The Essays of Warren Buffett: Lessons for Corp… Warren Buffett Books In Hindi Summary

The Essays of Warren Buffett: Lessons for Corp… Warren Buffett इंट्रोडक्शन वॉरेन बफ़ेट को भला कौन नहीं जानता, जो दुनिया के सबसे सक्सेसफुल इन्वेस्टर है? बर्कशायर हैथवे इंक के सीईओ ने अपने शेयरहोल्डर्स को इन्वेस्टमेंट के लिए वैल्यूएबल इन्फोर्मेशन देने के लिए लैटर लिखा था. इस समरी में आपको वो सारे लैटर्स पढने को मिलेंगे जो वॉरेन ने अपने शेयरहोल्डर्स को लिखे थे जिनमें उन्होंने फाइनेंस के कई पहलुओं पर चर्चा की थी जिसमे कॉर्पोरेट गवर्नेस, टैक्स, एकाउंटिंग, मर्जर और एक्वीजीशन जैसे टॉपिक्स कवर किए गए थे. तो आप ये समरी पढ़िये ताकि आप भी एक billionaire सीईओ के नज़रिए से वाकिफ हो सके और जान सके कि वो अपने इन्वेस्टमेंट बिजनेस को किस नज़र से देखते है. ऑथर लॉरेंस, ए. कनिंगघम ने अपनी बुक वॉरेन बफ़ेट के essay को सेलेक्ट करके उन्हें इस तरह से अरेंज किया है कि रीडर्स के लिए ये और भी स्पेशल और कीमती बन जाती है. The Essays of Warren Buffett: Lessons for Corp… Warren Buffett Corporate Governance बर्कशायर हैथवे के सीईओ वॉरेन बफ़ेट अपनी कंपनी और उसकी प्रेक्टिसेस के बारे में बताते हैं. वो दूसरे corporation की उन अनुअल मीटिंग्स की बात करते है कि उनमे और बर्कशायर की मीटिंग्स में क्या फ़र्क है. वॉरेन बफ़ेट हमें बताते है कि सीईओ की पोस्ट को लेकर उनके क्या विचार है और साथ ही वो सीईओ की जिम्मेदारियों की भी बात करते है. वो हमें अपने corporation के रिस्क कण्ट्रोल स्ट्रेटेज़ी और चैरीटी के बारे में भी बताते है. अनुअल मीटिंग असल में सिर्फ समय की बर्बादी है और कुछ नहीं ज्यादातर शेयरहोल्डर्स को corporation से ज्यादा अपनी चिंता रहती है. कोई भी बिजनेस की बात नहीं करता और मीटिंग का लेवल हर साल घटता ही जाता है. जो लोग सिरियसली बिजनेस माइंडेड होते है, वो तो मीटिंग अटेंड करना पसंद ही नहीं करते. जाहिर है जहाँ पर लोग बिजनेस की बात छोड़कर सिर्फ शिकायतें और दूसरी बात करेंगे तो भला कौन ऐसी मीटिंग अटेंड करना चाहेगा. लेकिन बर्कशायर की जो मीटिंग होती है, उनकी तो बात ही अलग है. बर्कशायर की जो मीटिंग होती है, उनकी तो बात ही अलग है. बर्कशायर हैथवे वो कॉर्पोरेशन है जहाँ मैं सीईओ हूँ. हर साल ज्यादा से ज्यादा लोग ये मीटिंग अटेंड करते है क्योंकि इन मीटिंग्स में सेंसिबल बातों और सवालों पर डिस्कसन होता है और सिर्फ बिजनेस से जुड़े सवालों के जवाब मिलते है. मीटिंग चाहे कितनी देर क्यों ना चले पर बर्कशायर के वाइस चेयरमेन चार्ली और मैं दोनों इन सवालों के जवाब ख़ुशी-ख़ुशी देते है. हमारी सबसे इम्पोर्टेन्ट प्रायोरीटी है आपको सही-सही इनोफोर्मेशन प्रोवाइड करना. हम आपको वही इन्फोर्मेशन देंगे जो सही और काम की हो क्योंकि अगर हम आपकी जगह होते तो हम भी आपसे यही एक्स्पेक्ट करते. हम जानते है एक इन्वेस्टर होने के नाते या जो भी हमारे साथ बिजनेस करना चाहता है, उसे पूरा हक है कि उस तक कंपनी की सही इनोफोर्मेशन पहुंचे, इसलिए ऑनेस्टी हमारी पहली policy है. अगर हम रोल रिवर्स करने की बात करे तो मैं कंपनी की लॉन्ग टर्म इकॉनोमिक कैरेक्टरिस्टिक के बारे में ज्यादा सोचूंगा. मैं ऐसे एकाउंटिंग मेथड्स पसंद नहीं करूंगा जो अनक्लियर और अनसन होते है, जिन्हें देखकर कुछ भी समझ पाना मुश्किल होता है इससे मुझे शक होता जैसे मैनेजमेंट मुझसे कुछ छुपाना चाहती है. तो इसके बजाए मैं चाहूंगा कि कंपनी के सीईओ साफ़-साफ बताए कि कंपनी में क्या चल रहा है क्योंकि हम भी अपनी कंपनी में यही करते है. बताए कि कंपनी में क्या चल रहा है क्योकि हम भी अपनी कंपनी में यही करते है. कई बड़े कारपोरेशन ख़ासतौर पर चुनकर इन्फोर्मेशन दिखाते है. ऐसे कंपनीज़ अक्सर वही इनोफोर्मशन प्रोवाइड करेगी जो उनके फायदे की हो और जो उनकी रेपुटेशन को नुकसान पहुंचाए, ऐसी कोई खबर वो लीक नहीं होने देती. मेरे ख्याल से एक और खतरनाक सिचुएशन तब आती है जब सीईओ अपनी कंपनी के लिए ग्रोथ रेट प्रेडिक्ट करते है. हालाँकि ये पॉजिटिव अप्रोच अच्छी है पर ये दावा करना कि कंपनी 75% एनुअल रेट के हिसाब से ग्रो करेगी, ये कहना थोडा रिस्की हो सकता है क्योंकि ऐसे फिगर कुछ ज्यादा ही ऑप्टीमिस्टिक यानि कुछ हद तक unrealistic लगते है. तो इसलिए मैं सजेस्ट करूंगा कि इन्वेस्टर्स पहले अच्छे से देख ले फिर इन्वेस्ट करे. सबसे पहले तो उन्हें ये पता होना चाहिए कि जिस कंपनी में वो इन्वेस्ट करने जा रहे है, कहीं उनकी एकाउंटिंग वीक तो नहीं है, वीक एकाउंटिंग का मतलब है अनक्लियर रिपोर्ट या ऐसे फिगर दिखाना जिन्हें देखकर कुछ भी समझ पाना मुश्किल हो. अगर कंपनी आपसे एक्चुअल फैक्ट छुपा रही है या आपको अनक्लियर स्टेटिसस्टिक दिखा रही है तो शायद आपको इन्वेस्टमेंट से पहले एक बार और सोचने की ज़रुरत है. साथ ही रिपोर्ट में सबसे नीचे लिखे फुटनोट चेक करना ना भूले. अगर ये आपकी समझ में