The Checklist Manifesto: How to Get Things Right Atul Gawande Books In Hindi Summary

The Checklist Manifesto:
How to Get Things Right
Atul Gawande
इंट्रोडक्शन
क्या आपने अपनी जिंदगी में या टीवी पर कोई
emergency ऑपरेशन होते हुए देखा है? क्या
आप कभी इस बात से चकित हुए हैं कि डॉक्टर या नर्स
अपना काम कैसे मैनेज करते हैं? क्या आपने कभी
सोचा है कि वो लोग अपना काम इतने अच्छे से कैसे
कर लेते हैं?
इस बुक में आप सीखेंगे कि चेकलिस्ट की पॉवर क्या
होती है. चेकलिस्ट वो लिस्ट है जो बताती है कि आपको
कौन सा काम कैसे करना है. हो सकता है कि आपको
लगे कि ये तो बहुत आसान है लेकिन आप यहाँ सीखेंगे
कि कैसे प्रोफेशनल्स, जैसे कि डॉक्टर या पायलट,
जितना हो सकता है उतना अपने काम के लिए
चेकलिस्ट यूज़ करते हैं. चेकलिस्ट हमारा समय बचाने
के साथ-साथ अच्छे से काम करने में भी मदद करती
है. आप ये भी सीखेंगे कि एक अच्छे और बुरे चेकलिस्ट में
क्या फ़र्क होता है और आप अपने लिए बेस्ट चेकलिस्ट
कैसे बना सकते हैं. चाहे आप कोई भी काम करते हों
लेकिन जब करने के लिए बहुत सा काम हो तो टेंशन
तो हो ही जाती है.
इस बुक से आप सीखेंगे कि कैसे एक छोटी सी
चेकलिस्ट आपके काम को बेहद आसान बना सकती
है. जब आप चेकलिस्ट यूज़ करना सीख जाएँगे तो
आपके काम में गलतियां कम होंगी और आप अपना
हर काम बिना कोई ज़रूरी स्टेप भूले ठीक से पूरा कर
पाएँगे.
Extreme complexity ki problems
एक बार हॉस्पिटल में एक ऐसा केस आया जिसने
ऑथर का ध्यान अपनी ओर खींचा. वो एक परिवार के
बारे में था जो जंगल में टहल रहे थे. बस कुछ पलों के
लिए माँ बाप की नज़र ओनी तीन साल की बच्ची से हट
गई लेकिन उसी पल में बहुत कुछ हो गया. वो बच्ची
एक बर्फ के तालाब में गिर गई. माँ बाप ने बच्ची को
बहुत ढूंढा और आखिर आधे घंटे बाद उन्हें बच्ची मिली.
बच्ची पानी में जमकर बेहोश हो गई थी.
माँ बाप बुरी तरह घबरा गए लेकिन जैसे तैसे उन्होंने
emergency टीम को हालात के बारे में बताया.
जब तक वो टीम वहाँ पहुँचती तब तक माँ बाप बच्ची
को CPR देते रहे. CPR में इंसान की चेस्ट को
बार-बार दबाया जाता है ताकि उसका दिल काम करना
बंद ना करे.emergency टीम भी बच्ची की हालत देखकर
मायूस हो गए. उस बच्ची के शरीर में कोई हरकत नहीं
हो रही थी. ना उसकी नब्ज़ चल रही थी और ना ऐसा
लग रहा था जैसे वो सांसें ले रही हो. जब उन्होंने बच्ची

हो रही थी. ना उसकी नब्ज़ चल रही थी और ना ऐसा
लग रहा था जैसे वो सांसें ले रही हो. जब उन्होंने बच्ची
की आँखों पर रौशनी डाली तो उन्हें बच्ची से कोई
रिएक्शन नहीं मिला. इससे पता चलता है कि उसके
दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था. उस तालाब का
बर्फीला पानी और मिटटी उसके lungs में भर गए थे.
ऐसा लगने लगा जैसे उसने दम तोड़ दिया हो.
emergency टीम ने बिना समय गवाएं हेलीकाप्टर
मंगवाया और उसे हॉस्पिटल ले गए. रास्ते में भी वो उसे
CPR देते रहे कि शायद कोई उम्मीद हो उसके बचने
की. जैसे ही वो हॉस्पिटल पहुंचें, सर्जरी करने वाले
डोक्टरों ने उसकी बॉडी से हार्ट-lung बाईपास मशीन
को जोड़ा. यह मशीन उसके शरीर में खून को पंप
करती रहेगी, क्योंकि उसके दिल और lungs काम
नहीं कर रहे थे.
सर्जन ने उसकी कमर के पास एक कट लगाया और
सिलिकॉन की रबर ट्यूब उसकी आर्टरी से जोड़ दिया.
ये ट्यूब बच्ची के शरीर से खून बाहर निकालने में मदद
करेगी. इसके साथ ही एक और सिलिकॉन ट्यूब को
जोड़ा गया एक नस में जोड़ा गया ताकि खून को दोबारा
उसके शरीर में भेजा जा सके.
उस मशीन से जोड़ने से लेकर करीब डेढ़ घंटे तक वो
बच्ची बेजान थी. लेकिन उसकी नसों में खून पहुँचने से
उसके शरीर का टेम्परेचर बढ़ने लगा. उसका दिल फ़िर
से धड़कने लगा. लेकिन अभी भी ख़तरा टला नहीं था.

