ONE UP ON WALL STREET John Rothchild and Peter Lynch. Books In Hindi Summary

ONE UP ON WALL STREET John Rothchild and Peter Lynch इंट्रोडक्शन क्या आपको स्टॉक मार्केट किसी गैम्बलिंग बिजनेस की तरह लगता है? क्या आप स्टॉक मार्केट में ये सोचकर इन्वेस्ट करने से डरते हो कि इसमें बड़ा रिस्क है? ये समरी पढ़िए और खुद पता लगाइए कि क्यों हमे स्टॉक मार्केट में पैसा इन्वेस्ट क चाहिए. ये जरूरी नहीं कि आपका फाइनेंस का बैकग्राउंड हो तभी आपको ये समरी पढनी चाहिए या स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करना चाहिए. स्टॉक मार्केट में कोई नौसिखिया या आम आदमी भी किसी एक्पर्ट से कम नहीं है, कई बार तो वो एक्सपर्ट से बढ़कर साबित होते हैं! पीटर लिंच दुनिया के बेस्ट परफोर्मिंग म्यूचुअल फंड मैनेजर है. लिंच आपको अपनी स्ट्रेटेज़ी बतायेंगे और कुछ सजेशन और टिप्स भी देंगे कि कब और किन कंपनीज़ में आपको पैसा इन्वेस्ट करना चाहिए.! इस समरी में पर्सनल एक्सपीरियंस और कई एक्जामप्लस दिए गए हैं जो आपको इन्वेस्टमेंट बिजनेस के और करीब ले आएगी और आपको मोटिवेट करेगी कि आप भी इन्वेस्ट करना स्टार्ट कर दे! The Making of a Stockpicker अक्सर लोग स्टॉक्स में पैसा लगाने से पहले सौ बार सोचते है. जिन लोगों का कोई फाईनेंशियल बैकग्राउंड नहीं होता या कोई एक्सपीरिएंस नहीं होता, वो तो नहीं होता या कोई एक्सपीरिएंस नहीं होता, वो तो स्टॉक मार्केट से मीलों दूर रहना पसंद करते है. इस चैप्टर में पीटर लिंच इस ग़लतफहमी को तोड़ते है कि स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करने के लिए हमारे पास इस फील्ड से रिलेटेड जानकारी होनी चाहिए. चाहे आपने अपनी पूरी लाइफ हिस्ट्री और फिलोसफी पढ़ी हो तो भी आप स्टॉक बिजनेस में सक्सेसफुल हो सकते हो. अगर आपको लगता है कि इन्वेस्टमेंट करने के लिए आपको फाईनेंस में डिग्री लेने की जरूरत है आप बिल्कुल गलत सोच रहे हो! बेशक आपका कभी फाईनेंस का बैकग्राउंड ना रहा हो तो भी कोई बात नहीं ! स्टॉक मार्केट में आपकी क्वालिफिकेशन मैटर नहीं करती. मैं भी एकदम ऐसा ही हूँ, मेरा कभी फाईनेंशीयल बैकग्राउंड नहीं रहा तो भी आज मैं दुनिया का बेस्ट परफोर्मिंग म्यूचुअल फंड मैनेजर बन गया हूँ. मेरा जन्म 19 जनवरी, 1944 में हुआ था. मेरी माँ अपने सात भाई-बहनों में सबसे छोटी थी. मेरी फेमिली उस दौर से गुज़र चुकी है जब दुनिया में ग्रेट डिप्रेशन आया था. यही कारण है कि मेरी फेमिली ने कभी स्टॉक मार्केट पर भरोसा नहीं किया. मेरी फेमिली में अब तक सिर्फ एक ही इन्सान ने स्टॉक मार्केट में पैसा लगाया था और वो थे मेरे ग्रैंडफादर, मेरे ग्रैंडफादर जीन ग्रिफ़िन ने सिटीज़ सर्विस नाम की एक कंपनी में इन्वेस्ट किया था. उन्हें लगा ये वाटर यूटीलिटी की कंपनी है. लेकिन जल्द ही उन्हें पता चला कि सिटी सर्विस कोई वाटर यूटीलिटी नहीं बल्कि एक तेल की कंपनी है! आपको क्या लगता है अब उन्होंने क्या किया होगा? उन्होंने फौरन अपने सारे शेयर बेच डाले, और उसके कुछ ही वक्त बाद सिटी सर्विस के शेयर के प्राइस पचास गुना बढ़ गए थे. लेकिन ये सिर्फ मेरे ग्रैंडफादर की कहानी नहीं है. 1950 के दौर में ज़्यादातर अमेरिकन्स का यही रवैया हुआ करता था. लोगों को लगता था कि स्टॉक मार्केट एक जुआ है जहाँ वो अपना पैसा हार जायेंगे. जैसा कि मैंने पहले बताया था मेरे घर में स्टॉक मार्केट की कोई बात नहीं होती थी, हमारी फेमिली इन्वेस्टिंग से कोसों दूर रहती थी. जब मैं सिर्फ दस साल का था तो मेरे फादर की ब्रेन कैंसर से डेथ हो गई. मजबूरी में मेरी माँ को सारे घर की जिम्मेदारी अपने कन्धो पर लेनी पड़ी. मैंने भी पार्ट-टाइम काम करने के बारे में सोचा और इस तरह मैं एक कैडी बन गया. कैडी यानी वो जॉब जहाँ लोगों का सामान उठाने के लिए, छोटे-मोटे काम करने के लिए लोगों को hire किया जाता है. उस वक्त मेरे लिए एक कैडी की जॉब भी बड़ी बात थी. मैं उन लड़को से ज्यादा कमा रहा था जो न्यूज़पेपर बेचते थे. इसके अलावा मुझे प्रेसिडेंट और बड़ी-बड़ी कंपनी के सीईओ से मिलने का मौका मिल जाता था जिनके लिए मैं बतौर कैडी काम करता था! इन्ही लोगों के सोहबत में मुझे पता चला कि स्टॉक मार्केट उतनी भी बुरी चीज़ नहीं है जितना लोग समझते है क्योंकि मेरे कई क्लाइंट स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करते थे और अच्छा-खासा प्रोफिट कमाते थे. मैं अपने हाई स्कूल के दिनों में पूरे साल कैडी की जॉब और अच्छा-खासा प्रोफिट कमाते थे. मैं अपने हाई स्कूल के दिनों में पूरे साल कैडी की जॉब करता रहा ताकि अपने खर्च उठा सकूँ. मुझे साइंस से ज्यादा आर्ट्स में इंटरेस्ट था. मैथ्स, एकाउंटिंग और बिजनेस जैसे सब्जेक्ट मुझे जरा भी पसंद नहीं थे. मुझे इस बात का पूरा यकीन था कि जो सब्जेक्ट मुझे स्टॉक मार्केट के लिए बेहतर ढंग से तैयार कर सकता है, वो statistics नहीं बल्कि आर्ट है क्योंकि मुझे लगता है कि इन्वेस्टिंग करना कोई साइंस नहीं बल्कि एक आर्ट है. 1963 में आखिरकार मुझे अपना पहला स्टॉक खरीदने का मौका मिला जब मैंने फ्लाइंग टाइगर एयरलाइन्स के स्टॉक खरीदे. उस वक्त उनके एक शेयर का प्राइस था $7. मैंने इन्वेस्टमेंट के लिए यूं ही कोई कंपनी नहीं चुनी थी बल्कि न्यूजपेपर में एक आर्टिकल पढने के बाद ही मैंने अपना मन बनाया था जिसमे फ्रेट कंपनी के ब्राईट फ्यूचर का वादा किया गया था. freight कंपनी यानी जो सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने का काम करती हैं. लेकिन स्टॉक प्राइस बढने का ये कारण नहीं था बल्कि असली वजह ये थी कि उन दिनों विएतनाम वॉर चल रही थी और cargo का पैसिफिक ocean में खूब आना-जाना लगा रहता था. अब ये मेरा गुड लक ही था जो मुझे इस डील से अच्छा प्रॉफिट हुआ. जब मैं boston कॉलेज में पढ़ रहा था तो मुझे फिडेलिटी, न्यू यॉर्क की एक बोट क्लब में गर्मियों में जॉब मिल गई. इस फील्ड में मुझे पहले कोई A में जॉब मिल गई. इस फील्ड में मुझे पहले कोई एक्सपिरिएंस नहीं था. यहाँ मेरा काम बस इतना था कि मुझे कुछ कंपनीज़ के बारे में रिसर्च करना होता था और फिर रिपोर्ट लिखनी होती थी. जब मैं अपने ग्रेजुएशन के सेकंड ईयर के लिए वापस wharton लौटा तब मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मैंने आज तक जो कुछ भी पढ़ा है, वो मेरे किसी काम का नहीं है. कॉलेज में मुझे स्टेटिसस्टिक और एडवांस्ड कैलकुलस सिखाया गया था. लेकिन मुझे ऐसा लगा कि ये वो एजुकेशन नहीं है जिसकी मुझे स्टॉक मार्केट में जरूरत पड़ सकती थी. मैं wharton कॉलेज के प्रोफेसर और फिडेलिटी के कलीग्स के बीच कम्प्येर करने लगा. मुझे एहसास हुआ कि कॉलेज में हमे जो थ्योरी पढाई जाती है वो रियल लाइफ में प्रेक्टिकल नहीं होती. स्टॉक मार्केट में काम करते हुए मेरा पोर्टफोलियो अभी ग्रो करना शुरू ही हुआ था. एक पॉइंट ऐसा भी आया जब मेरे पास 150$ की सेविंग्स थी! तो अगर आपको अब भी लगता है कि इन्वेस्टिंग के लिए आपको किसी क्वालिफिकेशन की या एक्सपर्ट एडवाईज़ की जरूरत है तो आपको बता दूं कि इस फिले में एक एक्सपर्ट बनने के लिए आप जरा भी अनक्वालीफाईड नहीं हो. na A . ONE UP ON WALL STREET John Rothchild and Peter Lynch The Wall Street Oxymorons पीटर लिंच अपनी बुक में “ऑक्सीमोरोन प्रोफ़ेसनल इन्वेस्टिंग” के बारे में डिटेल से बताते है. इस चैप्टर में आपको बताया जाएगा कि कैसे नए इन्वेस्टर्स भी एक्सपर्ट्स को पीछे छोड़ देते है. प्रोफेसन्ल्स के लिए इन्वेस्टमेंट में रिस्क फैक्टर किसी नौसिखिये की रिस्क फ्री इन्वेस्टमेंट से एकदम opposite होता है. ऑक्सीमोरोन का मतलब होता है कोंट्रीडिक्टरी टर्स का एक कंजक्शन जैसे कि एक्जाम्पल के लिए हम कहते है: deafening silence यानी कानों में चुभने वाला सन्नाटा. ये दोनों बातें इतनी अलग हैं कि एक साथ कभी हो ही नहीं सकतीं. एक और टर्म है जो मैं ऑक्सीमोरोन में एड करना चाहूंगा वो है” प्रोफ़ेसनल इन्वेस्टिंग”. वो इसलिए क्योंकि सारे नए लोगों को चाहिए कि वो इन्वेस्टिंग को एक डाउटफुल पर्सपेक्टिव से देखे यानी शक की नज़रो से देखे. स्टॉक तभी अट्रेक्टिव लगते है जब बहुत सारे बड़े इंस्टीट्यूशन स्टॉक्स में इन्वेस्ट करते है और जब वो एक रेकमंडेड लिस्ट में शामिल होता है. असल में लोग स्टॉक्स खरीदने के लिए दूसरों का वेट करते है, यानि कोई और पहले उस स्टॉक को खरीद ले तब वो खरीदेंगे. इसे मैं “स्ट्रीट लैग” बोलता हूँ. कंपनीज़ को सालो-साल लग जाते है तब जाकर इंस्टीट्यशन उनके स्टॉक्स खरीदते है. तो अगर आप खरीद ले तब वो खरीदेगे. इसे में “स्ट्रीट लैंग” बोलता हूँ. कंपनीज़ को सालो-साल लग जाते है तब जाकर इंस्टीट्यूशन उनके स्टॉक्स खरीदते है. तो अगर आप भी इसी इंतज़ार में हो कि पहले कोई और स्टॉक खरीद ले तब आप खरीदोगे, तो आपको बता दे कि इससे आपके प्रॉफिट कमाने के चांस कम हो जाते है. एक और एडवाईस आपको देना चाहूंगा, वो ये कि कभी प्रोफेसनल्स की बात मत मानना. सुनने में अजीब लगता है ना? पर यही सच है. असल में जब कभी हमे कोई अच्छा हेयरस्टाइल करवाना होता है या अपने घर का इंटीरियर करवाना होता है तो हम एक्सपर्ट के पास जाते है. लेकिन इन्वेस्टमेंट की बात अलग है, यहाँ आपको खुद से बढिया एक्सपर्ट नहीं मिलेगा. फंड मैनेजर वो स्टॉक्स नहीं खरीदते जिन्हें देखकर लगता हो कि इससे अच्छा रिवॉर्ड मिलेगा. इसे potentially rewarding stocks कहा जाता है. लेकिन जब यही स्टॉक्स ऊपर जाते है तो उनके पास कुछ ऐसे बहाने होते है : “इन्वेस्ट करने के लिए ये स्टॉक बड़े छोटे थे”. पोटेंशियली रीवार्डिंग स्टॉक्स में इन्वेस्ट करने में ज़्यादा रिस्क है और ज्यादातर फंड मैनेजर इस रिस्क को उठाने से डरते है. फंड मैनेजर असल में अपनी जॉब खोना नहीं चाहते. अगर वो अपने क्लाइंट्स को आईबीएम् जैसी कंपनीज़ में इन्वेस्ट करने को कहेंगे तो उनकी जॉब कभी नहीं जाएगी चाहे स्टॉक प्राईस कितने ही डाउन क्यों ना चले जाये. इसके पीछे वजह ये है कि आईबीएम् जैसी बड़ी कंपनी की मार्केट में अच्छी रेपुटेशन होती है और उम्मीद की जाती पाथ पपा जाणाणता पापापा मार्केट में अच्छी रेपुटेशन होती है और उम्मीद की जाती है कि इनके स्टॉक्स ऊपर जायेंगे ही जायेंगे इसलिए फंड मैनेजर के जजमेंट पर कोई अंगुली नहीं उठा पायेगा. वही दूसरी तरफ अगर फंड मैनेजर्स अपने क्लाइंट्स को किसी छोटी-मोटी कंपनी में इन्वेस्ट करने को कहते है और अगर स्टॉक्स बुरी तरह गिर जाएँ तो उनकी जॉब भी जा सकती है. अगर क्लाइंट्स अलग-अलग तरह के स्टॉक्स में इन्वेस्ट करते है तो भी ये एक रिस्की डिसीजन होगा. मान लो दो लोग जो साथ में गोल्फ खेलते है, जिनका अकाउंट एक ही बैंक मैनेज कर रहा है, तो क्या वो अपनी आपसी बातचीत में एक दूसरे को ये नहीं बताएँगे कि किसको कितना प्रॉफिट मिल रहा है. मान लो ए का अकाउंट 20% बढ़ा है जबकि बी का अकाउंट 40% तक बढ़ गया है, तो ऐसी सूरत में ए उस बैंक से अपना सारा पैसा निकालकर किसी और बैंक में डालने की सोच सकता है. यही वजह है कि क्लाइंट्स के लिए स्टॉक्स के सेम बैच से अलग-अलग स्टॉक चुने जाते हैं. लेकिन स्टॉक मार्केट में नया-नया होना ही आपकी सबसे बड़ी एडवांटेज है क्योंकि आपके एम्प्लोयर्स आपके किसी डिसीजन को क्रिटीसाईज़ नहीं कर पायेंगे और ना ही आप जॉब से निकाले जाओगे. आप रिस्क ले सकते हो, ऐसी कंपनीज़ में इन्वेस्ट कर सकते हो जो आईबीएम् से छोटी है. आपको अपना पैसा कई सारे स्टॉक्स में डिवाइड करने की जरूरत नहीं है. आप अपनी चॉदस से एक ही स्टॉक ले सकते हो अगर में ए उस बैंक से अपना सारा पैसा निकालकर किसी और बैंक में डालने की सोच सकता है. यही वजह है कि क्लाइंट्स के लिए स्टॉक्स के सेम बैच से अलग-अलग स्टॉक चुने जाते हैं. लेकिन स्टॉक मार्केट में नया-नया होना ही आपकी सबसे बड़ी एडवांटेज है क्योंकि आपके एम्प्लोयर्स आपके किसी डिसीजन को क्रिटीसाईज़ नहीं कर पायेंगे और ना ही आप जॉब से निकाले जाओगे. आप रिस्क ले सकते हो, ऐसी कंपनीज़ में इन्वेस्ट कर सकते हो जो आईबीएम से छोटी है. आपको अपना पैसा कई सारे स्टॉक्स में डिवाइड करने की जरूरत नहीं है. आप अपनी चॉइस से एक ही स्टॉक ले सकते हो. अगर आपको मार्केट सही नहीं लग रहा तो तब तक इन्वेस्ट मत करो जब तक कि आपको बैटर अपोचूँनिटी नहीं मिल जाती और बेशक, ये पता होना कि कहाँ इन्वेस्ट करना है, आपके लिए एक और एडवांटेज होगी. जिस रेस्ट्रोरेन्ट में आप जाते हो या आपके फ्रेंड्स ने क्या कपड़े पहने है, ये सब डिसक्राइब करता है कि कौन से स्टॉक्स ऊपर जाने वाले है. ये नॉलेज आपके पास है, उन प्रोफेसनल्स के पास नहीं जो अपने कैबिन में बैठे रहते है. उनके पास कोई ग्राउंड नॉलेज नहीं होती, सिर्फ अलग-अलग कंपनी की रिपोर्ट होती है. इसलिए असली खबर उन तक पहुँचने से पहले आप तक पहुँचती है. ONE UP ON WALL STREET John Rothchild and Peter Lynch Is This Gambling, or What? इस चैप्टर में स्टॉक्स और bond के बीच की इन्वेस्टमेंट को कम्प्येर किया गया है. साथ ही इन दोनों से जो भी रिस्क फैक्टर जुड़े है, उन्हें भी एक्सप्लेन किया गया है. पीटर लिंच स्टॉक इन्वेस्टमेंट को समझाने के लिए स्टड पोकर के गेम को मेटाफर की तरह यूज़ करते है. स्टॉक मार्केट गिरते ही लोग बैंक भागते है bond लेने के लिए. bond एक लोन की तरह है जो इन्वेस्टर्स पैसे उधार लेने वाले को कुछ इंटरेस्ट रेट पर देते हैं. पिछले कुछ 20 सालों से