The Art of Public Speaking Book Dale Carnegie In Hindi summary

The Art of Public Speaking Dale Carnegie परिचय (Introduction) क्या आपने कभी अकेले पूरी क्लास के सामने प्रेजेंटेशन दिया है ? क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप स्टेज पर हो और हज़ारो लोगो की नजरे सिर्फ आप पर टिकी हो ? क्या आप भी कोई स्पीच देने से पहले नर्वस फील करते हो ? अगर इन सारे सवालों का जवाब हाँ है तो ये बुक पढ़के देखे. ये आपके दिल से पब्लिक स्पीकिंग का डर हमेशा के लिए निकाल देगी. अब ज़रा सोचो कि आपको स्कूल के एक इवेंट में कुछ बोलना है. अब इस बात के पूरे चांसेस है कि आप ये सोचकर ही टेंशन में आ जाओगे कि किस टॉपिक पर बोलना है. लेकिन टेंशन की कोई बात नहीं क्योंकि आपके लिए टॉपिक चूज़ करने से लेकर स्पीच डिलीवर करने के मेथड तक, हर चीज़ में ये बुक आपकी हेल्प करेगी. डेल कार्निज लिखते है” द आर्ट ऑफ़ पब्लिक स्पीकिंग” उन लोगो के लिए है जिन्हें पब्लिक स्पीकिंग के नाम से ही पसीने छूटते है. इस बुक में उन्होंने कई सारे टिप्स दिए है जिन्हें पढकर आप भी एक ग्रेट पब्लिक स्पीकर बन सकते है. इस बुक के अंदर कई सारे चैप्टर्स है जिसमे पब्लिक स्पीकिंग के डिफरेंट टॉपिक्स लिए गए है. हर चैप्टर के एंड में कुछ सवाल और एकसरसाईंजेस 417117A सिम पाण्फ पाकिफ ७पर पपस लिए गए है. हर चैप्टर के एंड में कुछ सवाल और एकसरसाईंजेस दिए है जो आपको जानने में हेल्प करेंगे कि चैप्टर आपको कितना समझ में आया है. आपको और गाइडेंस देने के लिए हर चैप्टर के अंदर कुछ सेलेक्शन और पैसेजेस भी है जिन्हें आप मेन टॉपिक के एक्जाम्पल की तरह यूज़ कर सकते है. लेकिन कोई भी चैप्टर अवॉयड ना करे क्योंकि हर चैप्टर में एक लेसन और अलग यूज़ है. चैप्टर 1 (Chapter 1) अक्वाइरिंग कांफिडेंस बीफोर एन ऑडियंस (Acquiring Confidence before an Audience ऑडियंस के सामने कांफिडेंस बनाकर रखना हमे बोलते हुए कोई देख रहा है, ओब्ज़ेर्व कर रहा है, ये सोचकर ही अक्सर हम सेल्फ कांशस हो जाते है. लोग हमे जजमेंट करेंगे ये ख्याल हमेशा हमारे मन में रहता है. लेकिन सवाल ये है कि क्या हमे इस डर को खुद पे हावी होने देना चाहिए? अब सवाल है कि इस डर से बाहर कैसे निकले? तो जवाब है-फेस इट, यानी डर का सामना करो. आपको ऑडियंस के सामने स्पीच देनी है, फियर ऑफ़ पब्लिक स्पीकिंग यही से स्टार्ट होती है. कई लोगो की आँखे आपको देख रही है, ये सोचकर ही आप नर्वस होने लगते है, राईट? इस डर से निकलने के लिए आपको बार-बार प्रेक्टिस करनी होगी, जितना हो सके उतना बार-बार प्रेक्टिस करनी होगी, जितना हो सके उतना पब्लिक के सामने बोलने की कोशिश करनी होगी. इसके बाद जल्दी ही आपकी हेजिटेशन भी दूर हो जायेगी और कांफिडेंस बिल्ड होगा. इसलिए जितना हो सके पब्लिक के सामने बोलने की प्रेक्टिस करो, आपके अंदर का डर खुद ब खुद हट जाएगा. पहली कोशिश में मिस्टेक हो सकती है मगर डरने की कोई बात नहीं. दुनिया में कोई भी परफेक्ट नही होता. पहली बार में सबसे गलती होती है. लेकिन लगातार प्रेक्टिस करते रहो ताकि नेक्स्ट टाइम आप बैटर कर सको. दुनिया के बेस्ट मास्टर स्पीकर्स में से एक डेनियल वेबस्टर अपनी फर्स्ट स्पीच के दौरान इतने नर्वस हो गए थे कि वो स्पीच बीच में ही छोडकर वापस अपनी सीट में जा बैठे थे. इस बुक में दिए गए फाइव स्टेप्स आपको बताएँगे कि ऑडियंस के सामने कांफिडेंस कैसे बनाये रखे. फर्स्ट स्टेप है” आपकी ऑडियंस आपको ओब्ज़ेर्व करती है इसलिए आपको अपनी ऑडियंस पर फोकस करना है. क्योंकि यही वो लोग है जिनसे आपको डायरेक्ट बात करनी है नाकि दिवार पे लटकी घड़ी से और ना ही उस प्लेटफोर्म से जिस पर आप खड़े है. इस बात पे कांसेंट्रेट करे कि आप पब्लिक को क्या मैसेज देना चाहते है. सेकंड स्टेप, जो भी आपको बोलना है, उसकी तैयारी करके आए. अपनी स्पीच को अच्छे से याद कर लो, एक खाली दिमाग के साथ प्लेटफ़ॉर्म पर जाना बेवकूफी होगी. जब आपका माइंड खाली होता है तो आप टसरी अपनी स्पीच को अच्छे से याद कर लो, एक खाली दिमाग के साथ प्लेटफ़ॉर्म पर जाना बेवकूफी होगी. जब आपका माइंड खाली होता है तो आप दूसरी अनइम्पोर्टेट चीजों के बारे में सोचने लगते हो, जैसे” मेरे बाल ठीक तो लग रहे है?” मै सही कर रहा हूँ या नहीं?’ अगर ,मै फेल हो गया तो”? तो सेल्फ कांफिडेंस बिल्ड करने के लिए आपको कुछ ऐसा चाहिए जिसके बारे में आप पूरे कॉफिडेंट हो. और अगर आप पब्लिक स्पीकिंग कर हो तो आपके पास स्पीच रेडी होनी चाहिए. ऐसा टॉपिक जिसके बारे में आपने रिसर्च किया हो, स्टडी किया हो. ज़ाहिर है आप ऑडियंस के सामने ऐसा कुछ नहीं बोल सकते जिसके बारे में आप खुद फेमिलियर नहीं है. कॉफिडेंट होना अच्छा है लेकिन ओवर कॉफिडेंट होने से बचो. थर्ड स्टेप है” आफ्टर हेविंग सक्सेस एक्स्पेक्ट इट यानी सक्सेसफुल होने के बाद इसकी एक्सपेक्टेशन भी करो”. जैसे कि एक डिनर पार्टी में वाशिंग्टन इरविंग ने अपने फ्रेंड चार्ल्स डिकेन्सको इंट्रोड्यूस किया. चार्ल्स डिकेंस स्पीच दे रहे थे कि अचानक बीच में ही वो रुक गए, उन्हें इतनी शर्म आई कि वो अपने सीट पे जाकर बैठ गए. ये बड़ी अजीब सी सिचुएशन थी, वो साइड में बैठे अपने बेस्ट फ्रेंड की तरफ मुड़े और बोले” मैंने बोला था ना कि मुझसे नहीं होगा, देखा मै फेल हो गया” इसलिए हमेशा पोजिटिव एटीट्यूड रखो, अगर आप सोचोगे कि आपसे नहीं होगा तो डेफिनेटली आप फेल हो जाओगे बैठ गए. ये बड़ी अजीब सी सिचुएशन थी, वो साइड में बैठे अपने बेस्ट फ्रेंड की तरफ मुड़े और बोले” मैंने बोला था ना कि मुझसे नहीं होगा, देखा मै फेल हो गया” इसलिए हमेशा पोजिटिव एटीट्यूड रखो, अगर आप सोचोगे कि आपसे नहीं होगा तो डेफिनेटली आप फेल हो जाओगे. फोर्थ स्टेप है” अज्यूम मास्टरी ओवर योर ऑडियंस” यानी आपको इमेजिन करना है कि ऑडियंस पर आपका पूरा कण्ट्रोल है”. आपने पढ़ा होगा कि इलेक्ट्रिसिटी में नेगेटिव और पोजिटिव फ़ोर्स होता है. तो या तो आप में या आपकी ऑडियंस में कोई एक फ़ोर्स होगी. अगर आप पोजिटिव फील करोगे तो आपकी ऑडियंस भी पोजिटिव रहेगी. तो इसलिए ये सोचो कि आप एक कमाल की स्पीच डिलीवर कर सकते हो. एकदम नोर्मल और शांत रहो और चाहे कुछ भी हो जाए हिम्मत मत हारो. फिफ्थ और लास्ट स्टेप है” जल्दबाजी मत करो” जैसा हमने पहले भी कहा है जितना हो सके कूल रहो, जैसा आपने प्रेक्टिस किया है, उसी हिसाब से चलो. जब आपको खुद पे 100% कांफिडेंस हो जाएगा तब पको पता चलेगा कि पब्लिक स्पीकिंग इतना मुश्किल काम नहीं है जितना आप सोचते थे. याद रखो, खुद पे कांफिडेंस रखना बहुत इम्पोर्टेट है, आप कर सकते हो, ये भरोसा रखो. डर को दूर भगाकर खुद पे बिलीव करो. The Art of Public Speaking Dale Carnegie चैप्टर 2 (Chapter 2 द सिन ऑफ़ मोनोटोनी (The Sin of Monotony) टाइम के साथ इंग्लिश लेंगुएज में काफी चेंजेस आये है. और सबसे बड़ी बात ये है कि कुछ वर्ड्स के एक्स्ट्रा मीनिंग भी एड हो गए है जो पहले नहीं थे. जैसे कि लैक ऑफ़ वेरीएशन और रीपीटीटियस या डल को अब मोनोटोनस (monotonous बोला जाता है. मोनोटोनस (monotonous)स्पीकर स्पीच के शुरू से लेकर एंड तक एक हो टोन में बोलता है. यही नहीं, वो अपनी पूरी स्पीच में सेम स्पीड और सेम एक्सप्रेशन देता है. कितना बोरिंग है ना राईट? तो मोनोटोनी एक मोस्ट कॉमन मिस्टेक है जो ज्यादातर स्पीकर्स करते है. ऐसा स्पीकर एक थौट को दुसरे से अलग एक्सप्रेस नहीं कर पाता है, उसकी बोली हुई हर बात सेम लगती है. जहाँ उसे जोर देना होता है वहां भी सेम टोन होती है. इससे होता ये है कि ऑडियंस बोर होने लगती है, स्पीच में उनका इंटरेस्ट खत्म हो जाता है. अगर कोई आपके पास आकर बोले कि आपकी स्पीच मोनोटोनस (monotonous) लगी तो बुरा मत मानो. क्रिटिसिज्म एक्सेप्ट करना सीखो और दम्पवमेंट लाने की कोशिश करो स्पीच देंते वक्त उन है. अगर कोई आपके पास आकर बोले कि आपकी स्पीच मोनोटोनस (monotonous) लगी तो बुरा मत मानो. क्रिटिसिज्म एक्सेप्ट करना सीखो और इम्प्रूवमेंट लाने की कोशिश करो. स्पीच देंते वक्त उन वर्ड्स या फ्रेजेज़ पर ज्यादा जोर दो जो आप ऑडियंस के नोटिस में लाना चाहते हो. और जहाँ ज़रूरत हो वहां अपनी टोन का वोल्यूम कम या ज्यादा कर सकते हो. कुछ लोगो का मानना है कि मोनोटोनी हमारी लिमिटेशन शो कराता है. ये हमें बताता है कि हमे और कितना इम्प्रूव करना है. मोनोटोनी और गरीबी एक जैसी चीज़ है. डिपेंड करता है कि आपको इस गरीबी से छुटकारा पाना है कि नहीं. अपनी स्पीच में वेराइटी इनक्रीज करने के कुछ और तरीके सोचो, स्पीच को इंटरेस्टिंग बनाओ बोरिंग नहीं. एक ओर्गेनिस्ट के पास कुछ खास कीज़ मालूम होते है जिससे वो हारमोनी कण्ट्रोल करता है. एक कारपेंटर के पास स्पेशल टूल्स होते है जिससे वो बिल्डिंग के डिफरेंट पार्ट्स कंस्ट्रक्ट करता है. स्पीकर भी कुछ ऐसा ही होता है. भी स्पेशल वो अपनी स्पीच की मोनोटोनी कण्ट्रोल कर सकता है. उसे मालूम है कि कहाँ पर जोर देना है, कहाँ पर फीलिंग्स एक्सप्रेस करनी है और कैसे अपने ऑडियंस के बिलिफ्स को गाइड करना है. स्पीच में वेरिएशन देना आपकी केपेबिलिटी से बाहर की चीज़ है, एक या दो दिन की प्रेक्टिस से कुछ नहीं होने वाला इसलिए ज्यादा से ज्यादा प्रेक्टिस करो. या तो अकेले में करो या उसके पास कुछ टूल्स होते है जीससे दो दिन की प्रेक्टिस से कुछ नहीं होने वाला इसलिए ज्यादा से ज्यादा प्रेक्टिस करो. या तो अकेले में करो या ऑडियंस के सामने करो. अगर ऑडियंस के सामने प्रेक्टिस करोगे तो ज्यादा अच्छा है. वो आपको फीडबैक दे सकते है कि कहाँ पर इम्प्रूवमेंट की ज़रूरत है. लेकिन अगर आपके पास कोई ऑडियंस नहीं है तो खुद ओब्ज़ेर्व करो और देखो कि कहाँ कमी है. नैचुरल वे में बोलना थोडा बोरिंग लगता है इसलिए थोडा ड्रामा क्रियेट करो. अपने हार्ड वर्क से आप एंडलेस पोसिबिलिटीज एक्सप्लोर कर सकते हो और एक स्पीकर के तौर पे अपनी स्किल्स को इम्प्रूव कर सकते हो. चैप्टर 3 ( Chapter 3 एफिशिएंसी श्रू एम्फेसिस एंड सबओर्डीनेशन (Efficiency Through Emphasis and Subordination) कोई स्पीकर जब स्पीच देते टाइम डिफरेंट टोन यूज़ करे या किसी रेंडम सेंटेंस पर जोर दे तो ज़रूरी नहीं कि उसे रिजल्ट भी बढ़िया मिलेगा. आप हर एक वर्ड पर जोर नहीं दे सकते क्योंकि कुछ वर्ड्स इतने इम्पोर्टेट नहीं होते. अब जैसे इस सेंटेंस को ले लो” डेस्टिनी इज़ नोट अ मैटर ऑफ़ चांस”, इट्स अ मैटर ऑफ़ चॉइस” अब यहाँ पर आप डेस्टिनी वर्ड पे जोर दोगे क्योंकि ये आपकी बात का मेन आईडिया है, फिर आप नोट पर जोर दोगे ये बताने के लिए कि डेस्टिनी एक चांस की बात है. लेकिन आपको चांस वर्ड पे भी जोर देना होगा गोनिया मेंग ना राग सिसाल यानिगा बात है. लेकिन आपको चांस वर्ड पे भी जोर देना होगा क्योकि ये आपके सेंटेंस का दूसरा प्रिंसिपल आईडिया है. अब आप पूछोगे कि चांस पे क्यों जोर देना है तो जवाब ये है कि ये चॉइस का कंट्रास्ट है. और इससे दो कंट्रास्टिंग बातो पर जोर दिया जा रहा है. अब आप इन दोनों सेंटेंस को पढो और कैपिटल लैटर में लिखे वर्ड्स पे जोर देकर बोलो.: “डेस्टिनी इज़ नोट अ मैटर ऑफ़ चांस, इट इज़ अ मैटर ऑफ़ चॉइस”. (DESTINY is not a matter of CHANCE. IT IS A MATTER OF CHOICE.” “डेस्टिनी इज़ नोट अ मैटर चांस, इट इज़ अ मैटर ऑफ़ चॉइस”. (DESTINY is NOT a matter CHANCE. It is a matter of CHOICE.” दोनों में डिफ़रेंस है, राईट? एक एवरेज स्पीकर फर्स्ट सेंटेंस में उन वर्ड्स पे भी उतना ही जोर देगा जो ज्यादा इम्पोर्टेट नहीं है. लेकिन अगर एम्फेसिस और सबओर्डीनेशन में एफिशिएंट है तो आप सेकंड सेंटेंस पे जोर देकर बोलोगे और ऑडियंस को वो वर्ड्स लाउड एंड क्लियर वे में हमेशा याद रहेंगे. इस चैप्टर में एम्फेसिस का सिर्फ एक फॉर्म बताया गया है और वो है इम्पोर्टेट वर्ड्स पे ज्यादा जोर देना और अनइम्पोर्टेट वर्ड्स पे कम ज़ोर देना. हालाँकि हमे लाउडनेस को एम्फेसिस से कन्फ्यूज़ नहीं करना चाहिए. कोई किसी वर्ड को जोर से बोलने का मतलब ये नहीं कि वो इम्पोर्टेट है. और वैसे भी ज़ोर-ज़ोर से बोलना “डेस्टिनी इज़ नोट अ मैटर चांस, इट इज़ अ मैटर ऑफ़ चॉइस”. (DESTINY is NOT a matter CHANCE. It is a matter of CHOICE.” दोनों में डिफ़रेंस है, राईट? एक एवरेज स्पीकर फर्स्ट सेंटेंस में उन वर्ड्स पे भी उतना ही जोर देगा ज्यादा इम्पोर्टेट नहीं है. लेकिन अगर एम्फेसिस और सबओर्डीनेशन में एफिशिएंट है तो आप सेकंड सेंटेंस पे जोर देकर बोलोगे और ऑडियंस को वो वर्ड्स लाउड एंड क्लियर वे में हमेशा याद रहेंगे. इस चैप्टर में एम्फेसिस का सिर्फ एक फॉर्म बताया गया है और वो है इम्पोर्टेट वर्ड्स पे ज्यादा जोर देना और अनइम्पोर्टेट वर्ड्स पे कम ज़ोर देना. हालाँकि हमे लाउडनेस को एम्फेसिस से कन्फ्यूज़ नहीं करना चाहिए. कोई किसी वर्ड को जोर से बोलने का मतलब ये नहीं कि वो इम्पोर्टेट है. और वैसे भी ज़ोर-ज़ोर से बोलना इंटेलिजेंस की निशानी नहीं होती. एक स्पीकर को ये समझना होगा कि एम्फेसिस का कोई परमानेंट रुल नहीं है. क्योंकि हम पहले से नहीं बोल सकते कि किस वर्ड पे जोर देना है और किस पर नहीं. ये स्पीकर की इंटरप्रेशन पर डिपेंड करता है, और ज़रूरी नहीं कि हर स्पीकर सेम इंटरप्रेट करे. इसमें राईट क्या है और