MANAGING ONESELF Peter Drucker Books In Hindi Summary Pdf

MANAGING ONESELF Peter Drucker इंट्रोडक्शन हो सकता हैं कि आप अभी आलसी महसूस कर रहे हों. आप शायद मन ही मन चाह रहे होंगे कि काश मंडे की सुबह कभी न आए और हमेशा वीकेंड ही चलता जाए. क्या आपको अपने जॉब पर जाने के लिए मोटिवेशन की ज़रूरतपड़ती हैं? क्या आप अपने पैशन, अपने जुनून को आगे बढ़ाना चाहते हैं? क्या आपको लगता है कि आपकी जॉब आपके लिए नहीं हैं और आपको अपने काम में कोई भी challengingटास्क करने को नहीं मिल रहा है? अगर इनमें से किसी भी सवाल का जवाब हाँ हैं, तो यह समरी आपकी हेल्प करेगी. यहां आप सीखेंगे कि कैसे आप एक एक्सीलेंट परफॉर्मर बन सकते हैं. आप यह भी सीखेंगे कि पॉजिटिव इम्पैक्ट कैसे बनाया जाए, एक बेहतरीन टीम कैसे बनाई जाए और हर दिन प्रोडक्टिव कैसे बनें. तो अब बोरियत, आलस और मीडियोकर फील होना बंद होने वाला है. What are my strengths? बहुत से लोगों को लगता हैं कि वे अपनी स्ट्रेंथ यानी अपनी ताकत को पहचानते हैं. लेकिन वे अक्सर गलत होते हैं. लोग अपनी कमजोरियों के बारे में भी अंदाज़ा लगाते हैं. लेकिन वे इसमें भीज़्यादातर गलत होते हैं. हात ह. लोग अपना कमज़ारिया क बार म मा अदाज़ा लगाते हैं. लेकिन वे इसमें भीज़्यादातर गलत होते हैं. एक इंसान के पास सिर्फ एक बड़ी ताकत हो सकती हैं और, हम अपनी कमजोरियों के दम पर काम नहीं कर सकते. पुराने ज़माने में लोगों को यह जानने की जरूरत नहीं होती थी कि उनकी ताकत क्या हैं. एक शख्स एक प्रोफेशन लेकर ही पैदा होता था, जैसे कि किसान का बेटा किसान ही होता था,कारीगर की बेटी किसी कारीगर की पत्नी बन जाती थी. लेकिन अब, हमारे वक्त में, हमारे पास कई ऑप्शन हैं. हम कौन सी फिल्ड में जाएंगे, इसे समझने के लिए हमें अपनी ताकत तलाशनी पड़ती हैं. ऑथर पीटर हमें हमारी ताकत पहचानने का एक इफेक्टिव तरीका बता रहे हैं.यह हैं फीडबैक एनालिसिस का तरीका. जब भी आप कोई important स्टेप उठाते हैं या कोई भी ज़रूरी फैसला करते हैं, तो अपनी उम्मीदों की लिस्ट बना लीजिए. 9 या 12 महीने बाद आपके करियर का क्या होगा, आपकी क्या उम्मीद हैं इसे लेकर, उसे लिखिए. क्या आप अपने गोल्स को अचीवकर पाएंगेया आपको फिर से कोशिश करने की ज़रूरत पड़ेगी? यह टेक्निक ऑथर के लिए सालों से काम कर रही हैं. फीडबैक एनालिसिस कोई नया तरीका नहीं हैं. यह सदियों से चला आ रहा हैं. इसकी शुरुवात 14 वीं शताब्दी में एक जर्मन धर्मशास्त्री ने की थी. बाद में, लगभग 150 साल बाद, इसे फिर से लोयोला के जॉन रेस्लिा और टाशिकागो.ना टोनों गाते शताब्दी में एक जर्मन धर्मशास्त्री ने की थी. बाद में, लगभग 150 साल बाद, इसे फिर से लोयोला के जॉन केल्विन और इग्नेशियस ने खोजा था. दोनों ने अपने फॉलोवर्स को यह तरीका सिखाया था. यह इतना असदार तरीका था कि Calvinist movement और Jesuit order 30 सालों के अंदर पूरे यूरोप में फ़ैल गया. इन इंस्टीट्यूशंस की शुरुवात जॉन केल्विन और सेंट इग्नेशियस ने की थी. फीडबैक एनालिसिस आपको अपनी ताकत को पहचाने में हेल्प करता हैं. इससे आपको यह समझ में आएगा कि आपको कहां इम्प्रूवमेंट की ज़रूरत हैं. यह आपकी कमजोरियों को भी सामने लाएगा. अपना फीडबैक एनालिसिस करने के बाद आपको तीन काम करने पड़ते हैं. सबसे पहले, अपनी ताकत पर फोकस कीजिए. खुद को उस जॉब, बिज़नस या करियर में लगाइए जहां आपकी ताकत बेहतरीन रिजल्ट दे सकती हैं. दूसरा, अपनी ताकत में इम्प्रूवमेंट कीजिए. देखिए कि आपको कहां ज़्यादा प्रैक्टिस की ज़रूरत हैं और अपने स्किल, अपने हुनर, को तराशते रहिए. कुछ ऐसे गैप हो सकते हैं जिन पर आपको काम करने की ज़रूरत पड़े. तीसरा, intellectual arrogance से बचिए. यह वह घमंड हैं जो आपको नई चीजें सीखने से रोकता हैं. एग्जाम्पल के लिए, प्रोफेशनल इंजीनियर कहते हैं कि उन्हें लोगों के साथकैसे पेश आना चाहिए,यह सीखने की जरूरत नहीं हैं और, HR