THE INNOVATORS DILEMMA CLAYTON CHRISTENSEN Books Hindi Summary

THE INNOVATORS
DILEMMA CLAYTON CHRISTENSEN
इंट्रोडक्शन

टेक्नोलॉजी के बारे में तो हम सब ने सुना है लेकिन ये disruptive टेक्नोलॉजी क्या होती है? क्यों कुछ
कंपनियां disruptive टेक्नोलॉजी के सामने फेल हो जाती हैं तो वहीं कुछ कंपनियां बराबरी की टक्कर
देकर इस दौड़ में बनी रहती हैं? मार्केट में आने वाली नई नई disruptive टेक्नोलॉजी के बीच कंपनियां
इस बात का कैसे ध्यान रख सकती हैं कि वो भी competitive बनी रहे? वैसे इसका जवाब सिंपल नहीं है लेकिन कई कंपनियां जैसे |BM और हौंडा इसमें सक्सेसफुल रही हैं. तो इसके पीछे राज़ क्या है? ये सब स्ट्रेटेजी, प्लानिंग और एक ऐसे मार्केट की पहचान करने की एबिलिटी है जो अभी तक सामने नहीं आई है. ये बदलाव और नई opportunity के लिए अपनी सोच को बड़ा करने और अपने माइंड को खोलने के बारे में है. इस बुक में आप सीखेंगे कि disruptive टेक्नोलॉजी क्या होती है और कई कंपनियां इसके कारण क्यों फेल हो जाती हैं. आप ये भी सीखेंगे कि किसी disruptive टेक्नोलॉजी के मार्केट में आ जाने से
आप अपनी कंपनी को कैसे बचा सकते हैं. तो क्या आप अपनी कंपनी के लिए बेस्ट सर्वाइवल स्किल्स सीखने के लिए तैयार हैं? तो चलिए बिना देर किए शुरू करते हैं.

पहले समझते हैं कि टेक्नोलॉजी में दो तरह के इनोवेशन होते हैं – sustaining और disruprive. Sustaining का मतलब जहां कंपनी अपने मौजूदा प्रोडक्ट को फ़ीडबैक के बेसिस पर इम्प्रूव कर मार्केट की करंट डिमांड को पूरा करती है. इसका मार्केट पर ज़्यादा इम्पैक्ट नहीं होता है. इनका फोकस शोर्ट टर्म के लिए होता है. वहीं disruptive इनोवेशन मार्केट को बड़े रूप में इम्पैक्ट करते हैं. वो ऐसे प्रोडक्ट या सर्विस बनाते हैं जो एक पूरा नया मार्केट क्रिएट कर देता है. ये अलग वैल्यू और सर्विस ऑफर करते हैं जो पहले किसी ने ऑफर किया ही नहीं. ये मार्केट के फ्यूचर ज़रूरतों पर फोकस करता है यानी लॉन्ग टर्म पर. आमतौर पर इसकी शुरुआत में लो परफॉरमेंस और लो क्वालिटी प्रोडक्ट देखने को मिलते हैं लेकिन जब इसका मार्केट बढ़ने लगता है तो ये कंपनियां अपने प्रोडक्ट को इम्प्रूव करने लगती हैं.

HOW CAN GREAT FIRMS FAIL?
INSIGHTS FROM THE HARD DISK
DRIVE INDUSTRY

डिस्क ड्राइव का main काम होता है डिस्क पर डेटा को लिखना और रीड करना. इस इंडस्ट्री में कदम रखने
वाली पहली कंपनी IBM थी. पहली डिस्क ड्राइव को IBM में काम करने वाले researchers की एक टीम ने 1952 और 1956 के बीच बनाया था. जैसे-जैसे IBM डिमांड को पूरा करने के लिए ड्राइव बनाता जा रहा था, वैसे ही एक और कंपनी ने मार्केट में कदम रखा. 1960 में कुछ फर्म Plug Compatible Market (PCM) कांसेप्ट लेकर आए. इन कंपनियों ने IBM डिस्क ड्राइव का बेटर version IBM के क्लाइंट्स को कम दाम पर बेचना शुरू कर दिया.