नहीं आ रहे तो यानि सीईओ चाहता ही नहीं कि आप इन्हें समझे. तो इसका मतलब होगा कि नहीं कि आप इन्हें समझे. तो इसका मतलब होगा कि कंपनी आपसे सच्चाई छुपाने की कोशिश कर रही है. फाईनली ऐसे कंपनीज़ से दूर रहे जिनके सीईओ अनरिएलिस्टिक अर्निंग की गारंटी दे रहे हो क्योंकि फ्यूचर में क्या होगा, ये किसने देखा है. हम सिर्फ अच्छे रिटर्न की उम्मीद में इन्वेस्टमेंट कर सकते है पर अच्छा रिटर्न हमें मिलेगा ही मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है. अक्सर सीईओ जॉब में बने रहते है चाहे वो उस पोजीशन के लायक हो या ना हो, जैसे एक्जाम्पल के लिए मान लो, अगर एक सेक्रेटरी की जॉब की requirement है कि वो पर-मिनट 80 वर्ड टाइप कर सके तो जो भी कैंडिडेट इस क्राईटेरिया में फेल होगा, उसे ये जॉब नहीं मिल पाएगी. लेकिन सीईओ के साथ ऐसा नहीं है. वो इसलिए क्योंकि एक सीईओ की पर्पोरमेंस को जज करने का कोई स्टैण्डर्ड ही नहीं है. एक और कारण ये भी है कि सीईओ को जज करने वाला कोई है नहीं. उसके ऊपर कोई सुपीरियर ऑथरिटी नहीं है क्योंकि इन्ही कारणों की वजह से आपको कई सारे ऐसे सीईओ भी मिलेंगे जो कंपनी चलाने के लायक ही नहीं है. इसके बावजूद वो अपनी पोस्ट पर बने हुए है. तो इन कंपनीज़ को देखने से पहले आपके पास ये सारी इन्फोर्मेशन होना जरूरी है. जब बात चैरीटी की आए तो 50% चैरीटेबल कोंट्रीब्यूशन डायरेक्टर्स के ज़रिए किए जाते है जो ओनर्स को कंसल्ट नहीं करते और ये चीज़ मुझे एकदम गलत लगती है. जरा सोचो एक डायरेक्टर एकदम गलत लगती है. जरा सोचो एक डायरेक्टर को कैसा लगेगा अगर ओनर उसके पास आकर उसी की जेब टटोलते हुए पूछे कि उसका पैसा कहाँ गया ? तो प्रायोरीटी ऐसे चैरीटी पर होनी चाहिए जो बिजनेस से रीलेटेड हो और जो भी बेलेंस रहता है, उसे preference के हिसाब से दूसरी तरह की चैरीटी को दिया जाना चाहिए. बेशक हम मैनेजर्स की सुने पर फाईनल डिसिजन ओनर का होने चाहिए. मुझे इसी तरह का सिस्टम पसंद है जो हम बर्कशायर में भी फॉलो करते है. बात अगर रिस्क कण्ट्रोल की हो तो मुझे लगता है कि सीईओ को ये जिम्मेदारी खुद पर लेनी होगी. अगर सीईओ ज़िम्मेदारी नहीं लेता तो उसे शायद अपनी पोस्ट पर बने रहने का कोई हक नहीं है. एक सीईओ के तौर पर मैं हमेशा कहता हूँ कि हम बड़े से बड़ा फाईनेंशीयल नुकसान झेल सकते है पर अपनी रेपूटेशन नहीं खो सकते. तो रिस्क कण्ट्रोल करने के लिए ये मेरी स्ट्रेटेजी है जो मैं फॉलो करना पसंद करता हूँ. हालांकि ये इमपॉसिबल है कि एक-एक एम्प्लोई हमारे कण्ट्रोल में रहे और ठीक वैसा ही करे जो हम चाहते है. आप खुद सोचिए, 250,000 एम्प्लोई में से सारे के सारे तो हमारी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरेंगे. लेकिन जो हम कर सकते है वो ये कि जब भी ऐसी कोई घटना हमारी जानकरी आए , हम उस पर तुरंत एक्शन ले. The Essays of Warren Buffett: Lessons for Corp… Warren Buffett Finance and Investing इस चैप्टर में वॉरेन बफ़ेट ने लॉन्ग टाइम इन्वेस्टमेंट के बारे में एक्सप्लेन किया है और साथ ही उसे अप्रोच करने का तरीका भी बताया है. साथ ही वो डावर्सीफ़िकेशन और arbitrage की बात भी करते है. मैंने आज तक जब भी अपनी कंपनी के लिए स्टॉक्स लिए है हमेशा इकॉनोमिक प्रोस्पेक्ट को ध्यान में रखते हुए डिसीजन लिया है. मैंने ना तो कभी मार्केट के बारे में सोचा और ना ही राईट टाइम के बारे में. एक बायर होने के नाते मैं जितना हो सके उतना लंबे पीरियड के लिए स्टॉक लेने को तैयार रहता हूँ, जब तक मुझे यकीन है कि ये मुझे प्रॉफिट कमाने में हेल्प करेगा. अगर मुझे लगे कि शोर्ट पीरियड के लिए स्टॉक मुझे नुक्सान देगा तो मैं ज्यादा टेंशन नहीं लेता. मेरे लिए इम्पोर्टेट ये है कि मुझे लॉन्ग टर्म तक एडवांटेज मिलता रहे. मैं खुद को एक बिजनेस एनालिस्ट के तौर पर देखता हूँ नाकि मार्केट ऐनालिस्ट के. मैं मार्केट को एनालाईज़ नहीं करता, मैं बिजनेस को एनालाइज़ करता हूँ मैं मार्केट की पोजीशन देखकर स्टॉक में इन्वेस्ट नहीं करता तल्ति तभी टन्तेर करता हूँ जत्त पटो रातीन टो मैं मार्केट की पोजीशन देखकर स्टॉक में इन्वेस्ट नहीं करता, बल्कि तभी इन्वेस्ट करता हूँ जब मुझे यकीन हो जाता है कि जिन स्टॉक्स में मैं इन्वेस्ट करने जा रहा हूँ वो मुझे अच्छा प्रॉफिट देंगे. एक बेहतर आईडिया के तौर पर आप मार्केट को एक इन्सान की तरह देखे, मिस्टर मार्केट, यानि एक ऐसा इन्सान जिसे सीरियस ईमोशनल प्रॉब्लम हो! कई बार वो काफी ऑप्टीमिस्टिक यानी पॉजिटिव हो जाता है इसलिए वो हर स्टॉक की वैल्यू बढ़ा देता है, और कई बार वो इतना डिप्रेस्ड होता है कि स्टॉक्स एकदम नीचे चले जाते है. मिस्टर मार्केट की एक और खासियत है, आप उसे इग्नोर करोगे तो उसे कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता. अगर वो आपको आज इंट्रेस्टिंग नहीं लग रहा तो कल वो नए प्राइस और नई चीज़े लेकर आएगा. तो इस कांसेप्ट को माइंड में रखते हुए आप मार्केट को