bond काफी पोपुलर हुए है. लेकिन क्या हम bond में इन्वेस्ट करने को स्टॉक्स में इन्वेस्ट करने से कम्प्येर कर सकते है? बेशक ये सच है कि जो प्रॉफिट आपको स्टॉक्स में मिलता है, वो bond से कहीं ज्यादा होता है. वो इसलिए क्योंकि जब आप किसी कंपनी के स्टॉक में इन्वेस्ट करते हो तो उस कंपनी के कुछ शेयर यानी कुछ हिस्सा आपका हो जाता है. दूसरे शब्दों में कहे तो आप उस कंपनी के पार्टनर बन जाते हो. जब कंपनी ग्रो करेगी तो आप भी ग्रो करोगे क्योंकि आप भी एक पार्टनर हो. दूसरी तरह bond में आप सिर्फ एक लेंडर हो यानि आप सिर्फ पैसा उधार दे रहे हो जो बाद में आपको कुछ इंटरेस्ट के साथ वापस मिल जायेगा. अब चाहे आप मैकडोनाल्डस में इन्वेस्ट करो या किसी na A . ONE UP ON WALL STREET John Rothchild and Peter Lynch Is This Gambling, or What? इस चैप्टर में स्टॉक्स और bond के बीच की इन्वेस्टमेंट को कम्प्येर किया गया है. साथ ही इन दोनों से जो भी रिस्क फैक्टर जुड़े है, उन्हें भी एक्सप्लेन किया गया है. पीटर लिंच स्टॉक इन्वेस्टमेंट को समझाने के लिए स्टड पोकर के गेम को मेटाफर की तरह यूज़ करते है. स्टॉक मार्केट गिरते ही लोग बैंक भागते है bond लेने के लिए. bond एक लोन की तरह है जो इन्वेस्टर्स पैसे उधार लेने वाले को कुछ इंटरेस्ट रेट पर देते हैं. पिछले कुछ 20 सालों से bond काफी पोपुलर हुए है. लेकिन क्या हम bond में इन्वेस्ट करने को स्टॉक्स में इन्वेस्ट करने से कम्प्येर कर सकते है? बेशक ये सच है कि जो प्रॉफिट आपको स्टॉक्स में मिलता है, वो bond से कहीं ज्यादा होता है. वो इसलिए क्योंकि जब आप किसी कंपनी के स्टॉक में इन्वेस्ट करते हो तो उस कंपनी के कुछ शेयर यानी कुछ हिस्सा आपका हो जाता है. दूसरे शब्दों में कहे तो आप उस कंपनी के पार्टनर बन जाते हो. जब कंपनी ग्रो करेगी तो आप भी ग्रो करोगे क्योंकि आप भी एक पार्टनर हो. दूसरी तरह bond में आप सिर्फ एक लेंडर हो यानि आप सिर्फ पैसा उधार दे रहे हो जो बाद में आपको कुछ इंटरेस्ट के साथ वापस मिल जायेगा. अब चाहे आप मैकडोनाल्डस में इन्वेस्ट करो या किसी A < पापा जातात. पता ७पार ५०० णा पा५ में आपको कुछ इंटरेस्ट के साथ वापस मिल जायेंगा. अब चाहे आप मैकडोनाल्डस में इन्वेस्ट करो या किसी छोटी कंपनी में, ज्यादा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आपको ग्रोथ लिमिटेड ही रहेगी. लेकिन क्या स्टॉक्स में रिस्क ज्यादा है? बेशक है. स्टॉक्स आपको किसी भी प्रॉफिट की गारंटी नहीं देते. लेकिन इम्पोर्टेट ये है कि आप राईट टाइम पर पैसा इन्वेस्ट करो. लोग स्टॉक इन्वेस्टमेंट को इसीलिए एक जुआ बोलते है जब वो पैसे हार जाते है. लेकिन नुक्सान तभी होता है जब आप गलत जगह, गलत टाइम पर इन्वेस्ट करते हो और जहाँ तक रिस्क की बात है तो रिस्क कहाँ नहीं है. देखा जाये तो bond भी रिस्की है. इसमें कई बार इंटरेस्ट रेट इतना कम हो जाता है कि आपको काफी कम return मिलता है या फिर आपको डिस्काउंट में bond बेचने पड़ते है. किसी भी कंपनी में इन्वेस्ट करने से पहले आपको कुछ बेसिक सवाल पूछ लेने चाहिए और जो जवाब मिले उसी के हिसाब से डिसाइड करो कि इस कंपनी में इन्वेस्ट करना है या नहीं स्टॉक्स में इन्वेस्ट करना पोकर गेम की तरह है. शुरू में आपको कुछ समझ नहीं आता, फिर धीरे-धीरे आपके सामने पिक्चर क्लियर होने लगती है. शुरुवात में आपको सिर्फ अपने कार्ड्स का पता होता है, लेकिन जैसे-जैसे और कार्ड्स खुलते जाते है, आपको पता चल जाता है कि किसकी जीत होगी. Passing the Mirror Test इससे पहले कि आप स्टॉक्स में इन्वेस्ट करने का मन A < जीत होगी. Passing the Mirror Test इससे पहले कि आप स्टॉक्स में इन्वेस्ट करने का मन बनाये, पीटर लिंच आपको तीन सवालों का मिरर टेस्ट देते है. ये सवाल इसलिए है ताकि आपकी इन्वेस्टमेंट कहीं बहुत ज्यादा रिस्की ना हो जाए. साथ ही पीटर ह्यूमन ईमोशंस को भी डिसक्राइब करते है जो उस फैसलों के बीच आते है जो एक इन्वेस्टर को लेने पड़ते है. कहानी: इन्वेस्टिंग से पहले ऐसे तीन सवाल है जो आपको खुद से जरूर पूछने चाहिए – 1) क्या मेरा खुद का घर है? 2) क्या मुझे पैसे की जरूरत है? 3) 3) क्या मैं इतना काबिल हूँ कि स्टॉक्स मार्केट में सक्सेसफुल हो सकू? 4) स्टॉक्स में इन्वेस्ट करने से पहले आपको अपना घर खरीद लेना चाहिए क्योंकि घर खरीदना एक प्राइमरी इन्वेस्टमेंट है जो ज्यादातर लोग करते है. घर खरीदना मेंट है. लेकिन घर खरीदते वक्त उतना ही केयरफुल रहे जितना आप स्टॉक्स खरीदते वक्त रहते है. अपना घर लेने के बाद खुद से दूसरा सवाल करे: क्या मुझे पैसों की जरूरत है? अगर आपकी कोई और ज़िम्मेदारी है जहाँ आपको पैसे की जरूरत है तो फिर स्टॉक्स में पैसा मत लगाईए. जैसे एक्जाम्पल के लिए एक-दो साल में अगर आपको एक प्रॉफिटेबल: पैसे की जरूरत है तो फिर स्टॉक्स में पैसा मत लगाईए. जैसे एक्जाम्पल के लिए एक-दो साल में अगर आपको अपने बच्चो के एजुकेशन का खर्चा उठाना है तो स्टॉक्स में इन्वेस्ट करना आपके लिए सही जगह नहीं है. आपको स्टॉक मार्केट में तभी इन्वेस्ट करना चाहिए जब आप नुक्सान उठाने की सिचुएशन में हो. अगर आपके इन्वेस्टमेंट से आपकी डेली लाइफ या ज़रुरत के खर्ची में फर्क नहीं पड़ता तो आप इन्वेस्टिंग के बारे में सोच सकते हो. लास्ट में खुद से सबसे अहम् सवाल पूछो: सक्सेसफुल होने के लिए आपमें कुछ पर्सनल क्वालिटी होनी चाहिए जैसे पेशन्स, टोलरेंस, कॉमन सेन्स, फ्लेक्सीबीलिटी और लगातार डटकर लगे रहने की quality. इसके साथ ही अपनी गट फीलिंग के हिसाब से कभी मत चलना. सिर्फ फैक्ट्स के बेस पर डिसीजन लेना. एक एवरेज लापरवाह इन्वेस्टर तीन इमोशंस से गुजरता है: : concern, complacency और capitulation. इन्वेस्टर इस बात को लेकर चिंतित रहता है कि कहीं स्टॉक्स नीचे ना गिर जाएँ, इस डर से वो अच्छी कंपनी के स्टॉक्स नहीं लेता. फिर जब वो हायर प्राइस पर स्टॉक्स लेता है तो अनसेटिसफाईड फील करता है. फाईनली जब स्टॉक्स उसके खरीदे हुए प्राइस से कम हो जाते है तब उसकी हिम्मत टूट जाती है और वो अपने स्टॉक्स बेच देता है. कुछ और इन्वेस्टर्स खुद को” लॉन्ग टर्म” इन्वेस्टर्स बोलते है लेकिन जैसे ही स्टॉक्स के रेट गिरते है, वो फौरन अपने स्टॉक्स बेच देते है और “ शोर्ट टर्म” COA < A९ आपको स्टॉक मार्केट में तभी इन्वेस्ट करना चाहिए जब आप नुक्सान उठाने की सिचुएशन में हो. अगर आपके इन्वेस्टमेंट से आपकी डेली लाइफ या ज़रुरत के ख! में फर्क नहीं पड़ता तो आप इन्वेस्टिंग के बारे में सोच सकते हो. लास्ट में खुद से सबसे अहम् सवाल पूछो: सक्सेसफुल होने के लिए आपमें कुछ पर्सनल क्वालिटी होनी चाहिए जैसे पेशन्स, टोलरेंस, कॉमन