ऐसा ही है, हमे जो बताया जाता है, हम उसी पर यकीन करते है. इन्वेस्टर्स ये सोचकर किसी ग्रो करने वाले फंड्स में इन्वेस्ट करते है कि वो आगे भी ग्रो करते रहेंगे. साईंकोलोजिस्ट का मानना है कि इन्सान ये समझता है कि शोर्ट टर्म रिजल्ट से हम लॉन्ग रन का रिजल्ट भी प्रेडिक्ट कर सकते है. हमे लगता है कि सिर्फ कुछ ही बेसबॉल प्लेयर्स होम रन हिट कर सकते है सारे नहीं और सिर्फ कुछ ही स्टूडेंट्स अच्छे ग्रेड्स ला सकते है, सारे नहीं. लेकिन बदकिस्मती से ये स्ट्रेटेज़ी फाईनेंशीयल मार्केट में बिल्कुल भी काम नहीं करती. दो तरह के फंड्स होते हैं जिनमे हम इन्वेस्ट कर सकते है: Mutual फंड्स और इंडेक्स फंड. Mutual फंड 1924 में इंट्रोड्यूस हुए थे. इन्हें प्रोफेशनली मैनेज किया जाता है, ये चीप और मैनेज करने में आसान होते है. वही दूसरी ओर इंडेक्स फंड अलग-अलग स्टॉक्स का पोर्टफोलियो होता है जो किसी फाईनेंशीयल मार्केट इंडेक्स जैसे कि S&P or Nasdaq की परफोर्मेंस के हिसाब से रिजल्ट दिखाता है. इंडेक्स फंड मार्केट इंडेक्स जैसे कि S&P or Nasdaq की परफोर्मेंस के हिसाब से रिजल्ट दिखाता है. इंडेक्स फंड Mutual फंड से ज्यादा अच्छा रिटर्न देने के लिए जाने जाते हैं. बस इसमें एक कमी है. इंडेक्स फंड्स बोरिंग होते है. ये मार्केट के परफॉरमेंस के हिसाब से बने होते है इसलिए ये कभी मार्केट को बीट नहीं कर पाते. कई सारे और फंड्स भी है जो इंडेक्स को भी बीट करते है, तो आखिर इनकी कवालीफिकेशन क्या होती है? इनके मैनेजर्स कंपनी के सबसे बड़े शेयरहोल्डर होते है. अगर मैनेजर को अपनी कंपनी पर भरोसा होगा तभी वो कंपनी के शेयर खरीदेंगे. ये एक तरह से ट्रस्ट की बात है. दूसरी चीज़, ये चीप होते है. कोई भी फंड अगर ओवरप्राईस्ड हुआ तो मार्केट को बीट कैसे कर पाएगा? तीसरी बात, ये नए इन्वेस्टर्स को इन्वेस्ट करने के लिए इनवाईट नहीं करते बल्कि अपने ही शेयरहोल्डर्स को और ज्यादा इन्वेस्ट करने के लिए एनकरेज करते है और लास्ट में, ये लोग एडवरटीज़मेंट नहीं करते. आखिर कोई क्यों शेयर्स की एडवरटाईजिंग करके सबको सीक्रेट बताएगा जब तक कि शेयर्स ओवरप्राईस्ड ना हो जाए? The Investor and His Advisers इस चैप्टर में ग्राहम इस बात की चर्चा करते है कि कुछ इन्वेस्टर्स को प्रोफेशनल एडवाईजर्स की जरूरत भी पडती है तो इसलिए ये पता होना चाहिए कि कहीं आपको भी किसी प्रोफेशनल की जरूरत तो नहीं है. वो आगे हमे डिटेल भी देते है कि इन्वेस्टर्स को अपना पैसा लगाने के लिए किस तरह की कंपनी देखनी चाहिए. A < मार्केट इंडेक्स जैसे कि S&P or Nasdaq की परफोर्मेंस के हिसाब से रिजल्ट दिखाता है. इंडेक्स फंड Mutual फंड से ज्यादा अच्छा रिटर्न देने के लिए जाने जाते हैं. बस इसमें एक कमी है. इंडेक्स फंड्स बोरिंग होते है. ये मार्केट के परफॉरमेंस के हिसाब से बने होते है इसलिए ये कभी मार्केट को बीट नहीं कर पाते. कई सारे और फंड्स भी है जो इंडेक्स को भी बीट करते है, तो आखिर इनकी कवालीफिकेशन क्या होती है? इनके मैनेजर्स कंपनी के सबसे बड़े शेयरहोल्डर होते है. अगर मैनेजर को अपनी कंपनी पर भरोसा होगा तभी वो कंपनी के शेयर खरीदेंगे. ये एक तरह से ट्रस्ट की बात है. दूसरी चीज़, ये चीप होते है. कोई भी फंड अगर ओवरप्राईस्ड हुआ तो मार्केट को बीट कैसे कर पाएगा? तीसरी बात, ये नए इन्वेस्टर्स को इन्वेस्ट करने के लिए इनवाईट नहीं करते बल्कि अपने ही शेयरहोल्डर्स को और ज्यादा इन्वेस्ट करने के लिए एनकरेज करते है और लास्ट में, ये लोग एडवरटीज़मेंट नहीं करते. आखिर