ये बताना मुश्किल है. बस हमारे माइंड में ये प्रिंसिपल रहना चाहिए. रोंग क्या, The Art of Public Speaking Dale Carnegie चैप्टर 4 (Chapter 4) एफिशिएंसी श्रू चेंज ऑफ़ पिच (Efficiency Through Change of Pitch) टोन की हाई या लो डिग्री को और उसकी वेरिएशन को पिच बोलते है. पिच को हम पब्लिक स्पीकिंग में एक एक्स्क्लेमेशन के तौर पर अप्लाई करके यूज़ करते है. इस चैप्टर में आप सीखेंगे कि कैसे आपको अपनी स्पीच के अंदर वर्ड्स के डिफरेंट पार्ट्स में पिच को एफिशिएंटली चेंज करना है. थौट के हर चेंज के साथ वौइस् चेंज की भी ज़रूरत पड़ती है, इसी को हम पिच बोलते है. जब स्पीकर पिच चेंज का रुल फोलो करता है तो स्पीच में एक गुड वौइस् वेरिएशन आती है. हालाँकि कुछ लोग इसे बड़े अनइफेक्टिव तरीके से यूज़ करते है, जिससे ऑडियंस बोर होने लगती है. बिगेनर्स यानी नए सीखने वालो और प्रोफेशनल में चेंजिंग ऑफ़ पिच डिफरेंट होती है, खासकर जब उन्हें स्पीच याद हो. पिच के डिफरेंट वेरिएशंस होते है, जैसे एक पियानो होता है. पियानो में कई सारी कीज होती है और हर एक की एक अलग टोन या पिच देती है. यही हमारी आवाज़ के साथ भी है. हम अपनी स्पीच के अंदर वेरिएशन देने के लिए कई सारी टोंस यज कर सकते |पचकाडफरट वारएशस हात ह, जस एक पियाना होता है. पियानो में कई सारी कीज होती है और हर एक की एक अलग टोन या पिच देती है. यही हमारी आवाज़ के साथ भी है. हम अपनी स्पीच के अंदर वेरिएशन देने के लिए कई सारी टोंस यूज़ कर सकते है. पिच भी लगातार चेंज होती रहती है. अब जैसे एक बच्चे को ही देख लो. बच्चा मोनोटोनस्ली (monotonously) बात नहीं करता, यहाँ तक कि बड़े लोग भी डिफरेंट वेरिएशन में बोलते है. कभी बर्ड्स की चर्मिंग को ध्यान से सुनो, इनकी आवाज़ कितनी प्यारी लगती है. इनकी वौइस् टोन बदलती रहती है फिर भी हमे अच्छी लगती है. पिच चेंजिंग से भी हम एम्फेसिस कर सकते है यानी किसी वर्ड को एक ख़ास तरीके से बोलकर सूनने वालो का ध्यान उस तरफ खीच सकते है. इसका एक तरीका ये है कि आप उनकी अटेंशन लेने के लिए अपनी वौइस् पिच को एक ख़ास डिग्री में चेंज कर दो. जैसे एक्जाम्पल के लिए: “अब कांग्रेस आगे क्या करने वाली है? (हाई पिच) (What is Congress going to do next? (High pitch) -मुझे नहीं पता (I do not know.” लो पिच (Low pitch) अपनी वौइस् पिच में अचानक चेंज लाकर आप अपनी स्पीच के कुछ ख़ास वर्ड्स या सेंटेंस पर जोर दे सकते अपनी वौइस् पिच में अचानक चेंज लाकर आप अपनी स्पीच के कुछ ख़ास वर्ड्स या सेंटेंस पर जोर दे सकते है. लेकिन ध्यान रहे कि पिच बहुत हाई या लो ना हो जाए. चैप्टर 5 (Chapter 5 एफिशिएंसी श्रू चेंज ऑफ़ पेस (Efficiency Through Change of Pace) चलते वक्त, भागते वक्त या मूव करते टाइम जो कंसिस्टेंसी रहती है उसे हम पेस बोलते है. पब्लिक स्पीकिंग में पेस का मतलब है टेम्पो. टेम्पो रेट ऑफ़ मूवमेंट है. एक मिनट के सिक्स हंड्रेड में जब कोई गन शूट करती है तो वो फ़ास्ट टेम्पो है. एक ओल्ड मजलहोल्डर जिसे लोड करने में तीन मिनट लगते है, स्लो टेम्पो में शूट करता है. म्यूजिशियंस उस टेम्पो से फेमिलियर होते है जिस स्पीड पे म्यूजिक का कोई पैसेज प्ले किया जाता है. टेम्पो चेंजिंग से डिलीवरी में नेचुरलनेस आती है. और पब्लिक स्पीकिंग में नैचुरलनेस ज़रूरी है, टेम्पो में चेंज लाते रहने से आप अपनी स्पीच डिलीवरी को नैचुरल बना सकते है. मिस मार्गरेट अंग्लिन के स्टेज मैनेजर मिस्टर होवार्ड लिंडसे (Howard Lindsay,)ने कहा था कि चेंज ऑफ़ पेस एक एक्टर के लिए मोस्ट इफेक्टिव टूल होता है. और किसी भी स्पीकर के लिए इस टूल को अचीव करके यूज़ करना कोई इम्पॉसिबल चीज़ नहीं है. एक स्पीकर जब बोलते हुए अपना पेस चेंज करता है तो नैचुरलनेस साफ़ देखी जा सकती है. और टेम्पो चेंज पैसेज प्ले किया जाता है. टेम्पो चेंजिंग से डिलीवरी में नेचुरलनेस आती है. और पब्लिक स्पीकिंग में नैचुरलनेस ज़रूरी है, टेम्पो में चेंज लाते रहने से आप अपनी स्पीच डिलीवरी को नैचुरल बना सकते है. मिस मार्गरेट अंग्लिन के स्टेज मैनेजर मिस्टर होवार्ड लिंडसे (Howard Lindsay,)ने कहा था कि चेंज ऑफ़ पेस एक एक्टर के लिए मोस्ट इफेक्टिव टूल होता है. और किसी भी स्पीकर के लिए इस टूल को अचीव करके यूज़ करना कोई इम्पॉसिबल चीज़ नहीं है. एक स्पीकर जब बोलते हुए अपना पेस चेंज करता है तो नैचुरलनेस साफ़ देखी