1970 के आस पास, कई छोटी कंपनियों ने मार्केट में enter किया और डिस्क ड्राइव बनाने लगे, 1976 तक डिस्क ड्राइव इंडस्ट्री की वैल्यू 1 बिलियन डॉलर हो गई थी. यहाँ से ज़बरदस्त competition, तेज़ी से ग्रोथ और टेक्नोलॉजी में इम्प्रूवमेंट की शुरुआत हुई. 1980 तक PCM पुरानी और बेकार हो गई थी और अब कई कंपनियों ने Original Equipment Market (OEM) को बनाना शुरू किया. 1976 में, IBM को छोड़कर 17 बड़ी कंपनी को या तो किसी दूसरी कंपनी के ख़रीद लिया था या वो फेल हो गए थे. 1995 तक, 129 नई कंपनियों ने इस इंडस्ट्री में कदम रखा जिसमें से 109 फेल हो चुके थे. लेकिन ये सब हुआ क्यों? disruptive टेक्नोलॉजी के आने के कारण ये कंपनियां फेल हो गई थीं. IBM लगातार इनोवेशन करता रहा इसलिए वो अब भी मार्केट में टिका हुआ था और सक्सेसफुल भी था. डिस्क ड्राइव का साइज़ disruptive टेक्नोलॉजी
का एक एग्ज़ाम्पल है. शुरुआत में डिस्क ड्राइव का diameter 14 इंच था. उसके बाद 8 इंच हआ और अंत में उसका साइज़ 1.8 इंच हो गया. 8 इंच की ड्राइव मिनीकंप्यूटर के लिए परफेक्ट थी लेकिन 5.25 इंच की ड्राइव उनके लिए काम की नहीं थी इसके बजाय वो पर्सनल कंप्यूटर के लिए ज़्यादा परफेक्ट थी.

1980 और 1982 के बीच, मार्केट में पर्सनल डेस्कटॉप computer आने लगे. कई लोग और कंपनियां इन
छोटे और हल्के डेस्कटॉप कंप्यूटर को लेने में दिलचस्पी दिखाने लगे. इसके कारण, 5.25 इंच ड्राइव की
डिमांड बढ़ गई क्योंकि वो इन computers के लिए बिलकुल अच्छे से काम कर रहे थे. इसलिए, 8 इंच
डिस्क ड्राइव की सेल गिरने लगी और जो कंपनियां पूरी तरह इस पर डिपेंड करती थी वो एक एक कर मार्केट से बाहर होने लगे. ऐसा नहीं है कि disruptive टेक्नोलॉजी ने सिर्फ़ नुक्सान ही किया है, इसने कई कंपनियों को जन्म भी दिया है. इसका एक एग्ज़ाम्पल है शुगार्ट एसोसिएट्स (ShugartAssociates). उन्होंने 1978 और 1980 के बीच इंडस्ट्री में कदम रखा था. वो 40 MB की कैपेसिटी के साथ 8 इंच की डिस्क
ड्राइव बनाने में माहिर थे. इन ड्राइव्स को मेनफ्रेम manufacturers को नहीं बेचा जा सकता था.
इसलिए शुगार्ट ने इसे मिनी कंप्यूटर बनाने वालों को बेचना शुरू किया. उनके कस्टमर, जिनमें DEC और
HP शामिल हैं, शुरू में 14 इंच की ड्राइव इस्तेमाल कर रहे थे जब शगार्ड ने उन्हें 8 इंच की डाइव ऑफर की तो DEC और HP ने इसे अपने सिस्टम में शामिल कर लिया क्योंकि ये साइज़ में छोटे और ज़्यादा बेहतर थे. इस तरह, 8 इंच की ड्राइव मिनी कंप्यूटर manufacturers के बीच popular हुई.

1985 के बीच तक, 8 इंच की ड्राइव बनाने वाली कंपनियों ने मेनफ्रेम की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए
इसकी स्टोरेज कैपेसिटी को बढ़ाना शुरू कर दिया. इसके अलावा, 8 इंच की ड्राइव इसलिए भी बेहतर थी
क्योंकि 14 इंच की ड्राइव की तुलना में इससे निकलने वाली वाइब्रेशन कम थी. चार पांच सालों के अंदर ऐसा लगने लगा जैसे 8 इंच की ड्राइव ने मार्केट में धावा बोल दिया था और 14 इंच की ड्राइव को मार्केट से निकाल दिया था. 8 इंच ड्राइव की डिमांड इसलिए बढ़ी क्योंकि इसने कैपेसिटी और प्राइस दोनों जगह बेहतर परफॉर्म किया था. दूसरी ओर, 14 इंच बनाने वाले फेल इसलिए हुए क्योंकि उन्होंने उस समय 8 इंच की ड्राइव बनाने के बारे में बिलकुल सोचा ही नहीं. किसी भी कंपनी को ये पता होना चाहिए कि नए प्रोडक्ट मार्केट में आकर कभी भी डिमांड को पलट सकते हैं जिनके सामने उनकी टेक्नोलॉजी पुरानी और बेकार लगने लगेगी. कुछ कंपनियां अपने करंट प्रोडक्ट की सक्सेस के कारण इसे देखने में फेल हो जाती हैं. उन्होंने disruptive टेक्नोलॉजी के पोटेंशियल को समझने में गलती की जिसके कारण वो मार्केट से बाहर हो गए.