कोई क्यों शेयर्स की एडवरटाईजिंग करके सबको सीक्रेट बताएगा जब तक कि शेयर्स ओवरप्राईस्ड ना हो जाए? The Investor and His Advisers इस चैप्टर में ग्राहम इस बात की चर्चा करते है कि कुछ इन्वेस्टर्स को प्रोफेशनल एडवाईजर्स की जरूरत भी पडती है तो इसलिए ये पता होना चाहिए कि कहीं आपको भी किसी प्रोफेशनल की जरूरत तो नहीं है. वो आगे हमे डिटेल भी देते है कि इन्वेस्टर्स को अपना पैसा लगाने के लिए किस तरह की कंपनी देखनी चाहिए. आपको भी किसी प्रोफेशनल की जरूरत तो नहीं है. वो आगे हमे डिटेल भी देते है कि इन्वेस्टर्स को अपना पैसा लगाने के लिए किस तरह की कंपनी देखनी चाहिए. कुछ लोग इन्वेस्टमेंट डिसीजन अकेले लेना पसंद करते है. वो खुद अपने स्टॉक्स पिक करते है, जो भी रिसर्च करनी हो खुद करते है और खुद ही इन्वेस्ट कर लेते है. लेकिन हर किसी के पास एक जैसा एक्सपीरिएंस और समझने की या जज करने की एबिलिटी नहीं होती. तो ऐसे में हमे एक प्रोफेशनल की जरूरत पडती है, जो हमे बता सके कि कहाँ और कब इन्वेस्ट करना है. तो आपको ये कैसे पता चलेगा कि आपको एक प्रोफेशनल की जरूरत है ? तो हम बताते है. आपको ये चार चीज़े देखनी है- बड़े नुक्सान, बिगड़ा हुआ बजट, unorganized पोर्टफोलियो, और बड़े-बड़े बदलाव. अगर आप उनमे से है जो ख़ुद इन्वेस्ट करना पसंद करते है और फिर हमेशा नुक्सान झेलते है तो आपको प्रोफेशनल लोगों की सख्त जरूरत है. अगर आपको फाईनेंशियल मैटर में काफी दिक्कत आ रही है, या आपके खर्चों का बजट फेल हो जाता है, तो भी आपको प्रोफेशनल की हेल्प लेनी चाहिए. एक unorganized पोर्टफोलियो एक और निशानी है. अगर आपके पोर्टफोलियो में कई तरह के स्टॉक्स है जैसे कि आपने सिर्फ ये सोचकर 39 अलग तरह के इंटरनेट स्टॉक्स ले रखे है कि टेक्नोलोजी आपको प्रॉफिटेबल लगती है, तो भी आपको एक प्रोफेशनल गाईड की जरूरत है. लास्ट में अगर आप अपनी लाइफ में किसी मेजर चेंज से गुजर रहे है जैसे रिटायरमेंट १ गाईड की जरूरत है. लास्ट में अगर आप अपनी लाइफ में किसी मेजर चेंज से गुजर रहे है जैसे रिटायरमेंट प्लान सेट करना या बच्चों को कॉलेज भेजना, तो भी आपको प्रोफेशनल की हेल्प लेनी चाहिए. किसी ऐसे प्रोफेशनल को ढूंढो जिस पर आप आँख मूंदकर भरोसा कर सको. जब आपको उन पर पूरा भरोसा होगा तभी आप अपना पैसा उनके हाथ में दे पाएँगे. एक बार अगर कोई ऐसा आपको मिल जाये तो ये भी पता कर लेना वो अपने काम में कैसे है? आप उनके साथियों से आप उनके बारे में पूछताछ कर सकते हो. आपको ये भी पता करना चाहिए कि जिस इन्सान पर आप भरोसा कर रहे हो, क्या वो इतने एक्सपर्ट है कि आपकी हेल्प कर सके और ये भी देखना कि वो वाकई में आपके काम आ सकते है या नहीं. उनसे अच्छी तरह से सवाल-जवाब करने के बाद ही आप उन्हें बेहतर जान पाएँगे. लेकिन आप ये कैसे डिसाइड करोगे कि स्टॉक में आपको कितना पैसा लगाना चाहिए? तो आपको यहाँ कंपनी के लॉन्ग टर्म की possibility को देखना चाहिए. कम पांच सालो की रिपोर्ट चेक करो और पता लगाओ कि कंपनी आगे चलेगी भी या नहीं. दूसरी चीज़, आपको ये भी पता होना चाहिए कि कंपनी कैसे मैनेज होती है. मैनेजर्स को इकॉनमी को दोष देने के बजाये अपनी गलतियाँ और फेलियर को स्वीकार करना चाहिए. साथ ही आपको कंपनी की फाईनेंशियल ताकत यानि वो कितनी फाईनेंशीयली स्ट्रोंग है, ये पता होना चाहिए. इसका मतलब ये है कि आपको ये चीज़ पक्का करना ‘कम वो अपने काम में कैसे है? आप उनके साथियों से आप उनके बारे में पूछताछ कर सकते हो. आपको ये भी पता करना चाहिए कि जिस इन्सान पर