जा सकती है. और टेम्पो चेंज करने से आप एम्फेसिस भी ला सकते है. टेम्पो को अगर अचानक चेंज करोगे तो ऑडियंस को तुंरत पता चल जायेगा. अगर आप अपने ऑडियंस के सामने कोई पॉइंट रखना चाहते हो तो टेम्पो को तुरंत चेंज कर दो. लोग एकदम से आपका पॉइंट नोटिस कर लेंगे. मगर आपको इसके लिए टेम्पो रेगुलेटिंग की प्रेक्टिस करनी होगी वर्ना आपकी मूवमेंट ज्यादा फ़ास्ट हो सकती है. क्योंकि ज़्यादातर स्पीकर्स यही सेम मिस्टेक करते है. यहाँ हमे ये भी ध्यान रखना होगा कि इन चीजों को सीखने में वक्त लगता है. इसलिए टेक योर टाइम और लगातार प्रेक्टिस करते रहो. चैप्टर 6 (Chapter 6) पॉज एंड पॉवर ( Pause and Power) पॉज और स्टम्बलिंग में फर्क होता है. पब्लिक स्पीकिंग में बड़े ग्रेसफूली पॉज लिया जाता है. स्टम्बलिंगअलग चीज़ है जब आप स्पीच देते वक्त किसी वर्ड पे अटक जाते हो या गलत ढंग से बोलते हो. पब्लिक स्पीकिंग में पॉजिंग भी काफी मैटर करती है. आपकी स्पीच पर इसका पॉवरफुल इम्पेक्ट पड़ता है और आपको इम्पोर्टेट वर्ड्स या फ्रेज़ेस से पहले या बाद में पॉज़ लेना पड़ता है इसलिए इसकी प्रेक्टिस ज़रूरी है. अगर आप लाइन्स के बीच में पॉज लेते है तो ये नोर्मल है लेकिन कई न्यू स्पीकर्स काफी लंबा पॉज लेने की गलती करते है जोकि ठीक नहीं है.एफिशिएंट पॉजिंग के एक या चारो रिजल्ट्स कैसे अचीव किये जाए, ये आपको इस चैप्टर में सीखने को मिलेगा. स्पीच के दौरान पॉज लेना स्पीकर को नेक्स्ट मेजर आईडिया.डिलीवर करने की फ़ोर्स देता है. जैसे मेपल का पेड़ तरीMaple trees, for example, are rarely tapped continually. जब स्ट्रोंग फ्लो की ज़रूरत होती है तो पॉज लिया जाता है, When a strong flow is wanted, a pause is made, nature is given time to reserve its forces, and when the pause is made, nature is given time to reserve its forces, and when the tree is reopened, a stronger flow is the result. किसी भी लड़ाई में कूदने से पहले पूरी तैयारी ज़रूरी है.वर्ना हार पक्की है. एक स्पीकर के थौट उसके ऑडियंस के माइंड में नहीं भरे होते. स्पीकर जो उन्हें बताना पड़ता है. इसलिए आप पॉज लेते है, फिर फ़ोर्स के साथ एक नया आईडिया ऑडियंस के सामने रखते है. जब स्पीकर बोलते वक्त पॉज लेता है तो उसके भी ऑडियंस मैसेज रिसीव करने के लिए प्रीपेयर्ड रहते है. हर्बर्ट स्पेंसर ने एक बार कहा था कि ये पूरा यूनिवर्स मोशन में रहता है और हर परफेक्ट मोशन एक रिम है. रिद्म का एक पार्ट रेस्ट भी है. रेस्ट के बाद फिर एक्टिविटी शुरू होती है. जैसे, सीजन चेंज होता है, जैसे सांस आती है और जाती है और जैसे हार्टबीट चलती है, इसी तरह हर मोशन के बीच में एक पॉज ज़रूरी है. आप भी जब स्पीच में पॉज लेते हो तो आपकी ऑडियंस को भी एक रेस्ट मिलता है, जो आपने कहा, उस पर सोचने का मौका मिलता है क्योंकि लगातार स्पीच सुनने से ऑडियंस का इंड थक जाएगा फिर उन्हें इम्पोर्टेट पॉइंट्स याद नहीं रहेंगे और आपकी बात क्लीयरली उन तक पहुँच नहीं पाएगी. पॉज एक तरह का सस्पेंस भी क्रियेट करता है. सुनने वालो को इंतज़ार रहता है कि अब आगे क्या इन्फोर्मेशन मिलेगी. आपकी पब्लिक बेसब्री से आपकी नेक्स्ट लाइन्स का वेट करती है. इसलिए थोडा पॉज लेकर उन्हें वेट करने रहता कि जब जाग पपा पामरान मिला. आपकी पब्लिक बेसब्री से आपकी नेक्स्ट लाइन्स का वेट करती है. इसलिए थोडा पॉज लेकर उन्हें वेट करने दे, आपने देखा होगा कि अक्सर शेर्लोक होम्स की स्टोरी पढ़ते वक्त हम कितने क्यूरियस हो जाते है, जब तक मिस्ट्री सोल्व नहीं होती, आप स्टोरी पढना नहीं छोड़ते लेकिन अगर मिस्ट्री जल्दी सोल्व हो जाए तो आपका इंटरेस्ट भी खत्म हो जाएगा तो फिर आप पूरी बुक क्यों पढ़ेंगे? इसलिए पॉजिंग को हम सस्पेंस क्रियेट करने के लिए एक इंस्ट्रूमेंट की तरह यूज़ कर सकते है. अनस्किल्ड स्पीकर्स अपनी ऑडियंस के सामने सिर्फ फ्लेट वर्ड्स रखते है. उनकी स्पीच में कोई एक्सप्रेशन या एंटरटेनमेंट नहीं होता. सक्सेसफुल और अनसक्सेसफुल स्पीकर्स के बीच यही एक मेजर डिफ़रेंस है. आप अपनी ऑडियंस को किस तरह स्पीच डिलीवरी करते है ये आपकी स्किल पे डिपेंड करता है. हर बड़े आईडिया के बाद पॉज देना ज़रूरी होता है ताकि वो आईडिया ऑडियंस के माइंड में फिट हो जाए. जो लोग एक ही स्पीड में फटाफट अपनी बात खत्म कर लेते है, उनकी स्पीच किसी को याद नहीं रहती. जैसे