THE INNOVATORS
DILEMMA
CLAYTON CHRISTENSEN
WHAT GOES UP CAN’T GO DOWN

कुछ कंपनियां ज़्यादा पैसे देने वाले क्लाइंट्स की खोज कर के ख़ुद को मार्केट में बनाए रखती हैं. लेकिन
किसी भी कंपनी को मार्केट में जमे रहने के लिए, जो भी प्रोडक्ट मार्केट में तेजी से आगे बढ़ रहा है उसका
मुक़ाबला करने के लिए तैयार रहना चाहिए. आप स्टील इंडस्ट्री में इस ट्रेंड को देख सकते हैं.
1960 के आस पास स्टील बनाने वाली कंपनी मिनिमिल्स (mini-mills) को अपने प्रोडक्ट मार्केट
में बेचने की परमिशन दे दी गई. मिनिमिल्स recyled metal यानी स्क्रेप को यूज करके उन्हें बार, रोड या
शीट की शेफ देती थी। ये बड़े इंटीग्रेटेड मिल्स से अलग होते हैं. इंटीग्रेटेड मिल्स बड़े मिल्स थे जो iron-ore
से नया स्टील बनाते हैं. इसका अलावा, मिनिमिल्स और इंटीग्रेटेड मिल्स का प्रोडक्शन स्केल बहुत अलग
होता है. नार्थ अमेरिका में दुनिया के सबसे efficient मिनिमिल्स हैं. 1990 में सबसे efficient इंटीग्रेटेड
मिल को 2.3 labor hours की ज़रुरत होती थी जबकि मिनीमिल को per टन के लिए 0.6 labor
hours की. एक अच्छे मिनिमिल को बनाने के लिए लगभग 400 मिलियन डॉलर की ज़रुरत पड़ती थी जबकि एक इंटीग्रेटेड मिल की कॉस्ट 600 मिलियन डॉलर थी.

इसलिए नार्थ अमेरिका में हर इंडस्ट्री स्टील को फ़िर से बनाने और उसे शेप देने के लिए मिनिमिल्स का
इस्तेमाल करती थी. लेकिन हैरानी की बात तो ये है कि इंटीग्रेटेड मिल्स ने कभी भी मिनिमिल्स में यूज़ की जाने वाली टेक्नोलॉजी को इस्तेमाल करने के बारे में नहीं सोचा. ऐसा करने में कितना बड़ा फ़ायदा था क्योंकि तब वो मार्केट से मिनिमिल्स को बाहर कर सकते थे. असल में इंटीग्रेटेड मिल्स के मैनेजर रिस्क लेने से डरते 27. Bethlehem Steel Corp BiR U.S steel corp जैसी कंपनियां बंद हो गई क्योंकि वो बराबरी की टक्कर ही नहीं दे पाए. दूसरी ओर, एक इंटीग्रेटेड मिल USX ने अपनी मशीनों की एफिशिएंसी को 9 से 3 labor घंटे per टन बढ़ा दिया था. इन सब के बावजूद भी हर कोई मिनिमिल्स के पास ही जा रहा था. तो आख़िर प्रॉब्लम थी क्या? इसका जवाब ये है कि मिनिमिल्स disruptive टेक्नोलॉजी बन गए थे. 1960 में इसकी शुरुआत के दौरान, मिनिमिल्स के पास अच्छी क्वालिटी के प्रोडक्ट्स बनाने का पोटेंशियल था. जब वो मार्केट में कदम रख रहे थे उस वक़्त इंटीग्रेटेड मिल्स ज़्यादा popular और भरोसेमंद हुआ करते थे. वो हर तरह का cast और रिशेप बना सकते थे. वो बस एक चीज़ नहीं कर रहे थे, rebar नहीं बनाते थे. इसलिए मिनिमिल्स के पास बस यही सेगमेंट था. Rebar को कंस्ट्रक्शन के लिए इस्तेमाल किया जाता था.

