Leaders Eat Last: Why Some Teams Pull Togeth… Simon Sinek Books In Hindi Summary

Leaders Eat Last: Why
Some Teams Pull Togeth…
Simon Sinek

ये सुनने में थोडा अजीब लगेगा कि “लीडर्स ईट लास्ट”. लीडर्स के पास बाकी इंडीविजुएल्स से ज्यादा
पॉवर होती है, और युजुअली अपने सबओर्डीनेट्स या एम्प्लोयीज़ से अपनी खुद की वैल्यू ऊपर रखते है.
सेम टाइम में इस बुक का मैसेज भी यही है- लीडर्स जो लास्ट में खाते है, इस टर्म का मतलब है कि असली
लीडर्स वो होते है जो दुसरो की वेल बीइंग को इग्नोर करके सिर्फ अपना ख्याल नहीं रखते है. गुड लीडर्स वो
लोग है जो अपने साथ को-ओपरेट करने वालो की वैल्यू करते है, ऐसे लोग जो जानते है कि उनका इन्फ्लुयेंश दुसरो पर पढ़ रहा है और वो ट्राई करते है कि ये इन्फ्लुयेंश पोजिटिव हो. क्या आप जानना चाहते है कि एक गुड लीडर का सबसे इम्पोर्टेन्ट केरेक्टरस्टिक क्या है ? अगर जानना है तो हमारे साथ बने रहे. क्योंकि हम इस बुक में मेंशन ऐसे ही कुछ लीडर्स के बारे में डिसक्राइब करेंगे. तो गुड लीडर्स और क्या-क्या करते है, लास्ट में खाने के अलावा. व्हट गुड लीडर्स डू, अपार्ट फ्रॉम ईटिंग लास्ट. सिमोन सिनेक जो पहली शोर्ट स्टोरीज लिखी थी उनमे से एक दस बक में मेंशन है ये स्टोरी एक इफेक्टिव प्लाटून के बारे में है जिसमे एक अच्छा सर्जेंट था. इस प्लाटून की एफिशियेंशी इसके किसी लीडर की अथोरिटी पर डिपेंड नहीं थी बल्कि आपस के म्यूचुअल ट्रस्ट और रिस्पेक्ट पर डिपेंड थी. हालांकि एक लीडर को थोडा बहुत सेन्स ऑफ़ अथोरिटी हमेशा दिखाते रहना चाहिए. जो रिलेशन एक लीडर अपने सोल्जेर्स के साथ बिल्ड करता है सिर्फ लीडर और सबओरडीनेट वाला नही होता. ये रिलेशन भी बाकी यूजुअल रिलेशनशिप की तरह उतना ही ह्यूमेन है जो एक जैसी पोजीशन वाले दो युमन बीइंग्स के बीच में होता है. सिमोन सिनेक इसे “द प्रोटेक्शन फ्रॉम अबोव” कहते है. हमारे कुछ रीडर्स ने शायद वो पोपुलर टीवी शो देखा होगा जिसका नाम है” बैंड ऑफ़ ब्रदर्स” ये सीरीज शायद सबसे ज्यादा पोपुलर और बेस्ट एक्जाम्पल है

उस चीज़ का जिसे कहा जाता है” प्रोटेक्शन फ्रॉम अबोव”. यहाँ हम एक आदमी की स्टोरी देख सकते है
जो पहले एक सिम्पल सोल्जर हुआ करता था. फिर वर्ल्ड वार 2 के टाइम में उसने ग्रेट सक्सेस अचीव की.
बूट कैंप में विंटर्स बाकी दुसरे लोगो की तरह ही एक सिंपल प्राइवेट था. लेकिन वार के मुश्किल दिनों में उसकी अच्छाई और करेज ब्राईट लाइट की तरह उभर कर आई. और धीरे-धीरे वो एक ऑफिसर बन गया.शुरुवात में एक माइनर लेफ्टिनेंट.हालांकि वो अपने साथी सोल्जेर्स( बूट कैंप में उसके मेट्स) से आगे निकलकर हायर रैंक तक पहुँच गया था फिर भी उसने कभी इस बात का शो