सही तरीके से इमेजिन कर सकते हो. तो मैं चाहता हूँ कि आप मार्केट को एक इन्सान की तरह मानकर चले और उसे जहाँ तक हो सके इग्नोर करे. कोई फर्क नहीं पड़ता अगर मार्केट किसी बिजनेस की वैल्यू को समझने में ज्यादा वक्त लगा रही है. बल्कि इससे तो हमें एडवांटेज ही मिलेगा कि हम बेहतर प्राइस में शेयर्स खरीद सकें. कई बार मार्केट किसी बिजनेस को अंडरवैल्यू करने लगती है जिसका नतीज़ा ये होता है कि हमें शेयर्स शेयर्स खरीद सकें. कई बार मार्केट किसी बिजनेस को अंडरवैल्यू करने लगती है जिसका नतीज़ा ये होता है कि हमें शेयर्स बेचने पर मजबूर होना पड़ता है. तो इस तरह की गलतियां को अवॉयड करना चाहिए क्योंकि मार्केट किसी शेयर की असली वर्थ डिसाइड नहीं कर सकती. अक्सर मैंने ऐसे लोगो को जो स्टॉक मार्केट में लॉन्ग टर्म के लिए इन्वेस्ट करना चाहते है, प्राइस बढ़ते देखकर ख़ुश होते देखा है. लेकिन मुझे तो इसमें कोई लॉजिक नज़र नहीं आता. मैं बताता हूँ कैसे. मान लो किसी आदमी को हैमबर्गर खाना पसंद है तो बताओ उसे ख़ुशी कब होगी, जब बीफ के प्राइस बढ़ेंगे या घटेंगे? ज़ाहिर सी बात है कि उस आदमी को बीफ के प्राइस कम होने पर ही ज्यादा ख़ुशी होगी. सेम ऐसे ही शोर्ट टर्म इन्वेस्टर ही स्टॉक प्राइस बढने पर खुश होंगे और गिरने पर डिप्रेस हो जायेंगे. एक लॉन्ग टर्म इन्वेस्टर के तौर पर आपको सोरिंग यानी बढ़ते प्राइस के बदले सिंकिंग यानी घटते प्राइस पर ध्यान देना चाहिए. जब मुझे इन्वेस्ट करने के लिए कोई अच्छा आईडिया समझ नहीं आता तो अक्सर मैं arbitrage में इन्वेस्ट कर लेता हूँ. अगर आपको इसके बारे में पता नहीं है तो मैं बताता हूँ कि arbitrage क्या है. एक ही समय में अलग-अलग मार्केट में स्टॉक्स को खरीदना और बेचना arbitrage कहलाता है. arbitrage भी अच्छे return देते है. कई बार कहलाता है. arbitrage भी अच्छे return देते है. कई बार ऐसा होता है जैसे मान लो जापान में गोल्ड रेट अचानक से घट गए. तो बायर्स जापान में सस्ते रेट पर गोल्ड खरीद कर उसे न्यू यॉर्क में हायर रेट पर बेच कर प्रॉफिट कमा लेते है. लंदन के pound और न्यू यॉर्क के डॉलर के बीच जो रत्ती भर का प्राइस डिफ़रेंस है, वो भी आपके लिए एडवांटेज हो सकता है. एक इन्वेस्टर के तौर पर आपको किसी एक स्पेशिफिक इन्वेस्टमेंट स्टाइल पर डिपेंड नहीं रहना चाहिए. आपको फैक्ट्स को ईवैल्यूएट करके ही इंडीपेंडटली कोई इंटेलीजेंट डिसीजन लेना चाहिए. लेकिन आपका गोल क्या है ? आपका गोल है एक रीजनेबल प्राइस पर ज़बरदस्त बिजनेस का पता लगाना. आपका गोल ये नहीं है कि आप लोअर प्राइस में कोई मीडियोकर यानी एवरेज बिजनेस ढूंढो. मुद्दा अगर ये है कि आपका पोर्टफोलियो कैसा हो और आप किस तरह की इन्वेस्टमेंट करे तो मुझे डाइवर्सिफिकेशन का आईडिया ज्यादा पसंद नहीं है. अगर ये टर्म आपको नहीं पता तो हम बताते है. डाइवर्सिफ़िकेशन का मतलब है बिजनेस को एक ऐसे मार्केट सेगमेंट में बढ़ाना या फैलाना जो आपकी कंपनी के लिए बिलकुल नई हो और आपकी कंपनी के एक्जिस्टिंग प्रोड्क्ट से बाहर हो. मैं उन चीजों में ही इन्वेस्ट करना पसंद करता हूँ जो मेरी नॉलेज में हो. मैं ऐसी चीजों में बिजनेस करना चाहूंगा जो मुझे पसंद है और इन्वेस्ट तभी करना चाहिए मैं उन चीजों में ही इन्वेस्ट करना पसंद करता हूँ जो मेरी नॉलेज में हो. मैं ऐसी चीजों में बिजनेस करना चाहूंगा जो मुझे पसंद है और इन्वेस्ट तभी करना चाहिए जब आपको पता हो कि मैनेजमेंट भरोसेमंद है. लोग अक्सर “beta” के बेस पर डाईवर्सीफाई करते है. किसी भी स्टॉक में इन्वेस्ट करने से कितना रिस्क शामिल है उसे beta कहते हैं. जैसे एक्जाम्पल के लिए बीटा 1.5 का मतलब होगा कि किसी स्टॉक में इन्वेस्ट करने पर return में 1.5% चेंज का रिस्क शामिल है. पर मेरे ख्याल से बीटा के बेस पर स्टॉक खरीदना फ़िजूल होगा. मैं बताता हूँ कैसे. एक अच्छे स्टॉक की तलाश में आपको किसी कंपनी की एक्चुअल वैल्यू ढूंढनी होगी चाहे उसकी मार्केट पोजीशन जो भी हो. ये वो रिसर्च है जो एक स्टॉक पिकर को मार्केट में सक्सेस पाने में हेल्प करती है यानि इन्वेस्टर इतनी मेहनत करके कंपनी की टू वर्थ पता करने के बाद इन्वेस्टमेंट में प्रॉफिट कमाता है जोकि बीटा के ज़रिए पता नहीं चलती. याद रहे आपको डाइवर्सिफाई नहीं करना है और सिर्फ उन्ही स्टॉक्स में इन्वेस्ट करना है जिनकी आपको वाकई में नॉलेज है. याद रहे, आपको मार्केट के इन्फ्लुएंस में नहीं आना है बल्कि अपनी खुद की रिसर्च के हिसाब से ही इंडिपेंडेट डिसीजन लेना है. The Essays of Warren Buffett: Lessons for Corp… Warren Buffett Investment Alternatives इस चैप्टर में वॉरेन बफ़ेट हमें इन्वेस्टमेंट को तीन कैटेगरी में डिवाइड करते हुए उनके बारे में एक्सप्लेन करते है कि कौन सी कैटेगरी दूसरो से अच्छी है और कौन सी नहीं. वॉरेन बफ़ेट जंक बांड्स और एयरलाइन के पोपुलर इन्वेस्टमेंट के बारे में डिटेल से बताते है. आगे वॉरेन ये भी बताते है कि कैसे आने