The 22 Immutable Laws of Branding: How to Build books in Hindi Al Ries and Laura Ries

The 22 Immutable Laws of
Branding: How to Build a…
Al Ries and Laura Ries
द 22 इमुटेबल लॉज़ (Immutable Laws)
ऑफ़ ब्रांडिंग
Introduction 
22 लॉज़ आपको किसी भी ब्रांड का प्रोडक्ट सेल करने में हेल्प कर सकते है. ये 22 लॉज़ आपके लिए बिलकुल किसी पिल के फॉर्म में समराईज (summarized )किये गए है. बस इसे निगल लो और आपका काम हो गया ! एन्जॉय इट
चैप्टर : द लॉ ऑफ़ एक्सपेंशन (expansion)
शेवरले (Chevrolet) कभी एक डोमीनेटिंग कंपनी हुआ करती थी लेकिन अब अगर आप इसे देखे तो पता चलेगा कि ये आज एक ऐसी कंपनी है जिसके पास कोई की प्रोडक्ट नहीं है. आज ये अपने चीप,
एक्सपेंसिव (expensive) बड़े या छोटी कार या ट्रक्स के लिए जानी जाती है. अब फोर्ड अमेरिका की एक लीडिंग कार कम्पनी है और ये भी शेवरले  (Chevrolet) की तरह सेम प्रोब्लम फेस कर रही है. ये अपनी लाइन एक्सपेंड कर रही है जिससे इसका  ब्रांड नेम और कम्पनी नेम दोनों वीक हो जाएगा. अगर हम इन दोनों कंपनीज को कम्पेयर (compare) करे तो पता चलेगा कि शेवरले (Chevrolet )ने लास्ट इयर 10 डिफरेंट कार लाइन्स निकाली थी जबकि फोर्ड ने बस 8. 

तो शेवरले (Chevrolet ) क्यों और कैसे इन कार्स की मार्केटिंग की?

 वो इसलिए क्योंकि शेवरले (Chevrolet ) फोर्ड को आउटसेल (outsell) करना चाहती है लेकिन बात अगर लम्बी रेस की है तो फोर्ड ही जीतेगी. क्योंकि मार्किट में एक ही कंपनी की इतनी सारी कारे देखकर कंज्यूमर कन्फ्यूज़ हो जाएगा. तो अगर आप कोई कम्पनी है तो क्या करेंगे? क्या आप लाइन ऑफ़ एक्सपेंशन (line of expansion ) इनक्रीज करके शोर्ट टाइम के लिए सेल करना चाहेंगे या फिर नेरो लाइन ऑफ़ प्रोडक्ट्स (narrow line of products ) के साथ मार्किट में लम्बे टाइम तक टिकना चाहेंगे? अपने प्रोडक्ट्स की लाइन एक्सपेंशन (line expansions) और मेगा ब्रांडिंग करके जब तक ये कंपनीज मार्किट में अपने प्रोडक्ट्स चलाने की कोशिश करती है तब तक ये पुराने हो चुके होते है और इनकी पॉवर ओवर हो जाती है. कभी अमेरिकन एक्सप्रेस मेम्बरशिप प्रिविलेज (privilege ) के साथ मिलने वाला एक प्रीमियम क्रेडिट कार्ड हुआ करता था जिसने 27% मार्किट शेयर के साथ क्रेडिट कार्ड्स का मार्किट डोमिनेट किया हुआ था. फिर उन्होंने हर साल 12 से 15 कार्ड्स निकालने स्टार्ट कर दिए जिसकी वजह से उनका मार्किट शेयर ड्राप होकर सिर्फ 18% तक रह गया था. यही सेम चीज़ लेवी जींस (Levi jeans) के साथ भी हुई. उन्होंने मार्किट में हर टाइप के कट वाली जींस निकाली. हालाँकि ये डिसीज़न शोर्ट टर्म के लिए प्रोफिटेबल था लेकिन लॉन्ग टर्म के लिए नहीं.

