Invisible Influence: The Hidden Forces that Shap… Jonah Berger Books In Hindi Summary

Invisible Influence: The
Hidden Forces that Shap…
Jonah Berger
इंट्रोडक्शन

क्या होगा अगर कोई आपसे कहे कि आपके फैसले पूरी तरह से आपके नहीं है? और ये कहे कि आपके
लिए गए फैसलों पर लोगों का एक स्ट्रोंग इन्फ्लुएंस रहता है और आपको इसका पता भी नहीं चलता?
जी हाँ यही है सोशल साईंकोलोजी. एक्सपर्ट्स कहते है कि करीब 90% फैसले जो हम लेते है, लोगों की
ओपिनियन और सलाह से प्रभावित होते है. और ये लोग हमारे भाई-बहन, हमारे पेरेंट्स या फिर हमारे
स्कूलमेंट्स यानी हमारे आस-पास के ही लोग होते है. आपको यकीन नहीं आता? तो चलिए इस किताब को
पढ़ते है जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगी. इसमें वो सारी कहानियाँ है जो हमे यकीन दिलाती है कि कैसे बाकि लोग हमारी लाइफ चॉइस पर अपनी छाप छोड़ते है. तो आइए इन्हें एक-एक करके डिस्कस कर लेते है.

Monkey See, Monkey Do
चलो एक बेसिक विज़न एक्सरसाईंज़ लेते है. मान लो आपके सामने दो कार्ड रखे है. आपके बाएं जो कार्ड है
उस पर एक लाइन है और जो दाईं तरफ है उस पर तीन लाईने बनी है. अब आपको दायें वाले कार्ड की लाइन
को बाएं कार्ड की सेम लेंग्थ वाली लाइन से मैच करना है अब हम आंसर की बताते है, इसका सही आंसर है तीसरी लाइन या लाइन सी जो सही मैच करेगी. क्यों? क्योंकि आप देखेंगे कि लाइन ए काफी छोटी है और लाइन बी काफी बड़ी है. लाइन सी एकदम बराबर मैच करती है. आप शायद अकेले ये एकदम क्लियर देख पाए पर चैलेन्ज ये है कि आपको ये विज़न टेस्ट छह और लोगों के साथ करना है. तो आप कमरे में आते हो और बाकि पार्टीसिपेंट को देखते हो. Researcher आप सबको एक-एक करके ये टेस्ट करने के लिए बोलेगा, अब चूंकि कमरे में आने वाले आप आखिरी इन्सान है तो ज़ाहिर है आपको बाकियों के जवाब पता चल जायेंगे. तो होता है ये कि पहला पार्टीसिपेंट लाइन्स को देखता है और कांफिडेंस के साथ जवाब देता है बी. अगला पार्टिसिपेंट आता है, थोडा सोचता है और फिर वो भी बी बोलता है. तीसरा पार्टिसिपेंट आता है, फिर चौथा, फिर पांचवा, इस तरह एक-एक करके सारे आते है और सबका एक ही जवाब है लाइन बी. तो अब आप क्या करोगे? आपके माइंड में क्लियर आंसर है सी, आपने खुद अपनी आँखों से देखा कि सिर्फ लाइन सी ही लेफ्ट वाले कार्ड की लाइन से मैच करती है, तो फिर बाकि लोग बी क्यों बोल रहे है? आपका दिमाग चकरा जाता है. तो अब बताइए आपका जवाब क्या होगा? क्या आप अपनी गट फीलिंग के साथ जायेंगे या वही जवाब देंगे