वाले समय में इन्वेस्टर्स का return कम होने लगेगा. यानि ये चैप्टर वॉरेन के रीपरचेजिंग शेयर्स पर नज़रिए के साथ खत्म होता है. इन्वेस्टमेंट तीन तरह की हो सकती है. फर्स्ट है करंसी बेस्ड इन्वेस्टमेंट जिसमे bond, mortgage और बैंक डिपॉजिट आते है. लोग अक्सर सोचते है कि ये सबसे सेफ इन्वेस्टमेंट है जिनमे बीटा या रिस्क फैक्टर जीरो है. लेकिन सच्चाई इसके एकदम अपोजिट है. करंसी बेस्ड इन्वेस्टमेंट भी रिस्की हो सकता है. वो इसलिए क्योंकि गवर्नमेंट ही मनी की वैल्यू डिसाइड करती है और कई बार महंगाई भी काफी बढ़ जाती है. बेशक आपके पैसे का नक्सान नहीं होगा लेकिन A८ करती है और कई बार महंगाई भी काफी बढ़ जाती है. बेशक आपके पैसे का नुक्सान नहीं होगा लेकिन आपके वैल्यू ऑफ़ मनी गिरने के हाई चांस है. पहले जो चीज़ सिर्फ एक रूपये में मिलती थी, वो आज आपको बीस रूपये में पड़ेगी. तो कई बार ऐसे में हाई इंटरेस्ट रेट प्रॉब्लम सोल्व कर देते है, लेकिन ऐसा कम ही होता है. यही वजह है कि मुझे करंसी बेस्ड इन्वेस्टमेंट पसंद नहीं है. सेकंड कैटेगरी उन एसेस्ट से जुडी होती है जिनसे फिलहाल आपको कोई कमाई नहीं होती पर आप उसे इस उम्मीद में लेते है कि फ्यूचर में उनकी कीमत बढ़ेगी तो बेचते वक्त आपको अच्छा प्रॉफिट होगा. आपको क्या लगता है, ये किस तरह की इन्वेस्टमेंट हो सकती है जिनसे कोई कमाई नहीं होती पर फिर भी लोग उन्हें खरीदते है? जी हाँ, आपने ठीक समझा, गोल्ड यानी सोना ! क्योंकि गोल्ड सिर्फ वो है जो कुछ क्रिएट नहीं करती और इसकी डिमांड लिमिटेड होती है. थर्ड कैटेगरी मेरी फेवरेट है यानि प्रोडक्टिव एसेट्स में इन्वेस्ट करना. ये कोई बिजनेस हो सकता है या farm या फिर रियेल एस्टेट भी. इनमे इन्वेस्ट करने के लिए कम से कम कैपिटल की जरूरत होती है पर return काफी अच्छा मिलता है. इन तीनो कैटेगरी को मैंने काफी ध्यान से एक्जामिन किया है और मुझे लगता है कि जो थर्ड कैटेगरी है वो 41 इन तीनो कैटेगरी को मैंने काफी ध्यान से एक्जामिन किया है और मुझे लगता है कि जो थर्ड कैटेगरी है वो बाकि दो को आउटपरफोर्म कर सकती है. लेकिन मैंने लोगो को जंक bonds में भी इन्वेस्ट करते देखा है. जंक बांड्स मतलब debt यानी लोन में इन्वेस्ट करना. सुनने में अजीब लगता है ना? जंक बांड्स में आप उन बैंक्स को पैसे उधार देते हो जिनकी खराब क्रेडिट रेटिग होती है. अब आप पूछोगे क्रेडिट रेटिंग क्या है? तो क्रेडिट रेटिग वो चीज़ है जो आपको बता सकती है कि आपका बैंक कितना भरोसे के लायक है. लो क्रेडिट रेटिंग का मतलब है कि पास्ट में लेंडर्स यानी पैसे देने वालों को borrowers यानी पैसे लेने वाले से काफी मुश्किल से पैसा वापस मिल पाया था और लो क्रेडिट रेट की वजह से ये बैंक हाई इंटरेस्ट रेट ऑफर करते है ताकि वो लोगो का भरोसा जीत सके. नतीजन, आपको इन जंक्स बांड्स में पैसा लगाकर अच्छा-खासा नुक्सान उठाना पड़ सकता है. 1980 के दशक में जंक बांड्स एकाएक बड़े पोपुलर हो गए थे. इनका क्रेडिट रेट बहुत लो हुआ करता था इसलिए इनके चक्कर में आकर कई लोगो को भारी नुक्सान उठाना पड़ा. रिचर्ड branson , जो एक एयरलाइन्स के ओनर थे, उनसे एक बार पूछा गया कि मिलियनेयर बनने का सीक्रेट क्या है तो उन्होंने बड़ा ही मज़ेदार जवाब दिया. उन्होंने कहा कि मिलियनेयर बनने के लिए billionaire होना जरूरी है ताकि आप एयरलाइन्स बिजनेस कर सके और घाटा होने के आप एयरलाइन्स बिजनेस कर सके और घाटा होने के बाद ऑटोमेटिकली आप मिलियनेयर बन जायेंगे”. लेकिन सच बताऊं तो मैंने भी एक बार एयरलाइन्स में इन्वेस्ट किया था और हां मैं इस बात से एग्री करता हूँ कि मेरी ऐनालिसिस गलत थी. मैंने कंपनी की सारी रिपोर्ट ठीक से चेक की थी जो मुझे काफी प्रॉफिटेबल लगी लेकिन एक इम्पोर्टेट पॉइंट मैंने मिस कर दिया. एयरलाइन मार्केट काफी कॉम्पटीटिव होता है और यही पॉइंट मेरे दिमाग से उतर गया जिससे हमें काफी नुक्सान लोस उठाना पड़ा. इसलिए चाहे कंपनी की रिपोर्ट कुछ भी बोले पर अगर मार्केट कॉम्पटीटिव है तो आप प्रॉफिट की उम्मीद नहीं कर सकते. इन्वेस्टमेंट के साथ लालच और डर भी जुड़े होते है. जब भी मार्केट आपको ललचाने लगे आपको मार्केट से डरने की जरूरत है और जब मार्केट डरा हुआ यानि कमज़ोर दिखे तो आप लालची हो सकते हो. इसका मतलब ये है कि जब सब इन्वेस्ट कर रहे हो, तो आपको इन्वेस्ट करने से बचना चाहिए. वही इसके एकदम उल्टा जब हर कोई इन्वेस्ट करने से डर रहा हो तो आपके लिए इन्वेस्ट करने का यही सही टाइम होगा.. सुनने में ये थोडा अटपटा लग सकता है पर आज के इन्वेस्टर को बेहद कम return मिल रहा है. आप शायद सोच रहे होंगे कि जब अमेरिकन बिजनेस अच्छा तुननप पाडापासपाता है पर जाणा इन्वेस्टर को बेहद कम return मिल रहा है. आप शायद सोच रहे होंगे कि जब अमेरिकन बिजनेस अच्छा चल रहा है तो ये कैसे पॉसिबल है? तो मैं समझाता हूँ. मान लो एक सिंगल फेमिली का सारे अमेरिकन कॉर्पोरेश्न पर कब्ज़ा है. तो अपनी कंपनी की वजह