एम्पलॉईस मानते हैं कि उन्हें ट्रिगोनोमेट्री सीखने की ज़रूरत ही शताब्दी में एक जर्मन धर्मशास्त्री ने की थी. बाद में, लगभग 150 साल बाद, इसे फिर से लोयोला के जॉन केल्विन और इग्नेशियस ने खोजा था. दोनों ने अपने फॉलोवर्स को यह तरीका सिखाया था. यह इतना असदार तरीका था कि Calvinist movement और Jesuit order 30 सालों के अंदर पूरे यूरोप में फ़ैल गया. इन इंस्टीट्यूशंस की शुरुवात जॉन केल्विन और सेंट इग्नेशियस ने की थी. फीडबैक एनालिसिस आपको अपनी ताकत को पहचाने में हेल्प करता हैं. इससे आपको यह समझ में आएगा कि आपको कहां इम्प्रूवमेंट की ज़रूरत हैं. यह आपकी कमजोरियों को भी सामने लाएगा. अपना फीडबैक एनालिसिस करने के बाद आपको तीन काम करने पड़ते हैं. सबसे पहले, अपनी ताकत पर फोकस कीजिए. खुद को उस जॉब, बिज़नस या करियर में लगाइए जहां आपकी ताकत बेहतरीन रिजल्ट दे सकती हैं. दूसरा, अपनी ताकत में इम्प्रूवमेंट कीजिए. देखिए कि आपको कहां ज़्यादा प्रैक्टिस की ज़रूरत हैं और अपने स्किल, अपने हुनर, को तराशते रहिए. कुछ ऐसे गैप हो सकते हैं जिन पर आपको काम करने की ज़रूरत पड़े. तीसरा, intellectual arrogance से बचिए. यह वह घमंड हैं जो आपको नई चीजें सीखने से रोकता हैं. एग्जाम्पल के लिए, प्रोफेशनल इंजीनियर कहते हैं कि उन्हें लोगों के साथकैसे पेश आना चाहिए,यह सीखने की जरूरत नहीं हैं और, HR एम्पलॉईस मानते हैं कि उन्हें ट्रिगोनोमेट्री सीखने की ज़रूरत ही MANAGING ONESELF Peter Drucker How Do I Perform? आप किस तरह अपना काम करते हैं? यह जानना बहुत ही ज़रूरी हैं ताकि आप हमेशा अपना बेस्ट परफॉरमेंस दें सकें. अगर आप यह नहीं जानते कि आप किस तरह अपना बेस्ट परफॉरमेंस दे पाते हैं, तो आपका परफॉरमेंस low क्वालिटी का होगा. एक इंसान किस तरह अपना परफॉरमेंस देता हैं, यह बहुत ही अनोखा हैं. यह हर शख्स की पर्सनालिटी पर डिपेंड करता हैं. इस चैप्टर में हम दो सवालों पर ध्यान देंगे. पहला, “क्या आप सुनने वालों में से हैं यानी listener या पढ़ने वालों में से यानी रीडर ?” दूसरा, “आप किसी भी बात को कैसे सीखते हैं-लिखकर, पढ़कर, सुनकर या बोलकर?” आइए इनके बारे में और जानते हैं. आप सुनकर सीखते हैं या पढ़कर? ड्वाइट आइजनहावर यूरोप के अलाइड फोर्सेस के सबसे बड़े कमांडर थे. प्रेस उन्हें बहुत पसंद करती थी. सभी को उनके प्रेस कांफ्रेंस का हमेशा इंतजार रहता था. उनसे पूछे गए हर सवाल का वे कॉन्फिडेंस से जवाब देते थे. वह किसी भी पॉलिसी को एक्सप्लेन करने और किसी भी सिचुएशन के बारे में बताने के लिए एक या दो क्लियर लाइनों में अपना जवाब देने में माहिर थे. लेकिन दस साल बाद जब आइजनहावर प्रेसीडेंट माहिर थे. लेकिन, दस साल बाद, जब आइजनहावर प्रेसीडेंट बने, तो उन्हीं जॉर्नलिस्टों ने शिकायत करना शुरू कर दिया. आइजनहावर अब सवालों का जवाब नहीं देते थे. इसके बजाय, जब उनसे कुछ पूछा जाता, तो वे दूसरे ही मुद्दों पर बात करते थे. उनके स्टेटमेंटमेंभी बहुत सारी grammar की गलतियां होती थी. प्रॉब्लम यह थी कि आइजनहावर को यह नहीं पता था कि वह पढ़कर सीखने वालों में से हैं, न कि सुनकर सीखने वालों में. जब वे कमांडर थे, तो कांफ्रेंस शुरू होने से 30 मिनट पहले उन्हें प्रेस के सवाल दिखाए जाते थे. वह उन सवालों को पढ़कर उनका एनालिसिस कर लेते थे. जब वे प्रेसिडेंट बने तो आइजनहावर ने ऐसा करना बंद कर दिया. वे वही कर रहे थे जो पिछले दो प्रेसिडेंट फ्रैंकलिन रूजवेल्ट और हैरी ट्रूमैन ने किया था. वे सिर्फ प्रेस के सवालों को सुनते थे. लेकिन रूजवेल्ट और ट्रूमैन सुनने वालों में से थेऔर आइजनहावर उनसे अलग थे. इसलिए, आइजनहावर नाकाम रहे और प्रेसीडेंट के तौर पर low परफॉरमेंस दे पाए. अब, हम दूसरे सवाल पर चलते हैं, “आप किसी बात को कैसे सीखते हैं?” कई नामी गिरामी राइटर्स ने अपने स्कूल में खराब परफॉर्म किया है. उनमें से एक थे विंस्टन चर्चिल. उन्होंने अपनी पढ़ाई