बच्ची के lungs ख़राब हो चुके थे. उसमें तालाब
का पानी, मिटटी, पेड़ की टहनियां और काफ़ी गंदगी
भर गया था. इसी वजह से उसके lungs बॉडी को
ऑक्सीजन नहीं दे पा रहे थे. इसलिए, मेडिकल टीम
ने फैसला किया कि कुछ समय के लिए उसकी बॉडी
को एक आर्टिफीसियल lung सिस्टम से जोड़ देंगे
जिससे उसकी बॉडी को फ़िर से ऑक्सीजन मिल सके.
डॉक्टरों ने उसके चेस्ट को खोला और उसके दिल को
मशीन से जोड़ दिया.

दिन रात लगातार डॉक्टर बच्ची को बचाने में लगे
रहे. वो उस पर fiberoptic bronchoscopy
परफॉर्म करते रहे जिसका मतलब है कि वो इसके
ज़रोए उसके lungs से पानी और मिटटी निकालते
रहे. अगले दिन, बच्ची का lungs थोड़ा बेहतर हुआ.
जब उसके ब्रेन को चेक किया गया तो उसमें में सूजन
आ गई थी लेकिन डॉक्टर उसे कंट्रोल करने में कामयाब
रहे. लगभग एक हफ्ते तक वो बच्ची बेहोश और कोमा
जैसी कंडीशन में रही. लेकिन कुछ हफ़्ते गुज़रने के
बाद उसके सारे organ धीरे-धीरे ठीक होने लगे और
वो बेहतर होने लगी.
क्या आपको नहीं लगता कि डॉक्टरों की पूरी टीम
बिलकुल एक सुपर हीरो की तरह थी? वो बच्ची को
मौत के मुहं से बचा कर ले आए थे. उन्होंने जो किया
वो बेहद मुश्किल था. जो चीज़ इसे और भी ख़ास और
अन्दत बनाती है वो ये है कि ये काम किसी अकेले

वो बेहद मुश्किल था. जो चीज़ इसे और भी ख़ास और
अद्भुत बनाती है वो ये है कि ये काम किसी अकेले
आदमी के बस की बात नहीं थी. इस ऑपरेशन में बहुत
सारे लोगों ने साथ मिलकर काम किया ताकि ऑपरेशन
का हर स्टेप पूरी तरह सफ़ल हो पाए और बच्ची की
जान बच जाए.
क्या आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उन्हें किस लेवल
की coordination और तालमेल करने की ज़रुरत
पड़ी होगी? ये मत भूलिएगा कि डॉक्टरों के पास ये
सिर्फ़ एक केस नहीं था. उस टीम के हर इंसान को कई
और केस को भी हैंडल करना था. चाहे ये लोग अपने
काम में कितने भी एक्सपर्ट क्यों ना हों, हर किसी से
कहीं ना कहीं गलती तो ही जाती है. हर साल, लगभग
1,50,000 से ज़्यादा लोग सर्जरी के दौरान अपनी
जान गवां देते हैं.
एक स्टडी ये बताती है कि इनमें से करीबन 50% लोगों
को बचाया जा सकता था. हो सकता है कि मेडिकल
टीम का कोई मेंबर सर्जरी से पहले हाथ धोना भूल
गया हो या मास्क पहनना भूल गया हो. हो सकता है
कि ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाले टूल्स को ठीक से
sanitize नहीं किया गया हो जिससे इन्फेक्शन हो
गया और पेशेंट की मौत हो गई.
चाहे ये लोग अपने काम में कितने भी trained क्यों
ना हों, उन्हें कितने ही सालों का एक्सपीरियंस क्यों ना
हो, कई बार वो भी कुछ ना कुछ भूल जाते हैं. तो हम
इससे कैसे बच सकते हैं? कैसे हम ज़्यादा से ज़्यादा
लोगों की जान बचा सकते हैं?