बारिश एकदम तेज़ी से आकर बरस जाए तो फसल को कोई फायदा नही पहुँचता. इसलिए पॉज लेकर अपनी बात कहो, खासकर तब जब आपको कोई इम्पोर्टेट पॉइंट नोटिस में लाना हो. टाइम लो और ऑडियंस को भी टाइम दो. आपकी ऑडियंस कहीं भाग नहीं रही. The Art of Public Speaking Dale Carnegie चैप्टर 7 (Chapter 7) एफिशिएंसी श्रू इन्फ्लेक्शन (Efficiency Through Inflection) इन्फ्लेक्शन का मतलब है वौइस् पिच का मोड्यूलेशन. हमने चैप्टर 4 में चेंज ऑफ़ पिच की इम्पोर्टेस बताई थी. अब हम बताते है कि इन्फ्लेक्शन का क्या मतलब है. रेंडम व आपकी स्पीच को काफी बोरिंग बना देते है इसलिए कुछ ऐसे वर्ड्स एड करने चाहिए जो वर्ड्स को एक डीप मीनिंग देते हो. दो तरह के इन्फ्लेक्शन होते है. राईजिंग और फालिंग. इन दोनों को कम्बाइन करके मोड्यूलेशन के कई और वेरिएशन क्रियेट किये जा सकते है. ये बिलकुल ऐसे ही है जैसे आप कुछ खास वर्ड्स या सेंटेंस को नोटिस में लाने के लिए वौइस् पिच चेंज कर लेते है. अब ज़रा ये पढो” ओह, “ओह ही इज आल राईट (वो एकदम ठीक है” JOh, he’s all right.” देखा, फेंट प्रेज़ या पोलाईट डाउट या जहाँ अनसर्टेनिटी के लिए कैसे राईजिंग इन्फ्लेक्शन यूज़ किया गया. अब नोट करे कि कैसे सेम वर्ड्स एक फालिंग इन्फ्लेक्शन के साथ ज़ोरदार तारीफ को एक्सप्रेस करते है.. एक और एक्जाम्पल है जहाँ आप इन्फ्लेक्शन का डिफरेंस देख सकते है दो सिचएशन है एक में आप एक और एक्जाम्पल है जहाँ आप इन्फ्लेक्शन का डिफ़रेंस देख सकते है. दो सिचुएशन है, एक में आप किसी इमेजनरी पर्सन को गुड बाई बोल रहे हो जिससे आप कल फिर मिलने के बारे में सोच रहे हो और दूसरा जहाँ आप एक पुराने दोस्त को गुड बाई बोल रहे हो जिससे आप शायद फिर कभी नही मिलोगे. ध्यान रहे कि आपको ओवर इन्फ्लेक्ट नहीं होना है क्योंकि ये थोडा अनप्लीजेंट और अननैचुरल हो जाएगा. सेम चीज़ आपको इस चैप्टर के खत्म होने पर रीमाइंड कराई जायेगी. प्रेक्टिस करो, अपनी वौइस् को सुनो और इस बुक में दिए टिप्स की हेल्प से अपनी वौइस् क्वालटी इम्प्रूव करो. चैप्टर 8 (Chapter8) कंसन्ट्रेशंन इन डिलीवरी (Concentration in Delivery) अपने हाथो से एक सर्कुलर मोशन बनाओ और साथ ही अपने पैरो से एक रेक्टेगुलर मोशन बनाने की भी कोशिश करो. ऑफ़ कोर्स ये काफी मुश्किल है क्योंकि बिना प्रेक्टिस किये आप अपने हाथ और पैरो को दो अलग-अलग मोशन में नहीं चला पाएंगे. यही सेम मिस्टेक अक्सर स्पीकर्स भी करते है. उनकी पहली बात अभी पूरी भी नहीं होती कि वो दूसरी के बारे में सोचने लगते है. फिर होता क्या है कि उनका कंसन्ट्रेशन फेल हो जाता है, स्पीच स्टार्टिंग में तो सही चलती है लेकिन लास्ट तक आते-आते उसका इम्पेक्ट खत्म हो जाता है. किसी भी तेल पोगर्ट मारत में जिन तर्टयो तोर देना हा जाता ह, स्पाच स्टााटग म ता सहा चलता ह लाकन लास्ट तक आते-आते उसका इम्पेक्ट खत्म हो जाता है. किसी भी वेल प्रीपेयर्ड स्पीच में जिन वर्ड्स पे जोर देना होता है वो अक्सर सेंटेंस के एंड में आते है. लेकिन जब स्पीकर इम्पोर्टेन्ट वर्ड्स बोले बिना ही नेक्स्ट लाइन के बारे में सोचने लगता है तो उसका कंसन्ट्रेशन ढीला पड़ जाता है और इम्पोर्टेट इन्फोर्मेशन छूट जाती है. यहाँ आपको ये ध्यान रखने की ज़रूरत है कि कोई भी सेंटेंस को बोलते वक्त उसके अगले सेंटेंस के बारे में मत सोचो. जो आप बोल रहे हो, सारा फोकस उसी पर रखो. अगला सेंटेंस खुद आ जाएगा. बीच-बीच में पॉज लेते रहो कि अब आगे क्या बोलना है लेकिन करंट सेंटेंस पर भी फोकस करो. अपने देखा होगा कि रटी रटाई स्पीच सुनने कितनी बोरिंग लगती है? एक स्किल्फुल स्पीकर के वर्ड्स हर बार बोलते वक्त दुबारा जन्म लेते है. उनमे एक नई जान होती है इसलिए लोग पूरे एन्थूयाज्म से सुनते है.