को बोरियत और टॉर्चर से भरा हुआ कहा. ऐसा इसलिए क्योंकि राइटर पढ़ने या सुनने से नहीं सीखते बल्कि वे लिखकर सीखते हैं और १. हुआ कहा. ऐसा इसलिए क्योंकि राइटर पढ़ने या सुनने से नहीं सीखते बल्कि वे लिखकर सीखते हैं और इसलिए बड़े से बड़े राइटर अक्सर कम मार्क्स लाते हैं. हमारा एजुकेशन सिस्टम इसी सोच पर चलता हैं कि बच्चे इसी तरह सीखते हैं. सभी स्टूडेंट्स को घंटों बैठकर टीचर्स की बात सुननी पड़ती हैं. लेकिन बीथोवन जैसे जीनियस भी ऐसे माहौल से बच नहीं सकें. बीथोवन जैसे महान कम्पोज़र ने अपनी जिंदगी में बहुत सारे स्केचबुक लिखे. उन्होंने कहा कि अगर वे अपने दिमाग में बने हुए नोट्स को नहीं लिखते हैं, तो वह उन्हें भूल जाते हैं. उन्हें सभी नोट्स को लिखने की जरूरत पड़ती थी. इस तरह, वह उन्हें याद रखते थे, और उन्हें कभी उन नोट्स को दोबारा देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. आइए एक मॉडर्न एग्जाम्पल लेते हैं. एक CEO हैं जिन्होंने अपने फैमिली बिज़नस को इंडस्ट्री की टॉप कंपनी में बदल दिया था. यह CEO talking यानी बात करके सीखते थे. उनके पास एक स्टाफ था जिससे वह हफ्ते में एक बार मिलते थे. यह स्टाफ दो से तीन घंटे उनकी बात सुनता था. CEO को बात करने के लिए सिर्फ ऑडियंस की ज़रूरत पड़ती थी.इस तरह वह खुद की बात सुन पाते थेऔर सीखते थे. भले ही उनका स्टाफ कोई कमेंट न करें या सवाल न पूछे, CEO के लिए ऑडियंस का होना ही काफी था. MANAGING ONESELF Peter Drucker What Are My Values? अपने आप को मैनेज करने के लिए, आपको खुद से यह सवाल पूछने की ज़रूरत हैं, “मेरे वैल्यूज़ क्या हैं?” इस सवाल का जवाब पाने में जो टेक्निक काम आएगीवह है मिरर टेस्ट टेक्निक. एक बार एक एम्बेसेडर थे जिन्हें देखकर लगता था कि ये बहुत आगे तक जाएँगे. वह एक इज़्ज़तदार डिप्लोमैट थे, और उन्हें फॉरेन मिनिस्टरया फ़ेडरल चांसलर के तौर पर प्रमोट किए जाने की पूरी उम्मीद थी. लेकिन, कुछ सालों में,उसएम्बेसेडर ने अपने पोजीशन से रिजाइन करने का फैसला लिया. उस एम्बेसेडर को किंग एडवर्ड 7 के लिए डिनर होस्ट करना था. उस किंग को औरतों का शौक़ीन माना जाता था, और वह चाहता था कि डिनर में कई सारी औरतें शामिल हो ताकि वो उनके साथ वक्त बीता सकें. इसी वजह से एम्बेसेडर ने रिजाइन किया था. उन्होंने कहा, “मैं सुबह जब दाढ़ी बनाने जाऊँगा तो आईने में एक दलाल को नहीं देखना चाहता.” अब, आपको भी खुद को आईने में देखने का वक्त आ गया है. कल सुबह आप किस तरह के इंसान को आईने में देखना चाहते हैं? इंसानों के कुछ वैल्यूस होते हैं. ऑर्गनाइजेशन के भी अपने वैल्यूस होते हैं. अगर कोई शख्स किसी ऐसे ऑर्गनाइजेशन के लिए काम कर रहा हैं जिसके वैल्यस इंसानो के कुछ वेल्यूस होते है. ऑर्गनाइजेशन के भी अपने वैल्यूस होते हैं. अगर कोई शख्स किसी ऐसे ऑर्गनाइजेशन के लिए काम कर रहा हैं जिसके वैल्यूस उससे अलग हैं, तो वह एम्प्लॉई परेशान रहेगा और उसका परफॉरमेंस भी लो होगा. एक सक्सेस्फुल HR एग्जीक्यूटिव का एग्जाम्पल लीजिए. उसके फर्म को एक बड़ी कंपनी ने खरीद लिया था. इस एग्जीक्यूटिव को प्रमोशन मिला थाऔर उसे बड़े-बड़े पोस्ट के लिए लोगों को चुनने का काम दिया गया. एग्जीक्यूटिव का मानना था कि उन्हें पहले कंपनी के अंदरसे ही ऐसे लोगों की तलाश करनी चाहिए जो उस पोजीशन के लिए सबसेज़्यादा लायक हो. उन्हें तभी बाहर के लोगों को ढूंढ़ना चाहिए जब कोई ऑप्शन बचा न हो. लेकिन बड़ी कंपनी का मानना था कि एग्जीक्यूटिव को पहले बाहर देखना चाहिए ताकि वे नए लोगों को कंपनी में ला सके. नए लोग कंपनी में नए नज़रिए लेकर आएंगे. यहां हम देख सकते हैं कि HR एग्जीक्यूटिव और उसके नए बॉस के वैल्यूस एक जैसे नहीं हैं. HR एग्जीक्यूटिव से एक ऐसा काम करने की उम्मीद की गई जो उसकी सोच से मैच नहीं करती थी. कुछ सालों बाद, उस HR एग्जीक्यूटिव ने कंपनी से रिजाइन करने का फैसला किया. वह अलग वैल्यूस