आप भरोसा कर रहे हो, क्या वो इतने एक्सपर्ट है कि आपकी हेल्प कर सके और ये भी देखना कि वो वाकई में आपके काम आ सकते है या नहीं. उनसे अच्छी तरह से सवाल-जवाब करने के बाद ही आप उन्हें बेहतर जान पाएँगे. लेकिन आप ये कैसे डिसाइड करोगे कि स्टॉक में आपको कितना पैसा लगाना चाहिए? तो आपको यहाँ कंपनी के लॉन्ग टर्म की possibility को देखना चाहिए. कम से कम पांच सालो की रिपोर्ट चेक करो और पता लगाओ कि कंपनी आगे चलेगी भी या नहीं. दूसरी चीज़, आपको ये भी पता होना चाहिए कि कंपनी कैसे मैनेज होती है. मैनेजर्स को इकॉनमी को दोष देने के बजाये अपनी गलतियाँ और फेलियर को स्वीकार करना चाहिए. साथ ही आपको कंपनी की फाईनेंशियल ताकत यानि वो कितनी फाईनेंशीयली स्ट्रोंग है, ये पता होना चाहिए. इसका मतलब ये है कि आपको ये चीज़ पक्का करना है कि कंपनी जितना use करती है, उससे ज्यादा कैश प्रोड्यूस करे. कंपनी ऐसी पोजीशन में कभी ना रहे कि जहाँ इस पर बड़ी-बड़ी लाएबिलिटी और देनदारी हो और ये अपने खर्चे भी ना उठा सके क्योंकि आपको एक ऐसी कंपनी चाहिए जो प्रोफिट पर चलती हो! The Intelligent Investor. BENJAMIN GRAHAM Things to Consider About Per-Share Earnings ग्राहम शोर्ट टर्म अर्निंग्स की बात करते है और बताते है कि ये कैसे हमारे लिए बेहद धोखेबाज़ साबित हो सकते है. वो आगे ऐसी चार कंपनी का एक्जाम्पल भी देते है जो हमे ये समझने में हेल्प करेगी कि शोर्ट टर्म रिपोर्ट क्या कर सकती है. यहाँ आपके लिए ऐसी दो सलाह है जो आपको कभी नहीं भूलनी चाहिए. 1. एक सिंगल ईयर की अर्निंग को ज्यादा सीरियसली मत लो. 2. अगर आप शोर्ट टर्म अर्निंग्स पर ध्यान देते हो तो पहले ये देख लो कि कहीं कोई जाल या छुपा हुआ रिस्क ना हो. इसका मतलब ये है कि कई सारी कंपनी इन्वेस्टर्स को धोखे में रखने के लिए अपनी फाईनेंशीयल रिपोर्ट के साथ छेड़छाड़ करती है. तो इस बात का पता लगाने के दो तरीके है: 1. रीड बैकवार्ड्स यानि आप लास्ट पेज पहले पढो, फिर फ्रंट पेज पढो. हो सकता है कि कंपनी जो इन्वेस्टर्स से छुपाना चाहती है वो शायद आपको लास्ट पेज में मिल जाए. 2. रीड द नोट्स. debt और loan के बारे ज़्यादातर इन्फोर्मेशन फूटनोट्स में ही कहीं छुपी रहती है. अब चलिए उन चार स्टॉक्स को कम्पेयर कर लेते 2. रीड द नोट्स. debt और loan के बारे में ज़्यादातर इन्फोर्मेशन फूटनोट्स में ही कहीं छुपी रहती है. अब चलिए उन चार स्टॉक्स को कम्पेयर कर लेते है जिनमें मैंने 1999 के दशक में इन्वेस्ट किया था. ये कंपनी हैं – Emerson Electric Co., EMC Corp, Expeditors International of Washington, Inc 3R Exodus Communications, Inc. इनमे से सबसे महेंगे स्टॉक्स थे Emerson Electric के जो बाद में सबसे सस्ते हो गए थे क्योंकि स्टॉक्स ने अंडर परफॉर्म किया था. लेकिन कंपनी का क्या? ये कंपनी बिलियन डॉलर का सामान बेचती थी और टाइम के साथ इसकी अर्निंग भी काफी बढ़िया तरीके से बढ़ रही थी. EMC Corp के स्टॉक्स 1990 के दशक में बेस्ट performing स्टॉक्स हुआ करते थे जो करीब 81,000% तक बढ़े थे. हालाँकि उनका प्रॉफिट 1995 और 1999 के दौरान थोडा-बहुत नीचे आया था पर इसके बावजूद ये एक हाईली प्रॉफिटेबल स्टॉक रहा. Expeditors International साल के अंत में अचानक ही ऊपर चढ़ा पर तब तक उतना अच्छा परफोर्म नहीं कर रहा था. हालाँकि इस बात में कोई शक नहीं है कि ये एक एक्स्ट्राऑर्डिनरी बिजनेस है और इन्वेस्टर्स के बीच उतना पोपुलर नहीं है. Exodus Communications ने भी अच्छी-खासी बढ़त दिखाई