ऑफ तक नहीं किया. जहाँ वे सब सोते थे वो भी वही सोता था, जो वो खाते थे, वो भी वही खाता था और
उनके साथ ही सेम वार में लड़ता भी था. और उसके सोल्जेर्स इस बात के लिए उसकी बड़ी रिस्पेक्ट भी
करते थे. उसकी ब्रेवेरी की सब तारीफ़ करते थे क्योंकि वो हमेशा फर्स्ट लाइन में खड़ा होता था और लगभग
हर रोज़ ही जान की बाज़ी लगाने को तैयार रहता था.वो अपने हर सोल्जर को पर्सनल लेवल पर जानता था,
उन्हें उनके नाम से बुलाता था और हर एक की केयर करता था. अगर उसके सोल्जेर्स में से कोई बुरी तरह
इंजर्ड होता या किसी की जान चली जाती तो उसे इस चीज़ का बहुत दुःख होता था. फिर वो मेजर के रैंक
तक पहुंच गया मगर विंटर्स अभी भी सेम था. उसके बेहेवियर में कोई चेंजेस नहीं आया. हालाँकि इतनी बड़ी
पोस्ट में होने की वजह से उसे अब फ्रंट में रहने की ज़रुरत नहीं थी मगर वो अपना ज्यादा टाइम वही स्पेंड करता था, अपने सोल्जेर्स के साथ. और ऐसा भी टाइम आया जब अमेरिकन आर्मी और पैराटरूपर्स बास्टोने के फारेस्ट में फंस गए थे अपने समर गियर में विंटर के टाइम पर. बहुत से जेर्नेल्स और हायर ओफिशियाल्स ऐसी मुश्किल जगह में शायद ही कभी गए हो. और कुछ टाइम बाद ही इस जगह तक पहुँचना इम्पोसिबल सा हो गया था क्योंकि जर्मन्स ने अमरीकन्स को चारो तरफ से घेर लिया था. हालांकि मेजर वाल्टर्स और बाकियों की गुड लीडरशिप के चलते अमेरिकन सोल्जेर्स पीछे नहीं हेट और बाद में उन्होंने पलट कर वार भी कर दिया.

Leaders Eat Last: Why
Some Teams Pull Togeth…
Simon Sinek

“एम्प्लोयीज़ भी इंसान होते है” एक लीडर को ये चीज़ रिएलाइज करना बहुत ज़रूरी है जो अपने आस पास
वाले लोगो को साथ एथिकल और बस रिलेशनशिप का दिखावा करते है. जैसे एक्जाम्पल के लिए सिनेक
कहते है कि लोगो को सिर्फ एक कमोडिटी की तरह नहीं लेना चाहिए जिनसे आपका सिर्फ पैसे का रिश्ता
हो. बल्कि मनी को एक कमोडिटी की तरह देखा जाना चाहिए जिसकी वजह से हम दुसरो की हेल्प कर सके.
“एमपेथी” एक बहुत ज़रूरी चीज़ है जिससे हम ये कर सकते है. एक एक्जाम्पल देखते है. मार्क एक
सक्सेसफुल बिजनेसमेन है. उसकी कंपनी इन्टरनेट रूटर्स के साथ ट्रेड करती है और उन्हें सर्विसेस देती
है. उसकी कंपनी में एम्प्लोयीज कम है इसलिए वो सबको पर्सनल लेवल पर जानता है. अपनी जवानी में
मार्क सचमुच एक बड़ा आदमी बनकर खूब सारा पैसा कमाना चाहता था. लेकिन उसका ये मोटिव टाइम से
साथ ढीला पड़ता गया. उसने रियेलाइज किया कि अगर वो कम टाइम में ढेर सारा पैसा कमाने की कोशिश भी करे तो भी उसे अपने एम्प्लोयीज़ के साथ गुड रिलेशन रखना पड़ेगा ताकि वे और ज्यादा एफिशियेशी से उसके लिए काम कर सके. मगर फिर उसे रियेलाइज हुआ कि नंबर उतने इम्पोर्टेन्ट नहीं होते जितने कि रिलेशंस होते है. और फिर वो एक्स्ट्रीमली रिच बनने का अपना सपना ही भूल गया. उसके प्रोग्रामर्स में से एक जो सबसे ज्यादा हार्ड वर्किंग था, की सेलेरी मार्क से भी ज्यादा थी. हालाँकि मार्क कंपनी का ओनर था. उसके एम्प्लोयीज़ ये देखकर काफी खुश रहते थे और ये चीज़ उन्हें अपने वर्क प्लेस में और भी मोटिवेट करती थी.