ऐसे कई सारे एक्जाम्पल हम देखते है लेकिन कंपनीज ये बात नहीं समझ पाती है कि कंज्यूमर का माइंड एक नाम और एक चीज़ को एक ब्रांड से जोडकर देखता है. अपने प्रोडक्ट्स एक्सपेंशन (expansion) करने की वजह से मार्किटर के पास लॉन्ग, कोम्प्लीकेटेड (complicated ) ब्रांड नेम की लिस्ट बन जाती है जिससे कस्टमर के लिए सेम प्रोडक्ट्स में फर्क करना ही मुश्किल हो जाता है. मार्किटर्स (Marketers) को ये बात समझनी चाहिए कि उनकी सेल पॉवर ऑफ़ प्रोडक्ट की वजह से नहीं बल्कि उनके कोम्प्टीटर्स की
वीकनेस की वजह से होती है.
चैप्टर 2: द लॉ ऑफ़ कॉन्ट्रैक्टशन (law of contraction)
आज के टाइम हर गली या नुक्कड़ में एक कॉफी शॉप मिल जायेगी जहाँ ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर भी सर्व किया जाता है. लेकिन होवार्ड श्लुत्ज़ (Howard Shlutz) ने जो किया वो बिलकुल अलग था क्योंकि
उन्होंने सिम्पली एक कॉफ़ी शॉप खोली जो बस एक चीज़ में स्पेशलाईजेड (specialized) थी… गेस (guess ) करो…जी हाँ कॉफ़ी. उस शॉप को आज हम स्टारबक्स के नाम से जानते है. सेम यही चीज़ हुई थी जब फ्रेड डेलुका (Fred DeLuca) ने एक फ़ास्ट फूड रेस्तरोरेंट (restaurant) खोला जिसकी स्पेशिलिटी थी सबमेरीन सेंडविचेस (submarine sandwiches) और इसके लिए उन्होंने एक ब्रिलिएंट नाम चूज़ किया जो ईजीली याद रहता था और ये नाम था”सबवे”. आप अपना फोकस नेरो (focus ) करके फेमस फिंगरप्रिंट वाला एक स्ट्रोंग ब्रांड बिल्ड कर सकते है. आप खुद ही देख लो कि सबवे आज अमेरिका में आँठवा लार्जेस्ट (largest) फ़ास्ट फूड चेन है. बच्चो का सुपर मार्किट एक छोटा सा स्टोर था

जहाँ उनके फर्नीचर और टॉयज मिलते थे लेकिन एक पॉइंट पर आके ओनर को फील हुआ कि उसे एक्सपेंड
(expand ) करना चाहिए और इसलिए फर्नीचर डिपार्टमेंट (furniture department ) को हटाकर और ज्यादा टॉयज रख दिए गए. और उसने टॉयज का नेम चेंज करके ‘आर” रख दिया. अब इस स्टोर में 20% टॉयज सेल होते है. अगर आप सोचते है कि हर सक्सेसफुल कम्पनी की अपनी कुछ स्पेशल चीज़ होती है तो सही सोचते है. होम डिपो (Home Depot ) और फर्नीचर, गेप (Cap) और कम्फ़र्टेबल क्लोथ्स (comfortable clothes) और इसी तरह कई और चीजों की लम्बी लिस्ट आपको मिल जाएगी जहाँ आप देख्नेगे कि चीज़े और ब्रांड एक दुसरे से कनेक्टेड है. बेस्ट ब्रांडिंग और कांट्रेक्टिंग के लिए फाइव स्टेप्स है :

1. नेरो द फोकस (Narrow the focus )
2. स्टोक इन डेप्थ (Stock in depth)
3. बाई चीप (Buy cheap)
4. सेल चीप (Sell cheap )
5. डोमिनेट द कैटेगरी (Dominate the category)

इस पॉइंट तक आकर आप खुद से शायद ये पूछे “ तो फिर क्यों ज़्यादातर कंपनीज कॉन्ट्रैक्ट (contract ) के बजाये खुद को एक्सपेंड (expand ) करना चाहती है ? तो इसका जवाब है कि हम में से ज्यादातर
लोग रिच लोगो को देखते है और उन्हें कॉपी करते है. जबकि हमें उस चीज़ पर गौर करना चाहिए जो ये लोग अमीर होने से पहले किया करते थे.

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चैप्टर 3: द लॉ ऑफ़ पब्लीसिटी (The law of Publicity)

एक बहुत बड़ी मिसकनसेप्शन(misconception ) जो अक्सर न्यू मार्केटर्स के साथ होती है. उन्हें लगता है कि एडवरटाईजिंग का मतलब है कि ब्रांड कैसे बनता है”. वैसे तो ये बात बड़ी कंपनीज पर फिट बैठती है जिन्होंने पहले से ही मार्किट में अपनी डोमिनेंस(dominance)बनाई होती है लेकिन न्यू कंपनीज के उपर ये बात अप्लाई नहीं होती है. स्टारबक्स (Starbuck’s) की स्टार्टिंग के 10 साल तक वो बस 10 मिलियन डॉलर ही स्पेंड करते थे और यहाँ हम एक ऐसे बिजनेस की बात कर रहे है जो एनुअली (annually) 2.6 बिलियन का बिजनेस करता है. सेम चीज़ वाल मार्ट (wall-mart ) जो कि अमेरिका का सबसे बड़ा स्टोर है. लेकिन वो एडवरटाईजिंग पर हार्डली (hardly )स्पेंड करता होगा फिर भी वो इतना पोपुलर है. तो आखिर किसी ब्रांड को बनाने का सीक्रेट क्या है ? आप शायद यही सवाल पूछना चाहेंगे? तो इसका आंसर होगा एक अच्छा पब्लिसिटी केम्पेन वो भी इस न्यू एज टेक्नोलोजी और
सोशाल मिडिया के टाइम में. और पब्लिसिटी पाने का सबसे बढ़िया तरीका है 