सेन्स, फ्लेक्सीबीलिटी और लगातार डटकर लगे रहने की quality. इसके साथ ही अपनी गट फीलिंग के हिसाब से कभी मत चलना. सिर्फ फैक्ट्स के बेस पर डिसीजन लेना. एक एवरेज लापरवाह इन्वेस्टर तीन इमोशंस से गुजरता है: : concern, complacency और capitulation. इन्वेस्टर इस बात को लेकर चिंतित रहता है कि कहीं स्टॉक्स नीचे ना गिर जाएँ, इस डर से वो अच्छी कंपनी के स्टॉक्स नहीं लेता. फिर जब वो हायर प्राइस पर स्टॉक्स लेता है तो अनसेटिसफाईड फील करता है. फाईनली जब स्टॉक्स उसके खरीदे हुए प्राइस से कम हो जाते है तब उसकी हिम्मत टूट जाती है और वो अपने स्टॉक्स बेच देता है. कुछ और इन्वेस्टर्स खुद को” लॉन्ग टर्म” इन्वेस्टर्स बोलते है लेकिन जैसे ही स्टॉक्स के रेट गिरते है, वो फौरन अपने स्टॉक्स बेच देते है और “ शोर्ट टर्म” इन्वेस्टर की भीड़ में शामिल हो जाते है. ONE UP ON WALL STREET John Rothchild and Peter Lynch Is This a Good Market? Please Don’t Ask लेकिन हमे कैसे पता चलेगा कि इन्वेस्टिंग के लिए ये टाइम सही है या नहीं ? नहीं, इस बारे में कोई प्रेडिक्शन नहीं की जा सकती. इस चैप्टर में पीटर लिंच आपको बताएँगे कि अपने पिछले एक्सपिरियेस के बेस पर हमे क्यों फ्यूचर प्रेडिक्शन से बचना चाहिए. यहाँ वो “द कॉकटेल थ्योरी” एक्सप्लेन करते है जो हमे मार्केट सिनेरियो के बारे में प्रेडिक्ट करने या पहले से अंदाजा लगाने से रोकती है. लोग अक्सर मुझसे पूछते है” अभी मार्केट में इन्वेस्ट करना कैसा रहेगा? इस वक्त मार्केट कैसी है, अप या डाउन? प्राइस कब बढ़ेंगे?” जबकि हकीकत तो ये है कि आप स्टॉक मार्केट को कभी प्रेडिक्ट कर ही नहीं सकते, ये बस समय की बर्बादी है क्योंकि फ्यूचर में क्या होगा, ये कोई नहीं बता सकता. आपको ये याद रखना चाहिए कि पैटर्न हमेशा रिपीट नहीं होते, जो आज हुआ है जरूरी नहीं कल भी हो और इन्सान की फितरत है कि वो अपने पास्ट एक्सपीरिएंस के बेस पर फ्यूचर प्रेडिक्ट करने की गलती करता है. मायन माईथोलोजी के हिसाब से ये दुनिया चार बार खत्म हो चुकी है और हर टाइम मायंस खुद को फ्यूचर के लिए बचाने की कोशिश करते है. लेकिन उनका खत्म हो चुकी है और हर टाइम मायंस खुद को फ्यूचर के लिए बचाने की कोशिश करते है. लेकिन उनका प्रोटेक्शन हमेशा पहले वाले विनाश के खिलाफ होता है. जैसे कि मायंस मानते थे कि सबसे पहले दुनिया बाढ़ में खत्म हुई तो मायंस बचने के लिए पहाड़ों में चले गये और पेड़ो में घर बनाकर रहने लगे. फिर दूसरी बार दुनिया आग से खत्म हुई. ये सिलसिला चलता रहा और हर बार मायंस खुद को पहले वाले विनाश से बचाने की तैयारी करते रहे. लेकिन जो पहले हुआ था, वो आगे भी होगा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है. इसलिए फ्यूचर प्रेडिक्शन एक जुआ खेलना जैसा है. जब बड़े-बड़े प्रोफेसन्ल्स भी मार्केट प्रेडिक्ट नहीं कर पाते तो नए लोग भला कैसे बता पाएंगे ? तो इसलिए इस सिनेरियो में हमे ‘कॉकटेल थ्योरी” की जरूरत पड़ती है. मान लो एक कॉकटेल पार्टी चल रही है जहाँ अलग-अलग प्रोफेश्न के लोग शामिल है और ड्रिंक्स एन्जॉय कर रहे है. तो मार्केट का फर्स्ट स्टेज है जब कोई भी म्यूचुअल फंड मैनेजर से बात नहीं करता. लोग डेंटिस्ट के पास जाकर अपने दांतों की प्रॉब्लम डिस्कस कर रहे है. ये वो स्टेज है जहाँ मार्केट उपर जा सकता है. अब आता है स्टेज 2, जहाँ मेहमान म्यूचअल फंड मैनेजर से थोड़ी देर बात करने के बाद फिर से डेंटिस्ट के पास चले जाते है. इस स्टेज में मार्केट के 15% ऊपर जाने के चांस है. अब आता है स्टेज 3, अब हर कोई म्यूचल फंड मैनेजर को घेरे खड़ा है और एडवाइज़ मांग रहा है कि उन्हें कौन से स्टॉक खरीदने चाहिए. यहाँ तक डेंटिस्ट भी अब यही सवाल . प्रेडिक्शन एक जुआ खेलना जैसा है. जब बड़े-बड़े प्रोफेसनल्स भी मार्केट प्रेडिक्ट नहीं कर पाते तो नए लोग भला कैसे बता पाएंगे ? तो इसलिए इस सिनेरियो में हमे ‘कॉकटेल थ्योरी” की जरूरत पड़ती है. मान लो एक कॉकटेल पार्टी चल रही है जहाँ अलग-अलग प्रोफेश्न के लोग शामिल है और ड्रिंक्स एन्जॉय कर रहे है. तो मार्केट का फर्स्ट स्टेज है जब कोई भी म्यूचुअल फंड मैनेजर से बात नहीं करता. लोग डेंटिस्ट के पास जाकर अपने दांतों की प्रॉब्लम डिस्कस कर रहे है. ये वो स्टेज है जहाँ मार्केट उपर जा सकता है. अब आता है स्टेज 2, जहाँ मेहमान म्यूचअल फंड मैनेजर से थोड़ी देर बात करने के बाद फिर से डेंटिस्ट के पास चले जाते है. इस स्टेज में मार्केट के 15% ऊपर जाने के चांस है. अब आता है स्टेज 3 , अब हर कोई म्यूचल फंड मैनेजर को घेरे खड़ा है और एडवाइज़ मांग रहा है कि उन्हें कौन से स्टॉक खरीदने चाहिए. यहाँ तक डेंटिस्ट भी अब यही सवाल पूछ रहा है. ये वो स्टेज है जहाँ मार्केट 30% ऊपर जा सकता है. स्टेज 4 में सबने म्यूचल फंड मैनेजर को घेरा हुआ है, लेकिन इस टाइम वो सब मिलकर उसे बता रहे है कि उसे कौन से स्टॉक लेने चाहिए. यहाँ तक डेंटिस्ट भी अपनी टिप्स दे रहा है. ये वो स्टेज है जहाँ मार्केट अब पीक पर पहुंच चुका है और अब गिरने वाला ONE UP ON WALL STREET John Rothchild and Peter Lynch Stalking the Tenbagger & I’ve Got It, I’ve Got It – What Is It? ये चैप्टर आपको ऐसे 6 तरह की कंपनी को समझने में हेल्प करेगा कि आपको कहाँ अपना पैसा इन्वेस्ट करना चाहिए. ये कंपनी इस तरह से है: slow growers, stalwarts, fast growers, cyclicals, asset plays 3 turnarounds. अगर आप ये सोचकर परेशान है कि कहाँ इवेस्ट करे तो एक बार ज़रा गौर से अपने घर और बैकयार्ड का जायज़ा ले लीजिए. जहाँ आप काम करते है या जिस मॉल में शॉपिंग करने जाते है, वहां भी गौर कीजिये. एक एवरेज आदमी को साल में दो या तीन बार ही कोई अच्छा चांस मिलता है और आपको बस यही राईट मौका ढूंढना है. इन्वेस्टमेंट मेथड में ये आपका स्टेप नंबर ] होगा. कोई कंपनी ग्रो कर रही है या नहीं, ये जानने के लिए आपको कंपनी का सीईओ या एक्सपर्ट होने की जरूरत नहीं है. आप मामूली वर्कर हो चाहे कोई जियोलोजिस्ट हो या स्कूल टीचर हो सकते हो, यानि एक मामूली आदमी भी ये पता लगा सकता है. उन चीजों पर इन्वेस्ट करो जो आपको पता है. कोई ऐसा प्रोडक्ट चूज़ करो जो आपने यूज़ किया हो या आप पसंद करते हो. जो प्रोडक्ट आपको मालूम है, उनके स्टॉक्स में इन्वेस्ट करना आपको एक एडवांटेज देगा क्योंकि एक कंज्यूमर होने आपको एक एडवांटेज देगा क्योंकि एक कंज्यूमर होने के नाते आपके सामने मार्केट पोजीशन एकदम क्लियर होगी. आपको पता होगा कि मार्केट में उस प्रोडक्ट की क्या डिमांड है और वो कितना चलता है. बस आपको इसी चीज़ का खयाल रखना है, लेकिन सिर्फ इतना ही काफी नहीं है. कोई स्टॉक आपको सही लग रहा है