जो दूसरों ने दिया? चलिए इस पर बाद में चर्चा करेंगे, अभी हम एक दूसरी स्टडी पर बात करते है जो साईंकोलोजिस्ट मुजफ्फर शरीफ ने की थी. दरअसल वो ये पता लगाना चाहते थे कि क्या हमारी ओपिनियंस पर दूसरों का प्रभाव पड़ता है या नहीं पड़ता. एक अँधेरे कमरे में एक दीवार पर लाईट का एक छोटा सा पिनपॉइंट बना था. इस स्टडी में पार्टिसिपेंट्स को लाईट को कुछ देर तक घूरना था और ये तय करना था कि लाईट वहां से कितनी देर बाद मूव हुई. उन्हें ये टेस्ट पहले अकेले में और फिर ग्रुप में करने को बोला गया था. असल में लाईट का वो पिनपॉइंट अपनी जगह से कभी मूव ही नहीं हुआ पर जब हम किसी चीज़ को देर तक घूरते है तो हमारी आँखे थक जाती है और हमारा विज़न खुद ब खुद मूव हो जाता है जिससे दिमाग में एक इल्यूजन बन जाता है, हमे लगता है कि डॉट मूव हुआ है पर असल में ऐसा नहीं होता, डॉट अपनी जगह रहता है, बस हमारा विज़न मूव हो जाता है. सबसे पहले शरीफ ने पार्टिसिपेंट्स को एक-एक करके रूम में भेजा. कुछ लोगों ने कहा कि डॉट दो इंच मूव हुआ है तो कुछ ने छह इंच तक मूव होने का दावा
किया. इसके बाद पार्टिसिपेंट्स रूम में अंदर तीन के ग्रुप में भेजा गया. इस बार सबके जवाब अलग थे, कुछ लोगों ने अपने पहले वाले जवाब में 3.5 इंच जोडकर नया जवाब दिया और कुछ ने पहले के जवाब से चार इंच घटा के बताया.

लेकिन ऐसा हुआ क्यों? क्योंकि हर कोई ग्रुप के साथ अपना जवाब कन्फर्म करना चाहता था, उनमे से किसी ने शायद ही नोटिस किया हो पर हर कोई दूसरे के जवाब से इन्फ्लुएस्ड था. इस कांसेप्ट को सोशल इन्फ्लुएंस बोलते है. हम भी शायद ये बात नोटिस नहीं करते और ऊपर दावा करते है कि हमारे फैसले सिर्फ हमारी पसंद, नापसंद और वैल्यूज पर बेस्ड है. लेकिन स्टडीज़ से प्रूव हुआ है कि हम 99% तक दूसरों के राय से प्रभावित होते है. जिस तीन लाइंस वाले एक्सपेरिमेंट की हमने बात की थी, उसे साईंकोलोजिस्ट सोलोमन ऐश ने कन्डक्ट किया था. इसका सही जवाब लाइन सी था. राईट कार्ड की सिर्फ यही लाइन लेफ्ट कार्ड से मैच करती थी, एश ने इस एक्सपेरिमेंट में कुछ एक्टर्स को भी रखा था, सिर्फ एक पार्टिसिपेंट था, बाकि छेह लोग एक्टर्स थे. सारे छह एक्टर्स ने लाइन बी बोला था, लेकिन पार्टिसिपेंट ने साफ देखा था कि सही जवाब लाइन सी है. पर सही जवाब चाहे कितना भी क्लियर क्यों ना हो, फिर भी पार्टिसिपेंट ने बाकियों की देखा-देखी लाइन बी को चूज़ किया. उनमे से 75% ने यही किया. तो इस एक्सपेरीमेंट ने साबित कर दिया कि सही जवाब मालूम होने के बावजूद भी हम लोग भीड़ की हाँ में हाँ मिलाना पसंद करते है फिर चाहे भीड़ का फैसला गलत ही क्यों ना हो.

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A Horse of a Different Color

मॉर्गन ब्रायन एक 12 साल की सॉकर प्लेयर थी. एक दिन मॉर्गन ने देखा कि उनकी पूरी टीम एक ओलिंपिक डेवलपमेंट प्रोग्राम में शामिल की गई है और मॉर्गन को छोडकर हर एक टीम मेंबर का नाम लिस्ट में था. मॉर्गन एक ऐसी लड़की थी जिसके लिए सॉकर उसकी जिंदगी थी पर अपना नाम लिस्ट में ना देखकर वो बेहद निराश हुई थी. लेकिन बजाये हार मानने के मॉर्गन ने उस साल की गर्मियों का भरपूर फायदा उठाया, वो शुरू से ही दुबली-पतली और छोटे कद की प्लेयर रही थी. यहाँ तक कि उसके टीममेट्स उसे “प्लांकटन” कहकर बुलाते थे. पर मॉर्गन ने पूरी गर्मियों खूब प्रेक्टिस की. अपने स्किल्स और बॉडी इम्प्रूव करने के लिए वो सारा दिन मेहनत किया करती थी, मॉर्गन ने किक्स की इतनी प्रेक्टिस करी कि ये उसके लिए बाएं हाथ का खेल बन गया था. कोई एक साल बाद जाकर मॉर्गन स्टेट टीम में जगह
बनाने में कामयाब रही, फिर रीजनल टीम में और फिर यूथ नेशनल टीम में उसका नाम आया. इस बात को दस साल गुजर गए और आज मॉर्गन यू.एस. नेशनल टीम की मेंबर है. वो सिर्फ 22 साल की है और 2015 में वो वीमेन वर्ल्ड’स कप के लिए खेल चुकी है.