एक नयू कैटेगिरी बनना, जैसे कि:
→ हेनिकेन (Heineken) फर्स्ट इम्पोर्टेड बियर (first imported beer)
– जीरोक्स (Xerox) फर्स्ट प्लेन पेपर कोपियर (first plain paper copier )
– केऍफ़सी (KFC), फर्स्ट फ्रायड चिकेन फ़ास्ट फूड (the first fried chicken fast food )

ये लिस्ट काफी लम्बी है..न्यूज़ मिडिया को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि क्या अच्छा है, क्या नहीं उन्हें बस न्यू चीजों से मतलब है. अब आप शायद खुद से ये पूछे कि अगर पब्लिसिटी इतनी इम्पोर्टेट चीज़ है तो फिर
क्यों सारी पब्लिक एजेंसीज पर एडवरटाईजिंग एजेंट्स का कब्ज़ा है. हम बताते है इसका जवाब. दरअसल
पब्लिसिटी एकदम नया ट्रेंड है जैसे स्टार्टिंग में फैक्स इतना फेमस नहीं था लेकिन धीरे-धीरे ये बिजनेस में
कम्यूनिकेशन का सबसे इम्पोर्टेट मेथड बन गया था. लेकिन आज जो चीज़ काम करती है वो है पब्लिसिटी ना कि एडवरटाईजिंग. ऑथर (authors) एक बार की स्टोरी सुनाता है जब उन्हें लोटस डेवलपमेंट कोर्प
(Lotus Development Corp) के लिए मार्केटिंग करनी थी. उन्होंने लोटस नोट्स (Lotus Notes ) को “द फर्स्ट ग्रुपवेयर प्रोडक्ट” (“The first groupware product”) के तौर पर प्रोमोट किया. और ग्रुपवेयर का आईडिया काम कर गया क्योंकि तब ये एकदम फ्रेश कैटेगिरी था.

चैप्टर 4: द लॉ ऑफ़ एडवरटाईजिंग (The Law Of Advertising)
पब्लिसिटी बेशक ब्रांड्स क्रियेट करती है लेकिन मार्किट में अपनी लीडरशिप मेंटेन रखने के लिए उन्हें एडवरटाईजिंग की नीड होती है. अब एडवरटाईजिंग में काफी पैसा खर्च होता है लेकिन ये आपको मार्किट में आपके राइवल्स (rivals) से प्रोटेक्ट करती है. एडवरटाईजिंग का बेस्ट तरीका है कि आप लोगो को बताये कि जो लोगो को बेस्ट सोल्यूशन चाहिए वो आपके पास है. और तभो लोग आपका प्रोडक्ट खरीदेंगे. जेरोक्स (Xerox) सबसे पहले लोगो की नजरो में तब आया जब इसकी पब्लिसिटी हुई थी क्योंकि ये अपने टाइम का फर्स्ट प्लेन पेपर कॉपियर (first plain paper copier) था, और कुछ टाइम ही लोग इसे भूल गए क्योंकि ये पुरानी न्यूज़ हो चूका था. तो अब सवाल है कि कोई भी कम्पनी
पब्लिसिटी की पॉवर खत्म होने पर अपने प्रोडक्ट का मार्किट शेयर कैसे प्रोटेक्ट करेगी तो इसका जवाब है एडवरटाईजिंग. इसीलिए ज़ेरोक्स (Xerox) ने भी अपने प्रोडक्ट की एडवरटाईजिंग स्टार्ट कर दी,
उसे बेस्ट कोपियर बताकर और इसी वजह से उनके कोम्प्टीशन के दुसरे ब्रांड्स को काफी हार्ड वर्क करना पड़ा. और सबसे बड़ी बात है कि एडवरटाईजिंग एक्सपेंसिव (expensive ) होती है इसलिए लीडिंग ब्रांड्स ही इसे अफोर्ड कर पाते है..