थी. एक साल के अंदर ही Exodus Communications ने भी अच्छी-खासी बढ़त दिखाई थी. एक साल के अंदर ही इसने 10,000 डॉलर की इन्वेस्टमेंट को 10,000 डॉलर में बदल दिया था! और 1999 के बाद क्या हुआ? ये सारी कंपनी या तो दिवालिया हो चुकी थी या 1999 में इनके प्राइस काफी डाउन आ चुके थे. अब ये एक्स्पेक्ट करने का कोई कारण नहीं है कि जो कंपनी शोर्ट टर्म में अच्छा परफोर्म कर चुकी है, वो अब आगे भी हमेशा करती रहेंगी. आपको पहले कई सारी कंपनी की फाईनेंशियल रिपोर्ट देखनी चाहिए और ये चेक करना चाहिए कि कंपनी कितने सालों से कंसिस्टेंट रही है. कुल मिलाकर आपको रिपोर्ट में दी गई हर एक लाइन पर गहराई से सोच-विचार करना पड़ेगा. Stock Selection for the Defensive Investor अगर कोई इंवेस्टर रिस्क नहीं लेना चाहता तो ग्राहम एक्सप्लेन करते है कि ऐसे इन्वेस्टर्स को किस टाइप के स्टॉक्स लेने चाहिए. साथी ही वो ये भी बता रहे है कि कंपनीज़ को किस टाइप के मैनेजर्स रखने चाहिए. इसलिए स्टॉक सेलेक्शन ऐसी चीज़ है जो आपको करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. खैर इसके बावजूद कुछ इन्वेस्टर्स खुद रिसर्च करना पसंद करते है और लास्ट में अपनी चॉइस से ही स्टॉक्स पिक करते है. तो ऐसे लोगों के लिए जो खुद अपने स्टॉक्स पिक करना चाहेंगे, उन्हें किस टाइप की कंपनी अवॉयड करनी चाहिए? अगर आप रिस्क टेकर नहीं है तो ऐसी करना चाहेंगे, उन्हें किस टाइप की कंपनी अवॉयड करनी चाहिए? अगर आप रिस्क टेकर नहीं है तो ऐसी कंपनी एकदम अवॉयड करो जिनकी वर्थ $2 बिलियन से कम होती है. कंपनी की फाईनेंशीयल कंडिशन स्ट्रोंग होनी चाहिए और करंट अर्निंग उनकी लाएबीलीटी से डबल होनी चाहिए और ना सिर्फ अर्निंग अच्छी होनी चाहिए बल्कि कंसिस्टेंसी भी रहनी चाहिए और कंपनी को अपनी अर्निंग कम से कम तो वन थर्ड इनक्रीज करनी ही चाहिए. एक इंवेस्टर के तौर पर आपको p/ e ratio या price/earning ratio चेक करने चाहिए. ये एक इंडेक्स है जो करंट प्राइस और अर्निंग के बीच का फर्क दिखता है. तो ये फर्क मोडेरेट होना ही चाहिए . price/book ratio भी मोडरेट होना चाहिए. ये price/earning ratio की तरह ही है लेकिन साथ ही इसमें लाएबिलिटी और debt भी आते है और ये 1.5 से ज्यादा नहीं होना चाहिए. स्टॉक पिक करना एक स्किल है जो हर किसी को नहीं आती, ये स्किल सीखनी पडती है, जैसे म्यूजिशियन कॉन्सर्ट से पहले प्रेक्टिस करते है या एथलीट competition से पहले खुद को तैयार करता है, ऐसे ही स्टॉक पीकिंग में भी प्रेक्टिस की जरूरत पड़ती है. आप चाहे तो हाइपोथेटीकली शेयर्स और स्टॉक्स खरीदकर अपने रिटर्न ट्रैक कर सकते हो और फिर उसके बाद ही डिसाइड करो कि आप रियल में इन्वेस्ट करने के लिए रेडी हो या नहीं . ऐसी कई वेबसाइट अवलेबल है जिन पर जाकर आप rewarding स्टॉक्स का पता लगा चाहिए. ये price/earning ratio की तरह ही है लेकिन साथ ही इसमें लाएबिलिटी और debt भी आते है और ये 1.5 से ज्यादा नहीं होना चाहिए. स्टॉक पिक करना एक स्किल है जो हर किसी को नहीं आती, ये स्किल सीखनी पडती है, जैसे म्यूजिशियन कॉन्सर्ट से पहले प्रेक्टिस करते है या एथलीट competition से पहले खुद को तैयार करता है, ऐसे ही स्टॉक पीकिंग में भी प्रेक्टिस की जरूरत पड़ती है. आप चाहे तो हाइपोथेटीकली शेयर्स और स्टॉक्स खरीदकर अपने रिटर्न ट्रैक कर सकते हो और फिर उसके बाद ही डिसाइड करो कि आप रियल में इन्वेस्ट करने के लिए रेडी हो या नहीं. ऐसी कई वेबसाइट अवलेबल है जिन पर जाकर आप rewarding स्टॉक्स का पता