Rebar ऐसी चीज़ नहीं थी जिसे ज़्यादा लोग ख़रीदते थे और इसमें प्रॉफिट भी नहीं था. इंटीग्रेटेड मिल्स इसे
मिनिमिल्स के लिए छोड़ने के लिए तैयार थे. लेकिन मिनिमिल्स इससे निराश नहीं हुए और उन्होंने इस
बिज़नेस में खुद को जमाना शुरू कर दिया. उन्होंने हाई क्वालिटी और बड़े bars के प्रोडक्शन में इंवेस्ट करना शुरू किया. 1990 तक, मिनिमिल्स ने steel के साथ साथ rod, bar और angle iron भी बनाना शुरू कर दिया था. इस समय के दौरान, इन प्रोडक्ट्स से होने वाला प्रॉफिट काफ़ी कम था. इंटीग्रेटेड मिल्स इससे भी ख़ुश थे क्योंकि उन्हें कोई loss नहीं हो रहा था. अब मिनिमिल्स ने ऐसी चीज़ बनाकर मार्केट पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया जो इंटीग्रेटेड मिल्स नहीं बना रहे थे. 1992 आने तक, इंटीग्रेटेड मिल्स मार्केट से बाहर होने लगे और मिनिमिल्स मार्केट को dominate करने लगे. यहाँ समझने वाली सबसे ज़रूरी बात ये है कि 1980 के समय में, इंटीग्रेटेड मिल्स ने ज़्यादा पैसे  देने वाले क्लाइंट्स को टारगेट कर भारी प्रॉफिट कमाया था. एक तरफ़ जहां ये स्ट्रेटेजी अच्छी थी लेकिन दूसरी ओर उन्होंने कम कॉस्ट पर ज़्यादा हाई क्वालिटी प्रोडक्ट्स बनाने के लिए अपनी मशीनों को इम्प्रूव करने के बारे में सोचा ही नहीं और यही उनकी सबसे बड़ी भूल थी. इस वजह से, इंटीग्रेटेड मिल्स जड़ से उखड़ने लगे और मिनिमिल्स जिन्हें वो बेकार समझते थे, उनसे आगे निकल गए.

THE INNOVATORS
DILEMMA
CLAYTON CHRISTENSEN GIVE RESPONSIBILITY FOR DISRUPTIVE TECHNOLOGIES
TO ORGANIZATIONS WHOSE CUSTOMERS NEED THEM

जब disruptive टेक्नोलॉजी को हैंडल करने की बात आती है तो ज़्यादातर एग्जीक्यूटिव फेल क्यों हो
जाते हैं? ये सब resources को कैसे मैनेज किया जाता है उस पर डिपेंड करता है. किसी भी प्रोजेक्ट
के लिए अच्छे से रिसोर्स को डिवाइड करना कंपनीको बराबरी की टक्कर देने लायक बनाए रखती है.
कंपनियां फेल इसलिए हो जाती हैं क्योंकि उनके पास disruptive टेक्नोलॉजी के लिए रिसोर्सेज को ठीक
से डिवाइड करने की कोई अच्छी स्ट्रेटेजी नहीं है. IBM डेटा processing और एकाउंटिंग इंडस्ट्री
में बड़े आर्गेनाइजेशन को अपनी बनाई हुई मेनफ्रेम कंप्यूटर को बेचने वाली पहली कंपनी थी. जब मिनी
कंप्यूटर बनने लगे तो इसने disruptive टेक्नोलॉजी की प्रॉब्लम को क्रिएट किया. IBM और उनके
competitors ने मिनी कंप्यूटर को नज़रंदाज़ कर दिया था क्योंकि उनके कस्टमर्स को इसकी ज़रुरत नहीं थी. इस वजह से कई नई कंपनियों ने मार्केट में कदम रखा. धीरे-धीरे मिनी कंप्यूटर इतने एडवांस हो गए कि अब वो IBM के कुछ कस्टमर्स की ज़रूरतों को पूरा करने लगे थे. इस पॉइंट पर आकर, IBM ने मिनी कंप्यूटर को बनाना शुरू किया.