The Checklist Manifesto:
How to Get Things Right
Atul Gawande
Checklist
1930 के दौरान, US military Air Corps ने ये
चेक करने के लिए एक competition organise
किया कि कौन से Airplane manufacturer
उनके ऑफिसियल सप्लायर होंगे. जो प्लेन Boeing
लेकर आया था वो अब तक का उनसे सबसे ख़ास
और बेस्ट प्लेन था. वो प्लेन ऐसा था जिससे नज़रें
हटाना मुश्किल था. Boeing 299 के 103 foot
बड़े wings थे और बाकी प्लेन के मुकाबले उसमें दो
की जगह चार इंजन थे. वो बहुत ही आसानी से ज़मीन
से उठकर आसमान में करीब 300 फ़ीट उंचा उड़ा.
Boeing को वो डील लगभग मिल ही गई थी लेकिन
कुछ ही मिनटों बाद वो प्लेन रुका और फट गया. 5 में
से दो 2 क्रू मेंबर्स की मौत हो गई जिनमें से एक पायलट
था.
बाद में जब इस केस की इन्वेस्टीगेशन हुई तो पता चला
कि प्लेन में कोई भी गड़बड़ नहीं थी. उस इन्वेस्टीगेशन
की रिपोर्ट में सामने आया कि ये एक्सीडेंट पायलट
की एक गक्ति की वजह से हुई थी. उस प्लेन के
इंजन, लैंडिंग गियर और दूसरे हाई टेक फीचर काफ़ी
कॉम्प्लेक्स थे. क्योंकि पायलट को कई चीज़ों को ध्यान
में रतना शा तो तो पकातकरी स्टेगा मॉलो करना भल

कॉम्प्लेक्स थे. क्योंकि पायलट को कई चीज़ों को ध्यान
में रखना था तो वो एक ज़रूरी स्टेप फॉलो करना भूल
गए. जिस वजह से प्लेन क्रेश हो गया और पायलट
की मौत हो गई. अंत में Air cops दूसरी कंपनी
“Martin and Doughlas” के पास गए. इसके
बावजूद आर्मी ने Boeing से कुछ प्लेन ख़रीदे.
कुछ लोग इस बात से सहमत थे कि Boeing 299
ज़रूर उड़ाया जा सकता था. इस बात को साबित
करने के लिए कुछ पायलट्स को चुना गया. हालांकि
उन्होंने जो तरीका अपनाया वो बड़ा अलग, चौंकाने
वाला लेकिन अच्छा तरीका था. एक नई टीम ने उन
पायलट्स के लिए एक चेकलिस्ट बनाई. जो लोग थोड़े
एक्सपीरियंस्ड होते हैं उनके लिए एक चेकलिस्ट को
फॉलो कर काम करना बेहद मुश्किल होता है. उनके
लिए चेकलिस्ट एक बेकार सी चीज़ है. ये बिलकुल
ऐसा था जैसे आपको अपनी गाड़ी garage से बाहर
निकालनी हो और किसी ने आपके लिए एक चेकलिस्ट
बना दी हो.
लेकिन Boeing 299 एक कॉम्प्लेक्स प्लेन था. ये
इतना पेचीदा था कि चाहे कोई एक्सपर्ट ही क्यों ना हो,
एक अकेला इंसान सब कुछ ध्यान में नहीं रख सकता
था.
पायलट के लिए बनाई गई चेकलिस्ट बहुत आसान थी.
उस लिस्ट में हर चीज़ का स्टेप लिखा हुआ था यानी
जब वो टेक ऑफ करते, या प्लेन उड़ाते या जब लैंड

उस लिस्ट में हर चीज़ का स्टेप लिखा हुआ था यानी
जब वो टेक ऑफ करते, या प्लेन उड़ाते या जब लैंड
करते, इसलिए वो पायलट्स के लिए एक पूरी गाइड
जैसी थी.
सुनने में ऐसा लगता है कि ऐसा करने की क्या ज़रुरत
थी, आखिर पायलट को प्लेन उड़ाना ना आता हो तो
उन्हें पायलट थोड़ी कहा जा सकता है. शायद आपको
लग रहा होगा कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ा पर ऐसा
नहीं है. अबकी बार जब पायलट ने चेकलिस्ट को यूज़
कर Boing 299 को दूर तक उड़ाया तब एक भी
एक्सीडेंट नहीं हुआ.
आजकल ज़्यादातर प्रोफेशनल फ़ील्ड्स बेहद मुश्किल
हैं. सोचिए किसी डेंटिस्ट को दांतों की केविटी भरनी
हो या कोई सर्जन हार्ट की सर्जरी कर रहा हो. अगर ये
लोग सब कुछ सिर्फ़ याद कर के काम करेंगे तो इनके
लिए कितना मुश्किल होगा, इन्हें हर चीज़ ध्यान में
रखनी होगी. हमारी याददाश्त हमेशा हमारा साथ नहीं
देती. जब हमें किसी चीज़ को रोज़ करने की आदत हो
जाती है तो हम अक्सर कुछ ना कुछ भूल जाते हैं.
ऐसा हम जानबूझकर नहीं करते लेकिन हमारा दिमाग
उन चीज़ों पर ज़्यादा फोकस करता है जो नई हैं या
जिस पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रुरत है. हम सोचते हैं
कि अगर कोई स्टेप आसान है तो उसे छोड़ देने से कुछ
नहीं होगा. लेकिन एक ना एक दिन हमें उस स्टेप को
छोड़ने के नतीजे को भुगतना पड़ता है. चेकलिस्ट की
मदद से हम इन छोटे मगर इम्पोर्टेन्ट स्टेप्स को भूलेंगे
नहीं. ये हमें एहसास दिलाती हैं कि ये छोटे स्टेप्स इतने