वाले ऑर्गनाइज़ेशन के लिए काम करना नहीं चाहता था. दूसरा एग्जाम्पल हैं -एक चर्च था जो ज़्यादा से ज़्यादा फॉलोवर्स जोड़ना चाहता था. एक और चर्च था जो के लिए काम करना नहीं चाहता था. दूसरा एग्जाम्पल हैं -एक चर्च था जो ज़्यादा से ज़्यादा फॉलोवर्स जोड़ना चाहता था. एक और चर्च था जो अपने फॉलोवर्स के स्पिरिचुअल ग्रोथ पर फोकस करना चाहता था. पहले चर्च में ज़्यादा मेंबर थे. उसमें हर संडे नए मेंबर्स आया करते थे. लेकिन दूसरा चर्च अपने पुराने मेंबर्स को बरकरार रख पाता था क्योंकि उसके हर मेंबर का चर्च के साथ मजबूत रिश्ता बन गया था. कई साल पहले, इस के ऑथर पीटर को भी अपने वैल्यूस और अपने करियर के बीच चूज़ करना पड़ा था. वह लंदन में एक इन्वेस्टमेंट बैंकर के तौर पर काम कर रहे थेऔर बहुत पैसा कमा रहे थे. वह जो भी करते थे, उसमें वे बहुत ही अच्छे थे. लेकिन, पीटर को यह नहीं लगा कि वह एक एसेट मैनेजर के तौर पर कोई इम्पोर्टेन्ट कंट्रीब्यूशन दे रहे हैं. वह लोगों और रिश्तों को सबसे ज्यादा इम्पोर्टेस देते थे. अगर कब्रिस्तान में आम लोगों के साथ सबसे अमीर आदमी की भी कब्र है तो क्या उससे कोई फ़र्क पड़ता है? जब डिप्रेशन का दौर था तब पीटर के पास पैसे नहीं थेऔर उनके पास नई जॉब पाने का भी कोई चांस भी नहीं थालेकिन फिर भी पीटर ने अपनी जॉब छोड़ दी क्योंकि वह अपने वैल्यूस के लिए काम करना चाहते थे. Where Do I Belong? क्या आप भी सोचते हैं कि आपको कौन सा करियर चुनना चाहिए? क्या आप जानना चाहते हैं कि आप किस जॉब में कामयाब होंगे? क्या आप खुद से पूछते हैं चला 1400 परा। गागन चुनना चाहिए? क्या आप जानना चाहते हैं कि आप किस जॉब में कामयाब होंगे? क्या आप खुद से पूछते हैं कि क्या आप गलत फील्ड में हैं? क्या आप अपने पैशन को फॉलो करना चाहते हैं? म्यूजिशियन, शेफ और mathematician अपनी लाइफ में क्या बनना चाहते हैं, इस बारे में वे जल्दी पता लगा लेते हैं. वे पाँच साल की उम्र में ही म्यूजिशियन, शेफ और mathematicianबन जाते हैं. डॉक्टर अपने टीनेज़ या उससे भी पहले कर लेते हैं कि वे बड़े होकर डॉक्टर बनना चाहते हैं. लेकिन ज़्यादातर लोग नहीं जानते कि वे कहाँ हैं, यहाँ तक कि जब वे बीस -पच्चीस साल के भी हो जाते हैं, तब भी उन्हें नहीं मालूम होता कि वे अपनी लाइफ में कहाँ खड़े हैं. अगर आप उन्हीं लोगों में से एक हैं, तो अब तक आपको इतना तो जान गए होंगे हैं कि आपकी ताकत क्या है. आप पढ़कर सीखने वालों में से हैं या लिखकर सीखने वालों में से, ये भी आप जान गए होंगे. आपको यह भी पता हैं कि आपके लिए सीखने का सबसे अच्छा तरीका क्या हैं और आपके वैल्यूस क्या हैं. इन सवालों की ज़रुरत क्यों है ? क्योंकि इन सवालों के जवाब आपको यह डिसाइड करने में हेल्प करेंगे कि आपकी असली जगह कहां है. इसे आसान बनाने के लिए आप खुद से यह भी पूछ सकते हैं कि आपकी जगह कहाँ नहीं हैं. एग्जाम्पल के लिए, एक शख्स जो जानता हैं कि वह एक बड़े ऑर्गनाइज़ेशन में अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाएगा, उसे वहां किसी भी पोस्ट के लिए अप्लाई नहीं करना तरीका क्या हैं और आपके वैल्यूस क्या हैं. इन सवालों की ज़रुरत क्यों है ? क्योंकि इन सवालों के जवाब आपको यह डिसाइड करने में हेल्प करेंगे कि आपकी असली जगह कहां है. इसे आसान बनाने के लिए आप खुद से यह भी पूछ सकते हैं कि आपकी जगह कहाँ नहीं हैं. एग्जाम्पल के लिए, एक शख्स जो जानता हैं कि वह एक बड़े ऑर्गनाइज़ेशन में अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाएगा, उसे वहां किसी भी पोस्ट के लिए अप्लाई नहीं करना चाहिए. उसे छोटी फर्म में काम ढूंढ़ना चाहिए. दूसरे एग्ज़ामपल में एक ऐसा शख्स हैं जो फॉलोवर है और फैसले नहीं कर पाता हैं. इस शख्स को फैसले लेने वाले पोस्ट में काम नहीं करना चाहिए. जब किसी को पता होता हैं कि उसकी असली ताकत और जगह कहां हैं, तो वह किसी टास्क को तभी कह