दूसरी ओर, किसी भी मिनी कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी ने डेस्कटॉप कंप्यूटर नहीं बनाए क्योंकि इन प्रोडक्ट्स की वजह से मिनी कंप्यूटर का मार्केट शेयर कम हो जाता. उस वक़्त मिनी कंप्यूटर बहुत popular हो गए थे और उसे बनाने वालों को अच्छा ख़ासा प्रॉफिट हो रहा था. लेकिन 1980 के अंत में, नई कंपनियों ने अपने ज़्यादा एडवांस डेस्कटॉप कंप्यूटर के साथ मार्केट में आना शुरू किया. डेस्कटॉप कंप्यूटर मिनी कंप्यूटर की तुलना में कस्टमर्स को ज़्यादा features दे रहे थे. बहुत कम समय में, कई मिनी कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियां मार्केट से बाहर हो गई. यहाँ तक कि जो कंपनियां तुरंत डेस्कटॉप कंप्यूटर के प्रोडक्शन में कूद पड़े थे वो भी टिक नहीं पाए. यही चीज़ तब हुई थी जब Toshiba और Zenith
जैसी नई कंपनियों ने पोर्टेबल कंप्यूटर बनाना शुरू किया था. इन्होने डेस्कटॉप बनाने वाली बड़ी बड़ी
कंपनियां जैसे IBM और Apple को पीछे छोड़ दिया था क्योंकि ये पोर्टेबल गैजेट डेस्कटॉप कंप्यूटर से आगे
बढ़कर नई टेक्नोलॉजी कस्टमर तक पहुंचा रहे थे. लेकिन किसी भी कंपनी को DEC जितना नुक्सान नहीं हुआ है. Digital Equipment Corporation कुछ ही समय में आसमान से बिलकुल ज़मीन पर आ गया था. DEC इसलिए फेल नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने कोशिश नहीं की बल्कि उन्होंने तो ऐसे प्रोडक्ट्स बनाए जो कस्टमर्स के बीच काफ़ी popular थे. लेकिन फिर भी वो प्रोडक्ट्स फेल हो गए और उन्हें मार्केट से बाहर होना पड़ा. लेकिन इसके पीछे कारण क्या था? DEC फेल इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने अपने सभी प्रोडक्ट्स को मेनस्ट्रीम कंपनी से लॉन्च किया था. उन्होंने उन प्रोडक्ट्स को बनाने पर फोकस किया जो कस्टमर्स उस समय चाहते थे यानी वो करंट डिमांड पर फोकस कर रहे थे. वो उन प्रोडक्ट्स में इंवेस्ट नहीं कर रहे थे जिनकी डिमांड उस समय नहीं थी लेकिन फ्यूचर में हो सकती थी.

एक छोटा डिपार्टमेंट बनाए बिना पर्सनल कंप्यूटर के बिज़नेस में घुसने से, DEC दो इम्पोर्टेन्ट सेगमेंट में
लगातार काम करने के लिए मजबूर हो गया था. मार्केट में competitive बने रहने के लिए वो दोनों ही
फील्ड में ठीक से पैसा और resources इंवेस्ट नहीं कर पा रहे थे. दूसरी ओर, IBM लगातार उभरती हुई disruptive टेक्नोलॉजी के बावजूद मार्केट में टिके रहने में सक्सेसफुल हुआ. तो आख़िर IBM ने ऐसा क्या अलग किया ? उन्होंने raw materials को लाने, डेस्कटॉप कंप्यूटर बनाने और न्यू यॉर्क में उनके हेडक्वार्टर के किसी दखलंदाजी के बिना independently प्रोडक्ट बेचने के लिए फ्लोरिडा में एक छोटा ब्रांच

THE INNOVATORS
DILEMMA
CLAYTON CHRISTENSEN
DISCOVERING NEW AND EMERGING MARKETS

टेक्नोलॉजी के साथ-साथ मार्केट भी लगातार बदल रहा है और एक स्ट्रेटेजी जो आज काम करती है वो कल फेल भी हो सकती है. एक मैनेजर जो सोचता है कि वो जानता है मार्केट का फ्यूचर क्या होने वाला है वो उस मैनेजर की तुलना में अलग तरीके से इंवेस्ट करेगा जो मार्केट के बदलते नेचर को समझता है. रिसर्च से पता चला है कि कई सक्सेसफुल कंपनियों को मार्केट के बदलते हुए नेचर की वजह से अपने प्लान को पूरी तरह से बदलना पड़ा. अपनी स्ट्रेटेजी को बदलकर उन्होंने मार्केट के हिसाब से नई टेक्निक्स को अपनाया. एक अच्छा मर्केटर हमेशा उन मार्केट्स की खोज करता है जो फ़िलहाल मौजूद नहीं हैं लेकिन फ्यूचर में हो सकता है जिसमें बहुत अच्छा पोटेंशियल हो और उसके अनुसार तैयारी करता है जैसा कि हम हौंडा के केस में देखेंगे. जापान में जंग के बाद जब रिकंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था, उस दौरान हौंडा ने मार्केट में कदम रखा. वो मोटोराइज्ड bicycle (वो bicycle जिसमें मोटर लगी हुई थी) सप्लाई करते थे जिसका इस्तेमाल सामान डिलीवरी के लिए किया जाता था. हौंडा छोटे और efficient इंजन बनाना चाहता था. दस सालों के अंदर, उनकी सेल 1200 बाइक से बढ़कर 285000 मोटरबाइक per इयर हो गई थी. हौंडा नार्थ अमरीका के मार्केट में एंट्री करना चाहता था लेकिन जापान की तरह उनके पास ऐसा करने के लिए कोई प्लेटफार्म नहीं था. उनकी रिसर्च से पता चला कि ज़्यादातर अमरीकी लोग लंबी दूरी की ड्राइविंग के लिए मोटरबाइक का इस्तेमाल करते थे. इसलिए, स्पीड एक ऐसा फैक्टर था जो उन्हें attract कर सकता था.