लगा सकते हो. एक और बात का खयाल रखो कि बिजनेस कौन चला रहा है. ये लोग ऐसे होने चाहिए जो मैनेजर की तरह बल्कि कंपनी के ओनर की तरह सोचते हों. इसका पता लगाने के लिए आपको ये पता करना होगा कि कंपनी की रिपोर्ट समझ में आती है या नहीं आती. अगर आती है तो मतलब कंपनी का ओनर एक अच्छा बॉस है. दूसरी चीज़, ये देखो कि कहीं कुछ ऐसा तो नहीं है जो अजीब लगे और जो बार-बार हो रहा हो, तो ये समझ जाना कि ये कंपनी इन्वेस्टमेंट के लिए ठीक नहीं है. The Intelligent Investor. BENJAMIN GRAHAM Convertible Issues and Warrants बेंजमिन ग्राहम Convertible bond के बारे में बताते हुए कहते है कि कैसे इनमे हमे bond और कॉमन स्टॉक्स दोनों के फायदे मिलते है. साथ ही एक इंवेस्टर को इन्वेस्टिंग से पहले 4 तरह की कंपनीज़ के बारे में जानना चाहिए. Convertible bond एक तरह का bond है जो कुछ कॉमन स्टॉक्स और इक्विटी शेयर्स में कन्वर्ट की जा सकती है. आप चाहो तो bond अपने पास रखकर उसका इंटरेस्ट लेते रहो या फिर उसे किसी कॉमन स्टॉक के बदले एक्सचेंज कर दो. लेकिन क्योंकि इसी वजह से इसमें इंटरेस्ट रेट भी कम होता है. लेकिन अगर इसे स्टॉक में बदला जाए तो रिटर्न कॉमन स्टॉक से कहीं बैटर मिलते है. ये एक तरह से आम के आम गुठलीयों के दाम वाली बात है क्योंकि इसमें रिस्क ना के बराबर है और प्रॉफिट भी अच्छा मिलता है! तो बात अगर कंपनियों की करें तो चार तरह की कंपनी होती है जिस पर आपको ध्यान देना है- 1. एक ओवर प्राइस्ड कंपनी 2. कुछ कंपनीज़ का एक एम्पायर 3. एक छोटी फर्म जो बड़ी फर्म को टेक ओवर करती हो 4. किसी बेकार कंपनी की इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग 1. एक ओवर प्राइस्ड कंपनी 2. कुछ कंपनीज़ का एक एम्पायर 3. एक छोटी फर्म जो बड़ी फर्म को टेक ओवर करती हो 4. किसी बेकार कंपनी की इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग Lucent Technology भी एक ऐसी ही कंपनी थी. इसकी वर्थ थी $792.9 बिलियन और ये वर्ल्ड की 12 वे नंबर की मोस्ट वैल्यूएबल कंपनी मानी जाती थी. पर अगर आप रिपोर्ट्स थोडा ध्यान से देखे तो पायेंगे कि Lucent ने एक सप्लायर “Chromatis Networks” को $4.8 बिलियन में खरीद लिया था. कंपनी कोई रेवेन्यू जेनरेट नहीं कर रही थी और उनके पास मुश्किल से 150 एम्प्लोईज थे. ऊपर से कंपनी ने $1.5 billion का लोन दे रखा था. 2007 में कंपनी ने Chromatis डिविजन बंद कर दिया था. एक और ऐसी ही कंपनी है टाइको इंटरनेशनल लिमिटेड, जिसकी वैल्यू 2001 में $114 बिलियन थी, पर इसके बावजूद कंपनी ने $750 मर्जर या रीस्ट्रक्चरिंग के लिए खर्च कर डाले थे. तो एक इंटेलीजेंट इंवेस्टर होने के नाते आपको ये सारे सवाल पूछने चाहिए और फाइनेंसियल रिपोर्ट देखने चाहिए. जो भी फाईनेंशीयल रिपोर्ट चेक करे उसे इस तरह के रिस्की बिजनेस में पैसा कभी नहीं लगाना चाहिए. जैसा कि एक्स्पेक्टेड था, 2002 में टाइको को $9.4 बिलियन का नुक्सान उठाना पड़ा. एक इंटेलिजेंट इंवेस्टर होने के नाते, आपसे उम्मीद की जाती है रिस्की बिजनेस में पैसा कभी नहीं लगाना चाहिए. जैसा कि एक्स्पेक्टेड था, 2002 में टाइको को $9.4 बिलियन का नुक्सान उठाना पड़ा. एक इंटेलिजेंट इंवेस्टर होने के नाते, आपसे उम्मीद की जाती है कि आपको ये पता होना चाहिए कि कंपनी कब ओवरप्राइस्ड है. बेशक ऊपर से कंपनी फलती-फूलती लगे पर थोड़ी-बहुत रिसर्च करोगे तो आपको खुद ही कमियों का पता चल जाएगा. A Comparison of Eight Pairs of Companies ग्राहम कुछ कंपनीज़ का एक्जाम्पल