गुड लीडर जानते है कि जो लोग उनके अंडर है वे भी इंडीविजुवल्स है, जिनके पास अपनी फ़ी विल और ऑटोनोमी है. साइकोलोजी की कई स्टडीज़ में ये देखा गया है कि लोग एक डेमोक्रेटिक वर्क एनवायरमेंट में सबसे ज्यादा खुश रहते है.. अगर एम्प्लोयीज़ को उनके काम पर काफी कम कण्ट्रोल दिया जाए या बिलकुल भी कंट्रोल ना दिया जाए तो उनमे स्ट्रेस रिलेटेड सिम्पटम्स डेवलप हो सकते है. अगर ये स्ट्रेस बना रहेगा तो ये उनके माइंड में किसी तरह की क्रोनिक मेंटल चेंजेस जैसे डिप्रेशन और एन्जाईटी भी ला सकता है. जो लोग एक फ्री, वार्म और फ्रेंडली एनवायरमेंट में काम करते है, ज्यादा प्रोडक्टिव तो होते ही है साथ ही काफी खुशमिजाज़ भी रहते है. आपको डेमोक्रेटिक वर्क एन्वायरमेंट की सिग्निफिकेंस का मतलब और भी अच्छे से समझाने के लिए एक और आर्मी एक्जाम्पल लेते है. हालांकि आर्मी अपने आप में खद एक डेमोक्रेटिक वर्क कंडिशन का अच्छा एक्जाम्पल नहीं है, लेकिन आर्मी में ऐसे कुछ डेमोक्रेटिक लेवल है जिन्हें मेंटेन करना बहुत ज़रूरी है.

दो टॉप जर्नलर्स के बीच का इंटररिलेशन इसका बढ़िया एक्जाम्पल है. इन दोनों हाई ऑफिसर्स के बीच कोई
स्ट्रिक्ट इक्वेलिटी नहीं होती है. कुछ हायर पोस्ट में होते है और कुछ सबऑर्डीनेट्स होते है. लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि टॉप जर्नलर्सही सब कुछ डिसाइड करेंगे. वर्ल्ड वार 2 के दिनों में जब रेड आर्मी जर्मन आर्मी को अपनी बॉर्डर से खदेड़ रही थी तब एक पर्टिक्युलर ओपरेशन, ओपरेशन बेगरेशन ने इस्टर्न फ्रंट पर बेलेंस ऑफ़ पॉवर को प्रेक्टिकली टर्न किया.ये असल में दुनिया के सबसे बड़े मिलिट्री ओफ्फ्रेंस में से एक था जिसने 2.3 मिलियन टूरूपस, कई आर्मीज, काउंटलेस व्हीकल्स, प्लेन्स, और कंस को अपने घेरे में ले लिया था. अलेक्सेंडर वेसिलेवस्काई इस बड़े ओपरेशन की प्लानिंग में शायद सबसे ज्यादा इन्वोल्वड थे. वे इससे कुछ टाइम पहले ही सोवियत यूनियन के मार्शल की रैंक पर प्रोमोट हुए थे. ये रैंक फॉर्मर सोवियत यूनियन का हाईएस्ट मिलिट्री रैंक हुआ करता था..वेसिलेवस्काईने बेशक इसे बढ़िया ढंग से प्लान किया था लेकिन ये इतना कॉम्प्लेक्स ओपरेशन था कि किसी भी तरह से वे इसको कम्प्लीटली अकेले कण्ट्रोल नहीं कर पाए थे. उन्हें अपने जरन्ल्स की स्किल और इंटेलिजेंस पर डिपेंड रहना पड़ाजोकि उनके डायरेक्ट सबओर्डीनेट्स थे. जैसे एक्जाम्पल के लिए उन्हें कई सारी आर्मीज के कोर्डिनेशन के लिए जुकोव की स्किल पर रिले करना पड़ा जो कि उनकी मिलिट्री का एक और स्किल्ड लीडर था. क्योंकि वेसिलेवस्काईअकेले ये सब करने में अनेबल थे. अगर वेसिलेवस्काईने जुकोव के एक्शन पर कंट्रोल करने की कोशिश की होती तो ओपरेशन बेगरेशन इतना सक्सेसफुल नहीं होता जितना कि ये रहा था. लॉन्ग टर्म लीडर्स v/s शोर्ट टर्म लीडर्स ये बहुत इम्पोर्टेन्ट डिफ़रेंस है जिसे सिनेक ने अपनी बुक में हाईलाईट किया है. इसे सिम्पली रखते है, शोर्ट टर्म लीडर्स अपनी सक्सेस और सेटिसफिकेशन के बारे में ज्यादा सोचते है जबकि अपने एम्प्लोयीज़ की उन्हें कोई केयर नहीं होती है. सिनेक कुछ बड़े पोपुलर सीईओं के बारे में मेंशन करते है जो असल में दो डिफरेंट टाइप की लीडरशिप का बढ़िया एक्जाम्पल है.