इसलिए हौंडा ने ख़ासकर अमेरिकन मार्केट के लिए एक पावरफुल और तेज़ मोटरसाइकिल डिज़ाइन करने
की शुरुआत की. कंपनी ने तीन लोगों को लॉस एंजिल्स जाने और प्रोडक्ट की मार्केटिंग करने के लिए कहा. कम कॉस्ट के अलावा हौंडा कोई एक्स्ट्रा एडवांटेज नहीं दे रहा था इसलिए कई लोगों ने उनसे ख़रीदने से मना कर दिया. आख़िरकार, हौंडा की टीम ने कुछ डीलर्स से बात की और कुछ मोटरसाइकिल बेचने में कामयाब हुए. लेकिन हौंडा ने इंजन के डिज़ाइन में काफ़ी गलतियां की थी. जहां उनके बाइक पावरफुल और फ़ास्ट थे, उसे लंबे समय तक चलाने से उसमें से आयल लीक होने लगता था और क्लच भी ख़राब होने लगा था. इन सब चीज़ों का ध्यान रखने में हौंडा की फाइनेंसियल हालत ख़राब होने लगी थी. लेकिन फिर एक दिन नार्थ अमेरिका में हौंडा के एग्जीक्यूटिव ने अपनी मोटरबाइक ली और लॉस एंजिल्स के ईस्ट में पहाड़ों के रास्तों पर निकल गए.

उन्होंने अपने दो दोस्तों को भी साथ चलने के लिए इनवाईट किया. वहाँ के लोगों ने जब उनकी बाइक को देखा तो कहने लगे कि वो भी बिलकुल वैसी ही बाइक ख़रीदना चाहते थे. उन तीनों ने बड़ी ख़ुशी-ख़ुशी उनके लिए जापान से ऑर्डर मंगवाया. जैसे-जैसे ज़्यादा लोग इन बाइक्स को ख़रीदने लगे, लॉस एंजिल्स की टीम ने महसूस किया कि अमेरिका में इस तरह की adventurous और स्पोर्ट्स बाइक का मार्केट था जिसमें उनकी बाइक बिलकुल फ़िट बैठती थी. जापान में हेड ऑफिस को ये विश्वास दिलाने में उन्हें
मेहनत करनी पड़ी कि वो उस मार्केट में सक्सेसफुल होंगे और अंत में जब उन्हें मंजूरी मिल गई तो टीम को
पता चला कि उनके सामने अब सबसे बड़ा चैलेंज था उन छोटे बाइक्स के लिए रिटेलर्स को खोजना.
आख़िरकार, उनकी टीम ने अपने प्रोडक्ट्स ख़रीदने के लिए कुछ स्पोर्ट्समेन को राजी किया और यहाँ से हौंडा के सक्सेस की शुरुआत हुई. यहाँ से हौंडा कॉस्ट कम से कम करता चला गया जब तक वो सस्ती मोटरसाइकिल बनाने में कामयाब नहीं हो गए. उन्होंने अपने मार्केट को बढ़ाने और उनके competitors को ख़त्म करने के लिए इस स्ट्रेटेजी को यूज़ किया था. हौंडा के ये छोटे स्पोर्ट्स या एंटरटेनमेंट बाइक्स
disruptive टेक्नोलॉजी बन गए थे. स्टेटेजिक प्लानिंग के ज़रिए हौंडा नार्थ अमरीका और यूरोपियन मार्केट पर कब्ज़ा करने में सक्सेसफुल रहे. 1960 और 1970 के बीच नार्थ अमेरिका में मोटरसाइकिल की एक बड़ी brand Harley-Davidson ने हौंडा से आमने सामने मुकाबला करने की कोशिश की. उन्होंने हौंडा की तुलना में और भी छोटे इंजन के साथ छोटी मोटरसाइकिल बनाने का फैसला किया. उसके बाद,

Harley ने आगे बढ़कर इस प्रोडक्ट को हौंडा के मार्केट में बेचने की कोशिश की. लेकिन वो फेल हो गए
क्योंकि उन्होंने फ्यूचर में होने वाली डिमांड के लिए तो तैयारी ही नहीं की थी. अंत में, उन्होंने छोटे मोटरबाइक के मार्केट को छोड़ दिया. यहाँ समझने वाली ये बात है कि आज किसी मार्केट का क्या साइज़ है उसके बेसिस पर उसे कम मत समझो क्योंकि आगे जाकर वही मार्केट बहुत बड़ा साबित हो सकता है. आज लगातार नए नए मार्केट उभर रहे हैं और अगर आपने अच्छे से तैयारी नहीं की तो आप कम समय में मार्केट से बाहर हो जाएँगे.