लेते हुए डिसक्राइब करने की कोशिश करते है कि शोर्ट टर्म रिपोर्ट अक्सर इन्वेस्टर्स को धोखे में डालती है. साथ ही वो उस ज़िम्मेदारी पर भी फोकस करते है जो कंपनी की अपने शेयरहोल्डर्स के प्रति होनी चाहिए. वो डिटेल से बताते है कि क्यों किसी कंपनी का शेयर होल्डर होने के नाते ये इम्पोर्टेट है कि कंपनी आपके साथ ऑनेस्टी का बर्ताव करे. ग्राहम यहाँ अपनी बात रिस्क का टॉपिक लेते हुए खत्म करते है कि रिस्क इन्वेस्टर्स के साथ जुड़े है नाकि स्टॉक्स के साथ. एक बात याद रखना, अच्छी स्टॉक जैसी कोई चीज़ नहीं होती. सिर्फ अच्छे स्टॉक प्राइस होते है जो आते-जाते रहते है. यहाँ हम कुछ कंपनीज़ का जिक्र कर रहे है जिनके बारे में पढना जरूरी है ताकि आप ये समझ पाएं: Cisco and Sysco! 2000 में Cisco दुनिया की मोस्ट वैल्यूएबल कॉरिशन बन गई शी कंपनी अपना डेटा इन्टरनेट पर कुछ कंपनीज़ का जिक्र कर रहे है जिनके बारे में पढना जरूरी है ताकि आप ये समझ पाएं: Cisco and Sysco! 2000 में Cisco दुनिया की मोस्ट वैल्यूएबल कॉर्पोरेशन बन गई थी. कंपनी अपना डेटा इन्टरनेट पर मैनेज करती थी. अपनी मेजर सक्सेस के कोई दस साल बाद जाकर ये कंपनी पब्लिक हुई थी. वही दूसरी तरफ एक और कंपनी है Sysco कॉर्प. ये किचन को फूड सप्लाई करती है. अगर आप किसी भी आम आदमी से इन दोनों कंपनियों के बारे में पूछोगे तो वो सिस्को में इन्वेस्ट करने को बोलेगा. हमारे माइंड में जो मेंटल इमेज बनी है उसके हिसाब से ही हम बगैर छानबीन किये डिसीजन ले लेते है. लेकिन अगर आप गहराई से जांच-पड़ताल करो तो जानते हो क्या पता चलेगा? Cisco की ग्रोथ एक्वीजीश्न की वजह से हुई है, वही Sysco ने भी इसी दौरान कुछ कंपनीज़ को अपने अंडर लिया था हालाँकि उन्होंने काफी कम अमाउंट पे किया था. चलो एक और एक्जाम्पल लेते है. याहू और यम! 1999 में याहू! लॉन्च होते ही एक महीने के अंदर-अंदर डबल हो गई थी. इसके 90% स्टॉक एम्प्लोईज़ के पास थे और हजारो लोग तब याहू के शेयर खरीदना चाहते थे. वही दूसरी तरफ यम! ने याहू का 17 गुना ज्यादा कमाया इसके बावजूद इसकी वैल्यू बेहद कम बढ़ी. तो शोर्ट टर्म कांटेस्ट याहू ने जीता जिनकी अर्निंग एक ही महीने में बेतहशा बढती गई. आखिर लास्ट में अर्निंग ही O V जो मेंटल इमेज बनी है उसके हिसाब से ही हम बगैर छानबीन किये डिसीजन ले लेते है. लेकिन अगर आप गहराई से जांच-पड़ताल करो तो जानते हो क्या पता चलेगा? Cisco की ग्रोथ एक्वीजीश्न की वजह से हुई है, वही Sysco ने भी इसी दौरान कुछ कंपनीज़ को अपने अंडर लिया था हालाँकि उन्होंने काफी कम अमाउंट पे किया था. चलो एक और एक्जाम्पल लेते है. याहू और यम! 1999 में याहू! लॉन्च होते ही एक महीने के अंदर-अंदर डबल हो गई थी. इसके 90% स्टॉक एम्प्लोईज़ के पास थे और हजारो लोग तब याहू के शेयर खरीदना चाहते थे. वही दूसरी तरफ यम! ने याहू का 17 गुना ज्यादा कमाया इसके बावजूद इसकी वैल्यू बेहद कम बढ़ी. तो शोर्ट टर्म कांटेस्ट याहू ने जीता जिनकी अर्निंग एक ही महीने में बेतहशा बढती गई. आखिर लास्ट में अर्निंग ही मैटर करती है क्योंकि याहू की अर्निंग यम से कहीं आगे थी! CMG| और CGI. 2000 में CMCI को 1126 का गेन हुआ था! वही दूसरी तरफ CG| एक कोल्ड स्टॉक थी. इसकी नेट वर्थ इनकम नीचे गिरती जा रही थी कि अचानक चीज़े एकदम से रिवर्स गियर में चलने लगी जब इसके स्टॉक में 43% की बढ़ोत्तरी हुई. The Intelligent Investor. BENJAMIN GRAHAM Red Hat and Brown Shoe. रेड हैट लिनक्स सॉफ्टवेयर का एक डेवलपर था जिसने शुरुवात में 