अगर आप मॉर्गन से पूछे कि वो अपनी सफलता का श्रेय किसे देना चाहती है तो मॉर्गन अपनी बहन जेनिफर का नाम लेगी जो उससे पांच साल बड़ी है. मॉर्गन और जेनिफर रोजाना डिनर टाइम होने तक प्रेक्टिस किया करते थे. एक तरह से जेनिफर उसकी ट्रेनर और प्रेक्टिस पार्टनर थी. और मजे की बात तो ये है कि अमेरिका में ज़्यादातर इलीट वीमेन सॉकर पलेयर की लिस्ट में शामिल औरतें अपने पेरेंट्स की पहली संतान नहीं हैं यानी सबके बड़े भाई या बहन हैं. अब जैसे एक्जाम्पल के लिए 2015 की वर्ल्ड कप टीम के 23 प्लेयर्स में से 17 के बड़े भाई बहन थे. रिसर्चर्स ने वीमेन’स नेशनल टीम ट्रेनिंग कैंप के उन सभी प्लेयर्स के नाम पता किये थे जिनकी उम्र 14 से 23 के बीच थी. इस स्टडी से उन्हें कुछ ऐसे फैक्टर्स पता चले जो सारे प्लेयर्स के बीच सेम थे. सारे टॉप एथलीट्स के बीच एक ख़ास फैक्टर सेम था और ये था उनका बर्थ ऑर्डर. करीब 75% बेस्ट प्लेयर्स के बड़े भाई या बहन थे. यानी दूसरे शब्दों में बोले तो बेस्ट प्लेयर्स में से ज़्यादातर कोई भी फर्स्टबोर्न चाइल्ड नहीं था. मॉर्गन की तरह ही बाकि टॉप परफ़ॉर्मर के भी बड़े भाई या बहन उनके साथ प्रेक्टिस किया करते थे. बड़े भाई-बहन बड़े और तेज़ होते है. इसलिए वो अपने छोटे भाई-बहनों को अपने साथ अच्छी प्रेक्टिस करवा देते है

वो उन्हें एक ट्रेनर की तरह पुश भी करते है. और छोटे भाई-बहन चुपचाप उनकी सारी बाते मान लेते है. ये
सिर्फ सॉकर प्लेयर्स के साथ ही नहीं बल्कि बाकि गेम्स में भी अप्लाई होता है. आपके कितनी भाई-बहन है? आप सबसे ज्यादा किसके करीब है? सिब्लिंग्स एक- दूसरे को कॉपी भी करते है और साथ ही एक दूसरे से कॉम्पटीशन भी करते है. जैसे मान लो आपकी कोई बड़ी बहन है जो बहुत अच्छी ड्राइंग और पेंटिंग बनाती है, तो हो सकता है कि आप भी उसकी तरह आर्ट में इंटरेस्ट लेना शुरू कर दे. लेकिन कई बार हम अपने भाई-बहनों से एकदम अलग भी होते है, जैसे बड़ा भाई स्मार्ट है तो छोटा भाई थोडा फनी टाइप होगा. या छोटा भाई स्पोर्टी टाइप है तो बड़ा भाई या बहन पढ़ाकू होगा. यानी हम किसी ना किसी रूप में एक दूसरे से अलग पहचान भी बनाना चाहते है. यहाँ तक जुड़वाँ बच्चो की भी पसंद-नापसंद एक सी नहीं होती, वो भी एक दूसरे से अलग पहचान बनाना चाहते है. दोनों की चौइस अलग होगी या फिर दोनों की पर्सनेलिटी डिफरेंट होगी.
जरा इमेजिन करो आप अपने दो खास दोस्तों के साथ एक बार में बैठे हो. आप सब वेटर को एक-एक करके ऑर्डर देते हो. फर्स्ट फ्रेंड रेड एल आर्डर करता है और दूसरा yellow एल. हालाँकि आप भी yellow एल ऑर्डर करना चाहते हो पर आप समर स्टाइल बीयर ऑर्डर कर देते हो. क्यों? ज़ाहिर सी बात है, आप सेम चीज़ ऑर्डर करके सेम नहीं लगना चाहते.