तो ये मतलब नहीं है कि आप उसे खरीद लो. पहले उसके बारे में थोड़ी रिसर्च कर लो. बिना रिसर्च के इन्वेस्ट करना ऐसा ही है जैसे अपने कार्ड्स पर नज़र डाले बिना स्टड पोकर खेलना. लोग अक्सर स्टॉक्स लेने में उतना एफर्ट नहीं लगाते जितना वो घर का सामान खरीदने में लगाते है. पर ये माइंडसेट चेंज करना होगा. ये जानना बेहद जरूरी है कि जो प्रोडक्ट आपने चूज़ किया है, वो अपनी कंपनी के लिए कितनी सेल्स ला रहा है. जरूरी नहीं है कि कोई प्रोडक्ट अच्छा बिक रहा हो तो उसका अपनी कंपनी के प्रॉफिट में उतना ही अच्छा कोंट्रीब्यूशन भी होगा. जैसे हम यहाँ पैम्पेर्स का एक्जाम्पल ले सकते है. पैम्पेर्स 1970 से मार्केट में है और इसके बॉक्स में लिखा रहता है कि इसे प्रॉक्टर और गैम्बल ने बनाया है. तो अब माना कि पैम्पेर्स की सेल अच्छी है तो क्या अब आप इसके स्टॉक्स ले लोगे? अगर आप थोड़ी सी रिसर्च करते हो तो आपको पता चलेगा कि पैम्पेर्स का अपनी कंपनी के प्रॉफिट में थोडा सा ही कोंट्रीब्यूशन है. इसलिए आपको सिर्फ प्रोडक्ट की सक्सेस नहीं देखनी है बल्कि ये भी चेक करना है कि वो कंपनी के लिए कितना प्रॉफिटेबल है. असल में कंपनी का साइज क्या < कितना प्रॉफिटेबल है. असल में कंपनी का साइज़ क्या है, ये काफी मैटर करता है. कोका-कोला जैसी कंपनी में इन्वेस्ट करके आप बहुत बड़े प्रॉफिट की उम्मीद नहीं कर सकते. असल में बड़ा प्रॉफिट तो छोटी कंपनी से ही मिलता है. वो इसलिए क्योंकि बड़ी कंपनी बड़े प्रोफिट नहीं देखती. वो तो पहले से ही टॉप पर बैठी है. कंपनी की बात आई है तो हम इन्हें 6 कैटेगरी में डिवाइड कर सकते है. ये है are slow growers, stalwarts, fast growers, cyclicals, asset plays, and turnarounds. स्लो ग्रोअर्स वो पुरानी कंपनियाँ है जो कभी फ़ास्ट ग्रोअर्स के तौर पर स्टार्ट हुई थी. इनका सबसे बड़ा एक्जाम्पल है आज की इलेक्ट्रिक यूटीलीटीज़. ये कंपनियां अपने मैक्सीमम लेवल तक पहुँच चुकी है. इन कंपनीज़ की ग्रोथ ग्रोस नेशनल प्रोडक्ट से 2-4% तेज़ होती है. ग्रोस नेशनल प्रोडक्ट टोटल का मतलब है उन प्रोडक्ट्स और सर्विस का मार्केट वैल्यू जो किसी particular पीरियड में एक इकॉनमी में produce किया गया है. स्टालवा वो कंपनी होती हैं जो स्लो ग्रोअर्स और फ़ास्ट ग्रोअर्स के बीच में आते है. स्टालवार्ट्स में पैसा लगा के आप अच्छा प्रॉफिट कमा सकते हो. कोका-कोला भी एक स्टालवार्ट कंपनी है, तो अगर आप राईट टाइम पर राईट स्टालवार्ट कंपनी में पैसा लगाते है तो इस बात की गारंटी है कि आप अच्छा पैसा कमा सकते है. फ़ास्ट ग्रोअर्स वो कंपनी है जो आपको 200% तक प्रॉफिट दे सकती हैं. फ़ास्ट ग्रोअर कंपनी के कुछ ® A . फ़ास्ट ग्रोअर्स वो कंपनी है जो आपको 200% तक प्रॉफिट दे सकती हैं. फ़ास्ट ग्रोअर कंपनी के कुछ एक्जाम्पल है, फ़ास्ट फूड बिजनेस में Taco Bell और जर्नल स्टोर बिजनेस में Wallmart. इन कंपनीज़ ने एक स्पेशिफिक डोमेन में अपना नाम कमाया है और सक्सेसफुल हुए हैं इसलिए मार्केट में इनकी अपनी मोनोपोली है. आपको recession यानी मंदी के दौरान कंपनी की परफोर्मेंस भी जरूर चेक करनी चाहिए ताकि ये डिसाइड कर सके कि आपको कब तक इनके स्टॉक्स होल्ड करके रखने है. Cyclical वो कंपनीज़ होती है जिनके प्रॉफिट और loss या तो रेगुलर होते है या जिनके बारे में ज्यादा प्रेडिक्ट करना मुश्किल होता है. कुछ Cyclical कंपनीज़ के एक्जाम्पल है केमिकल कंपनीज़ और एयरलाइन्स की कंपनीज़. इनके राइज़ और fall कुछ एक्सटर्नल फैक्टर्स पर डिपेंड करते है जैसे रॉ मटीरियल या एडमिनिस्ट्रेशन की policy. टर्नअरौंड वो कंपनीज़ है जिनकी किसी प्रॉब्लम की वजह से ग्रोथ रुक जाती है. ऐसी कंपनीज़ में इन्वेस्ट करना बड़ा रिस्की होता है. अगर इनके क़र्ज़ हमेशा राइज़ कर रहे हो और P/Eratio इन्फ्लेटेड हो तो इनके स्टॉक्स बेचना ही बैटर होगा. Asset Play कंपनीज़ इन्वेस्टमेंट के लिए पोटेंशीयली rewarding हो सकती है और इसके अलावा बड़े इन्वेस्टर्स इन्हें ज़्यादातर नज़रअंदाज़ ही करते है. ये कंपनियां वो है जहाँ आप अपने एडवांटेज ट्रिक खेल सकते है और ये पता लगा सकते है कि कोई Cyclical वो कंपनीज़ होती है जिनके प्रॉफिट और loss या तो रेगुलर होते है या जिनके बारे में ज्यादा प्रेडिक्ट करना मुश्किल होता है. कुछ Cyclical कंपनीज़ के एक्जाम्पल है केमिकल कंपनीज़ और एयरलाइन्स की कंपनीज़. इनके राइज़ और fall कुछ एक्सटर्नल फैक्टर्स पर डिपेंड करते है जैसे रॉ मटीरियल या एडमिनिस्ट्रेशन की policy. टर्नअरौंड वो कंपनीज़ है जिनकी किसी प्रॉब्लम की वजह से ग्रोथ रुक जाती है. ऐसी कंपनीज़ में इन्वेस्ट करना बड़ा रिस्की होता है. अगर इनके क़र्ज़ हमेशा राइज़ कर रहे हो और P/E ratio इन्फ्लेटेड हो तो इनके स्टॉक्स बेचना ही बैटर होगा. Asset Play कंपनीज़ इन्वेस्टमेंट के लिए पोटेंशीयली rewarding हो सकती है और इसके अलावा बड़े इन्वेस्टर्स इन्हें ज़्यादातर नज़रअंदाज़ ही करते है. ये कंपनियां वो है जहाँ आप अपने एडवांटेज ट्रिक खेल सकते है और ये पता लगा सकते है कि कोई कंपनी एसेट प्ले है या नहीं. एक कंपनी किसी एक ही कैटेगरी में नहीं रहती है. एक बार अगर आपने कोई ऐसा स्टॉक ढूंढ लिया जहाँ कि आप इन्वेस्ट कर सकते हो और उसके बारे में रिसर्च भी कर ली तो उसके बाद आपको उस कंपनी को इन 6 कैटेगरी में से एक में रखना होगा. ये आपके इन्वेस्टमेंट मेथड का स्टेप 3 है, यानि कैटेगराईजेशन . A < ONE UP ON WALL STREET John Rothchild and Peter Lynch The Perfect Stock, What a Deal! & Stocks I’d Avoid ये चैप्टर आगे उस तरह के स्टॉक्स डिसक्राइब करेगा जिनमे इन्वेस्ट करना आपके लिए ठीक रहेगा. साथ ही पीटर लिंच उस तरह के स्टॉक्स भी डिसक्राइब करेंगे जिनमे इन्वेस्ट करना आपको पूरी तरह अवॉयड करना चाहिए. अब जबकि आपने इन्वेस्ट करने के लिए कंपनीज़ को कैटगराईज़ कर लिया है तो अब आपको बताते है कि ये कंपनी कैसे अपनी अर्निंग्स बढ़ाती है. वैसे पिक्चर अभी तक इनकम्पीट है, और आपको स्टोरी कम्पील्ट करनी है. स्टोरी कम्प्लीट करने के लिए कंपनी की अर्निंग्स चेक करो और पता करो कि वो अपनी अर्निंग कैसे इनक्रीज करेगी. किस तरह की कंपनीज़ अपनी अर्निंग बढाने वाली है और आप कैसे अर्निंग बढ़ा सकते हो? ये आपको स्टेप 4 पर ले आएगा: अपनी अर्निंग बढाने के लिए कंपनीज़ इन पाँच स्ट्रेटेज़ी को फॉलो करती है: प्रोडक्ट या सर्विस की कॉस्ट घटा कर- ये तब किया जाता है जब मार्केट में कई सारे कॉम्पटीटर्स हो और आपको दूसरो से आगे निकलना हो. अपने प्रोडक्ट या सर्विस के रेट बढ़ाकर- जब कोई प्रोडक्ट अच्छा बिक रहा हो तो यही राईट टाइम है उसके रेट बढाने का. अब क्योंकि प्रोडक्ट पहले ही