छोड़ने के नतीजे को भुगतना पड़ता है. चेकलिस्ट की
मदद से हम इन छोटे मगर इम्पोर्टेन्ट स्टेप्स को भूलेंगे
नहीं. ये हमें एहसास दिलाती हैं कि ये छोटे स्टेप्स इतने
ज़रूरी क्यों हैं.
जॉन हॉपकिंस (John Hopkins) हॉस्पिटल के एक
क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट पीटर प्रोनोवोस्ट (Peter
Pronovost) ने 2001 में डोक्टरों के लिए एक
चेकलिस्ट बनाने की कोशिश की. उन्होंने एक ऐसे रिस्क
पर फोकस किया जो डॉक्टर्स अपने पेशेंट को दे सकते
थे, वो था सेंट्रल लाइन्स को इन्फेक्ट करना. सेंट्रल
लाइन्स कैथेटर होते हैं जिन्हें पेशेंट की नसों में डाला
जाता है जब हार्ट, किडनी या lungs काम करना बंद
कर देते हैं. ये लाइन बाईपास मशीन या डायलिसिस
मशीन से कनेक्ट की जाती है ताकि पेशेंट स्टेबल रह
सके अगर उसके main organs काम करना बंद
कर दे तो. अगर डॉक्टर इस प्रोसेस में कोई भी स्टेप
लेना भूल जाएंगे तो पेशेंट के ब्लड में सीधे germs
जा सकते हैं जिस से उसके अंदर के organ इन्फेक्ट
हो सकते हैं.
प्रोनोवोस्ट ने एक पेपर पर लिस्ट बनाई जिसमें उन्होंने
सेंट्रल लाइन्स के सेट अप के सारे स्टेप्स लिखे. बिलकुल
पायलट की चेकलिस्ट की तरह, ये लिस्ट भी बहुत
आसान थी. अगर आप ऐसे डॉक्टर होते जो सालों से
प्रैक्टिस कर रहे हैं तो आप इस चेकलिस्ट को देखकर
हँसते. आप आँखें बंद कर के भी सारे स्टेप्स फॉलो कर
लेते.

सबसे पहले अपने हाथ साबुन से धोना. दूसरा,
एंटीसेप्टिक से पेशेंट की स्किन साफ़ करना. तीसरा,
पेशेंट की पूरी बॉडी को स्टेराइल drape से कवर
करना. चौथा, स्टेराइल सर्जरी गाउन, कैप और फेस
मास्क पहनना. पांचवा, जैसे ही पेशेंट की नसों में सेंट्रल
लाइन जाए वैसे ही उस जगह पर स्टेराइल ड्रेसिंग
लगाना.
प्रोनोवोस्ट ने नर्स को कहा कि वो एक महीने तक इस
बात का ध्यान रखे कि डोक्टरों ने चेकलिस्ट के सारे
स्टेप्स को फॉलो किया या नहीं और इसके नतीजे बहुत
आश्चर्यजनक निकले. हर 3 में से एक पेशेंट की सर्जरी
के वक़्त डॉक्टर कम से कम एक बेसिक स्टेप भूल
जाते थे.
जॉन होपकिंस हॉस्पिटल के एडमिनिस्ट्रेशन ने
साफ़-साफ़ कह दिया था कि अगर कोई भी डॉक्टर
किसी भी स्टेप को भूलता है तो नर्स उन्हें रोक सकती
है और बता सकती है. अगर डॉक्टर नर्स की बात नहीं
सुनते तो हॉस्पिटल का एडमिनिस्ट्रेशन नर्स का पूरा
साथ देगा. करीब एक साल तक, चेकलिस्ट को को
सख्ती से लागू किया गया.
प्रोनोवोस्ट और उनके साथी नतीजे देखकर चकित रह
गए. हर 10 दिन में होने वाले सेंट्रल लाइन इन्फेक्शन के
पेशेंट 17% से घटकर 0% हो गए थे. अगले 15 महीनों
के लिए उन्होंने उन पेशेंट्स को ओब्सर्व किया जिनकी
सर्जरी चेकलिस्ट फॉलो करके हुई थी. उस समय दो ही
तो मेंटल नाटत तोनात तसा OTT टॉपिोरन लगाना.
प्रोनोवोस्ट ने नर्स को कहा कि वो एक महीने तक इस
बात का ध्यान रखे कि डोक्टरों ने चेकलिस्ट के सारे
स्टेप्स को फॉलो किया या नहीं और इसके नतीजे बहुत
आश्चर्यजनक निकले. हर 3 में से एक पेशेंट की सर्जरी
के वक़्त डॉक्टर कम से कम एक बेसिक स्टेप भूल
जाते थे.
जॉन होपकिंस हॉस्पिटल के एडमिनिस्ट्रेशन ने
साफ़-साफ़ कह दिया था कि अगर कोई भी डॉक्टर
किसी भी स्टेप को भूलता है तो नर्स उन्हें रोक सकती
है और बता सकती है. अगर डॉक्टर नर्स की बात नहीं
सुनते तो हॉस्पिटल का एडमिनिस्ट्रेशन नर्स का पूरा
साथ देगा. करीब एक साल तक, चेकलिस्ट को को
सख्ती से लागू किया गया.
प्रोनोवोस्ट और उनके साथी नतीजे देखकर चकित रह
गए. हर 10 दिन में होने वाले सेंट्रल लाइन इन्फेक्शन के
पेशेंट ]]% से घटकर 0% हो गए थे. अगले 15 महीनों
के लिए उन्होंने उन पेशेंट्स को ओब्सर्व किया जिनकी
सर्जरी चेकलिस्ट फॉलो करके हुई थी. उस समय दो ही
पेशेंट को सेंट्रल लाइन इन्फेक्शन हुआ था. हॉस्पिटल
की टीम की कैलकुलेशन के हिसाब से चेकलिस्ट ने
कमाल कर दिया था. चेकलिस्ट की वजह से 43
इन्फेक्शन और 8 मौत होने से बच गई थी. साथ ही
हॉस्पिटल ने 2,000,000 डॉलर भी बचाए.