वर्ड्स की फीलिंग्स लूज़ मत करो. जो भी बोलो दिल से बोलो तभी आपके वर्ड्स ऑडियंस के माइंड में लम्बे टाइम तक रह पायेंगे. अगर आप किसी ऐसी चीज़ पे कंसन्ट्रेट करते हो जो आपको हर्ट कर रही है तो आपको ज्यादा दुःख होगा. इसलिए प्रेजेंट पर ध्यान दे, जो आप बोल रहे है उसी पर पूरा फोकस रखे, फ़ालतू बातो को माइंड से हटा दे. चैप्टर 9 (Chapter 9) फ़ोर्स (Force) चैप्टर 9 (Chapter 9) फ़ोर्स (Force) इस चैप्टर में हम इनर और आउटर फ़ोर्स के बीच का डिफ़रेंस देखेंगे. इनमे से एक कॉज है और दूसरा इफेक्ट है. एक स्पीचुअल है तो दूसरा फिजिकल. इसलिए हमे ह्यूमन फ़ोर्स और फिजिकल फ़ोर्स के बीच का डिफ़रेंस समझना होगा. The book samples loudness. नेचर का लाउडनेस फ़ोर्स नहीं है, हालाँकि फ़ोर्स कभी-कभी नॉइज़ से भी होता है. स्पीच में जोर-जोर से वर्ड्स बोलकर आप उसे गुड या रीमार्केबल नहीं बना सकते. हालाँकि कई बार किसी बात को इफेक्टिव बनाने के लिए हमे ऊँची आवाज़ का भी सहारा लेना पड़ता है. फ़ोर्स को अगर छोड़ दिया जाए तो उससे कुछ भी हो सकता है, ऑडियंस अलर्ट हो जायेगी कि स्पीकर क्या बोल रहा है. लेकिन फ़ोर्स अचीव करने के लिए आपको खुद को लूज़ रखना होगा. ऐसा माना जाता है कि आदमी खुद ही फाइनल फैक्टर है. वो खुद ही अपने फ्यूल का सप्लायर है. और इस आग को हवा देती है आपकी ऑडियंस या खुद स्पीकर. लेकिन अगर आपके अंदर फ़ोर्स ही नही होगी तो आग कहाँ से पैदा होगी? इस चैप्टर में फ़ोर्स के चार फैक्टर्स मेंशन किये गए है जो आपके कण्ट्रोल में है” आईडियाज, सब्जेक्ट के बारे में फीलिंग्स, वर्डिंग और डिलीवरी, इस बुक में हमने इन फ़ोर्स को अगर छोड़ दिया जाए तो उससे कुछ भी हो सकता है, ऑडियंस अलर्ट हो जायेगी कि स्पीकर क्या बोल रहा है. लेकिन फ़ोर्स अचीव करने के लिए आपको खुद को लूज़ रखना होगा. ऐसा माना जाता है कि आदमी खुद ही फाइनल फैक्टर है. वो खुद ही अपने फ्यूल का सप्लायर है. और इस आग को हवा देती है आपकी ऑडियंस या खुद स्पीकर. लेकिन अगर आपके अंदर फ़ोर्स ही नही होगी तो आग कहाँ से पैदा होगी? इस चैप्टर में फ़ोर्स के चार फैक्टर्स मेंशन किये गए है जो आपके कण्ट्रोल में है” आईडियाज, सब्जेक्ट के बारे में फीलिंग्स, वर्डिंग और डिलीवरी, इस बुक में हमने इन चारो के बारे में डिस्कस किया है. अच्छे वर्ड्स चॉइस से भी स्पीच में फ़ोर्स आती है. प्लेन वर्ड्स ज्यादा फ़ोर्सफुल होते है उन वर्ड्स के मुकाबले जो कम यूज़ होते है. शोर्ट वर्ड्स लॉन्ग वर्ड्स से ज्यादा स्ट्रोंग होते है. स्पेशिफिक वर्ड्स जेर्नल वर्ड्स से ज्यादा स्ट्रोंग होते है. अपनी स्पीच में अगर आप सोच-समझकर वर्ड्स अरेंजमेंट करते है तो उससे भी आपकी स्पीच में फ़ोर्स आएगा. मोडीफायर्स और कनेक्टिव्स को कट आउट करो. स्पीच हमेशा ऐसे सेंटेंस या वर्ड्स से स्टार्ट करो जिस पर तुंरत ध्यान जाए. ये कुछ एक्जाम्पल है जिनकी हेल्प से आप अपनी स्पीच में एक फ़ोर्स ला सकते है. The Art of Public Speaking Dale Carnegie चैप्टर 10 (Chapter 10) फीलिंग एंड एन्थूयाज्म (Feeling and Enthusiasm) जो लोग फीलिंग के बिना स्पीच देते है, सच बोले तो ऑडियंस का टाइम वेस्ट करते है. क्योंकि उनकी स्पीच सुनने में बड़ी बोरिंग सी लगती है. ऐसी स्पीच पर लोग ध्यान ही नहीं देते. लोग कुछ देर सुनेगे फिर उठ कर चल देंगे. चैप्टर 10 में आप सीखोगे कि स्पीच को जानदार कैसे बना सकते हो. हम आपको ऐसे टिप्स देंगे जो आपको पूरे एन्थूयाज्म और फीलिंग्स के साथ एक बढ़िया स्पीच डिलीवर में हेल्प करेगी. अपनी आँखों के सामने ही अपने बच्चे बिकते हुए देखने वाली नीग्रो मदर्स ने अमेरिका के कुछ गिने-चुने और सबसे जानदार स्पीच्स को इंस्पायर किया है. बेशक इन मदर्स को स्पीकिंग की टेक्नीक नहीं पता थी और ना ही उन्हें बोलने के तरीका मालूम था लेकिन उनके पास कुछ ऐसा था जो हर टेक्नीक और रीजन्स से ज्यादा इफेक्टिव था और वो थी उनके अंदर की फीलिंग, जो इफेक्टिव था और वो थी उनके अंदर की फीलिंग, जो वो अपने बच्चो के लिए फील करती थी. पोलिटिकल पार्टीज अक्सर लोगो को या ऐसे बैंड्स को हायर करती है जो उनकी स्पीच में तालियाँ बजाते है और एन्थूयाज्म बढाते है. अब लीडर सही बोल रहा है या गलत ये तो सुनने वाले पर डिपेंड करता है मगर इस बात पे कोई डाउट नहीं कि तालियों की आवाज़ लोगो का एन्थूयाज्म ज़रूर बढा देती है. न्यू यॉर्क में, एक वाच मेन्यूफेक्चरर ने एडवरटीज़मेंट की दो सीरीज ट्राई की. एक में वर्कमेनशिप, ड्यूरेबिलिटी और वाच के सुपीरियर स्ट्रक्चर की बात थी वही दुसरे एड में लिखा था” एक वाच जिस पर आप प्राउड कर सकते हो”, जिसका साफ़ मतलब ये था कि अगर आपके पास ये वाली वाच है तो आपको एक तरह का प्लेजर और प्राइड फील करना चाहिए. ज़रा अंदाजा लगाओ कि कौन से एडवरटीज़मेंट ने ज्यादा कमाई की होगी? ऑफ़ कोर्स दुसरे वाले ने. अपनी स्पीच में फीलिंग लाने का एक तरीका ये भी है कि आप केरेक्टर की स्किन में घुस जाओ. आप जो मैसेज देना चाहते हो, जो पॉइंट रखना चाहते हो, या जिस पर्पज से आयूं करना