से ही ये फेमिली पीढ़ी दर पीढ़ी अमीर होती जाएगी. लेकिन फिर कुछ लोग जिन्हें हेल्पर्स कह सकते हैं, फेमिली के पास आते है और उन्हें सजेस्ट करते है कि उन्हें कुछ कंपनीज़ खरीद कर दूसरो को बेच देनी चाहिए ताकि वो अपने रिश्तेदारों से पैसे के मामले में आगे बढ़ सकें हेल्पर्स फेमिली मेम्बर्स को बोलते है कि वो उनका काम कर सकते है और बदले में वो कुछ फीस लेंगे. अब ज़ाहिर है फेमिली की थोड़ी वेल्थ तो कम हो जायेगी. तो जितना वो अपना बिजनेस बेचते जायेंगे उतना ही कम पैसे उन्हें मिलते रहेंगे. अब ये फेमिली अपनी फाईनेंशीयल कंडिशन को लेकर थोडा टेंशन में आ जाती है तो एक और हेल्पर ग्रुप उनकी मदद के लिए आगे आते है. वो कहते है कि इस सिचुएशन से निकलने के लिए फेमिली को प्रोफेशनल मैनेजर्स की जरूरत पड़ेगी. अब ये नए हेल्पर्स भी भारी-भरकम फीस लेकर चलते बनते है, और फेमिली का कुछ और पैसा कम हो जाता है. तो जितने ज्यादा हेल्पर्स फेमिली की हेल्प के लिए आते जायेंगे, उतना ही उनकी दौलत घटती जायेगी और इस सबकी वजह से सिचुएशन और भी खराब होती चली जाएगी. तो ये सिचएशन आपकी लाइफ में एक इन्वेस्टर होने तो ये सिचुएशन आपकी लाइफ में एक इन्वेस्टर होने के नाते कब आती है? क्या आपने प्राइवेट इक्वीटी या हेज फंड्स के बारे में सुना है? ये फंड्स वो है जहाँ आप पैसा इन्वेस्ट करते हो और अपनी इन्वेस्टमेंट मैनेज करने के लिए किसी मैनेजर की हेल्प लेते हो. तो ये मैनेजर उन हेल्पर्स की तरह है जो आपकी हेल्प के लिए रखे गए है लेकिन बदले में आपका return कम हो जाता है क्योंकि आपको उन्हें फीस जो देनी पड़ती है. इसलिए अच्छा-ख़ासा बिजनेस होने के बावजूद इन्वेस्टर्स को अपने return से कोम्प्रोमाईज़ करना पड़ता है जब वो मैनेजर्स की हेल्प लेते है. जहाँ तक मेरी कंपनी की बात है तो मेरे सिर्फ दो गोल है. पहला ये कि मैं और मेरा पार्टनर चार्ली, हम दोनों ही अपनी कंपनी को ओवरवैल्यूएड नहीं करना चाहते. हम चाहते है कि हमारी कंपनी की टू वर्थ का पता इसकी रिपोर्ट से चले और हमारा सेकंड गोल है, लॉन्ग टर्म पार्टनरशिप. अगर हमारे पार्टनर आए दिन पार्टनरशिप तोड़ते रहेंगे तो ये काफी निराश करने वाली बात होगी. हमें इस तरह की कोई हरकत बर्दाश्त नहीं कर सकते. क्या किसी स्कूल या चर्च के मेंबर उन्हें छोड़कर चले जाते है तो क्या आपने उन्हें खुश होते देखा है ? हम यही चाहेंगे कि सिर्फ वही लोग हमारी कंपनी में इन्वेस्ट करे जो हमारे साथ लॉन्ग टर्म रिलेशनशिप बनाये और हम पर भरोसा रखे. एक और चीज़ जो आपको पता होनी चाहिए वो है कंपनी शेयर्स की रीपरचेजिंग? सकते. क्या किसी स्कूल या चर्च के मेंबर उन्हें छोड़कर चले जाते है तो क्या आपने उन्हें खुश होते देखा है ? हम यही चाहेंगे कि सिर्फ वही लोग हमारी कंपनी में इन्वेस्ट करे जो हमारे साथ लॉन्ग टर्म रिलेशनशिप बनाये और हम पर भरोसा रखे. एक और चीज़ जो आपको पता होनी चाहिए वो है कंपनी शेयर्स की रीपरचेजिंग? जब आप सुनते है कि किसी कंपनी ने अपने शेयर्स रीपरचेज किए है यानी वापस खरीद लिए हैं तो ये आपके लिए अच्छी खबर है. सबसे पहले तो आपको पता होना चाहिए कि कंपनी तभी रीपरचेज करती है जब उसे लगता है कि कंपनी अंडरवैल्यूएड है और वो अपनी टू वर्थ जानती है. दूसरी बात, कोई क्यों शेयर्स रीपरचेज करेगा अगर उसे कंपनी पर भरोसा ही नहीं होगा तो? मेरे कई शेयरहोल्डर्स मुझे सजेस्ट कर चुके है कि मुझे अपनी कंपनी बर्कशायर के शेयर्स रीपरचेज कर लेने चाहिए और कई बार मैंने ऐसा ना करने की गलती की है. लेकिन जहाँ तक मुझे लगता है कि हमें अपने स्टॉक्स रीपरचेज करने की तब तक जरूरत नहीं है जब तक कि प्राइस अपनी टू वैल्यू से काफी नीचे नहीं गिर जाते. The Essays of Warren Buffett: Lessons for Corp… Warren Buffett Mergers and Acquisitions वॉरेन बफेट यहाँ दूसरी कंपनीज़ के साथ एक्वीजिश्न और मर्जर की बात करते है. वो उन कंपनीज़ की बात करते है जिन्हें वो खरीदना चाहते वॉरेन बफेट एकाउंटिंग फिगर्स की भी बात करते है जिसका हमें इन्वेस्ट करने से पहले ध्यान रखना चाहिए. इसमें कुछ स्टेटेस्टिक्स शामिल है जो काफी यूज़ किए गए है और साथ ही एक लेटेस्ट इंडेक्स, यानि जो अर्निंग्स की जानकारी दे! एक एक्टिविटी जो मुझे पसंद है वो है कि मैं ऐसे अच्छे बिजनेस को खरीदना पसंद करता हूँ जिनका इकॉनोमिक स्टेट्स बढ़िया है. चार्ली और मैं बिजनेस ऐसे ढूंढते है जैसे कोई अपने लिए लाइफ पार्टनर ढूंढता है. लेकिन अगर हम एक्टिव है, ओपन माइंडेड और इंट्रेस्टेड रहे तो हमें ऐसे बिजनेस मिल भी जाते है पर अगर हम जल्दबाजी में ढूंढें तो कई बार नुकसान भी हो जाता है. ठीक वैसे ही जैसे आप जल्दबाजी में किसी से शादी करके पछताते हो, ऐसे ही बिजनेस सेलेक्ट करते वक्त भी जल्दबाजी से काम नहीं लेना चाहिए.. मेरे शुरुवाती दिनों में मैंने कई बार ऐसे बिजनेस खरीद लिए थे जो उतने अच्छे नहीं थे पर वो उनकी रेटिंग मेरे शुरुवाती दिनों में मैंने कई बार ऐसे बिजनेस खरीद