The Checklist Manifesto:
How to Get Things Right
Atul Gawande
The End of the Master Builder
चेकलिस्ट एक सेफ्टी नेट की तरह काम करती है
चाहे लोग अपनी फील्ड में कितने ही एक्सपीरियंस्ड
क्यों ना हों. इंसान हर चीज़ याद नहीं रख सकता इसी
वजह से होने वाले हादसों को चेकलिस्ट रोक सकती
है. हालांकि, चेकलिस्ट की भी अपनी लिमिट होती
है. आपको समझना होगा कि कब आपको उनकी
ज़रुरत है और कब नहीं. प्रोफेसर बेंडा ज़िमरमैन और
शोलोम ग्लोबर्मन (Brenda Zimmerman and
Sholom Glouberman) के हिसाब से तीन तरह
की प्रॉब्लम होती है जिसे सिंपल, complicated
और कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम कहते हैं,
सिंपल प्रॉब्लम एक चॉकलेट केक बनाने की तरह होती
है. उसकी एक फिक्स रेसिपी होती है और उस रेसिपी
की मदद से आप आसानी से केक बना सकते हैं. जब
आपको केक बन जाएगा तब आप अगली बार भी वही
सेम रेसिपी फॉलो करेंगे.
complicated प्रॉब्लम ऐसा है जैसे rocket को
चाँद पर भेजना. ऐसी बड़ी प्रॉब्लम के अंदर छोटी छोटी
बहुत साड़ी सिंपल प्रॉब्लम छुपी होती है. हालांकि,
इसकी कोई guarantee नहीं ले सकता कि इनका
नतीजा कामयाब होगा या नहीं.
Corrinla, साना साना नताजा कामयाबहागा या नहा.
Complex प्रॉब्लम के लिए आपको किसी दूसरे
इंसान पर भरोसा करना पड़ता है. ऐसी प्रॉब्लम में
आपस में तालमेल यानी coordination एक बहुत
बड़ा फैक्टर होता है. साथ में complex प्रॉब्लम एक बच्चे को बड़ा करने
जैसी होती है. एक छोटे बच्चे को अच्छे संस्कार देकर
बड़ा करना बेहद मुश्किल होता है. इसमें कोई भी सीधा
या सरल रास्ता नहीं होता है. हर बच्चा अलग होता है,
जो बात एक बच्चे को समझ आए वो ज़रूरी नहीं कि
दूसरा बच्चा भी आसानी से समझ पाए. Complex
से प्रॉब्लम में कभी भी फिक्स नहीं होता कि क्या रिजल्ट
मिलेगा. हालांकि, एक बच्चे को बड़ा करना नामुमकिन
नहीं है लेकिन ये बेहद मुश्किल है.
सिंपल प्रॉब्लम में चेकलिस्ट बहुत अच्छे से काम करती
है. इसलि मदद से सर्जरी से पहले डॉक्टर अपने हाथ
धोना नहीं भूलेंगे, जिससे सेंट्रल लाइन इन्फेक्शन नहीं
होगा. लेकिन complex प्रॉब्लम का क्या जिसमें
आपको बहुत सारी चीज़े ध्यान में रखनी पड़ती हैं.
जो टीम ICU में ऑपरेशन हैंडल करती है उसे हर
पेशेंट के लिए बहुत सारे इम्पोर्टेन्ट काम करने पड़ते हैं.
उससे भी ज़्यादा उन्हें बहुत सारे स्पेशलिस्ट के साथ
भी coordinate करना पड़ता है. हर काम के लिए
चेकलिस्ट बनाना नामुमकिन है तो हम कॉम्प्लेक्स
प्रॉब्लम से कैसे डील कर सकते हैं? क्या इसके लिए भी
कोई चेकलिस्ट बन सकती है?
दमका ततात आपको चौंका देगा एक दिन काम पर