हिट A A < अपने प्रोडक्ट या सर्विस के रेट बढ़ाकर- जब कोई प्रोडक्ट अच्छा बिक रहा हो तो यही राईट टाइम है उसके रेट बढाने का. अब क्योंकि प्रोडक्ट पहले ही हिट है तो आप ये एक्स्पेक्ट कर सकते है कि कंज्यूमर हायर प्राइस देने को तैयार हो जायेगा. नए मार्केट में एक्सपेंड करो- इसके लिए आप और भी बैटर प्रोडक्ट या सर्विस की रेंज ऑफर कर सकते हो. कंपनीज़ अपने टारगेट ऑडियंस को भी एक्सपैंड कर सकती है. पुराने मार्केट में अपने ज्यादा प्रोडक्ट बेचने की कोशिश करो- इस स्ट्रेटेज़ी के अंदर कंपनीज़ पहले से बनी-बनाई मार्केट में अपने करंट प्रोडक्ट या सर्विस सेल करती हो ताकि वो ज्यादा से ज्यादा मार्केट शेयर कवर कर सके. कंपनी अपने करंट कस्टमर्स को ज्यादा प्रोडक्ट खरीदने के लिए अट्रेक्ट कर सकती है या फिर नये कस्टमर्स को टारगेट कर सकती है, यहाँ तक कि अपने कॉम्पटीटर्स से कस्टमर्स को भी अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर सकती है. पिछड़ रहे या बंद होने वाले यूनिट को दोबारा जिंदा करें – कोई भी स्ट्रेटेजी जो फायदेमंद साबित ना हो रही हो revise की जा सकती है या फिर अर्निंग बढाने के लिए एकदम छोड़ी भी जा सकती है. जो स्टॉक्स dull लगते है, अक्सर वही ऊपर जाते है. इमेजिन करो किसी स्टॉक का नाम हो Bob Evans Farms. ऐसे नाम वाली कंपनी में कोई भी इन्वेस्ट नहीं करना चाहेगा. नाम जितना फैंसी होगा, उतने ही ज्यादा लोग उनमे इन्वेस्ट करना पसंद करते है. लेकिन ये स्टॉक A ९ A < चाहेगा. नाम जितना फैंसी होगा, उतने ही ज्यादा लोग उनमे इन्वेस्ट करना पसंद करते है. लेकिन ये स्टॉक ज्यादातर नीचे ही जाते है और भी अच्छा रहेगा अगर किसी बोरिंग से नाम वाली कंपनी का काम भी बोरिंग हो. मान लो कोई कंपनी bottle के कैप बनाती है. आपने शायद इस कंपनी को किसी मैगज़ीन के फ्रंट पेज पर कभी नहीं देखा होगा. लेकिन ये बड़े इन्वेस्टर्स का अटेंशन खींच सकती है. अगर इंस्टीट्यूशन इनके स्टॉक्स नहीं लेना चाहते तो आपको इन्वेस्ट करने के लिए एक पोटेंशीयल कंपनी मिल जाएगी. लो ग्रोथ वाली कंपनी में इन्वेस्ट करना भी अच्छा आईडिया है. हाई ग्रोथ इंडस्ट्री के शेयर्स अक्सर नीचे जाते है. आपको ऐसी कंपनी के बारे में भी सोचना चाहिए जो ऐसे प्रोडक्ट बनाती है जो लोग हमेशा खरीदते है, जैसे रेजर ब्लेड या फिर दवाइयाँ. कंप्यूटर कंपनी में इन्वेस्ट करने से अच्छा है, आप उन कंपनी में इन्वेस्ट करो जो टेक्नोलोजी का यूज़ करती है. वो इसलिए क्योंकि कंप्यूटर कंपनी में हमेशा ज्यादा कॉम्पटीशन रहता है और उनके प्राईस इसलिए डाउन जाते है और जो कंपनी इस टेक्नोलोज़ी का यूज़ करती है, वो कम प्राईस में अपना काम कर लेती है और हमेशा प्रॉफिट में रहती है. जिन कंपनी के अपने स्टॉक्स में लार्ज शेयर होता है, उन्हें अपनी कंपनी पर भरोसा होता है. आप आँखे मूंदकर इन कंपनीज़ के स्टॉक्स ले सकते हो क्योंकि शेयर होल्डर्स को अपनी कंपनी से हमेशा अच्छा परफोर्म करने की उम्मीद रहती है. अगर कोई ऐसा स्टॉक है जो आपको एकदम अवॉयड करना A < होता है. आप आँखे मूंदकर इन कंपनीज़ के स्टॉक्स ले सकते हो क्योंकि शेयर होल्डर्स को अपनी कंपनी से हमेशा अच्छा परफोर्म करने की उम्मीद रहती है. अगर कोई ऐसा स्टॉक है जो आपको एकदम अवॉयड करना चाहिए तो ये वो स्टॉक है जो शहर में चर्चा का विषय हो. सबसे हॉट लगने वाले स्टॉक्स तेज़ी से ऊपर चढ़ते है और जल्द ही प्रोफिट को बड़े नुक्सान में बदल देते है. किसी इंडस्ट्री में हाई ग्रोथ होने से वो एंटप्रेन्योर्स के एक छोटे से ग्रुप को अट्रेक्ट करती है जो इस पर तुरंत एक्शन लेते है. एक और तरह की कंपनी है जो आपको अवॉयड करनी चाहिए, ये है जिसे “second another big company” के नाम से पोपुलर करने की कोशिश की जाती है. जैसे एक्जाम्पल के लिए” नेक्स्ट इंटेल” या “नेक्स्ट McDonalds”. वो इसलिए क्योंकि किसी भी चीज़ का नेक्स्ट बेहद मुश्किल से मिलता है. अक्सर लोग इन्वेस्ट करने के लिए कंपनीज़ रेकमंड करते है और फिर लास्ट में अपनी पर्सनल स्टेटमेंट एड कर देते है मानो वो आपसे कोई सीक्रेट शेयर कर रहे हो. ये कंपनीज़ अक्सर longshots या whisper stocks होती है. लेकिन इन स्टोरीज़ में कोई दम नहीं होता. ऐसी फैंसी नाम वाली कंपनीज़ में इन्वेस्ट कभी मत करना. ये फैंसी नाम सिर्फ अट्रेक्ट करने के लिए रखा जाता है ताकि लोग इन्हें नोटिस करे. ONE UP ON WALL STREET John Rothchild and Peter Lynch . Earnings, Earnings, Earnings, The Two-Minute Drill & Getting The Facts इस चैप्टर में ऐसे कई इंडीकेटर्स का जिक है जो आपको डिसाइड करने में हेल्प करेंगे कि आपको इन्वेस्टमेंट के बारे में सोचना चाहिए या नहीं ये इंडीकेटर्स उन 6 कैटेगरी पर बेस्ड है जो हमने पहले मेंशन किये है. इस चैप्टर में इस बात का भी जिक्र है कि जिस कंपनी में आप इन्वेस्ट करने जा रहे है, उसका ग्राउंड फैक्ट चेक करना बेहद जरूरी है. कहानी: इन्वेस्टमेंट से पहले हमे ये समझना जरूरी है कि जिस कंपनी में आज आप इन्वेस्ट कर रहे हो, कल उसका और ज्यादा वैल्यूएबल होना क्यों जरूरी है. ये अर्निंग और एसेट से जुडी बात है. अर्निंग्स और एसेट तय करते है कि इन्वेस्टर कितना पैसा लगाने को तैयार है. P/E ratio ये पता करने का अच्छा तरीका है कि कोई स्टॉक ओवरप्राइस्ड है, अंडरप्राइस्ड है या फिर रीज़नेबली प्राइस्ड है. P/E ratio प्राइस और अर्निंग्स के बीचे का ratio होता है. इसे केलकुलेट करने के लिए हमे किसी स्टॉक के करंट प्राइस को कंपनी की फिस्कल अर्निंग से डिवाइड करना पड़ता है. फिस्कल अर्निंग्स कंपनी की 12 महीने से पहले की अर्निंग्स या कमाई को कहते है. आपको किसी कंपनी की फ्यूचर अर्निंग चेक करनी A < कमाइका कहत ह. आपको किसी कंपनी की फ्यूचर अर्निंग चेक करनी होती है. लेकिन अब क्योंकि आप ये प्रेडिक्ट नहीं कर सकते तो आप सिर्फ पता लगा सकते कि कंपनी अपनी अर्निंग्स बढ़ाने के लिए क्या प्लान करेगी. एक बार आपने ये पता लगा लिया तो फिर आप regularly चेक कर सकते हो कि प्लान काम कर रहा है या नहीं. बस एक बार आपको ये पता करना है कि कंपनी कौन सी कैटेगरी में आती है और उसके स्टॉक ओवरप्राइस्ड है, अंडरप्राइस्ड या फिर रीजनेबली प्राइस्ड, तो फिर आप नेक्स्ट स्टेप ले सकते हो. आपका नेक्स्ट स्टेप है: कंपनी के बारे में और जानकारी हासिल करो और ये पता करो कि वो आगे ज़्यादा कैसे कमाएगी. अगर कंपनी स्लो ग्रोअर है तो आपको तभी इन्वेस्ट करना चाहिए जब ये आपको रेगुलरली डिविडेंड पे करे और कंपनी की अर्निंग्स बढ़ रही हो. एक और चीज़ चेक करो कि कंपनी रिसेशन के टाइम डिविडेंड पे कर रही है या नहीं. अगर कंपनी cyclical है तो आपको ये चेक करना होगा कि पिछले