THE INNOVATORS
DILEMMA
CLAYTON CHRISTENSEN PERFORMANCE PROVIDED, MARKET
DEMAND, AND THE PRODUCT LIFE CYCLE

अक्सर कई कंपनियां इसलिए फेल हो जाती हैं क्योंकि वो मार्केट के डिमांड को पूरा नहीं कर पाते हैं और कुछ इसलिए ख़त्म हो जाते हैं क्योंकि वो मार्केट को ठीक से स्टडी करने में चूक जाते हैं और डिमांड से ज़्यादा
सप्लाई करने लगते हैं जिससे उनका दिवाला निकल जाता है. जब कोई कंपनी ज़रुरत से ज़्यादा सप्लाई करने लगती है तो ये disruptive टेक्नोलॉजी को नीचे से अटैक करने का मौक़ा देने लगता है. इस वजह से एक प्रोडक्ट का लाइफ साईकल बहुत छोटा हो जाता है क्योंकि वो अपने समय से पहले ही मार्केट से बाहर हो जाता है. इसलिए मार्केट के डिमांड को पूरा करना बहुत ज़रूरी होता है. आइए एक एग्ज़ाम्पल से समझते हैं. 1922 में टोरंटो के चार साइंटिस्ट ने जानवरों के पैंक्रियास से इंसुलिन निकालकर उसे डायबिटिक
पेशेंट्स की बॉडी में इंजेक्ट किया. उनका ये एक्सपेरिमेंट सक्सेसफुल साबित हुआ. क्योंकि ये इंसुलिन गाय और पिग की बॉडी से निकाला जा रहा था

तो परफॉरमेंस को बेहतर बनाने का इकलौता तरीका था इंसुलिन की क्वालिटी को इम्प्रूव करना.
1980 तक इसमें गंदगी का लेवल 50,000 ppm से कम होकर 10 ppm हो गया था. ये Eli Lily
जैसी कंपनी की मेहनत के कारण हुआ था. लेकिन जानवरों का इंसुलिन इंसानों के इंसुलिन से अलग
होता है इसलिए कई पेशेंट्स पर इसका कोई असर नहीं हो रहा था. इस वजह से Eli Lily ने जेनेटिक
तरीके से इंसुलिन प्रोटीन को बनाने की रिसर्च की शुरुआत की ताकि वो इंसानों को suit हो सके. उन्होंने
Genentech Company के साथ पार्टनरशिप की और लगभग 1 बिलियन डॉलर की इन्वेस्टमेंट की. ये
प्रोजेक्ट बहुत सक्सेसफुल साबित हुआ. 1980 में, Humulin-brand के इंसुलिन को मार्केट में introduce किया गया. ये बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में इंसानों के इस्तेमाल के लिए बिकने वाला पहला प्रोडक्ट था. Eli Lily ने जानवरों के इंसुलिन की तुलना में इसकी कीमत 25% ज़्यादा रखी थी. लेकिन इसकी सेल उम्मीद के मुताबिक़ नहीं थी. आख़िर ऐसा  क्यों हुआ? इसका कारण था कि जहां लोग इस प्रोडक्ट के आने से ख़ुश थे वहीं उन्हें इसकी ज़रुरत नहीं थी. सिर्फ़ चंद लोग जिनका इम्यून सिस्टम जानवरों के इंसुलिन को रिजेक्ट कर रहा था उन्हें Humulin की ज़रुरत थी. ज़्यादातर पेशेंट्स को जानवरों का इंसुलिन suit कर रहा था जिसे वो कम दाम में ख़रीद सकते थे.

pure इंसुलिन का सप्लाई डिमांड से ज़्यादा था. दूसरी ओर, Novo Nordisk नाम की एक डेनिश कंपनी ने इंसुलिन पेन बेचने का स्कोप देखा. डायबिटिक पेशेंट्स को इंजेक्शन लगाने के लिए बार-बार सिरिंज बदलना पड़ता था. जैसे नार्मल इंजेक्शन दिया जाता है उन्हें इन्सुलिन भी वैसे ही लेना पड़ता था जिसमें काफ़ी वक़्त लगता था और अक्सर उन्हें डॉक्टर के पास इसे इंजेक्ट करवाने के लिए जाना पड़ता था. Novo Nordisk ने एक ऐसा डिवाइस डेवलप किया जो दिखने में एक पेन जैसा था और उसमें एक हफ़्ते का इंसुलिन सप्लाई स्टोर किया जा सकता था. इसमें धीरे और तेज़ी से काम करने वाले दोनों तरह के
इंसुलिन को यूज़ किया जा सकता था. अब पेशेंट्स को बस एक डायल घुमाकर एक बटन दबाने की जरुरत
थी और अपने स्किन पर पेन लगाने से इन्सुलिन उनकी बॉडी में इंजेक्ट हो जाता था. इस पूरे प्रोसेस में सिर्फ 10 सेकंड का समय लगता था.