Leaders Eat Last: Why
Some Teams Pull Togeth…
Simon Sinek

जैक वेल्श जब जेनेरल इलेक्ट्रिक के सीईओ थे, अपने बिहेवियर के हिसाब से एक शोर्ट टर्म लीडर के रोल
में एकदम फिट बैठते थे. हमें गलत ना समझे, ये कोई ज़रूरी नहीं कि शोर्ट टर्म लीडर्स बिजनेस में उतने अच्छे
नहीं होते. बल्कि इसके एकदम उल्टा ये लोग बहुत ज्यादा प्रॉफिट ओरियेंटेड होते है. इतने ज्यादा कि वे
इस दुनिया को सिर्फ नंबर्स के हिसाब से देखते है नाकि लोगो से. उनकी हर बात पैसे पर आकर खत्म होती
है. जैक वेल्श इसी टाइप के इंसान थे -वो अचानक से डिसीजन ले लेते थे, जेनेरल इलेक्ट्रिक के स्टॉक्स ऊपर नीचे होते रहते थे. जैक वेल्श कभी भी किसी को जॉब से निकाल देते थे, ” टू बेलेंस द बुक्स”. अब ये बात तो कहनी पड़ेगी कि किसी को जॉब से निकालना एक ऐसा काम है जो सोच समझ कर करना चाहिए. जिन लोगो की जॉब छूट जाती है, कभी-कभी बहुत दुखी हो जाते है. उनकी लाइफ का मोटिवेशन खत्म हो जाता है. इसीलिए किसी को भी इतनी जल्दी जॉब से नहीं निकालना चाहिए. लेकिन वेल्श ये सब नहीं सोचते थे और उन्होंने अपने टेन्योर में कई सारे लोगो को जॉब से निकाला. उनके चारो तरफ एक मेलेफिक औरा था और एक पत्थरदिल और किसी की केयर ना करने वाले इंसान की जो नयी इमेज उनकी बनी थी, उन्हें शायद पसंद थी.वो लाइफ की सिंपल चीजों जैसे ह्यूमन रिलेशन और इमोशंस की कोई कद्र नहीं करते थे. वही इस स्पेक्ट्रम के दूसरी और जैफ सिनेगल है, जो कोस्टको के सीईओ है. कोस्टको दुनिया में दुसरे नम्बर की सबसे बड़ी रीटेलर कंपनी है. दुनिया को हिला देने वाले इकोनोमिक क्राईसेस के बावजूद ये कंपनी हमेशा टॉप पर रही. इकोनोमिक क्राईसेस के पीरियड में भी जैफ सिनेगल ऐसे बिहेव करते रहे जैसे कि कुछ हुआ ही ना हो.ऐसा लगता था जैसे उन्होंने इकोनोमिक सिचुएशन को इग्नोर कर दिया हो. उन्होंने कंपनी का कोई भी एम्प्लोयी नहीं हटाया. जहाँ बाकी दूसरी कम्पनीज इकोनोमिक क्राइसीस से निपटने के लिए अपने एम्प्लोयीज़ को निकाल कर पैसे बचा रही थी, वही जैफ की कम्पनी ने अपने स्टाफ में से किसी को भी नहीं हटाया भले ही उन्हें काफी लोस बियर करना पड़ा क्योंकि सिनेगल ऐसा नहीं करना चाहते थे. और यही वजह है कि आज कोस्टको का बिजनेस उन दिनों से बैटर है जब क्राइसेस चल रहा था.