सकता हैं, “हां, मैं इस काम को करूंगा. लेकिन मैं इसे इस तरह से करूंगा. मैं इस तरह का रिजल्ट दे पाऊंगा और आप मुझसे ऐसा उम्मीद कर सकते हैं क्योंकि मैं यही मैं हूँ.” जब कोई अपनी ताकत, अपनेवैल्यूस और परफॉरमेंस देने के बेस्ट तरीकों को जान जाता हैं, तो वह अपने काम में सक्सेसफुल होगा. दूसरे शब्दों में कहे तो यह जानना कि आपकी असली जगह कहाँ हैं, आपको एक हाई परफॉर्मर में बदल सकता हैं. । MANAGING ONESELF Peter Drucker What Should I Contribute? पुराने ज़माने में लोगों को खुद से यह सवाल नहीं पूछना पड़ता था, “मुझे क्या कंट्रीब्यूशन यानी योगदान देना चाहिए?” उन्हें बताया जाता था कि उन्हें क्या करना हैं और उन्हें उनका काम दे दिया जाता था. उन्हें किसान या कारीगर, मालिक या मालकिन बनने को कहा जाता था. लेकिन 1960 के दशक के आखिर में, लोगों ने यह सुनने से इनकार कर दिया कि उन्हें क्या करना चाहिए.यंग मर्द और औरतें अपने हिसाब से काम करने लगे. वे खुद ही ढूँढने लगे कि वे क्या करना चाहते थे. मुझे क्या कंट्रीब्यूशन देना चाहिए? यह जानने के लिए यहां तीन गाइड सवाल दिए गए हैं. सबसे पहले, आपको यह जानना होगा कि सिचुएशन की डिमांड क्या हैं. दूसरा, अपनी ताकत, वैल्यूस और परफॉर्म करने के तरीके के बेसिस पर जानिए कि आप अपना बेस्ट कंट्रीब्यूशन कैसे दे सकते हैं. तीसरा, आपको यह जवाब देना होगा कि कौन से रिजल्ट से फर्क पड़ेगा. आइए एक नए हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेटर का एग्जाम्पल लेते हैं.एक बड़ा और फेमस हॉस्पिटल था, लेकिन पिछले 30 सालों से इसका नाम नीचे गिरता जा रहा था तो नए एडमिनिस्ट्रेटर ने फैसला लिया कि उसका कंट्रीब्यूशन ये होगा कि उसे अगले दो सालों में हॉस्पिटल के एक इम्पोर्टेन्ट फील्ड को बदलना है. MANAGING ONESELF Peter Drucker What Should I Contribute? पुराने ज़माने में लोगों को खुद से यह सवाल नहीं पूछना पड़ता था, “मुझे क्या कंट्रीब्यूशन यानी योगदान देना चाहिए?” उन्हें बताया जाता था कि उन्हें क्या करना हैं और उन्हें उनका काम दे दिया जाता था. उन्हें किसान या कारीगर, मालिक या मालकिन बनने को कहा जाता था. लेकिन 1960 के दशक के आखिर में, लोगों ने यह सुनने से इनकार कर दिया कि उन्हें क्या करना चाहिए.यंग मर्द और औरतें अपने हिसाब से काम करने लगे. वे खुद ही ढूँढने लगे कि वे क्या करना चाहते थे. मुझे क्या कंट्रीब्यूशन देना चाहिए? यह जानने के लिए यहां तीन गाइड सवाल दिए गए हैं. सबसे पहले, आपको यह जानना होगा कि सिचुएशन की डिमांड क्या हैं. दूसरा, अपनी ताकत, वैल्यूस और परफॉर्म करने के तरीके के बेसिस पर जानिए कि आप अपना बेस्ट कंट्रीब्यूशन कैसे दे सकते हैं. तीसरा, आपको यह जवाब देना होगा कि कौन से रिजल्ट से फर्क पड़ेगा. आइए एक नए हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेटर का एग्जाम्पल लेते हैं.एक बड़ा और फेमस हॉस्पिटल था, लेकिन पिछले 30 सालों से इसका नाम नीचे गिरता जा रहा था तो नए एडमिनिस्ट्रेटर ने फैसला लिया कि उसका कंट्रीब्यूशन ये होगा कि उसे अगले दो सालों में हॉस्पिटल के एक इम्पोर्टेन्ट फील्ड को बदलना है. था तो नए एडमिनिस्ट्रेटर ने फैसला लिया कि उसका कंट्रीब्यूशन ये होगा कि उसे अगले दो सालों में हॉस्पिटल के एक इम्पोर्टेन्ट फील्ड को बदलना है. इसके लिए उसने इमरजेंसी वार्ड को चुना, जो अब बेकार और ineffective होता जा रहा था. उसका गोल ये था कि इस वार्ड में आने वाले हर पेशेंट को 60 सेकंड के अंदर नर्स चेक करे. एडमिनिस्ट्रेटर और उनकी टीम ने इस पर काफी मेहनत की. एक साल के अंदर ही उस हॉस्पिटल का इमरजेंसी वार्ड पूरे अमेरिका के सभी हॉस्पिटल्स के लिए एक रोल मॉडल बन गया. अगले दो सालों में उस हॉस्पिटल के दूसरे डिपार्टमेंट में भी पॉजिटिव बदलाव आए. जैसा कि इस एग्जाम्पल ने दिखाया,छोटे- छोटे इंटरवेलके लिए प्लान बनाना इफेक्टिव होता है, न कि बहुत