चैप्टर 5: द लॉ ऑफ़ द वर्ड (The Law of the Word)
सबसे पॉवरफुल ब्रांड्स वो होते है जिनके पास अपने प्रोडक्ट से जुड़ा हुआ एक वर्ड होता जिसे कस्टमर रेसोनेट (resonates ) करता है यानी एक ऐसा वर्ड जिसे सुनकर उन्हें किसी ख़ास ब्रांड की याद आ जाए. जैसे कि अगर किसी ऑटोमोबाइल (automobile) बायर ( buyer ) से पुछा जाए कि “प्रेस्टीज (prestige) वर्ड सुनकर आपके माइंड में क्या आता है तो वो बोलेगा मर्सीडीज़ बेंज (Mercedes-Benz ) और अगर आप पूछे “सेफ्टी” (“Safety”) वर्ड से क्या इमेज माइंड में आती है तो शायद उनका जवाब होगा वॉल्वो ( Volvo ).
लेकिन एक कॉमन मिस्टेक जो ये सारी कंपनीज करती है वो ये है कि जो कैटेगरी उन्होंने क्रियेट की थी, अब वो उससे आउट हो गयी है. क्योंकि आप देखेंगे कि वॉल्वो अब सपोर्ट कार्स (sports cars) बनाने लगी है.. क्लीनेक्स (Kleenex) शायद अब तक का बेस्ट ब्रांड रहा होगा क्योंकि लोग टीश्यू बोलने के बजाये (क्लीनेक्स) बोलते थे. उनके लिए टीश्यू का मतलब ही क्लीनेक्स (Kleenex ) होता था.लेकिन आप जानते है क्लीनेक्स (Kleenex ) क्या किया. वो अपने ब्रांड तक स्टिक रहा जोकि फर्स्ट पॉकेट साइज़ टीश्यू था, वे टॉयलेट पेपर (toilet paper) या किचेन पेपर (kitchen paper ) तक पहुंचे ही नहीं. यही सेम फेड-एक्स (Fed-ex ) के साथ भी हुआ. उन्हें ओवरनाईट (“overnight”) डिलीवरी के लिए जाना जाता था क्योंकि वे फास्टेस्ट डिलीवरी देते थे. लेकिन फिर उन्होंने अपना डिलीवरी एरिया एक्सपेंड कर लिया हालाँकि वो कभी अपनी कैटेगरी से आउट नहीं हुए.

चैप्टर 6: द लॉ ऑफ़ क्रेडेन्शियल (The Law of Credentials)
वो चीज़ जो किसी भी ब्रांड को हटके बनाती है वो है उसका स्पेशल होना. यानी कस्टमर जब कोई प्रोडक्ट खरीदे तो उसे लगे कि यही सबसे बेस्ट है लेकिन इसके लिए उन्हें आपकी बात पर यकीन करने की ज़रूरत
नहीं है बल्कि उन्हें ये खुद लगना चाहिए. इसलिए सीक्रेट है यूनीक (unique) और डिफरेंट और खुद का क्रेडेन्शियल (credentials) होना. जैसा कि हमने पहले बताया था, अपने ब्रांड पर फोकस करना ही सक्सेस दिलाता है. लेकिन अगर आप अपनी खुद की कैटेगरी बनने तक अपने ब्रांड पर फोकस करे तो क्या होगा. जॉनसन एंड जॉनसन (Johnson and Johnson) के आने से पहले मार्किट में कोई बेबी शैम्पू कंपनी नहीं थी, वॉक्सवैगन (Volkswagen) से पहले चीप अफोर्डेबल (affordable) कार्स ( cars.) कहाँ होती थी. जब आप खुद अपनी कैटेगरी बन जाते है तो और कंपनी आपसे आगे निकल ही नहीं सकती. कंज्यूमर की अटेंशन ग्रेब करने के लिए थोडा बहुत कोम्प्टीशन होना भी चाहिए. बिना कोला / पेप्सी वार के कोई भी कोला मार्किट को भाव नहीं देगा.