Finn जितने भी चेकलिस्ट बनाते थे सोच समझकर
बनाते थे. हर काम की अलग चेकलिस्ट बनती थी. एक
चेकलिस्ट इंजीनियरिंग ट्रेड के लिए थी तो दूसरी प्लंबिंग
ट्रेड के लिए. ऐसे ही हर काम के लिए अलग चेकलिस्ट
थी. हर वर्कर अपना काम करने से पहले हर हफ्ते
चेकलिस्ट पढता था और ये ध्यान रखता था कि कोई
भी काम रह ना जाए.
फ़िर भी अगर किसी काम में कोई गड़बड़ हो जाए तो?
कोई मास्टर बिल्डर नहीं है जो हर प्रॉब्लम को
आसानी से हल कर देगा. O’Sullivan ने अतुल को
एक दिमाग चकरा देने वाला टाइम टेबल दिखाया. वो
टाइम टेबल एक एक्सपर्ट का दूसरे एक्सपर्ट से बात
करने के लिए था. किसी भी प्रॉब्लम को लेकर हर
एक्सपर्ट की अपनी अलग राय होती है. फ़िर वो दूसरे
एक्सपर्ट से अपनी प्रॉब्लम को डिस्कस करते हैं.
Complex प्रॉब्लम होने पर वो लोग पूरी तरह
आपस में बात कर के हल ढूँढने की कोशिश करते हैं.
अगर किसी एक प्रॉब्लम के बारे में काफ़ी लोगों से
बात की जाए तो उस प्रॉब्लम के बहुत सारे ओपिनियन
मिल जाते हैं. इन सब राय को मिलाकर वो लोग अपनी
प्रॉब्लम को अच्छी तरह से हल कर पाते हैं.
इसलिए कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम को हल करने के लिए
आपको पहले हर स्पेशलाइजेशन के लिए कई
चेकलिस्ट बनानी चाहिए. उसके बाद एक एक्सपर्ट होने
के नाते आपको दूसरे एक्सपर्ट से उस प्रॉब्लम के सारे
एंगल के बारे में चर्चा करनी चाहिए. उसके बाद ही आप
एक बेस्ट और दफेक्टिव coltition निकाल सकते हैं

ट्रेड के लिए. ऐसे ही हर काम के लिए अलग चेकलिस्ट
थी. हर वर्कर अपना काम करने से पहले हर हफ्ते
चेकलिस्ट पढता था और ये ध्यान रखता था कि कोई
भी काम रह ना जाए.
फ़िर भी अगर किसी काम में कोई गड़बड़ हो जाए तो?
अब कोई मास्टर बिल्डर नहीं है जो हर प्रॉब्लम को
आसानी से हल कर देगा. O’Sullivan ने अतुल को
एक दिमाग चकरा देने वाला टाइम टेबल दिखाया. वो
टाइम टेबल एक एक्सपर्ट का दूसरे एक्सपर्ट से बात
करने के लिए था. किसी भी प्रॉब्लम को लेकर हर
एक्सपर्ट की अपनी अलग राय होती है. फ़िर वो दूसरे
एक्सपर्ट से अपनी प्रॉब्लम को डिस्कस करते हैं.
Complex प्रॉब्लम होने पर वो लोग पूरी तरह
आपस में बात कर के हल ढूँढने की कोशिश करते हैं.
अगर किसी एक प्रॉब्लम के बारे में काफ़ी लोगों से
बात की जाए तो उस प्रॉब्लम के बहुत सारे ओपिनियन
मिल जाते हैं. इन सब राय को मिलाकर वो लोग अपनी
प्रॉब्लम को अच्छी तरह से हल कर पाते हैं.
इसलिए कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम को हल करने के लिए
आपको पहले हर स्पेशलाइजेशन के लिए कई
चेकलिस्ट बनानी चाहिए. उसके बाद एक एक्सपर्ट होने
के नाते आपको दूसरे एक्सपर्ट से उस प्रॉब्लम के सारे
एंगल के बारे में चर्चा करनी चाहिए. उसके बाद ही आप
एक बेस्ट और इफेक्टिव solution निकाल सकते हैं.