कुछ सालो में कंपनी की सेल में कोई बढ़ोत्तरी हुई है या नहीं. एक एस्सेट प्ले कंपनी में आपको ये चेक करना होगा कि उनक एसेट्स क्या है और उन एसेट्स की वर्थ क्या है. अगर कंपनी टर्नअराउंड है तो आपको ये पता लगाना है कि क्या कंपनी अपनी अर्निंग्स इम्प्रूव कर रही है और क्या इसके plan काम कर रहे है. न माना DIFro+inानि नै . प A A < ८ अगर कंपनी टर्नअराउंड है तो आपको ये पता लगाना है कि क्या कंपनी अपनी अर्निंग्स इम्प्रूव कर रही है और क्या इसके plan काम कर रहे है. एक स्टालवार्ट कंपनी में P/E ratio बेस्ट इंडिकेटर है, ये डिसाइड करने का कि आपको इन्वेस्ट करना चाहिए या नहीं. अगर आप किसी फ़ास्ट ग्रोअर कंपनी में इन्वेस्ट कर रहे हो तो ये पता लगाओ कि कंपनी कैसे और तेज़ी से ग्रो कर सकती है. अगर आपके मन में डाउट है तो कंपनी को कॉल कर सकते हो. ज्यादातर कंपनीज़ इन्वेस्टिंग को लेकर अपने कस्टमर्स के साथ ऑनेस्ट होती है. वो इसलिए क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि सच्चाई एक न एक दिन तो रिपोर्ट के ज़रिए बाहर आ ही जाएगी. जब आप किसी कंपनी के शेयर होल्डर होते हो तो आप कंपनी के हेड क्वार्टर जा सकते हो और वहां रीप्रेजेंटेटिव से मिल सकते हो. इससे आपको वैल्यूएबल कॉन्टेक्ट्स बनाने में हेल्प मिलेगी. आपको स्टोर जाना चाहिए और उन प्रोडक्ट्स को खुद यूज़ करके देखना चाहिए जिनमे आप इन्वेस्ट करना चाहते हो. आप यूजर्स से भी बात कर सकते हो जो वो प्रोडक्ट्स यूज़ कर रहे है ताकि आपको मार्केट में प्रोडक्ट्स और कंपनी की पोजीशन पता लग सके. Some Famous Numbers, Rechecking the Story & The Final Checklist ये चैप्टर कई इंडेक्स के बारे में डिसक्राइब करेगा जो ये डिसाइड करने में हेल्प करेंगे कि इन्वेस्ट करना चाहिए य चप्टर कइ इडक्स क बार म डसक्राइब करगा जा य डिसाइड करने में हेल्प करेंगे कि इन्वेस्ट करना चाहिए या नहीं इस चैप्टर में आपको इन्वेस्टमेंट प्रोसेस की इन्फोर्मेशन मिलेगी और साथ ही टिप्स और सजेशन भी. कहानी: अब तक आपने वो स्टॉक ढूंढ लिया होगा जिसमे आपको इन्वेस्ट करना है, आपने कंपनी के बारे में रिसर्च भी कर ली होगी, उसे कैटगरी में भी डाल दिया होगा और उसकी अर्निंग्स भी चेक कर ली होगी. लेकिन अभी भी कुछ और बाकि है जो आपको इन्वेस्टिंग से पहले करना है. यानि अब आप स्टेप 5 पर पहुंच चुके है. नंबर! नंबर अफवाहों और कोरी बातचीत से ज्यादा दमदार होते है. नंबर से ही किसी कंपनी का असली स्टेटस पता चलता है कि कंपनी किस लेवल पर खड़ी है. यहाँ कुछ नंबर्स है जिन पर आपको इन्वेस्टिंग से पहले एक बार जरूर गौर करना चाहिए- परसेंट ऑफ़ सेल्स: सेल्स परसेंटेज ही तय करती है कि किसी प्रोडक्ट की कंपनी में कितनी इम्पोर्टेस है यानि जो प्रोडक्ट जितना बिकेगा वो अपनी कंपनी को उतना ही ज्यादा प्रॉफिट कमा के देगा. सेल्स जितनी ज्यादा होगी, उतनी ही ज्यादा उसकी इम्पोर्टेस होगी. Price/Earning ratio: P/Eratio ये पता करने में हेल्प करता है कि स्टॉक कहीं ओवरवैल्यूएड या अंडरवैल्यूएड तो नहीं है या फिर उनकी ठीक-ठीक वैल्यू है. P/E ratio प्राइस और अर्निंग्स के बीच का 1472111 पा – HI ”ए। पूरा अंडरवैल्यूएड तो नहीं है या फिर उनकी ठीक-ठीक वैल्यू है. P/E ratio प्राइस और अर्निंग्स के बीच का ratio होता है. इसे निकालने के लिए हम स्टॉक प्राइस को कंपनी की फिस्कल अर्निंग्स से डिवाइड करते है. फिस्कल अर्निंग्स किसी भी कंपनी की पिछली 12 महीनों की अर्निंग्स को बोला जाता है. आपको शेयर्स तब लेने चाहिए जब P/E ratio इंडस्ट्री की P/E से कम हो. इंडस्ट्री का P/E होता है: किसी एक सेक्टर या इंडस्ट्री का एवरेज प्राइस टू अर्निंग्स रेश्यो. एक हाई P/E का मतलब होगा कि इन्वेस्टर्स फ्यूचर में हाई अर्निंग्स ग्रोथ की उम्मीद कर सकता है और लो P/E इस बात की तरफ ईशारा करता है कि कंपनी की परफोर्मेंस पहले के मुकाबले अब ज्यादा बैटर है. इसलिए अगर P/E रेश्यो अगर एक से कम है या स्टॉक अंडरवैल्यूएड है तो स्टॉक्स लेना आपके लिए प्रॉफिटेबल रहेगा. तो कहने का मतलब है कि एक लोअर P/E रेश्यो सुनने में बेशक फेवरेबल लगे पर बाकी कंडिशंस भी चेक करना जरूरी है. द कैश पोजीशन: कैश पोजीशन होता है किसी कंपनी का नेट कैश per शेयर. ये डिसाइड करता है कि कंपनी का लेवल ऑफ़ कैश उसके खर्चों और पेंडिंग liability के मुकाबले कितना है. अगर कैश पोजीशन स्टेबल है तो इसका मतलब कंपनी अपने कैश on हैण्ड से अपनी लाएबीलीटीज़ पूरी कर सकती है. द डेट फैक्टर: आपको पता करना होगा कि किसी कंपनी के ऊपर कितना कर्जा है और कितना कर्जा पारा ‘III ग. II । हैण्ड से अपनी लाएबीलीटीज़ पूरी कर सकती है. द डेट फैक्टर: आपको पता करना होगा कि किसी कंपनी के ऊपर कितना कर्जा है और कितना कर्जा इसने दे रखा है. अगर डेट, इक्विटी से ज्यादा है तो उस कंपनी के स्टॉक्स मत लेना. कंपनी के ऊपर कितना कर्जा है, ये चीज़ बताएगी कि कंपनी फ्यूचर में दिवालिया हो सकती है या नहीं. डिविडेंड : जो स्टॉक्स रेगुलली डिविडेंड पे करते है, यहाँ तक कि रिसेशन में भी वो ज्यादा प्रॉफिटेबल होंगे बजाए उन स्टॉक्स के जो डिविडेंड पे नहीं करते. इन्वेंटरी: इन्वेंटरी वो आइटम है जो स्टॉक में होल्ड करके रखा जाता है और जिन्हें अभी बेचा नहीं गया है. अगर इन्वेंट्री बढती रहे और सेल्स से ज्यादा ग्रो कर जाए तो ये अच्छी बात नहीं है. कंपनी की पोजीशन रेगुलर चेक करना भी बहुत जरूरी है. आपको स्टोर में जाकर और कस्टमर्स से बात करके ग्राउंड फैक्ट्स और रिपोर्ट रिव्यु करते रहना चाहिए. कुल मिलाकर कहने का मतलब है कि जिस भी कंपनी में आप इन्वेस्ट करने की सोच रहे हो, उसे अच्छे से जांच-परख लो और सिंपल एनालिसिस करने के लिए उन्हें कैटगरी में बाँट लो. इन्वेस्ट करने के लिए छोटी कंपनी को कंसीडर करो. उन स्टॉक्स में पैसा मत लगाओ जिन में हर कोई लगा रहा है. याद रहे, जिस कंपनी के ऊपर कर्जा नहीं होगा, वो कभी दिवालिया नहीं होगी. ऐसी कंपनी में इन्वेस्ट करो जो खुद के शेयर्स खरीदती हो. सबसे बड़ी बात, पेशंस रखो और खब अच्छे से रिसर्च करने के बाद ही कोई डिसीजन उस कंपनी के स्टॉक्स मत लेना. कंपनी के ऊपर कितना कर्जा है, ये चीज़ बताएगी कि कंपनी फ्यूचर में दिवालिया हो सकती है या नहीं. डिविडेंड : जो स्टॉक्स रेगुलली डिविडेंड पे करते है, यहाँ तक कि रिसेशन में भी वो ज्यादा प्रॉफिटेबल होंगे बजाए उन स्टॉक्स के जो डिविडेंड पे नहीं करते. इन्वेंटरी: इन्वेंटरी वो आइटम है जो स्टॉक में होल्ड करके रखा जाता है और जिन्हें अभी बेचा नहीं गया है. अगर इन्वेंट्री बढती रहे और सेल्स से ज्यादा ग्रो कर जाए तो ये अच्छी बात नहीं है. कंपनी की पोजीशन रेगुलर चेक करना