लम्बे वक्त के लिए प्लान बनाना. प्लान को अगले 18 महीनों और उससे कम वक्त के लिए बनाना चाहिए और ये प्लान क्लियर भी होना चाहिए. रिजल्ट आपकी पहुंच के अंदर होना चाहिएऔर,इस रिजल्ट का कोई मतलब निकलना चाहिए. रिजल्ट ऐसा हो कि यह दिखाई दें और नापा जा सकें. यहां से, आप यह पता लगा सकते हैं कि आपको क्या करना है, कहां से शुरू करना है. साथ ही कौन से गोल सेट करने हैं और कितना वक्त लगाना हैं, आप यह भी डिसाइड कर सकते हैं. Responsibility for Relationships अपने करियर में हम दूसरे लोगों के साथ करने से बच नहीं सकते. फिर चाहे वह एम्पलॉई हो, एंट्रेप्रेन्योर हो, नहीं सकते. फिर चाहे वह एम्पलॉई हो, एंट्रेप्रेन्योर हो, फ्रीलांसर हो या कोई और. इसलिए, अपने आप को मैनेज करने में अपने रिश्तों की जिम्मेदारी लेना भी शामिल हैं. इसके दो पार्ट हैं. पहला है, आपको यह मानने की ज़रूरत हैं कि दूसरे लोग भी आपकी ही तरह हैं. उनके पास भी उनकी अपनी ताकत, वैल्यूस और काम करने का तरीका होता हैं. एक अच्छा वर्किंग रिलेशनशिप बनाने के लिए, आपको अपने साथ काम करने वालों की ताकत, वैल्यूस और परफॉरमेंस टाइप को जानना बहुत ही ज़रूरी हैं. यह बहुत आसान लग सकता हैं, लेकिन अक्सर इसे लोग नजरअंदाज कर देते हैं. उस एम्प्लॉई का एग्जाम्पल लीजिए जिसे हर मंडे को अपने बॉस के लिए रिपोर्ट लिखना होता हैं. सब कुछ ठीक चल रहा था क्योंकि उसका बॉस उन लोगों में से था जो पढ़कर चीज़ों की इन्फॉर्मेशनलेता हैं. लेकिन, एक वक्त आया जब एक नए बॉस उसकी जगह ले ली. इस एम्प्लॉई ने नए बॉस को रिपोर्ट भेजने का काम जारी रखा, लेकिन नया बॉस सुनने वालों में से था, न कि पढ़ने वालों में से. क्योंकि इस एम्प्लॉई ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि नया बॉस listner हैं या रीडर तो यह एक प्रॉब्लम बन गई थी. नए बॉसकोलगने लगा कि एम्प्लॉई आलसी और नकारा हैं. आपको हमेशा याद रखना चाहिए कि बॉस किसी ऑर्गनाइजेशन में सिर्फ एक पोजीशन नहीं है. बॉस जापान।। पा५ रखना पाए। पातापाता ऑर्गनाइजेशन में सिर्फ एक पोजीशन नहीं है. बॉस असली लोग होते हैं. वे ऐसे लोग होते हैं जिनकी अपनी ताकत, कमजोरियां, वैल्यूस और परफॉर्म करने के तरीके होते हैं. इसलिए अपने बॉस को जानना एक एम्प्लॉई की जिम्मेदारी होती हैं और, एम्प्लॉई का काम हैं कि वह खुद में ज़रूरी बदलाव लाए और अपने माहौल के मुताबिक खुद को ढाल लें. यह बात आपके कलीग्स पर भी लागू होती हैं. टीम के हर मेंबर को अपने तरीके से काम करने का हक़ होता हैं. टीम के हर मेंबर को उनकी ताकत और वैल्यूस के हिसाब से काम दिया जाना चाहिए ताकि टीम असरदार तरीके से काम कर सकें. अब, रिलेशनशिप की ज़िम्मेदारी के दूसरे पार्ट के बारे में बात करते हैं. यह हैं कम्युनिकेशन. बॉस और टीम मेंबर्स को पहले ही बता देना चाहिए कि उनकी ताकत और वैल्यूस क्या हैं ताकि बाद में कोई टकराव न हो. इन पर शुरुवात में ही बात हो जानी चाहिए ताकि काम बिना रुकावट के चल सकें. इससे टीम मेंबर्स के बीच अच्छे वर्किंग रिलेशनशिप भी बनते हैं. एग्जाम्पल के लिए, एक मार्केटिंग वाइस प्रेसिडेंट को लीजिए जो पहले सेल्स डिपार्टमेंट में थे. नए मार्केटिंग वाइस प्रेसिडेंट मार्केटिंग और सेल्स दोनों के ही बारे में सब कुछ जानते थे. लेकिनउन्हें दूसरे डिपार्टमेंट जैसे एडवर्टाइजिंग, पैकेजिंग और प्राइसिंग के बारे में कोई आइडिया नहीं था. इसलिए, दूसरे डिपार्टमेंट के लोगों को नए मार्केटिंग वी पी को सीखाना चाहिए कि वे क्या करते हैं और कैसे रिजल की उम्मीद रखते हैं हर मेंबर को अपने तरीके से काम करने का हक़ होता हैं. टीम के हर मेंबर को उनकी ताकत और वैल्यूस के हिसाब से काम दिया जाना चाहिए ताकि टीम असरदार तरीके से काम कर सकें. अब, रिलेशनशिप की ज़िम्मेदारी के दूसरे पार्ट के बारे में बात करते हैं. यह हैं कम्युनिकेशन. बॉस और टीम मेंबर्स को पहले ही बता देना चाहिए कि उनकी ताकत और