The Checklist Manifesto:
How to Get Things Right
Atul Gawande
The Checklist Factory
अतुल ने O’sullivan की बनाई गई कंस्ट्रक्शन वाली
चेकलिस्ट को कॉपी करने की कोशिश की. अतुल एक
सुगेओं थे, उनकी फील्ड बहुत मुश्किल थी इसलिए
उन्होंने अपनी फील्ड में भी चेकलिस्ट बनाने के बारे
में सोचा. चेकलिस्ट बनाने में महीनों लग गए.
उनके लिए हर एक पल कीमती था क्योंकि वो एक सर्जन थे.
इसलिए उन्होंने Aviation industry से मदद लेनी
की सोची. वो उस वक़्त के सबसे बेहतरीन पायलट
Daniel Boorman से मिले.
Boorman अपने उम्दा काम के लिए जाने जाते थे.
वो पिछले 20 सालों से Boeing के लिए चेकलिस्ट
बना रहे थे. उन्होंने 1000 से ज़्यादा प्लेन क्रेश के
बारे में पढ़ा था. उनका गोल था कि वो जितना हो सके
ह्यूमन error को ख़त्म कर सकें.
उनकी मीटिंग के वक़्त boorman ने अतुल को एक
हैंडबुक दिखाई. वो करीब 200 पेज की थी. अतुल ये
देखकर बहत आश्चर्यचकित हए कि वो हैंडबक सिर्फ़

6ऽयुम दिखा. पापारा ZOO पण पाया. जतुल 4
देखकर बहुत आश्चर्यचकित हुए कि वो हैंडबुक सिर्फ़
एक चेकलिस्ट नहीं थी बल्कि वो कई चेकलिस्ट की
कलेक्शन थी. हर एक चेकलिस्ट शोर्ट थी और आसान शब्दों में
लिखी हुई थी. हर एक चेकलिस्ट में उन अलग-अलग
सिचुएशन के बारे में लिखा था जिसका सामना एक
पायलट प्लेन चलाते वक़्त या प्लेन उड़ाने से पहले कर
सकता था. उस हैंडबुक में ऐसे दो सिचुएशन भी लिखे
हुए थे जिनका सामना पायलट अपने पूरे करियर में
कभी नहीं करते हैं. लेकिन अगर इत्तेफ़ाक से कभी
उनके सामने ऐसी कोई सिचुएशन आई तो चेकलिस्ट
उनके पास होगी जिससे उन्हें पता चलेगा कि उन्हें क्या
करना चाहिए. Boorman के हिसाब से दो तरह की चेकलिस्ट
होती है Good और Bad यानी अच्छी और बुरी.
बुरी चेकलिस्ट बहुत confusing, लंबी और मुश्किल
होती है. वो थ्योरी में बस पढ्ने के लिए अच्छी होती
है लेकिन प्रैक्टिकल जिंदगी में कोई काम नहीं आती.
अच्छी चेकलिस्ट में सीधी बात लिखी होती है, उसे
करना आसान भी होता है और सबसे ज़रूरी बात वो
प्रैक्टिकल होती है जिसे आप अपनी regular लाइफ
में यूज़ कर सकते हैं. Boorman और अच्छी
चेकलिस्ट बनाने वाले दसरे लोगों ने इस बात का परा

में यूज़ कर सकते हैं. Boorman और अच्छी
चेकलिस्ट बनाने वाले दूसरे लोगों ने इस बात का पूरा
ध्यान रखा कि ऐसी चेकलिस्ट बनाई जाए जिसे रियल
लाइफ में यूज़ किया जा सके.
अच्छी चेकलिस्ट बनाने से पहले आपको एक सवाल
का जवाब देना होगा. क्या ये Do then Confirm
चेकलिस्ट है या फिर Read then Do चेकलिस्ट
है. Do then Confirm में आप अपने हिसाब से
याद करके step by step काम करते हैं. हालांकि,
आप काम के बीच में रुक कर चेकलिस्ट देखते हैं कि
कहीं कोई स्टेप छूट तो नहीं गया. Read then
Confirm चेकलिस्ट में आप चेकलिस्ट में लिखने
से पहले स्टेप्स को पढ़कर अपना काम करते हैं. ये
बिलकुल ऐसा है जैसे कि किसी रेसिपी को फॉलो
करना.
जब आपको पता चल जाएगा कि आपको कैसी
चेकलिस्ट बनानी चाहिए, ध्यान दें कि वो ज़्यादा बड़ी
ना हो. आप सिर्फ 5-9 item ही याद रख सकते हैं
इसलिए इतने ही स्टेप्स बनाने की कोशिश करें. जब
बात आती है कि आपको कौन कौन से स्टेप्स लिखने
चाहिए तो आपको “Killer Items” बिलकुल नहीं