चैप्टर 9: द लॉ ऑफ़ द नेम (The Law of the Name)
शोर्ट रन में ब्रांड को एक स्टरडी (sturdy) आईडिया और एक यूनीक कैटेगरी चाहिए लेकिन लॉन्ग रन में किसी ब्रांड को उसका नाम ही जिंदा रखता है. नाम के बगैर ब्रांड कुछ भी नहीं है. ज़ेरोक्स(Xerox) फर्स्ट
प्लेन पेपर कॉपियर (first plain paper copier) था जोकि स्टार्टिंग में एक यूनीक आईडिया था लेकिन उसके बाद मार्किट में कितने ही प्लेन पेपर कॉपियर आ गए लेकिन ज़ेरोक्स (Xerox) बेस्ट है क्योंकि ये फर्स्ट था और इसका नाम हमेशा ही बेल रिंग करता रहेगा. कॉमन नेम हमेशा फेड हो जाते है, पेपर मास्टर जैसा नाम भीड़ में खोकर रह जाता है. एक बड़ा डिफ़रेंस जापानीज़ और अमेरिकन कंपनीज के बीच ये भी है कि अमेरिकन कंपनीज ज्यादा फोकस रहती है जबकि जापानीज़ कंपनीज उतनी फोकस नहीं रहती, हालांकि पब्लिकली ये डिफ़रेंस इतना नज़र नहीं आता लेकिन सेल्स एड में साफ़ दिखता है. अमेरिकन कंपनीज मार्किट का 2.6% बनाती है जबकि जापानीज़ कंपनीज़ सिर्फ 0.7%.

चैप्टर 10: द लॉ ऑफ़ एक्स्टेंशन (The Law of Extensions)
ब्रांड एक्स्पेंडिंग (Expanding ) कभी-कभी डिजास्टरस (disastrous) हो सकता है, आपकी न्यू प्रोडक्ट लाइन कहीं ओल्ड वाले से कोंट्राडिक्ट (contradict) ना करे, इस बात का ध्यान रखना होगा जैसा कि अक्सर होता है. लाईट केचअप (Light Ketchup) के आने से कंज्यूमर (consumer ) कन्फ्यूज़ हो गए आखिर नार्मल केचअप में क्या प्रोब्लम है. जैसे क्रिस्टल पेप्सी से लोगो को समझ नहीं
आया कि ओर्डिनेरी (ordinary Pepsi) से ये कैसे डिफ़ररेंट है. जी नहीं, कंज्यूमर्स स्टुपिड नहीं बल्कि आप ही उन्हें अपने ओरिजिनल ब्रांड से दूर कर रहे है. तो इसलिए अपना ब्रांड एक्सटेंड (extend ) करने से पहले खुद से पूछ ले कि कहीं ये आपकी मार्किट को  तो अफेक्ट नहीं करेगा. जैसा स्टडीज़ (studies ) से पता चलता है कि सुपर मार्किट में 26,000 प्रोडक्ट्स है और पर डे ये नंबर एक्सीड (exceeded ) होता है तो इनमे से सिर्फ 16,000 प्रोडक्ट्स ही बिकते है बाकी के 5,000 ऐसे ही पड़े धूल खाते है. इसलिए आपको काफी स्मार्ट तरीके से चलना होगा और कोई भी न्यू प्रोडक्ट लौंच करने से पहले खुद से पूछे कि उसमे स्पेशल क्या है? पहले बीयर के बस 4 ब्रांड्स ही हुआ करते थे और आज मार्किट में 15 नए ब्रांड्स आ चुके है. अब इससे बियर के कंज्यूमर्स तो नहीं बड़े, हाँ मार्किट शेयर ज़रूर डिवाइडेड (divided)हो गया है.

चैप्टर 11: द लॉ ऑफ़ फेलोशिप (The Law of Fellowship)
कोई भी एक ब्रांड पूरे मार्किट शेयर को कण्ट्रोल नहीं कर सकता है और ये एक सबक है जो बहुत से ब्रांड्स सीखना नहीं चाहते. अगर देखा जाए तो कॉम्पटीशन (Competition) हेमशा हेल्दी होता है और इसका बेस्ट एक्जाम्पल हम कोला/पेप्सी वार में देख सकते है. उनका कॉम्पटीशन पब्लिक की अटेंशन ग्रेब करता
है जो इस वार को और भी इंट्रेस्टिंग बनाता हैलेकिन कॉम्पटीशन से मेरा मतलब है एक या दो कॉम्पटीटर्स ना कि 40 ! अमेरिकन वाइन इंडस्ट्री में 14,000 के करीब डिफरेंट ब्रांड्स है तो अब कस्टमर के पास कोई चॉइस ही नहीं बची कि अपना फेवरेट ब्रांड चूज़ कर सके. जबकि एब्सोल्यूट वोदका (absolute vodka ) और जैक डैनियल’स व्हिस्की (Jack Daniels’ Whiskey) ने इंटरनेशनल मार्किट में अपने लिए जगह बनाई है. एक बेस्ट लीडिंग ब्रांड मार्किट का सिर्फ 50% शेयर ही ले सकता है और अगर आपको ज्यादा शेयर चाहिए इंडीविजुअल ब्रांड (individual brand) से ज्यादा ब्रांड निकालने होंगे.