जहां Eli Lily ऊँचें दाम वाले हाई क्वालिटी के प्रोडक्ट बनाने में बिजी था वहीँ Novo Nordisk ने सिंपल
डिज़ाइन इम्प्रूवमेंट पर फोकस किया और हर इंसुलिन यूनिट के लिए अपने प्रोडक्ट को 30% ज़्यादा दाम पर
बेचा. 1980 के बीच तक जहां Novo Nordisk अपने इंसुलिन पेन से अंधाधुन प्रॉफिट कमा रहा था वहीँ Eli
Lily को ख़ुद को मार्केट में बनाए रखने के लिए भी स्ट्रगल करना पड़ रहा था. इन दोनों केस से पता चलता
है कि एक प्रोडक्ट जो मार्केट की उम्मीद के पार चली जाती है वो फेल हो सकती है जबकि एक प्रोडक्ट जो
सिंपल और सीधे disruptive टेक्नोलॉजी लेकर आता है वो उम्मीद से ज़्यादा सक्सेसफुल हो सकता है.
डायबिटिक पेशेंट्स को इंसुलिन लेने में बहुत मुश्किल होती थी. Novo Nordisk ने easy-to-use
इंसुलिन पेन के ज़रिए उन्हें एक ऐसा डिवाइस दिया था जिसने कम दर्द, कम परेशानी और कम गलती करने
की गुंजाइश के साथ उनकी हर रोज़ की जिंदगी आसान बना दी थी.

कन्क्लूज़न
तो आपने IBM और हार्ड डिस्क ड्राइव की इंडस्ट्री के बारे में जाना. Disruptive टेक्नोलॉजी के साथ तालमेल बैठाने और उसके अनुसार बदलने के लिए तैयार रहे क्योंकि जो कंपनियां अपनी पुरानी टेक्नोलॉजी और स्ट्रेटेजी को नहीं बदलती हैं वो बहुत जल्द मार्केट से आउट हो जाती हैं. आपने स्टील इंडस्ट्री और मिनिमिल्स के बारे में भी जाना. अगर अभी मार्केट शेयर छोटा है तो उससे निराश ना हों. अगर आप वाजिब दाम पर ज़्यादा वैल्यू देते रहे तो लोग जल्द ही आपको नोटिस करने लगेंगे. आपने मेनफ्रेम कंप्यूटर से पोर्टेबल कंप्यूटर तक के डेवलपमेंट के बारे में भी समझा. एक बड़ी कंपनी एक इंडिपेंडेंट छोटे brand को बनाकर disruptive टेक्नोलॉजी का सामना कर सकती है. आपने ये भी देखा कि हौंडा ने कैसे नार्थ अमेरिका
के मार्केट में कदम रखा. यहाँ तक कि अगर आपकी इंडस्ट्री में पहले से कोई brand मौजूद है जिसका
ज़बरदस्त नाम है तब भी आपको वहाँ मौकों की तलाश करनी चाहिए, बस अपनी स्ट्रेटेजी को अच्छे से प्लान
करें. अंत में, आपने Novo Nordisk के एक्स्ट्राऑर्डिनरी इनोवेशन के बारे में जाना. कस्टमर के एक्सपीरियंस को बेहतर बनाना भी एक तरह का disruptive टेक्नोलॉजी है.

आज innovator की दुविधा ये है कि टेक्नोलॉजी बड़ी तेज़ी से बदल रही है. Disruptive टेक्नोलॉजी,
जो नई और ज़्यादा efficient है, वो हमेशा मार्केट में आती रहेगी इसलिए आप अपनी कंपनी के करंट
सक्सेस को लेकर बेफ़िक्र और लापरवाह नहीं हो सकते. लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा वैल्यू देने के लिए
हमेशा नए तरीके ढूंढते रहें. जब आप ज़्यादा वैल्यू देने का गोल बनाते हैं तब आपको वो इनोवेटिव आईडिया
आने शुरू होते हैं जिसके बारे में पहले कभी किसी ने नहीं सोचा और वहीं से disruptive टेक्नोलॉजी
का जन्म होता है जो आपको अनलिमिटेड सक्सेस दे सकता है.

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