वैल्यूस क्या हैं ताकि बाद में कोई टकराव न हो. इन पर शुरुवात में ही बात हो जानी चाहिए ताकि काम बिना रुकावट के चल सकें. इससे टीम मेंबर्स के बीच अच्छे वर्किंग रिलेशनशिप भी बनते हैं. एग्जाम्पल के लिए, एक मार्केटिंग वाइस प्रेसिडेंट को लीजिए जो पहले सेल्स डिपार्टमेंट में थे. नए मार्केटिंग वाइस प्रेसिडेंट मार्केटिंग और सेल्स दोनों के ही बारे में सब कुछ जानते थे. लेकिनउन्हें दूसरे डिपार्टमेंट जैसे एडवर्टाइजिंग, पैकेजिंग और प्राइसिंग के बारे में कोई आइडिया नहीं था. इसलिए, दूसरे डिपार्टमेंट के लोगों को नए मार्केटिंग वी पी को सीखाना चाहिए कि वे क्या करते हैं और कैसे रिजल्ट की उम्मीद रखते हैं. इस बीच, नए मार्केटिंग वी पी की भी जिम्मेदारी हैं कि वह अपनेसे नीचे काम करने वालों को अपने गोल के बारे में बताए कि वह अपना काम कैसे करते हैं और साथ ही वह खुद से क्या उम्मीद रखते हैं, टीम से क्या उम्मीद रखते हैं, उन्हें यह भी बताना चाहिए. MANAGING ONESELF Peter Drucker The Second Half of Your Life आपने शायद मिड लाइफ क्राइसिस के बारे में सुना होगा. अक्सर देखा गया हैं कि ऐसा उन बिज़नस एक्सेक्यूटिव्स के साथ होता हैं जो अपने करियर के टॉप पर हैं. वे लगभग 45 साल की उम्र के होते हैं, और कामयाब और इज़्ज़तदार होते हैं. उन्हें जो कुछ सीखना था, वे सीख चुके होते हैं, और अपने काम में महारत हासिल करचुके होते हैं. ये एक्सेक्यूटिव्स 20 सालों से यही काम करते आए हैं और उन्होंने लगातार अच्छा परफॉर्म कियाहैं. अब उनके जॉब में कोईभी चैलेंज नहीं बचा हैं. लेकिन फिर भी, उनसे आगे के 25 सालों तक इसी तरह काम करने की उम्मीद की जाती हैं. ये एक्सेक्यूटिव्स मिड लाइफ क्राइसिस से गुज़र रहे होते हैं और उनके रिटायर होने में काफी साल अभी बाकी हैं. तो इसका सोल्यूशन क्या हैं? अगर आपभी 40 की उम्र के एक्सेक्यूटिव हैं, तो आप सेकंड करियर शुरू कर सकते हैं. इसे करने के तीन तरीके हैं. सबसे पहले, आप वाकई में एक नए करियर की शुरुआत कर सकते हैं. आप एक टाइप के ऑर्गनाइज़ेशन से दूसरे टाइप में जा वाकई में एक नए करियर की शुरुआत कर सकते हैं. आप एक टाइप के ऑर्गनाइज़ेशन से दूसरे टाइप में जा सकते हैं. एग्जाम्पल के लिए, आप एक बड़े कॉर्पोरेशन में डिविशनल कंट्रोलर हैं. आप यहाँ से रिजाइन कर किसी बड़े हॉस्पिटल में कंट्रोलर बन सकते हैं. अगर आप ऐसा नहीं कर सकते, तो आप एक पूरी तरह से अलग लाइन से भी शुरुआत कर सकते हैं. एग्जाम्पल के लिए, आप एक गवर्नमेंट एम्प्लॉई हैंतो आप 45 साल की उम्र में चर्च के फादर या मंत्री बनने का फैसला करसकते हैं. दूसरे एग्जाम्पल में एक मिड लेवल का मैनेजर हैं जो 20 सालों के बाद कॉर्पोरेट दुनिया को छोड़ देता हैं. वह लॉ स्कूल जाने और एक छोटे से शहर में वकील बनने का फैसला करता हैं. अपनी लाइफ के दूसरे पार्ट को गुज़ारने का एक और तरीका हैं एक पैरेलल करियर बनाना. इसका मतलब हैं कि आप अपना main जॉब नहीं छोड़ेंगे बल्कि उसके साथ-साथ दूसरा काम भी करेंगे. आप अपने दूसरे पैरेलल करियर के लिए कुछ एक्स्ट्रा घंटे काम करेंगे. आप अब भी अपनी पहली जॉब में फुल टाइम या पार्ट टाइम काम कर सकते हैं. आप कंसलटेंट के तौर पर भी वहां काम कर सकते हैं. लेकिन साथ ही आपकुछ और कर सकते हैं जैसे कि एक NGO में लीडर बन सकते हैं. टाइम काम पर सफत 6. जापपासल फतार पर मा वहां काम कर सकते हैं. लेकिन साथ ही आपकुछ और कर सकते हैं जैसे कि एक NGO में लीडर बन सकते एग्जाम्पल के लिए, आप गर्ल स्काउट काउंसिल के प्रेसिडेंट हो सकते हैं. आप पब्लिक लाइब्रेरी में लाइब्रेरियन भी बन सकते हैं या फिर आप लोकल स्कूल में बोर्ड के मेंबर हो सकते हैं. आप औरतों के आश्रम में लीडर या लोकल चर्च में एडमिनिस्ट्रेटर भी हो सकते हैं. मिड लाइफ क्राइसिस को ठीक करने का तीसरा तरीका सोशल एंट्रप्रेन्योर बनना हैं. यह आप पर डिपेंड करता हैं कि आप अपनी पहली जॉब छोड़ना