चाहते हो, आप ये सारी चीज़े अपने माइंड में अच्छे से बिठा लो. जो बोलना है उस पर इतना यकीन करो कि जब आप बोलो तो लोगो चीज़े अपने माइंड में अच्छे से बिठा लो. जो बोलना है उस पर इतना यकीन करो कि जब आप बोलो तो लोगो को सच लगे. आपकी बात आपके एक्सप्रेशन और फीलिंग्स से मैच होनी चाहिए. अपने सब्जेक्ट के लिए ऑडियंस में सिम्पेथी क्रियेट करो. आपका एन्थूयाज्म रियेल लगना चाहिए तभी वो सामने वाले पर भी असर करेगा. ज्यादातर पब्लिक स्पीचेस में ह्यूमेनिटी के टॉपिक भी होते है जैसे लिटरेचर, मॉडर्न लेंगुएज, ह्यूमन जियोग्राफी, लॉ और पोलिटिक्स, रिलीजन, आर्ट्स और हिस्ट्री. स्पीकर्स अक्सर अपने पॉइंट रखने के लिए या अपने टॉपिक की इम्पोर्टस शो कराने के लिए इन टोपिक्स को यूज़ करते है. इमेजिन करो कि आप ऑडियंस हो. अब इमेजिन करो कि आपके सामने कोई स्पीकर बगैर किसी फीलिंग के अमेरिकन हिस्ट्री पर स्पीच दे रहा है. तो आप क्या करोगे? ज़ाहिर है आपका ध्यान दूसरी चीजो पर चला जाएगा. क्योंकि जब आपको इंटरेस्ट ही नहीं होगा तो आप फोकस कैसे करोगे? तो भला ऐसी स्पीच से क्या फायदा जब लोगो को कोई इन्फोर्मेशन या नॉलेज ही ना मिल पाए. एक एवरेज स्पीकर स्पीच देते वक्त थोडा शर्माता है, उसकी फीलिंग्स ऑडियंस के सामने खुलकर नहीं आ पाती लेकिन आप अगर प्रेक्टिस करते रहोगे तो आपका उसका फालिग्स आडियस क सामन खुलकर नहा आ पाती लेकिन आप अगर प्रेक्टिस करते रहोगे तो आपका कांफिडेंस बढेगा. फिर आप भी किसी प्रोफेशनल स्पीकर की तरह एक जानदार और शानदार स्पीच दे सकते हो. एक ऐसी स्पीच जो आपके सूनने वालो को लम्बे टाइम तक याद रहेगी. कनक्ल्यूजन (Conclusion) डेल कारनेज की “द आर्ट ऑफ़ पब्लिक स्पीकिंग” बुक पढकर ना सिर्फ आपके अंदर से पब्लिक स्पीकिंग का डर निकलेगा बल्कि इसके बाद आपको पब्लिक स्पीकिंग में और भी मज़ा आएगा. अगर आप भी एक सक्सेस फुल पब्लिक स्पीकर बनना चाहते हो तो एक बुक आपको गाइड करेगी. इस बुक के अच्छे और एफिशिएंट रिजल्ट्स भी आपको तभी मिलेंगे जब आप अपने अंदर एक पोजिटिव एटीट्यूड डेवलप करोगे. अगर आपको खुद पे यकीन है तो बेशक रीजल्ट भी मिलेगा. और इसके लिए डिसप्लीन भी उतना ही ज़रूरी है. रूल्स फोलो करो, टिप्स और गाइड यूज़ करो, इस बुक के हर चैप्टर में दिए गए सवालों के जवाब दो. लेकिन आपको एक भी चैप्टर स्किप नहीं करना है. क्योंकि उसका फालिग्स आडियस क सामन खुलकर नहा आ पाती लेकिन आप अगर प्रेक्टिस करते रहोगे तो आपका कांफिडेंस बढेगा. फिर आप भी किसी प्रोफेशनल स्पीकर की तरह एक जानदार और शानदार स्पीच दे सकते हो. एक ऐसी स्पीच जो आपके सूनने वालो को लम्बे टाइम तक याद रहेगी. कनक्ल्यूजन (Conclusion) डेल कारनेज की “द आर्ट ऑफ़ पब्लिक स्पीकिंग” बुक पढकर ना सिर्फ आपके अंदर से पब्लिक स्पीकिंग का डर निकलेगा बल्कि इसके बाद आपको पब्लिक स्पीकिंग में और भी मज़ा आएगा. अगर आप भी एक सक्सेस फुल पब्लिक स्पीकर बनना चाहते हो तो एक बुक आपको गाइड करेगी. इस बुक के अच्छे और एफिशिएंट रिजल्ट्स भी आपको तभी मिलेंगे जब आप अपने अंदर एक पोजिटिव एटीट्यूड डेवलप करोगे. अगर आपको खुद पे यकीन है तो बेशक रीजल्ट भी मिलेगा. और इसके लिए डिसप्लीन भी उतना ही ज़रूरी है. रूल्स फोलो करो, टिप्स और गाइड यूज़ करो, इस बुक के हर चैप्टर में दिए गए सवालों के जवाब दो. लेकिन आपको एक भी चैप्टर स्किप नहीं करना है. क्योंकि डेल कारनेज की “द आर्ट ऑफ़ पब्लिक स्पीकिंग” बुक पढकर ना सिर्फ आपके अंदर से पब्लिक स्पीकिंग का डर निकलेगा बल्कि इसके बाद आपको पब्लिक स्पीकिंग में और भी मज़ा आएगा. अगर आप भी एक सक्सेस फुल पब्लिक स्पीकर बनना चाहते हो तो एक बुक आपको गाइड करेगी. इस बुक के अच्छे और एफिशिएंट रिजल्ट्स भी आपको तभी मिलेंगे जब आप अपने अंदर एक पोजिटिव एटीट्यूड डेवलप करोगे, अगर आपको खुद पे यकीन है तो बेशक रीजल्ट भी मिलेगा. और इसके लिए डिसप्लीन भी उतना ही ज़रूरी है. रूल्स फोलो करो, टिप्स और गाइड यूज़ करो, इस बुक के हर चैप्टर में दिए गए सवालों के जवाब दो. लेकिन आपको एक भी चैप्टर स्किप नहीं करना है. क्योंकि हर एक चैप्टर में एक लेसन है जो आपको मिस नहीं करना है. जल्दबाजी मत करो, जल्दबाजी से कभी कुछ हासिल नहीं होता. पब्लिक स्पीकिंग एक आर्ट है जिसे आप प्रेक्टिस के साथ ही धीरे-धीरे सीखोगे. इसलिए प्रेक्टिस करते रहो.

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