वेल्श के स्टॉक के मुकाबले सिनेगल की कंपनी के स्टॉक ऊपर नीचे भी नहीं होते बल्कि धीरे-धीरे बढ़ते
हुए स्टेबल ही रहते है. ये ओबीयस बात है कि ऐसी पर्सनेलिटी के साथ सिनेगल ने एक सेफ वर्किंग
एनवायरमेंट क्रियेट किया और अपने एम्प्लोयीज़ को हमेशा यही फील कराया है कि उनकी कंपनी में
एक रिस्पेक्ट है और उनकी सिचुएशन को किसी भी तरह का थ्रेट कभी नहीं होगा. अगर इस तरह का एनवायरमेंट मिले तो लोग अपने काम में स्ट्रेस फील नहीं करते है बल्कि बगैर किसी डर के फ्री होकर अपना बेस्टपरफोर्मेंस देते है. हो सकता है कि वेल्श की तरह की वर्क स्ट्रेटेजी से कुछ हद तक सक्सेस मिले इश्पेश्ली स्टार्टिंग में, लेकिन लॉन्ग टर्म में इसके डीवास्टेटिंग रिजल्ट्स निकल सकते है क्योंकि आपके एम्प्लोयीज़ फ्रस्ट्रेटेड और स्ट्रेसफुल होकर ना तो अच्छी परफोर्मेंस दे पायेंगे और ना ही कंपनी के प्रॉफिट में कोई कंट्रीब्यूट कर पायेगे. सिनेक आगे 4 हैप्पी केमिकल्स के बारे में बताते है जिन्हें यूज़ करके वे एक्सप्लेन करते है कि कैसे लोगो के साथ हमारा बांड सिर्फ माइंड तक ही नहीं होता. वो हमें ये दिखाना चाहते है कि कैसे दूसरो के लिए हमारी फीलिंग्स का फिजिकल वर्ल्ड में एक स्ट्रोंग बेसिस होता है और ये केमिकल्स हमारे लिए काफी इम्पोर्टेन्ट होते है. ये हैप्पी केमिकल्स है डोपेमाइन, एंडरोफिन, सेरोटोनिन और ओक्सीटोसिन. उन्होंने इन 4 केमिकल्स को 2 मेन ग्रुप में क्लासीफाइड किया है:

1. सेल्फिश या इंडीवीजुएलिस्टिक केमिकल्स
-डोपामाइन और एंडरोफिन
2. सेल्फलेस या कलेक्टिव केमिकल्स
-ओक्सीटोसिन और सेरोटोनिन
“सेल्फिश” केमिकल्स प्राइड और सेल्फ-वर्थ की फीलिंग्स के लिए रिस्पोंसिबल होते है. जैसे कि जब
एक लम्बे टाइम के बाद जब हम फाईनली अपना गोल अचीव करते है अगर कोई दन केमिकल्स का एडिक्टेट फीलिंग्स के लिए रिस्पोंसिबल होते है. जैसे कि जब एक लम्बे टाइम के बाद जब हम फाईनली अपना गोल अचीव करते है. अगर कोई इन केमिकल्स का एडिक्टेड हो जाए तो वो इंसान सिर्फ अपनी वर्ल बीइंग और अपने सेल्फ प्राइड के बारे में ही सोचता रहेगा उसे दुसरो की फीलिंग्स की ज़रा भी फ़िक्र नहीं होगी. ये बात ध्यान रहे कि ये केमिकल्स बुरे तब होते है जब इन्हें अब्युज्ड या ओवर यूज़ किया जाए. लेकिन आपको इन्हें कभी भी पूरी तरह से एलिमिनेट करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. जैसे एक्जाम्पल के लिए जब हम कोई इम्पोर्टेन्ट गोल अचीव करते है तो हमारी बॉडी में डोपेमाइन रिलीज़ होता है. ये एक बेस्ट रिवार्ड है जो हम पा सकते है और इसे एलिमिनेट करना बेवकूफी होगी. हां, लेकिन ये भी केयरफुल रहना ज़रूरी है कि इस तरह की फीलिंग्स के साथ हम ओब्सेस्ड ना हो जाए. ये कोई कोइंसीडेंस नहीं है कि ज़्यादातर स्टीमुलेंट ड्रग्स जैसे कोकेन या मेथएम्फेटामाइंस का अफेक्ट इसीलिए होता है क्योंकि वे बॉडी में डोपेमाइन लेवल बढ़ा देती है.