7 डॉलर per शेयर ऑफर किया और बाद में इसे 272% का प्रॉफिट हुआ. वहीं अगर ब्राउन शू की बात करे तो ये एक wholesale शू मेन्यूफेक्चरर था जिसके स्टॉक्स काफी नीचे चल रहे थे. लेकिन ऐसा क्यों था? रेड हैट, का नाम तो काफी कूल था ही साथ ही इसके पास इन्टरनेट और सॉफ्टवेयर जैसी पॉवर भी थी. हालाँकि इनकी वैल्यू आगे और नहीं बढ़ी. इन सारे एक्जाम्पल्स से आपको जो चीज़ समझ में आई वो ये कि किसी भी कंपनी का स्टेट्स हमेशा एक जैसा नहीं रहता. कुछ कंपनीज़ एक या दो महीने के टाइम में बढिया परफोर्म करती है या साल में भी पर लॉन्ग रन में फेल हो जाती है. जबकि कुछ कंपनीज़ जो हमे लगता है कि अच्छा कर रही है, कई बार ओवरवैल्यूएड होती है. तो पहले ये साड़ी कमियाँ चेक करे उसके बाद ही इन्वेस्ट करे. एक इंवेस्टर के तौर पर आपको ये ध्यान रखना है कि शेयर खरीदते वक्त आप भी कंपनी के ओनर बन जाते हो. फिर उस कंपनी का बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स हो जाते हो. फिर उस कंपनी का बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स हो या फिर सीईओ, हर कोई आपके प्रति जवाबदेह होता है. अगर आपको कंपनी के मैनेजमेंट का तरीका पसंद नहीं है तो आपका हक है कि आप मैनेजर से जवाब सवाल करो या फिर आप प्रॉपर्टी को बेचने की डिमांड भी कर सकते हो. आज की डेट में इन्वेस्टर्स स्टॉक्स खरीदने में सारा टाइम लगा देते है, बेचने में उससे भी कम और स्टॉक्स को होल्ड करने में तो जरा भी यकीन नहीं करते. कुछ इन्वेस्टर्स कंपनी को पूरी आज़ादी देते है कि वो अपने एक्जीक्यूटिव को ज़्यादा पे करे. एप्पल के फाउंडर स्टीव जॉब्स 1997 में वापस कंपनी के चीफ एक्जीक्यूटिव बनके लौटे थे. चूंकि वो पहले से अमीर थे तो उन्होंने कहा कि वो साल में सिर्फ एक डॉलर सैलरी के तौर पर लेंगे. अब क्योंकि उन्होंने कोई सैलरी नहीं ली तो बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स ने उन्हें $90 मिलियन का जेट गिफ्ट कर दिया था. पर क्या किसी कंपनी को इस तरह की आज़ादी लेनी चाहिए कि वो इस तरह के खर्चे करे? जरा सोचिये. एक ओनर होने के नाते, आपके पास ये ऑथोरिटी है कि आप उन लोगों से जवाब मांगे जो आपके नीचे काम करते है. ऐसे हर डिसीजन पर आपको सवाल उठाने का हक है जो डिसीजन पर आपको सवाल उठाने का हक है जो आपको लगता है कि कंपनी के फेवर में नहीं है. जिस कंपनी में आपने इन्वेस्ट किया है, वो कंपनी हमेशा तरक्की करे और आगे बढ़े, यही आपका गोल होना चाहिए! अब आते है रिस्क पर, रिस्क के कई डेफिनेशन हो सकते है, और वो डेफिनेशन क्या है, ये काफी हद तक टाइम पर भी डिपेंड करता है. जैसे कि 1999 में रिस्क का मतलब पैसे का नुक्सान नहीं था, बल्कि इसका मतलब था औरो से कम पैसे कमाना. फिर 2003 आते-आते ये डेफिनेशन चेंज हो गई. अब इसका मतलब है आपके पास जो थोड़े बहुत पैसे बचे थे, स्टॉक मार्केट में उसका नुक्सान होना. तो देखा आपने! मार्केट बदला तो मीनिंग भी चेंज हो गई. लेकिन रिस्क से जुड़े फैक्टर वही सेम है. बेशक, आप इन्वेस्टिंग में नुक्सान को पूरी तरह अवॉयड नहीं कर सकते. थोडा-बहुत पैसे का loss तो आपको झेलना पड़ेगा, लेकिन इम्पोर्टेट ये है कि कहीं आप अपना सारा पैसा ना हार जाओ. एक इंटेलीजेंट इंवेस्टर ये समझता है कि रिस्क स्टॉक्स में नहीं बल्कि हमारे अंदर है. रिस्क इस बात में है कि आप इन्वेस्टमेंट बिजनेस में एंटर करने के लिए कितने तैयार हो. आपको ये पता होना चाहिए कि क्या आप इन्वेस्टमेंट के बारे में उतनी नॉलेज रखते हो |कतन तयार हा, आपका य