चैप्टर 12: द लॉ ऑफ़ द जेनेरिक (The Law of the Generic)

जेनेरिक यानी कॉमन नेम (Generic) शायद पहले के टाइम में चलते होंगे. ये कंपनीज इसीलिए चल पाई थी क्योंकि ये इनोवेशन बेस्ड (innovation) अपने टाइप की फर्स्ट कंपनीज थी. अपनी कंपनी
के लिए बेस्ट नेम चूज़ करने के लिए आपको कोई जेनेरिक नेम (generic name) सोचना होगा और उसे थोडा ट्विस्ट कर ले जैसे स्टेपल्स एक ऐसा ही नाम है. आपको अपने ऑफिस के लिए बेस्ट
सप्लाईज (office supplies ) और स्टेपल्स (staples ) कहाँ से मिलेंगे? ऑफ़ कोर्स स्टेपल्स से. लेकिन कुछ ब्रांड बड़े लकी होते है जैसे कि वेसलीन (Vaseline) कंज्यूमर्स ने बाद में इसमें इंटेंसिव केयर
(intensive care ) जोड़ दिया जोकि डिस्क्रीप्टिव नेम (descriptive name ) नहीं है बल्कि इसके जेनेरिक नेम का पार्ट बन गया है.

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चैप्टर 13: द लॉ ऑफ़ द कम्पनी (The Law of the Company)
कंज्यूमर बस ब्रांड के बारे में सोचता है नाकि कंपनी के बारे में. तो जब आप अपने ब्रांड का नाम कंपनी पर रखते है तो ये नेम डोमिनेट करेगा. जैसे कोका कोला कम्पनी है जिसका प्रोडक्ट नाम भी कोका कोला ही है. ऐसे कई और भी प्रोडक्ट्स है. क्योंकि कंज्यूमर्स को कोई फर्क नहीं पड़ता इस बात से कि कौन सी कम्पनी है, उन्हें तो बस ब्रांड से मतलब है. कोई बेवकूफ ही होगा जो कम्पनी की पूछताछ करेगा. क्या आप इस
बात की केयर करते है कि जो बुक आप पढ़ रहे है, उसका पब्लिशर कौन है? इसीलिए ये कंपनी का काम है कि वे अपने ब्रांड को ऐसे इनोवेट करे कि कस्टमर्स खिंचा चला आये.
चैप्टर 14: द लॉ ऑफ़ सब ब्रांड्स (The Law of Sub-brands)
कोई भी ब्रांड लांच (launch) होने के कुछ टाइम बाद ही खुद को इनोवेट (innovate )करके एक्सपेंड (expand ) होने की सोचता है और इसलिए वो सब-ब्रांडिंग से खुद को एक्सपेंड करता है. होलीडे इन (Holiday Inn) यू.एस. का एक लीडिंग होटल/ मोटेल ब्रांड है और उन्हें जब एक्सपेंड करना था तो वो एक न्यू प्रेस्टीजीयस एक्सपेंसिव (prestigious expensive ) होटल होलीडे इन क्राउन प्लाजा लेकर आये लेकिन हुआ ये कि लोगो को लगा जिस हिसाब से होलीडे इन को होना चाहिए था उससे ये थोडा ज्यादा एक्सपेंसिव है. फिर कंपनी ने दोनों प्रोजेक्ट को डिसकनेक्ट(disconnect) कर दिया और ये बस क्राउन प्लाज़ा होटल के नाम से ही चलने लगा. सब-ब्रांडिंग (sub-branding) का बेसिक आईडिया यही है कि आप जब कभी एक्सपेंड (expand) करने की सोचते है और आपके दो ब्रांड आपस में कोंट्रीडेक्ट (contradict) करे तो दोनों को सेपरेट (separate) कर ले.

चैप्टर 15: द लॉ ऑफ़ सिब्लिंग्स (The Lawof Siblings)
कोई भी कम्पनी एक साथ ही सारे ब्रांड्स नहीं निकाल सकती क्योंकि या तो ये आईडिया काम करता है या फिर ये फर्स्ट ब्रांड को ही मार्किट से गायब कर देगा. रीग्ले (Wrigely) कम्पनी बिलियन डॉलर्स के साथ च्यूइंग गम इंडस्ट्री (chewing gum industry) को डोमिनेट करती है और उनके कई सारे ब्रांड्स है, जैसे कि :

बिग रेड Big Red
डबल मिंट Doublemint
एक्स्ट्रा Extra
फ्रीडेंट Freedent
जूसी फ्रूट Juicy Fruit
स्पेयरमिंट Spearmint
विंटरफ्रेश Winterfresh