चाहते हैं या नहीं. एग्जाम्पल के लिए, बॉब बफ़ोर्ड को लीजिए. वह एक कामयाब टेलीविजन कंपनी के मालिक हैं. लेकिन दूसरी तरफ, उन्होंने एक नॉन प्रॉफिट ऑर्गनाइज़ेशन की शुरुवात की जो विरोध करने चर्चों की हेल्प करता हैं. बॉब ने एक और नॉन प्रॉफिट ऑर्गनाइज़ेशन शुरू की जो उनके जैसे दूसरे सोशल एंट्रप्रेन्योर को उनके बिज़नस और उनके नॉन प्रॉफिट ऑर्गनाइज़ेशन को बैलेंस करने में हेल्प करता हैं. आप यहां देख सकते हैं कि कैसे एक सेकंड करियर, एक पैरेलल करियरया एक सोशल एंट्रेप्रेन्योर बनने से आपको खद को मैनेज करने में हेल्प मिलती हैं. अपने जाप पहा ५५ सकताफा पास एफ सफापारपर, एक पैरेलल करियरया एक सोशल एंट्रेप्रेन्योर बनने से आपको खुद को मैनेज करने में हेल्प मिलती हैं. अपने पुराने जॉब में फंसनेसेबेहतर हैं अपने लिए किसी दूसरे काम में अच्छा करने और कामयाब होने का मौका ढूंढ़ना. यह आपको आम शख्स बनने से बचाता हैं. जब आप बूढ़े भी हो जाएँगे ये तब भी यह आपको प्रोडक्टिव बनाए रखता हैं. कन्क्लूज़न तो सबसे पहले, आपने अपनी ताकत जानने के इम्पोर्टेस के बारे में सीखा.आपको एक ऐसा जॉब ढूंढ़ना चाहिए जो आपकी ताकत के साथ मैच करता हो और इसे और भी इम्प्रूव करता हो. अपने दिमाग को हमेशा नई नॉलेज हासिल करने के लिए खुला रखिए. दूसरा, आपने सीखा कि आपके लिए यह जानना बहुत ही ज़रूरी हैं कि आप कैसा परफॉर्म करते हैं. आप सुनकर सीखने वालों में से हैं यानी listener हैं या पढ़कर सीखने वालों में से यानी रीडर हैं? क्या आप लिखकर, पढ़कर, सुनकर या बोलकर सीखते हैं?इनके बारे में जानकर आप लगातार अच्छा परफॉरमेंस दे पाएंगे. तीसरा, आपने सीखा कि लोग और ऑर्गनाइज़ेशन दोनों के ही अपने-अपने वैल्यूस होते हैं. आप उसी ऑर्गनाइज़ेशन में सक्सेसफल होंगे जिनके वैल्यूस दोनों के ही अपने-अपने वैल्यूस होते हैं. आप उसी ऑर्गनाइज़ेशन में सक्सेसफुल होंगे जिनके वैल्यूस आपके वैल्यूज के जैसे हों. चौथा, आपने सीखा कि आपकी ताकत, वैल्यूस और परफॉर्म करने का तरीका आपको यह डिसाइड करने में हेल्प करेंगे कि आपकी असली जगह कहाँ है यानी ऐसा कौन सा जॉब या करियर हैं जिसमें आप कामयाब हो सकते हैं. पांचवां, आपने सीखा कि आपको क्या कंट्रीब्यूशन देना हैं, इस बात को डिसाइड करते हुए आपको short टर्म का प्लान बनाना चाहिए यानी अपने प्लान को अगले 18 महीनों के लिए बनाएँ, उससे ज़्यादा का नहीं और आपका प्लानक्लियर और फिक्स्ड होना चाहिए. छठा, आपने सीखा कि एक टीम को इफेक्टिवबनाने के लिए, उसके लीडर और मेंबर्स को अपनी ताकत, वैल्यूस और परफॉरमेंस के तरीकों को शेयर करना चाहिए. यह अच्छे रिलेशन बनाता हैं और हाई प्रोडक्टिविटी लाता हैं. सातवां, आपने मिड लाइफ क्राइसिस को ठीक करने के तीन तरीके सीखे. यह तीन तरीकें हैं सेकंड करियर बनाना, पैरेलल करियर बनाना या सोशल काम करना. आप रिटायरमेंट के बाद भी काम करना जारी रख सकते हैं. के लिए, उसके लीडर और मेंबर्स को अपनी ताकत, वैल्यूस और परफॉरमेंस के तरीकों को शेयर करना चाहिए. यह अच्छे रिलेशन बनाता हैं और हाई प्रोडक्टिविटी लाता हैं. सातवां, आपने मिड लाइफ क्राइसिस को ठीक करने के तीन तरीके सीखे. यह तीन तरीके हैं सेकंड करियर बनाना, पैरेलल करियर बनाना या सोशल काम करना. आप रिटायरमेंट के बाद भी काम करना जारी रख सकते हैं. अपनी ताकत और वैल्यूस को पहचानकर, परफॉर्म करने के बेस्ट तरीके को जानकार और यह समझकर कि आपकी असली जगह कहां हैं, आपएक्स्ट्राऑर्डिनरी परफॉरमेंस देने वाले बन सकते हैं. खुद को बेस्ट तरीके से मैनेज करने के लिए, प्रोडक्टिव होने के लिए और दुनिया पर पॉजिटिव असर डालने के लिए,आपको देखना होगा कि आप क्या कंट्रीब्यूट कर सकते हैं. अपनी फैमिली, कलीग्स और सोसाइटी के साथ अच्छे रिश्ते बनाइए. एवरेज या आम मत बनिए. अपनी जिंदगी को अपनेकंट्रोल में करें और हर दिन को भरपूर जिएँ.

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