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Not If They’re Doing It

कैरेन स्टैंडफोर्ड यूनीवरसिटी की स्टूडेंट है. एक रात की बात है, कैरेन के हॉस्टल रूम में कुछ लोग उसे
मिलने आये, उन्होंने बताया कि वो स्टैंडफोर्ड कैंसर अवेयरनेस ग्रुप से आये है, उन्होंने कैरेन से ये भी
कहा कि नवम्बर yellow मन्थ है इसलिए वो लोग yellow रिस्टबैंड बेचकर पैसे जमा कर रहे है. उनमे से एक लड़की ने कैरेन को yellow रिस्टबैंड देते हुए कहा कि अगर कैरेन एक डॉलर या ज्यादा डोनेट करती है तो वो पैसा कैंसर रिसर्च फंड में जायेगा. उस लड़की ने कैरेन को ये भी बोला कि कैंसर अवेयरनेस को प्रोमोट करने के लिए उसे ये yellow बैंड पहन लेना चाहिए. “ओके” कैरेन ने कहा उसने रिस्टबैंड पहन लिया और एक डॉलर देने को तैयार हो गई. साथ ही उसने एक रिस्टबैंड अपनी रूममेट कैथरीन के लिए भी खरीद
लिया. “बैंक यूं” उनमे से एक वालंटियर बोला”अपना रिस्टबैंड पहनना मत भूलना. अगले हफ्ते जब कैरेन अपने रूम में आई तो उसे पिज़्ज़ा की खुशूब आई. उसने देखा कि उसके डोर्ममेट्स कोई फॉर्म भर रहे थे और  आपको पता चलता कि गीक्स yellow रिस्टबैंड पहनते है, तो क्या आप तब भी इसे पहनते?

अब यहाँ स्टोरी में एक ट्विस्ट है. इस बुक के ऑथर जोनाह बर्गेर और दूसरे बेस्ट सेलिंग ऑथर चिप हीथ ने
ये रिसर्च स्टडी की थी. असल में ये सब एक सेट-अप था, कैंसर अवेयरनेस के लिए रिस्टबैंड बेचने से लेकर
आखिरी तक सब कुछ एक प्लान था. वो ये पता करना चाहते थे कि क्या स्टूडेंट्स तब भी yellow रिस्टबैंड
पहने रहेंगे जब उन्हें पता चलेगा कि स्टैंडफोर्ड के गीक्स भी यही yellow रिस्टबैंड पहनते है. कैरेन और उसके डोर्ममेट्स एक हफ्ते तक यही रिस्टबैंड पहने रहे. क्योंकि वो लोग कैंसर अवेयरनेस कॉज को सपोर्ट करना चाहते थे और शायद उन्हें yellow रिस्टबैंक पहनना पसंद भी था. लेकिन प्रोफेसर चिप हीथ और जोनाह को पता चला कि ज़्यादातर स्टूडेंट्स ने तब रिस्टबैंड पहनना छोड़ दिया था जब उन्हें पता चला कि गीक्स स्टूडेंट्स भी वही रिस्टबैंड पहनते है. दरअसल प्रोब्लम रिस्टबैंड्स के साथ नहीं थी बल्कि स्टूडेंट्स की ये सोच थी कि वो गीक्स स्टूडेंट्स जैसे नहीं है इसलिए वो उनका स्टाइल कॉपी नहीं करना चाहते थे.