लिए थे जो उतने अच्छे नहीं थे पर वो उनकी रेटिंग अच्छी थी. फिर बाद में मैंने अपनी स्ट्रेटेज़ी बदली और सिर्फ वही बिजनेस एक्वायर किए जिन्हें गुड रेटेड माना भी जा सकता था और नहीं भी. हम छोटे कमिटमेंट अवॉयड करते है. एक बार अगर हमने किसी कंपनी में इन्वेस्ट किया तो वो इसलिए क्योंकि लॉन्ग टर्म कमिटमेंट में यकीन रखते है. अब बात करते है दूसरी कंपनी के साथ बिजनेस मर्ज करने की, तो मैं यहाँ एक स्ट्रिक्ट और फ़ास्ट रुल फॉलो करता हूँ. मैं तब तक शेयर्स इश्यू नहीं करूंगा जब तक कि मुझे उतना इंट्रीसिंक बिजनेस वैल्यू नहीं मिलता जितना कि मैं उन्हें दे रहा है . लेकिन आप इसके बारे में सोच कर देखो. क्यों कोई 5 डॉलर के बदले 5 सेंट लेना चाहेगा? मैं मर्ज तभी करना पसंद करूंगा जब मुझे ये पता हो कि एसेट् की सही वर्थ क्या है. एक्विजिश्न भी कई तरह की हो सकती है. ये leveraged buyouts हो सकती है. एक लेवेज्ड बायआउट में एक्विजिशन का कॉस्ट निकालने के लिए borrowed मनी यानी लोन लिए हुए पैसों का एक बड़ा हिस्सा यूज़ किया जाता है. इस बात पर हम एक स्टोरी से एक्जाम्पल ले सकते है. एक बार एक बीमार घोड़े का मालिक डॉक्टर के पास गया और कहा कि मेरा घोड़ा कभी तो लंगडा के MAP इस बात पर हम एक स्टाररा स एक्जाम्पलल सात है. एक बार एक बीमार घोड़े का मालिक डॉक्टर के पास गया और कहा कि मेरा घोड़ा कभी तो लंगड़ा के चलता है और कभी ठीक चलता है. इस पर डॉक्टर ने कहा “परेशानी की कोई बात नहीं है, घोड़ा जिस वक्त ठीक-ठाक चल रहा हो, तभी उसे बेच दो”. तो कॉर्पोरेट कंपनी भी कुछ ऐसा ही करने की कोशिश करती है. जब कंपनी अच्छी चल रही हो, उस वक्त वो उसे बेचने की कोशिश करती है, लेकिन असल में उन्हें ही पता होता है कि कंपनी के अंदर क्या चल रहा है. तो ये एक अहम पॉइंट है जो आपको नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए. जब मैं कंपनी एक्वायर करने का डिसीजन लेता हूँ तो मैं उन्ही कंपनी को चूज़ करता हूँ जिनके ओनर्स को मैं बतौर मैनेजर्स रख सकू. मुझे ऐसी कंपनी खरीदना पसंद है जिनके ओनर्स ने बेहद प्यार से बिजनेस की नींव रखी होती है और जो आगे भी कंपनी से जुड़े रहना चाहते है. ज्यादातर लोग एकाउंटिंग फिगर्स देखना नापसंद करते है, लेकिन उन पर एक नज़र डालना बेहद इम्पोर्टेट है. एक इंडेक्स जिसके बारे में आपको पता होना चाहिए, वो है इंट्रीसिंक वैल्यू. इंट्रीसिंक वैल्यू वो वैल्यू है जो किसी कॉम्प्लीकेट फ्यूचर प्रॉब्लम को कंसीडर किए बगैर एसेट्स की केलकुलेटेड वैल्यू होती है. ये एक्चुअल वैल्यू नहीं होती बस एक एस्टीमेट होता है. यानि बस एक रफ फिगर जिससे कि आपको अंदाजा हो जाए अगर दो लोग किसी कंपनी के सेम फैक्स पार पाएसरा पा पाणपु.७ पास ९.५ एक्चुअल वैल्यू नहीं होती बस एक एस्टीमेट होता है. यानि बस एक रफ फिगर जिससे कि आपको अंदाजा हो जाए. अगर दो लोग किसी कंपनी के सेम फैक्ट्स पर नज़र डाले तो दोनों को ही ऑलमोस्ट सेम इंट्रीसिंक वैल्यू मिलेगी. यही वजह है कि मेरी कंपनी इस वैल्यू को रिपोर्ट में नहीं दिखाती. इसके बजाए रिपोर्ट में वो सारे फैक्ट्स दिये जाते है जिनसे आप खुद वैल्यू केलकुलेट कर सके. लेकिन हम जो -शेयर बुक वैल्यू प्रेजेंट करते है, उसकी भी लिमिटेड इम्पोर्टेस होती है. ये इंडेक्स टोटल अवलेबल एसेट्स (लाएबीलीटीज़ और डेट्स के बगैर) और उन स्टॉक्स के बीच का रेश्यो है जो अभी शेयरहोल्डर्स के पास है. इस फिगर की लिमिटेड इम्पोर्टेस है क्योंकि ये कंपनी की इंट्रीसिक वैल्यू से काफी अलग हो सकती है. बर्कशायर में एक अच्छी चीज़ है कि हमारी इंट्रीसिक वैल्यू कभी गलत नहीं हो सकती. वो इसलिए क्योंकि हमारी अर्निंग स्टेबल है और debt यानी लोन मिनियम है. यानि बर्कशायर की इंट्रीसिकं वैल्यू ज्यादातर कंपनी के मुकाबले काफी हद तक सही-सही केलकुलेट की जा सकती है. तो आप इसका अंदाजा कैसे लगायेंगे अगर सारे फिगर्स ही कुछ हद तक गलत हो? तो जवाब है कि अर्निंग्स देखो! आप वो अर्निग देखो जो करंट अर्निंग्स के तौर पर अकाउंट में जा रही है और उसे आने वाले सालो में एक्स्पेक्टेड अर्निंग्स के तौर पर एड कर दो. मैं annual रिपोर्ट देखने के बजाय इस बात पर सकती. वो इसलिए क्योंकि हमारी अर्निंग स्टेबल है और debt यानी लोन मिनियम है. यानि बर्कशायर की इंट्रीसिकं वैल्यू ज्यादातर कंपनी के मुकाबले काफी हद तक सही-सही केलकुलेट की जा सकती है. तो आप इसका अंदाजा कैसे लगायेंगे अगर सारे फिगर्स ही कुछ हद तक गलत हो? तो जवाब है कि अर्निंग्स देखो! आप वो अर्निंग देखो जो करंट अर्निंग्स के तौर पर अकाउंट में जा रही है और उसे आने वाले सालो में एक्स्पेक्टेड अर्निंग्स के तौर पर एड कर दो. मैं annual रिपोर्ट देखने के बजाय इस बात पर ज्यादा ध्यान दूंगा कि कंपनी लॉन्ग टर्म में क्या करने जा रही है. एक ब्लैक स्कोल्स मॉडल भी है जो आपको थियोरीटीकल वैल्यू या फेयर प्राइस डिसाइड करने में हेल्प करेगा लेकिन अगर लंबे पीरियड तक अप्लाई किया जाए तो ये