एंडरोफिन हमारी बॉडी से तब रीलीज़ होता है जब हम कोई एक्ज़ास्टिंग वाली एक्टिविटी फिनिश करते है.
जैसे कि “रनर्स हाई” एक तरह की फीलिंग है जो तब आती है जब कई मील लम्बी और थका देने वाली रन
के बाद आपको रिलेक्सेसन मिलता है. ये एक तरह का रिवार्ड है जो हमें बहुत मेहनत करने के बाद मिलता है. तो इसलिए ये भी डोपेमाइन की तरह है. डिफ़रेंस सिर्फ ये है कि डोपेमाइन बॉडी में तब रिलीज़ होता है जब
आपने कोई गोल अचीव किया हो जिसे आपन जी जान से पूरा करना चाहते थे. वही दूसरी तरह जब लोगो के बीच रिलेशनशिप होती है तो सेल्फलेस या कलेक्टिव केमिकल्स दो प्रोमीनिएन्ट प्लेयर होते है. शोर्ट में कहे तो सेरोटोनिन केमिकल की वजह से ग्रेटफुल फील करते है, जबकि ओक्सीटोसिन को एक तरह से लव केमिकल भी कहा जाता है. लेकिन ऐसा भी ना हो कि सेल्फिश केमिकल्स को इग्नोर करके आप सिर्फ इन केमिकल्स पर ही ज्यादा अटेंशन दे क्योंकि ऐसा करना भी ठीक नहीं होगा. अगर आप सिर्फ सेल्फलेस केमिकल्स पर अटेंशन देंगे तो अपने सेल्फ रिस्पेक्ट और इगो की सेंस कम्प्लीटली खो देंगे.

Leaders Eat Last: Why
Some Teams Pull Togeth…
Simon Sinek
बिलोंगिंग एंड द सर्कल ऑफ़ थ्रेट्स

सिनेक एक्सप्लेन करते है कि दो तरह के सर्कल ऑफ़ थ्रेट्स होते है -पहला वाला बुरा है क्योंकि इसमें एक
इंसान कम्प्लीटली आइसोलेट होकर अपनी परेशानिया खुद ही सोल्व करने की कोशिश करता है. वही दुसरे
हाथ में एक गुड सर्कल ऑफ़ थ्रेट को एक स्ट्रोंग टीम से केरेक्टराइज किया जा सकता है. और एक गुड
लीडर वो होता है जो साथ मिलकर काम करे और साथ मिलकर परेशानियां सोल्व करे. एक इंसान जो किसी बड़े ओर्गेनाइजेशन या ग्रुप से जुड़ा हुआ नहीं है, वो दरअसल बेड सर्कल ऑफ़ थ्रेट में आता है जैसा कि
स्टीफन के साथ था. बेशक वो एक अच्छा वर्कर था, डिलीजेंट और फेयर लेकिन कुछ ऐसा था जो ठीक
नहीं था.सबसे पहली बात तो ये कि वो अपने को-वर्कर्स को ठीक से जानता तक नहीं था. हां, उसे उनके नाम
और पर्सनल स्टोरीज़ पता थी और हर सुबह वो उन्हें गुडमोर्निग बोलता था और हर शाम को घर जाते हुए
गड इवनिंग. बस इतना ही. जैसे ही वो ऑफिस की बिल्डिंग से निकलता था, वो उन्हें कम्प्लीटली भूल जाता था, उनके बारे में उसे कुछ याद नहीं रहता था और उसे ये भी पता था कि वे लोग भी उसे भूल जाते है. वे डिफरेंट वर्ल्ड में रहते थे.