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Similar but Different

सीज़र और रिबेका काफी टाइम से एक बेटा चाहते थे हालाँकि उनके पहले से ही चार साल की जुड़वाँ बेटियां
है पर इस बार रिबेका जब प्रेग्नेंट हुई तो उन्हें उम्मीद थी कि उनका बेटा ही होगा, आखिरकार भगवान ने
उनकी प्रार्थना सुनी और उनके घर एक प्यारा सा बेटा पैदा हुआ. लेकिन सवाल अब ये था कि बच्चे का नाम
क्या रखा जाए. उनके रिश्तेदारों ने उन्हें बहुत से नाम सुझाए पर उन्हें कोई नाम पसंद ही नहीं आया. कुछ नाम बहुत पुराने टाइप के लग रहे थे तो कुछ अजीब से थे. फिर कोई 2006 में जाकर उन्होंने अपने बेटे का नाम रखा, कीगन. उनका पूरा परिवार इस नए बच्चे के आने से बेहद खुश था. कुछ सालो बाद कीगन जब स्कूल जाने लगा तो उसकी किंडरगार्टन टीचर को एक बड़ी अजीब सी बात पता चली. क्लास के 26 बच्चो में से छेह का नाम के, सी या फिर के साउंड से शुरू होता था. जैसे बच्चो के नाम थे, कीगन, किम्बर्ली, केविन, कार्मन और कार्सन. क्या ये सिर्फ एक इत्तेफाक था या इसके पीछे कोई वजह थी? इस किताब में ऑथर जोनाह बर्गर ने इस बात का पता लगाने के लिए व्हार्टन प्रोफेसर एरिक ब्रैडलो के साथ मिलकर एक स्टडी की. उन्होंने यूएस सोशल सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन से मदद मांगी जिनके पास पिछले 125 सालों के सारे अमेरिकन सिटीजन के नामो की लिस्ट मौजूद थी. सोशल सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन के पास ये भी रिकॉर्ड था कि 1900, 1901, 1902 और इसके बाद के सालों में कितनी सूजन, कितनी जेस्सी, या कितने जैकब पैदा हुए थे.

जोनाह और उनके कलीग जब ये डेटा स्टडी कर रहे थे तो उन्हें पता लगा कि कई लोगों ने हरिकेन से इन्फ्लुए होकर अपने बच्चो के नाम रखे थे. जैसे कि हरीकेन केटरीना आज तक का सबसे खतरनाक हरीकेन था जिसने 2005 में अमेरिका में बड़ी तबाही मचाई थी. जैसा हमने पहले भी नोटिस किया, कीगन और उसके पांच क्लासमेट्स के नाम का पहला अक्षर के से स्टार्ट होता है. डेटा से ये भी पता चला कि उस वक्त पूरे अमेरिका में जितने भी बच्चे पैदा हुए उनके के से नाम शुरू होने के चांसेस 10% तक बढ़ गए थे.
1992 में जब हरीकेन एंडू आया था, तब ज़्यादातर बच्चो का नाम ए से शुरू होने के चांसेस 7% तक बढ़े
थे. हरिकेन केटरिना अमेरिका के ईतिहास में पांचवा सबसे खतरनाक हरिकेन था जिसमें करीब $100
बिलियन प्रॉपर्टी की तबाही हुई थी और करीब 1800 लोगों की जान गई थी लेकिन सवाल ये है  कि कोई क्यों अपने बच्चे का नाम ऐसे खतरनाक तूफ़ान पर रखना चाहेगा? तो डेटा से ये पता चला कि लोगों ने बाद में अपने बच्चो का नाम कैटरीना रखना बंद कर दिया था, इस नाम में करीब 40% तक की कमी आई थी. कैटरीना नाम अनपोपुलर हो गया लेकिन के और के साउंड से शुरू होने वाले नाम खूब हिट हुए. केट, या कोरा नाम से कई बच्चो के नाम रखे गए. कीली नाम 25% ज्यादा पोपुलर हुआ और केलिन नाम की पोपुलेरिटी तो 55% तक बढ़ गई थी. तो यही सिमीलियर बट डिफरेंट का मतलब.