और टाइम की भी सेम अप्रोच रहती है. अगर आप अपने प्रोडक्ट्स के कई सारे ब्रांड्स एक साथ सक्सेसफूली चलाना चाहते है तो आपको नीचे दिए गए कुछ राईट फार्मूलाज़(right formulas) अप्लाई करने होंगे.
1. एक कॉमन प्रोडक्ट एरिया में फोकस करे Focus on a common product area
2. सेगमेंट को एक सिंगल एट्रीब्यूट (attribute) में सेलेक्ट करे Select a single attribute to segment
3. अपने सभी ब्रांड्स के बीच रिजिड डिसटिंकशन (rigid distinctions ) यानी उनके ख़ास डिफ़रेंस
हो.
4. डिफरेंट ब्रांड नेम क्रियेट करे Create different, not similar brand names

5. अपने ब्रांड का न्यू सिबलिंग तभी लांच करे जब आप कोई न्यू कैटेगरी क्रियेट करे. Launch the
new sibling when you can create a new category
6. सिबलिंग फेमिली पर हाईएस्ट लेवल पर कण्ट्रोल Red Keep control of the sibling family
at the highest level
अपने ब्रांड का सिबलिंग लौंच (Launch) करना सबके बस की बात नहीं है, इसके लिए राईट स्ट्रेटेजी (strategy ) और हार्ड वर्क की ज़रुरत पड़ती है.
चैप्टर 16: द लॉ ऑफ़ शेप (The Law of Shape)
लोगोस (Logos) हर शेप और साइज़ में मिलते है लेकिन उनकी ऑप्टीमल शेप (optimal shape ) होरिजेंटल (horizontal) है. लोगोस ( logos) बहुत इम्पोर्टेट है क्योंकि इसके श्रू आप अपने ब्रांड को रीप्रेजेंट (represent)करते है. अमेरिकन मार्केटर्स लोगोस डिजाईन में एक्सपर्ट है. लेकिन ऐसा कम ही
होता है जब आपको कोई सिंपल सा लोगो देखने को मिलेगा जो पूरी तरह आपके माइंड में छा जाए जैसे कि मर्सीडीज बेंज (Mercedes-Benz)का थ्री स्टार लोगो जो सिंपल भी है और इफेक्टिव भी.

चैप्टर 17: द लॉ ऑफ़ कलर (The Law of Colour)
अपने ब्रांड के लिए राईट कलर चूज़ करना काफी हार्ड डिसीज़न हो सकता है. आपको मुट्ठी भर कलर्स जैसे रेड, येल्लो, ब्ल्यू, ओरेंज और ग्रीन में से एक चूज़ करना होता है. आप ऐसा कलर चाहते है जो डिफरेंट
हो और आपके कॉम्पटीटर्स से आपको अलग शो कराये. एक बार जब ऑथर (author) को ब्राजील की एक कंपनी के फ़ार्म ट्रेकटर्स (farm tractors) का नाम और ब्रांड चूज़ करने को बोला गया तो उन्होंने मेक्सियन (Maxion (power) ) नाम चूज़ किया लेकिन जब कलर चूज़ करने की बारी आई तो उन्होंने
देखा कि कॉम्पटीटर्स में से बस एक ने ग्रीन कलर चूज़ किया था बाकी सारे रेड थे. तो उन्होंने बिलकुल डिफरेंट कलर ब्लू चूज़ किया. यही पेप्सी के साथ हुआ था जब उन्हें कलर चूज़ करना था, उन्होंने एक बड़ी मिस्टेक की. उन्होंने ब्ल्यू कलर चूज़ किया जोकि काफी स्लो कलर माना जाता है जबकि उनके कॉम्पटीटर् पेप्सी ने रेड कलर चूज़ किया था जोकि फेस कलर से मिलता जुलता है.

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चैप्टर 18: द लॉ ऑफ़ बॉर्डर्स (The Law of Borders)

कई सारे ब्रांड्स का ऐसा मानना है कि वे अपनी नेटिव कंट्री में ग्रो नहीं कर पायेंगे. इसलिए उन्हें ग्रो और एक्सपेंड करने के लिए दूसरी कंट्रीज़ में बिजनेस करना होगा. लेकिन पहले के चैप्टर्स में एक से
ज्यादा बार ये बात कही जा चुकी है कि एक्सपेंशन (expansion) आपकी प्रॉब्लम का सोल्यूशन नहीं है: पहले अपनी कंट्री में ग्रो करो फिर ग्लोबल के लिए ट्राई करो. और एक ही कैटेगरी में फोकस करो. खुद
को अपने टाइप का फर्स्ट बिजनेस बनाओ. हेनिकेन ब्रूअरी (Heineken brewery ) दुनिया की सबसे बड़ी बियर कंपनीज में से एक है जबकि ये नीदरलैंड में ओरिजिनेट (originated) हुई थी जोकि काफी
स्माल कंट्री है. हम बोल सकते है कि कुछ मामलो में ये लकी कंपनी थी लेकिन उन्होंने अपनी स्ट्रेंग्थ (strengths) भी काफी स्मार्टली यूज़ की है