उनकी आपस में बातचीत तो थी मगर वो फॉर्मल सी होती थी जैसे वेदर या किसी स्पोर्ट्स के बारे में. और
उस बातचीत में भी स्टीफन को लगता था कि जैसे वो नकली हो, जैसे वो बनावटी और झूठी बाते हो. और
सबसे बुरी बात तो ये थी कि उसे फील होता था कि उसके कलीग भी ऐसा ही कुछ सोचते है. कुल मिलाकर
वो अपने कलीग्स को अच्छे से जानता ही नहीं था सिर्फ कुछ इनसिग्नीफिकेंट डिटेल्स के अलावा. अब
उपर से और भी बुरी बात ये थी कि उनका बॉस एक अथोरिटिव और पुशी टाइप का था जो किसी को भी
काम से निकालने से पहले एक बार भी नहीं सोचता था.यहाँ तक कि वो कई बार अपनी पर्सनल प्रोब्लम की भड़ास में ऑफिस के किसी भी स्टाफ पर निकाल देता था. तो कोई भी उस बॉस को पसंद नहीं करता था और लोग सिर्फ और सिर्फ अपनी नौकरी बचाने के बारे में सोचते थे. इसका बुरा इफेक्ट ऑफिस के माहौल पर पड़ता था. लोग अपनी जॉब सेव करने के चक्कर में कॉम्पटीटिव हो गए थे मगर नेगेटिव तरीके से. सब एक दुसरे से डरते थे,

कुछ लोग तो दुसरो का काम बिगाड़ने में लगे रहते थे ताकि उनकी एम्प्लोयेमेंट सेफ रहे. ऐसे नेगेटिव
एटमोस्फियर में कामर करते हुए स्टीफन पर भी इसका इफेक्ट पड़ रहा था.वो काम पर हमेशा उदास,
इररिसपोंसिव और इरीटेबल आता था, उसे किसी पर भी ट्रस्ट नहीं था, हर कोई उसे अपना दुश्मन लगता
था. कहने की ज़रुरत नहीं है कि ऐसी सिचुएशन में वर्क रिलेटेड स्ट्रेस बढ जाता है. लोग हर बात पे काट
खाने को दौड़ते है, आपस में वेर्बल फाइट्स और बहस होती है. छोटी-छोटी बात का भी बतंगड़ बनता है. ऐसे
माहौल में काम करना मुश्किल हो गया था. इसलिए स्टीफन ने डिसाइड किया कि वो अब वहां जॉब नहीं
करेगा. उसने रिजाइन लैटर लिखकर दे दिया. उसका बॉस ज़रा भी हैरान नहीं हुआ. स्टीफन बिल्डिंग से बाहर निकला और फिर कभी मुड़कर नहीं देखा. कुछ मंथ्स के बाद उसने एक एड देखा जिसमें एक जॉब खाली थी. जॉब इंटरव्यू के बाद वो ये देख कर हैरान हो गया कि उसका फ्यूचर बॉस कितना शांत, रिलेक्स्ड और लैड बैक था. उसे ये थोडा अजीब लगा कि कम्पनी का सीईओ जॉब इन्टरव्यू ले रहा था. उसके काम का फर्स्ट बहुत बढ़िया रहा.

किसी का कोई प्रेशर नहीं था, दोपहर में उसका बॉस उसके पास आया और पुछा कि सब कैसा चल रहा है.
बॉस ने स्टीफन को एश्योर कर दिया कि वो स्टार्टिंग में ही स्टीफन से मैक्सिमम एफिशिएंसी एक्स्पेक्ट नहीं
करता है. और ये भी कि वो इस बात को समझता है कि स्टीफन को नए माहौल में ढलने में अभी टाइम
लगेगा.स्टीफन अपने नए बॉस की ये बात सुनकर हैरान रह गया था. उसे याद आया कि उसके फॉर्मर बॉस ने पर्सनली उससे तब बात की थी जब किसी गलती के लिए उसने स्टीफन को वार्निंग दी थी. लेकिन उसके नए बॉस ने उसे आगे जो पुछा वो और भी अमेजिंग था. उसने स्टीफन से पुछा कि क्या उसके बच्चे है? “हाँ 2″
स्टीफन ने जवाब दिया. वो हमेशा इस फैक्ट से डरता था कि उसके बच्चे है क्योंकि उसे पता था कि ज्यादातर
बॉस इस टोपिक को फेवरबली नहीं देखते क्योंकि उन्हें लगता है कि बच्चो की वजह से कभी ऐसे इवेंट हो
सकते है जो वर्कर्स की एफिशियेशी अफेक्ट करते है. आप इमेजिन कर सकते है कि स्टीफन कितना ग्रेटफुल फील कर रहा था जब उसके नए बॉस ने कहा” तुम शायद हैरान होगे कि मैंने क्यों पुछा ? क्योंकि मेरी खुद की भी एक फेमिली है और मुझे पता है कि कई बार कुछ प्रॉब्लम भी आ जाती है” इस दुनिया में इससे बुरा कुछ नहीं होता जब आपका बच्चा बीमार हो या इंजर्ड हो. आपका दिल रोता है और आप उसकी हेल्प करना चाहते है.और उस वक्त कोई भी अपने काम या किसी और चीज़ के बारे में नहीं सोचता.इसलिए मैंने तुमसे बच्चो के बारे में पुछा ताकि कभी भी कुछ होता है तो तुम मुझे कॉल कर सकते हो और बेशक तुम्हे एक या दो दिन की पेड छुट्टी मिल सकती है. ये सब सुनना स्टीफन के लिए किसी ड्रीम जैसा था. सडनली बहुत सिक्योर और फ्री फील करने लगा. उसे अब अपनी जॉब की टेंशन नहीं थी और ना ही अपने बच्चो की क्योंकि वो ज़रुरत पड़ने पर जब चाहे उनके पास रह सकता था. फिर जल्द ही वो अपने कलीग्स से भी घुलमिल गया और ज़्यादातर लोग उसे काफी अच्छे लगे थे. वे लोग भी उसकी तरह अपने वर्कप्लेस से खुश थे इश्पेश्ली अपने बॉस के बिहेवियर से.