इंडेक्स अजीब रिजल्ट भी दे सकता है. फिर भी चार्ली और मैं इस फ़ॉर्मूला को अपनी फाईनेंशीयल स्टेटमेंट में यूज़ करते है. ज़्यादातर बिजनेस स्कूल इस फ़ॉर्मूला को पढाते है और अगर हम लोग इसे अपनी रिपोर्ट में शामिल ना करे तो हमारे बिजनेस पर भी गडबड घोटाले का शक किया जा सकता है. The Essays of Warren Buffett: Lessons for Corp… Warren Buffett Accounting Shenanigans वॉरेन बफेट आगे एक्सप्लेन करते है कि कौन से एकाउंटिंग प्रैक्टिस फॉलो किए जाते है और कैसे कंपनी इन्हें मेनीपुलेट करके इन्वेस्टर्स को धोखा देती है. इसलिए वॉरेन हमें ऐसे तरीकों से बचकर रहने की सलाह देते है. कंपनी के डेटा रिपोर्ट करने के लिए चाहे जो भी मेथड यूज़ हो, उसमे ये तीन सवाल जरूर पूछे जाने चाहिए.] कंपनी की वर्थ कितनी है? 2. क्या ये फ्यूचर ऑब्लिगेशन पूरी कर पाएगी. 3. कंपनी के मैनेजर कितने काबिल है? ज्यादातर होता है ये कि कंपनी GAAP यूज़ करती है यानि or Generally Accepting Accounting Principles. ये वो स्टैण्डर्ड सेट है जिसका गोल है एकाउंटिंग इन्फोर्मेशन की रिपोर्ट देना. पर इन तीनो सवालों के जवाब देने के लिए GAAP ही काफी नहीं है. कुछ लोग इन्वेस्टर्स को धोखा देने के लिए GAAP का यूज़ करते है क्योंकि वो जानते है लोग GAAP को सिरियसली लेते है इसलिए वो कुछ इस तरह से फिगर सामने रखते है कि एकाउंटिंग रिजल्ट GAAP के साथ मैच कर जाए, पर असल में ये एकदम झूठ होता है. इसे करने का दूसरा तरीका भी है. नेट इन्कम एक ऐसा इंडेक्स है जो काफी पोपुलर है. बर्कशायर में हम AA A sAਜਾ ਨਾ ਰh में A < इसे करने का दूसरा तरीका भी है. नेट इन्कम एक ऐसा इंडेक्स है जो काफी पोपुलर है. बर्कशायर में इंडेक्स को लीगली कोई भी नंबर बना सकते है. मैं आपको बताता हूँ कैसे. नेट इन्कम में रिएल गेन्स यानि एक्चुअल प्रॉफिट शामिल होते है नाकि अनरिएलाईज्ड गेन्स( पोटेंशियल प्रोफिट जो सिर्फ पेपर में दिए होते है). पर चार्ली और मैं नंबर्स के साथ ज्यादा छेड़छाड़ करना पसंद नहीं करते हालंकि आपको अलर्ट रहना चाहिए क्योंकि कुछ कॉर्पोरेशन ऐसा करते है. एक और ऐसा ही तरीका है रीस्ट्रक्चरिंग चार्ज. ओरिजनली ये एक वन टाइम कॉस्ट होता है जो कंपनी अपना बिजनेस रीऑर्गनाईज़ करते वक्त पे करती है. ये लीगल है पर लोग इसमें फिगर्स के साथ छेड़छाड़ कर सकते है. तो होता ये है कि पिछले कई सालो से चले आ रहे नुक्सान के लिए किसी एक सिंगल घटना को ब्लेम कर दिया जाता है. ये घटना वो होती है जहाँ उम्मीद होती है कि नंबर डाउन जायेंगे. ये एक गोल्फर की तरह है जिसने एक राउंड में 140 स्कोर किया जबकि बाकि राउंड्स में उसका एवरेज स्कोर 80 रहा. तो वो गोल्फ शॉप पर जाकर पने स्विंग्स रीस्ट्रक्चर करता है. और जब वापस फील्ड में आता है तो बजाए 140, 80,80, 80,80, के वो 91, 94,89,94,92 शो करता है. इससे इन्वेस्टर्स धोखे में आ जाते है जिन्हें लगता है कि कंपनी लगातार अच्छा परफोर्म करती रही है. जब कंपनी एक्वायर होती है तो ट्रांजेक्शन के लिए दो टेक्नीक यूज़ होती है: परचेजिंग और पूलिंग. परचेजिंग A < इससे इन्वेस्टर्स धोखे में आ जाते है जिन्हें लगता है कि कंपनी लगातार अच्छा परफोर्म करती रही है. जब कंपनी एक्वायर होती है तो ट्रांजेक्शन के लिए दो टेक्नीक यूज़ होती है: परचेजिंग और पूलिंग. परचेजिंग यानि एसेट्स और लाएबिलिटीज़ फेयर वैल्यू के हिसाब से रिकॉर्ड की जाती है. पूलिंग में एसेट्स और लाएबिलीटीज़ बुक वैल्यू के हिसाब से रिकॉर्ड होती है यानी उस वैल्यू पर जिस पर एसेट्स ओरिजनली खरीदे गए थे. पर फाईनेंशीयल एकाउंटिंग स्टैंडर्ड बोर्ड ने पूलिंग पर रोक लगा दी है. एक और चेंज जो मैंने नोटिस किया है वो GAAP में आया है. इसमें अब हमें बेलेंस शीट में अपनी सारी subsidiaries के बारे में मेंशन करना पड़ता है. पहले एक सिंगल फिगर से डेटा रीप्रेजेंट किया जाता था पर अब हमें उन सबका सेगमेंट डेटा मेंशन करना होता है जो हमारी चिल्ड्रन कंपनी होती है और टैक्स को लेकर भी कुछ नए रूल्स बने है. इससे हमारी लाएबिलिटीज़ को केलकुलेट करने का तरीका ही बदल जाता है. हमें अब फ्यूचर में दी जाने वाली पेंशन की लाएबिलिटी भी ध्यान में रखनी पडती है. इन सारी वजहों से आज कंपनी के लिए इन्वेस्टर्स को चीट करना बड़ा ईजी हो गया है इसलिए एक इन्वेस्टर को इन सब चीजों के बारे में नॉलेज होना जरूरी है. The Essays of Warren Buffett: Lessons for Corp… Warren Buffett Tax Matters इस चैप्टर में वॉरेन बफ़ेट टैक्स रिफार्म और उसके इम्पैक्ट के बारे में बता रहे है. वो एक्सप्लेन करते है कि कैसे टैक्स से जुड़े मामले कारपोरेशन और कंज्यूमर दोनों को इम्पैक्ट करते है. 