भी बहुत जरूरी है. आपको स्टोर में जाकर और कस्टमर्स से बात करके ग्राउंड फैक्ट्स और रिपोर्ट रिव्यु करते रहना चाहिए. कुल मिलाकर कहने का मतलब है कि जिस भी कंपनी में आप इन्वेस्ट करने की सोच रहे हो, उसे अच्छे से जांच-परख लो और सिंपल एनालिसिस करने के लिए उन्हें कैटगरी में बाँट लो. इन्वेस्ट करने के लिए छोटी कंपनी को कंसीडर करो. उन स्टॉक्स में पैसा मत लगाओ जिन में हर कोई लगा रहा है. याद रहे, जिस कंपनी के ऊपर कर्जा नहीं होगा, वो कभी दिवालिया नहीं होगी. ऐसी कंपनी में इन्वेस्ट करो जो खुद के शेयर्स खरीदती हो. सबसे बड़ी बात, पेशंस रखो और खूब अच्छे से रिसर्च करने के बाद ही कोई डिसीजन लो. A ONE UP ON WALL STREET John Rothchild and Peter Lynch The Long-term View ये चैप्टर आपको अपना खुद का पोर्टफोलियो डिजाईन करने में हेल्प करेगा और ये भी बतायेगा कि शेयर खरीदने और बेचने का बेस्ट टाइम कौन सा होता है. हालाँकि ये सच है कि स्टॉक मार्केट में कुछ भी फिक्स नहीं होता, फिर भी अगर आप अपनी नज़र बनाये रखेंगे तो आपको पता चल सकता है कि स्टॉक्स कब बेचने है और कब खरीदने है. आपने स्टॉक्स चूज़ कर लिए है तो अब बारी आती है इन्वेस्ट करने की. ये है स्टेप 6. अगर P/E ratio इंडस्ट्री के P/E ratio से कम है तो ये एक अच्छा साईंन है. एक हाई P/E का मतलब होगा कि आप फ्यूचर में हायर अर्निंग्स ग्रोथ एक्स्पेक्ट कर सकते हो, लेकिन अभी इस वक्त कंपनी ओवरवैल्यूएड है. लो P/E इस बात का ईशारा है कि कंपनी पहले से अच्छा परफोर्म कर रही है तो आप ये शेयर खरीद सकते हो क्योंकि कंपनी अंडरवैल्यूएड है लेकिन साथ ही बाकि फैक्टर जैसे इन्वेंट्री, कैश फ्लो, कैश पोजीशन, डेट फैक्टर वगैरह चेक करना ना भूले. स्टॉक मार्केट से 25 से 30% की annual return की उम्मीद A ९ हा बााक फक्टर जस इन्वट्रा, कश फ्ला, कश पाजाशन, डेट फैक्टर वगैरह चेक करना ना भूले. स्टॉक मार्केट से 25 से 30% की annual return की उम्मीद रखना कुछ ज्यादा ही अनरिएलिस्टिक हो जायेगा. हो सकता है किसी साल आपको 30% तक return मिले और किसी साल 20% से भी कम. इसलिए इम्पोर्टेट ये है कि अनरिएलिस्टिक उम्मीद ना ही रखे तो अच्छा है. आप जितने ज्यादा स्टॉक्स ख़रीदेंगे, उतने ही ज्यादा चांस होंगे कि उनमे से कोई एक स्टॉक बड़ा प्रॉफिट कमा कर दे और आपके पास अगर ज्यादा स्टॉक्स होंगे तो आप ईज़िली उनके बीच में पैसों को रोटेट कर पाओगे. आप अपना पैसा स्टॉक्स की कई कैटेगरी में बाँट सकते हो. स्लो ग्रोअर स्टॉक्स में रिस्क फैक्टर कम रहता है पर प्रॉफिट भी कम ही मिलता है. जैसे एक्जाम्पल के लिए कोका-कोला से अच्छी परोफोर्मेंस की उम्मीद की जाती है पर असल में प्रॉफिट उतना बड़ा नहीं होता जितना आप उम्मीद करते हो. इसी तरह एसेट प्लेज़ लो रिस्क और हाई गेन स्टॉक है. cyclical भी लो रिस्क या हाई रिस्क हो सकते है और इनमे प्रॉफिट लो या हाई भी जा सकता है. फ़ास्ट ग्रोअर्स हाई गेन और हाई रिस्क दोनों होते है. इन्वेस्ट करने का बेस्ट टाइम वही है जब आपको यकीन हो जाए कि जो सॉक्स आपने दंदें है वो दन्वेस करने करने का बेस्ट टाइम वही है जब आपको यकीन हो जाए कि जो स्टॉक्स आपने ढूंढें है, वो इन्वेस्ट करने लायक है या नहीं. लेकिन स्टॉक्स अक्टूबर और दिसम्बर के बीच सबसे ज्यादा डाउन होते है जब होलीडे सीज़न होता है. लेकिन चाहे जो भी हो आप अपने स्टॉक्स हमेशा के लिए होल्ड करके नहीं रख सकते. जिस कंपनी में हमने इन्वेस्ट किया है, अगर वो अच्छी नहीं चल रही है तो हमे उसके स्टॉक्स होल्ड करके रखने की जरूरत नहीं है क्योंकि हम स्टॉक बिजनेस में पैसा कमाने के लिए ही इन्वेस्ट करते है. लेकिन अगर कोई अर्निंग ही नहीं हो रही या आपके इन्वेस्टमेंट loss में जा रहा है तो ऐसी सूरत में शेयर्स बेचना ही सही है और ये आपको स्टेप 8 पर लेकर आएगा. यानि अपने शेयर्स बेचना . लेकिन आप ये कैसे डिसाइड करेंगे कि आपको शेयर कब बेचने है? तो हम बताते है, ऐसा कोई भी सिंगल फ़ॉर्मूला नहीं है जो आपको ये बता सके कि अब आप स्टॉक्स बेच दो. स्लो ग्रोअर्स के शेयर्स तब बेचो जब 30-50% की appreciation यानी बढ़त हो. स्टालवार्ट तब बेचो जब P/E अपनी नॉर्मल रेंज से काफी दूर हो. cyclical को एंड ऑफ़ द साइकिल तब बेचना जब कुछ गलत हो जाए. फ़ास्ट ग्रोअर को तब बेच सकते हो जब P/E बड़ी बेतरतीबी से बढ़ती जा रही हो और टर्नअराउंड स्टॉक्स तब बेचने ।। III बढती जा रही हो और टर्नअराउंड स्टॉक्स तब बेचने चाहिए जब ये टर्न अराउंड कर चुकी हो और सारी प्रॉब्लम खत्म हो चुकी हो. अगर कंपनी एसेट प्ले है तो जब तक कंपनी क़र्ज़ में ना जा रही हो, तब तक आप स्टॉक्स होल्ड करके रख सकते हो. स्टॉक्स में इन्वेस्ट करने के लिए मार्केट जब गिरी हुई हो यानी डिक्लाइन कर रही हो, वो भी एक अच्छा मौका होता है. अगर मौका आचा ना हो तो चीप स्टॉक्स मत खरीदना. अगर कोई कंपनी प्रेजेंट में अच्छा परफोर्म नहीं करती तो ये जरूरी नहीं कि उसकी हालत आगे जाकर सुधर जाये. स्टॉक मार्केट एक ऐसी जगह है जहाँ आपको हमेशा अपना माइंड नए आईडिया के लिए खुला रखना चाहिए. Conclusion वन अप ऑन द वॉल स्ट्रीट आपको स्टॉक बिजनेस पर नॉलेज ऑफर करती है जो इस बुक के ऑथर पीटर लिंच अपने रीडर्स के साथ शेयर कर रहे है, वो खुद एक इन्वेस्टमेंट एक्सपर्ट हैं. ये समरी एक्सपर्ट्स के साथ-साथ नए लोगों के लिए भी बड़े काम की है. आपने इसमें लिंच के एक्सपीरियंस और सजेशन के बारे में जाना जो आपको राईट कंपनी में राईट इन्वेस्टमेंट करने में हेल्प करेगी. इसे जानने के बाद आप कंपनियों को अलग-अलग कैटेगरी में परफोर्म नहीं करती तो ये जरूरी नहीं कि उसकी हालत आगे जाकर सुधर जाये. स्टॉक मार्केट एक ऐसी जगह है जहाँ आपको हमेशा अपना माइंड नए आईडिया के लिए खुला रखना चाहिए. Conclusion वन अप ऑन द वॉल स्ट्रीट आपको स्टॉक बिजनेस पर नॉलेज ऑफर करती है जो इस बुक के ऑथर पीटर लिंच अपने रीडर्स के साथ शेयर कर रहे है, वो खुद एक इन्वेस्टमेंट एक्सपर्ट हैं. ये समरी एक्सपर्ट्स के साथ-साथ नए लोगों के लिए भी बड़े काम की है. आपने इसमें लिंच के एक्सपीरियंस और सजेशन के बारे में जाना जो आपको राईट कंपनी में राईट इन्वेस्टमेंट करने में हेल्प करेगी. इसे जानने के बाद आप कंपनियों को अलग-अलग कैटेगरी में रख पाएँगे और ये भी पता लगा पाएंगे कि कौन सी इन्वेस्टमेंट आपके लिए सही होगी और कौन सी नहीं. इसमें आपको सारे रिस्क फैक्टर के बारे में भी बताया गया है ताकि आप कोई ऐसा डिसीजन ना लें जो आपको किसी बड़े नुक्सान में फंसा दे. इसके साथ ही आपको इसमें अपनी पर्सनल फाईनेंशियल स्टेटस पर बेस्ड बेस्ट एडवाइज़ भी मिली!

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