सिनेक कहते है जब इस तरह का वर्क एनवायरमेंट एस्टेबिलिश होता है तो लोग किसी भी तरह की रियल
प्रॉब्लम को टैकल करने को तैयार रहते है. क्योंकि उन्हें पता होता है कि उनके ऊपर कोई थ्रेट नहीं है और
उनक बाकी लोगो के साथ भी एक फर्म और सिक्योर बांड डेवलप होता है जो उनके साथ मिलकर बिजनेस
प्रॉब्लम सोल्व करते है.

कनक्ल्यूजन
हमने यहाँ बस वही चीज़े मेंशन की है जो हमें सबसे ज्यादा इम्पोर्टेन्ट लगी.. सिनेक की इस बुक में काफी
डिटेल्स और स्टोरीज़ है. अगर आपको ये समरी इंट्रेस्टिंग लगी है तो हम आपको बता दे कि बुक इससे
भी ज्यादा इंट्रेस्टिंग है. चलो उन चीजों को फिर से देखते है जो हमने इस समरी में हाईलाईट की है.
1. प्रोटेक्शन फ्रॉम अबोव
2. एम्पैथी
3. एम्प्लोयीज़ आर आल्सो पीपल
4. ऑटोनोमी
5. लॉन्ग टर्म लीडर्स v/s शोर्ट टर्म लीडर्स
6. 4 मोस्ट इम्पोर्टेन्ट ब्रेन केमिकल्स
7. बिलोंगिंग एंड द सर्कल ऑफ़ थ्रेट्स
ये सुनने में थोडा अजीब लगेगा कि “लीडर्स ईट लास्ट”. लीडर्स के पास बाकी इंडीविजुएल्स से ज्यादा
पॉवर होती है, और युजुअली अपने सबओर्डीनेट्स या एम्प्लोयीज़ से अपनी खुद की वैल्यू ऊपर रखते है.
सेम टाइम में इस बुक का मैसेज भी यही है- लीडर्स जो लास्ट में खाते है, इस टर्म का मतलब है कि असली
लीडर्स वो होते है जो दुसरो की वेल बीइंग को इग्नोर करके सिर्फ अपना ख्याल नहीं रखते है गद लीडर्स वो लोग है जो अपने साथ को-ओपरेट करने वालो की वैल्यू करते है, ऐसे लोग जो जानते है कि उनका इन्फ्लुयेंश दुसरो पर पढ़ रहा है और वो ट्राई करते है कि ये इन्फ्लुयेंश पोजिटिव हो. क्या आप जानना चाहते है कि एक गुड लीडर का सबसे इम्पोर्टेन्ट केरेक्टरस्टिक क्या है ? अगर जानना है तो हमारे साथ बने रहे. क्योंकि हम इस बुक में मेंशन ऐसे ही कुछ लीडर्स के बारे में डिसक्राइब करेंगे.

Leave a Reply