1986 के टैक्स रिफार्म ने हमें कई तरह से अफेक्टे किया है हालाँकि इसकी वजह से कई सारे बदलाव भी आए जो काबिले तारीफ है, पर कुल मिलाकर इसका हम पर नेगेटिव इम्पैक्ट ही ज्यादा रहा. एक तो इस एक्ट की वजह से हमारे बिजनेस की ग्रोथ रेट वैसे ही स्लो होने वाली है और ऊपर से ये हमारे शेयरहोल्डर्स को और भी बुरी तरह इम्पैक्ट करेगा. पहले जहाँ हर डॉलर पर 80 सेंट्स बनते थे, वो अब सिर्फ 72 रह गए है और ये इसलिए हुआ क्योंकि टैक्स 20% से 28 % हो गया. बर्कशायर में टैक्स रेट हमारे आर्डिनरी इनकम( सैलरी, बर्कशायर में टैक्स रेट हमारे आर्डिनरी इनकम( सैलरी, टिप्स, रेंट) वगैरह से 46% से 34% तक बढ़ जायेगा. तो जाहिर है ये चीज़ हमें पॉजिटिव वे में ही इम्पैक्ट करेगी. इस बारे में बहुत से लोगो के अलग-अलग विचार है. कुछ लोग सोचते है कि जो टैक्स पे किए जा चुके है, उन्हें कंज्यूमर्स पे कर चुके है. वेल, टैक्स घटने का मतलब है कि टैक्स घटने की वजह से हमें प्रॉफ़िट कम होंगे, है ना? जबकि बाकि लोगो को लगता है कि आप सिर्फ कारपोरेशन को टैक्स पे करते हो और इसका कंज्यूमर्स पर कोई ज्यादा असर नहीं पड़ता. लेकिन क्या यही सच है? सच तो ये है कि कुछ केस में लो कॉर्पोरेट टैक्स सिर्फ कारपोरेशन और उनके शेयरहोल्डर्स से वसूल किए जाते है, बाकि कंज्यूमर्स तो फायदे में रहते है. दूसरे केस में कंज्यूमर्स को टैक्स पे करने पड़ते है जबकि कॉर्पोरेशन फायदे में रहती है. तो ये कैसे पता चले कि आगे क्या होने वाला है? तो ये डिपेंड करता है बिजनेस की ताकत पर और इस बात पर कि वो बिज़नस रेगुलेटेड है या नहीं? रेगुलेटेड बिजनेस वो होते है जो सर्टिफाईड, रजिस्टर्ड और लाईसेंस्ड होते है. अगर कोई बिजनेस रेगुलेटेड है, जैसे मान लो किसी इलेक्ट्रिक यूटीलीटी में टैक्स में जो चेंजेस आयेंगे उससे प्राइस भी चेंज हो जायेंगे. तो अगर टैक्स कम इलेक्ट्रिक यूटीलीटी में टैक्स में जो चेंजेस आयेंगे उससे प्राइस भी चेंज हो जायेंगे. तो अगर टैक्स कम होते है तो प्राइस भी कम हो जायेंगे. हालाँकि अगर बिजनेस रेगुलेटेड नहीं है तो corporation और शेयरहोल्डर्स को टैक्स घटने का फायदा मिलेगा. हमारे कई बिजनेस अनरेगुलेटेड है. ज्यादातर टैक्स कम होने का असर कस्टमर्स की पॉकेट से ज्यादा हमारी पॉकेट पर पड़ता है. अगर ये सुनने में अजीब लग रहा है तो जरा अपने एरिया के किसी ब्रेन सर्जन के बारे में सोचे. अगर टैक्स कम होते है तो क्या आप ये एक्स्पेक्ट करेंगे कि सर्जरी का खर्च 50% से घटकर 28% हो जायेगा? नहीं ना, तो फिर ये क्यों आपको अजीब लग रहा है कि टैक्स घटने का सीधा असर ओनर्स की पॉकेट पर जाकर पड़ेगा? इस एक्ट से एक और चेंज ये आया है कि इससे कॉर्पोरेट कैपिटल गेन टैक्स रेट 28 से 34% तक बढ़ गया है. कैपिटल गेन्स वो एसेट्स होते है जो अभी कुछ भी प्रोड्यूस नहीं करेंगे पर फ्यूचर में इनसे अच्छे रिटर्न की उम्मीद की जा सकती है. लेकिन ये हमारे फेवर में नहीं है क्योंकि हम कैपिटल गेन से अपने गेन की उम्मीद करते है. जैसे एक्जाम्पल के लिए, हमारे तीन मेजर इन्वेस्टमेंट होल्डिंग, Cap Cities, CEICO All Done? Finished उम्मीद करते है. जैसे एक्जाम्पल के लिए, हमारे तीन मेजर इन्वेस्टमेंट होल्डिंग, Cap Cities, CEICO और Washington Post के मार्केट वैल्यू है $1.7 बिलियन, लेकिन एनुअल return सिर्फ $9 मिलियन है. तो एक तरह से हम फ्यूचर में कैपिटल गेन्स की हाई डिलीवरी एक्स्पेक्ट कर रहे है और डिविडेंड और इंटरेस्ट इन्कम पर भी भारी भरकम टैक्स लगेगा जिससे हमारी अर्निंग करीब 10% तक कम हो जायेगी. टैक्स की बात करे तो चार्ली और मैं उस बारे में कोई शिकायत कर ही नहीं रहे. हम समझते है कि हमारे एफर्ट का हमें काफी फायदा होने वाला है. हम कंपनी में एक शेयर लेने के बजाए पूरा 100% तक एक्वायर करना चाहेंगे. वो इसलिए क्योंकि टैक्स लॉज़ हमारे लिए इसे और भी प्रॉफिटेबल बना देते है ताकि हम कंपनीज़ के कुछ शेयर्स के बदले 80% तक ओनरशिप ले सके. हम एक्चुअल में उम्मीद कर सकते है कि हमारे टैक्स फ्यूचर में बढ़ेंगे यानि सीधा मतलब है कि हमारी कंपनी अमीर हो रही है. Conclusion ये समरी कुछ ऐसे इंट्रेस्टिंग और वैल्यूएबल लैटर्स का कलेक्शन है जो वॉरेन बफ़ेट ने अपने शेयरहोल्डर्स कंपनीज़ के कुछ शेयर्स के बदले 80% तक ओनरशिप ले सके. हम एक्चुअल में उम्मीद कर सकते है कि हमारे टैक्स फ्यूचर में बढ़ेंगे यानि सीधा मतलब है कि हमारी कंपनी अमीर हो रही है. Conclusion ये समरी कुछ ऐसे इंट्रेस्टिंग और वैल्यूएबल लैटर्स का कलेक्शन है जो वॉरेन बफ़ेट ने अपने शेयरहोल्डर्स के लिए लिखे थे. वॉरेन बफ़ेट के फाइनेंसियल विज़डम और बेहद कीमती एक्सपीरियंस से भरे हुए ये लैटर जो एक बुक की शक्ल में है, एक इन्वेस्टर या शेयरहोल्डर होने के नाते आपके लिए गाईड की तरह काम करेंगे और इन्वेस्टमेंट की फील्ड में आपके बेहद काम आयेंगे. ये आपको टैक्स, एक्वीज़ीशन, मर्जर और फाइनेंस जैसे मामलों पर एक billionaire इन्वेस्टर के नज़रिए से वाकिफ कराएगी. इसमें आप जो essay पढ़ेंगे, वो इस आर्डर में अरेंज किए गए है जो उन लोगो के लिए बेहद काम के है जो इन्वेस्टमेंट की फील्ड को और गहराई से जानना और समझना चाहते है.

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