बात आती है कि आपको कौन कौन से स्टेप्स लिखने
चाहिए तो आपको “Killer Items” बिलकुल नहीं
भूलना चाहिए. ऐसे स्टेप्स जिनको मिस करना बहुत
ख़तरनाक होता है और ये अक्सर छूट जाते हैं, उन
स्टेप्स का नाम Boorman ने Killer Steps रखा
है. अगर आप किसी स्टेप के बारे सोच रहे हैं जो किलर
आइटम में नहीं आता तो आप उस स्टेप को हटा सकते
हैं. चेकलिस्ट में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करें जो सिंपल
हों और जो आपके प्रोफेशन से मिलते जुलते हों.
कोअशिश करें कि सारे स्टेप्स एक ही चेकलिस्ट में आ
जाएं और उन डिटेल्स को add ना करें जो ज़रूरी नहीं
हैं. Boorman Helvetica नाम के बड़े font का
इस्तेमाल करने का सुझाव देते हैं.
चाहे आप कितना भी सोच समझकर चेकलिस्ट बना लें,
ज़रूरी नहीं कि वो पहली बार में सक्सेसफुल हो. थ्योरी
हमेशा प्रैक्टिकल से अलग होती है. चीजें बहुत अलग
हो जाती हैं जब हम असली दुनिया में इसे अप्लाई करते
हैं. आपको हमेशा बदलाव के लिए तैयार रहना होगा.
ये बदलाव आपको बेहतर चेकलिस्ट बनाने में मदद
करते हैं. आखिरकार, आपकी चेकलिस्ट हमेशा काम
में आएगी और आप दूसरों के साथ भी उसे शेयर कर
सकते हैं. में आएगी और आप दूसरों के साथ भी उसे शेयर कर
सकते हैं. Boorman और दूसरे पायलट ज़्यादातर flight
simulation से गुज़रते थे. वो हमेशा कोशिश करते
थे कि वो Read then Do चेकलिस्ट को फॉलो
करें नाकि Confirm then Do को. सिमुलेशन का
सामना करते करते वो सीख गए कि कैसे ख़तरनाक
सिचुएशन में अपनी और अपने साथियों की जिंदगी को
बचाया जा सकता है.
कन्क्लूज़न
इस बुक में आपने सीखा कि एक्सपर्ट भी गलती कर
सकते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम इंसान
हैं और हम परफेक्ट नहीं हैं. चीजें भूलने का और
कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम से डील करने का solution
चेकलिस्ट बनाना ही है.
आपने सीखा कि आप अपने लिए चेकलिस्ट कैसे बना
सकते हैं. वो छोटी, समझने में आसान और प्रैक्टिकल
होनी चाहिए. थ्योरी प्रैक्टिकल से अलग होती है.
आपको अपनी चेकलिस्ट को हमेशा टेस्ट करके ज़रूरी
बदलाव करते रहना चाहिए.
ये
बुक
आपको समझाती है कि चेकलिस्ट जैसी आसान
सी चीज़ कैसे एक बड़ा असर छोड़ सकती है. हमें

आपको अपनी चेकलिस्ट को हमेशा टेस्ट करके ज़रूरी
बदलाव करते रहना चाहिए.
बुक आपको समझाती है कि चेकलिस्ट जैसी आसान
सी चीज़ कैसे एक बड़ा असर छोड़ सकती है. हमें
हमेशा लगता है कि हमें किसी की मदद की ज़रुरत नहीं
है लेकिन आज के हमारे हीरो जैसे डॉक्टर या पायलट
को भी एक दूसरे की ज़रुरत पड़ती है.
हमें आपस में खुलकर बात करने की ज़रुरत है.
एक्सपर्ट कभी अपनी जिंदगी में आगे नहीं बढ़े होते
अगर उन्हें लगता कि वो हर काम ख़ुद कर सकते हैं.
दुनिया में बदलाव लाने के लिए या कमाल की चीजें
बनाने के लिए हमें हमेशा किसी ना किसी पे निर्भर
होना पड़ता है.
सिर्फ़ एक चेकलिस्ट बनाने से शायद आपको वो मिल
जाए जिसकी आपको ज़रुरत है. हो सकता है कि आप
कभी किसी एक्टिविटी के लिए कोई चेकलिस्ट इतनी
अच्छी बना दें कि आप दूसरी एक्टिविटी के लिए भी
चेकलिस्ट बनाने लग जाएं. फ़िर आप अपनी बनाई गई
चेकलिस्ट अपने साथियों के साथ भी शेयर कर सकते हैं
और अपने काम में एक बड़ा फ़र्क ला सकते हैं.

Leave a Reply