पता होना चाहिए। क्या आप इन्वेस्टमेंट के बारे में उतनी नॉलेज रखते हो जितना आपको लगता है. दूसरी चीज़, अगर आपकी एनालिसिस गलत साबित हुई तो आप क्या करोगे? इन्वेस्टिंग से पहले आपको अपने करेक्ट होने के चांस पर गौर करना चाहिए और ये भी ध्यान रखना चाहिए कि अगर कहीं आपका आईडिया गलत हुआ तो फिर आप क्या करोगे? ये सारे सवाल स्टॉक्स में शामिल रिस्क से कहीं ज्यादा अच्छे रिस्क जानने के पैरामीटर हैं. रिस्क पर नज़र बनाये रखने का एक अच्छा तरीका है कि हम” मार्जिन ऑफ़ सेफ्टी” का कांसेप्ट यूज़ करे.”. ये एक कुशन की तरह है जो आपको किसी भी भारी नुक्सान से बचाकर रखेगा. वैसे loss आपको फिर भी होगा पर नेट इफेक्टिव नेगेटिव नहीं होगी. पर आप ये करेंगे कैसे? आपको बस इतना करना है कि जो भी खरीदना है, उस वक्त खरीदो जब उसके प्राइस इंट्रीसिंक प्राइस से कम हो. आप ये बार अपने हिसाब से सेट कर सकते हो, लेकिन ये ध्यान रहे कि प्राइस कभी भी उस स्टॉक या bond की true वैल्यू के ज्यादा क्लोज़ ना हो, जिस पर आप इन्वेस्ट करना चाहते हो. मान लो किसी चीज़ का रेट आज $7 है. तो काफी हद तक मुमकिन है कि कल इसका रेट 50 सेंट हो जाये या फिर $2 भी हो सकता है क्योंकि कल DA ८ किसी चीज़ का रेट आज $7 है. तो काफी हद तक मुमकिन है कि कल इसका रेट 50 सेंट हो जाये या फिर $2 भी हो सकता है क्योंकि कल क्या होगा, कोई नहीं जानता. लेकिन अगर मुझे आज ये पता है कि intrinsic वैल्यू $7.5 या ज्यादा है तो उस स्टॉक को खरीदना मेरे लिए सेफ रहेगा. हालाँकि मुझे नुक्सान हो भी सकता है और नहीं भी, पर नुक्सान होने के चांस जरूर कम हो जायेंगे. तो इस तरह की एनालिसिस हमारे फाइनेंसियल करियर में काफी बड़ा फ़र्क ला सकती है. तो इस तरह की सिंपल स्ट्रेटेज़ी और टैक्टिस आपको एक स्मार्ट इंवेस्टर बनने में काफी हेल्प करती है. Conclusion तो आपने इस समरी में फाईनेंस मार्केट के बारे में पढ़ा और हमे यकीन है कि अब आप इन्वेस्टमेंट की दुनिया में कदम रखने के लिए पूरी तरह से तैयार होंगे! इस समरी ने आपको लॉन्ग टर्म और शोर्ट टर्म स्ट्रेटेज़ी के बारे में सिखाया ताकि आप एकदम रिस्क फ्री इन्वेस्टमेंट कर सके और ज्यादा से ज्यादा प्रॉफिट कमा सके. आपने इसमें करीब एक दर्जन से भी ज्यादा कंपनीज़ की कहानियां जानी और समझीं कि स्टॉक मार्केट रियल लाइफ में कैसे काम करता है. आपने कई इम्पोर्टेट De hond its convertible नुक्सान होने के चांस जरूर कम हो जायेंगे. तो इस तरह की एनालिसिस हमारे फाइनेंसियल करियर में काफी बड़ा फ़र्क ला सकती है. तो इस तरह की सिंपल स्ट्रेटेज़ी और टैक्टिस आपको एक स्मार्ट इंवेस्टर बनने में काफी हेल्प करती है. Conclusion तो आपने इस समरी में फाईनेंस मार्केट के बारे में पढ़ा और हमे यकीन है कि अब आप इन्वेस्टमेंट की दुनिया में कदम रखने के लिए पूरी तरह से तैयार होंगे! इस समरी ने आपको लॉन्ग टर्म और शोर्ट टर्म स्ट्रेटेजी के बारे में सिखाया ताकि आप एकदम रिस्क फ्री इन्वेस्टमेंट कर सके और ज्यादा से ज्यादा प्रॉफिट कमा सके. आपने इसमें करीब एक दर्जन से भी ज्यादा कंपनीज़ की कहानियां जानी और समझीं कि स्टॉक मार्केट रियल लाइफ में कैसे काम करता है. आपने कई इम्पोर्टेट इन्वेस्टमेंट जैसे bond और convertible bond के बारे में भी जाना. अब जबकि आपने ये बातें जान ली है तो हमे उम्मीद है कि आप किसी भी wall स्ट्रीट इंवेस्टर को कॉम्पटीशन दे सकते हो और फाईनेंशियल वर्ल्ड में अपना नाम कमा सकते हो.

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