 चैप्टर 19: द लॉ ऑफ़ कंसिसटेंसी (The Law of consistency)  जब आप कोई ब्रांड बिल्ड करते है तो साथ ही अपनी कंपनी का फ्यूचर और केरेक्टर बिल्ड कर लेते है. टाइम  पर ट्रेंड्स चेंज होते है और होते रहेंगे और हो सकता है कि ये आपके ब्रांड के एकदम अपोजिट चेंज हो. तब आपको यही ओबियस (obvious) लगेगा कि आप भी ट्रेंड फोलो करो लेकिन ये एकदम रोंग मूव (wrong move) होगा. जब एक बच्चा बड़ा होता है तो उसकी चॉइस कोला से बियमें चेंज हो जाती है. क्योंकि ये उसके लिए एक मैच्योरिटी का एक साइन है तो ज़रा इमेजिन (imagine) करो कि कोका कोला अगर कोका कोला बियर लाइन मार्किट में उतारे तो क्या होगा. जैक डेनियल व्हिस्की (Jack Daniels whiskey) के साथ कुछ यही हुआ था जब उन्होंने जैक डेनियल बियर (Jack Daniels beer ) निकाली और प्रोडक्शन रोकनी पड़ी क्योंकि इसे कोई भी नही खरीद रहा था. वॉल्वो (Volvo) भी इसी ट्रेप में फंसी थी क्योंकि वॉल्वो को हमेशा ही सेफ कार्स के लिए फेमस रही है लेकिन फिर कंपनी को वॉल्वो स्पोर्ट्स कार का आईडिया आया. नयी स्पोर्ट्स कार का आईडिया वॉल्वो के सेफ्टी कार के आईडिया पर भारी पड़ा और कंपनी को इस डिसीजन से काफी लोस (loss) उठाना पड़ा.

चैप्टर20: द लॉ ऑफ़ चेंज (The Law of Change)
आये दिन कोई न कोई कंपनी अपने ब्रांड को चेंज करने का आईडिया लेकर आती है. केंटुकी फ्रायड चिकेन (Kentucky Fried Chicken ) ने भी व्होल फ्रायड चिकेन (whole fried chicken ) से हटकर कुछ करने की सोची और अपना नाम केऍफ़सी (KFC ) चेंज करके कुछ हेल्दियर ऑप्शन लेकर आये लेकिन कस्टमर्स अभी भी उनके फ्रायड चिकेन के दीवाने थे. इसलिए आप अपने ब्रांड के बारे में क्या सोचते है ये उतना मैटर नहीं करता बल्कि ये ज्यादा मैटर करता है कि कस्टमर्स आपके ब्रांड के बारे में क्या सोचते है. और जैसे ही आपको पता चले कि वो क्या सोचते है, तुरंत इस बात का फायदा उठा लो.

चैप्टर 21: द लॉ ऑफ़ मोर्टेलिटी (The Lawof Morality)
ब्रांड्स भी लाइफ की बाकि चीजों की तरह होते है उनकी भी एक लिमिटेड लाइफ है. बहुत सी कंपनीज कोई न्यू ब्रांड बिल्ड करने के बजाये मिलियन डॉलर खर्च करके अपने किसी ओल्ड ब्रांड को बचाने में लगी रहती है. ये एक यूज़लेस कोशिश है. पर्सनल कंप्यूटर के आने से कई सारी कंपनीज खुली जैसे डैल (dell)
और ऐसे ही आजकल स्ट्रीमिंग सर्विसेस आने से हम ब्लोकबस्टर वीडियोज (blockbuster videos )
को भूल गए है.
चैप्टर 22: द लॉ ऑफ़ सिंगूलेरिटी (The Law of Singularity)
ब्रांड की सिंगूलेरिटी इसे स्ट्रोंग बनाती है. अटारी (Atari) पहले एक लीडिंग वीडियो गेम था लेकिन जब इसने कंप्यूटर बनाने की सोची तो अपनी जान से भी हाथ धो बैठा. लेकिन कुछ ब्रांड्स जैसे हेनिकेन
(Heineken ) और रोलेक्स (Rolex) अपने क्राफ्ट और सिंगुलेरिटी के लिए ही जाने जाते है.

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