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The Goldilocks Effect

अब चलिए एक इम्पोर्टेट कांसेप्ट पर बात करते है. क्या आपने कभी गोल्डीलॉक्स इफ़ेक्ट के बारे में सुना है? बच्चो की ये स्टोरी गोल्डीलॉक्स और तीन भालूओं की कहानी कुछ इस तरह है कि गोल्डीलॉक्स नाम की एक छोटी लड़की भालूओं की घर जाती है, तीनो भालूओं के खाने-पीने और बिस्तर की चॉइस में फर्क है. जैसे कि एक भालू को सोने के लिए सख्त बिस्तर पसंद है जबकि दूसरे को बेहद मुलायम और तीसरे को ना तो ज्यादा सख्त पसंद है और ना ही ज्यादा मुलायम. गोल्डीलॉक्स तीनो बिस्तरों पर बारी-बारी से सोती है
और डिसाइड करती है कि उसे बीच का बेड पसंद है जो ना ज्यादा सख्त है और ना ज्यादा मुलायम. फिर तीनो भालू पोर्रिज़ खाते है. उनमे से एक भालू को गर्म पसंद है तो दूसरे को अपना पोरिज़ ठंडा चाहिए और तीसरे भालू ना तो ज्यादा गर्म खाता है और ना ही ज्यादा ठंडा यानी ठीक-ठीक. गोल्डीलॉक्स भी वही पोरिज़ पसंद करती है जो गर्म और ठंडे के बीच में है. तो हम यहाँ फेमिलिएरिटी और नोवेल्टी के कांसेप्ट पर बात कर रहे है. एक ग्राफ की कल्पना करो जिसमे उल्टा यू कर्व बना है. हमे वही चीज़े पसंद आती है जो हमे जानी-पहचानी लगती है और जो नया होता है उसे हम अक्सर अवॉयड करते है. लेकिन जब कोई चीज़ बहुत ज्यादा फेमिलीयर होने लगती है तो वो बोरिंग हो जाती है. और कई बार ऐसा भी होता है कि जब हमे नोवेल्टी या नयापन पसंद आता है इस उल्टे यू में एक पॉइंट ऐसा भी आता है जहाँ हम नोवेल्टी से ज्यादा फेमिलीएरिटी पसंद करते है और कभी फेमिलीएरिटी से ज्यादा नोवेल्टी.

चलिए एक एक्जाम्पल लेते है. मान लो आप दफ़्तर से घर लौटे तो देखा आपकी वाइफ ने एक नया सोफा
खरीदा है. या फिर बाथरूम में घुसते ही आप देखते है कि टोवेल्स नए है. आपकी वाइफ कहती है” ग्रे वाले टॉवल पुराने हो गए थे तो मैं फिरोज़ी रंग के नए खरीद लाई. अच्छे लग रहे है ना?’ आप थोडा हैरान रह जायेंगे, क्योंकि आपकी आँखों को पुराना सोफा या पुराने टॉवल देखने की आदत है. नए सोफे पर बैठकर या नए टॉवल से मुंह पोंछते हुए आपको कुछ अजीब लगता है, एक तरह से बोले तो आपको uncomfortable फील होता है. आपको शायद लगेगा कि आप किसी पड़ोसी के घर में बैठे है. तो देखा आपने, ये नोवेल्टी या नया एक्सपीरिएंस है, और हम इसे शुरुवात में नकारते ही है. एकदम से हमे नयापन पंसद नहीं आता. क्योंकि चीज़े नई है इसलिए हमे अभी उनकी आदत नहीं लगी है, हमारा माइंड पहले ये श्योर करना चाहेगा कि ये सेफ और सिक्योर है. क्योंकि नएपन के प्रति हम क्यूरियस भी है और थोड़े डरे हुए भी.

नए सोफे या नए बाथ टॉवल की आदत पड़ने में हमे टाइम लगता है. लेकिन बार-बार वही चीज़े इस्तेमाल
करने से हम उसके आदी हो जाते है. फिर आपको यकीन हो जाएगा कि नया वाला सोफा भी पुराने वाले
की तरह ही आरामदायक है. और धीरे-धीरे आप उसे पसंद करने लगते है और इस तरह आपकी डेली रुटीन
में वो चीज़ शामिल हो जाती है. हालाँकि जब हम पहले से ही किसी चीज़ के प्रति फेमिलियर होते है तो वो हमे कुछ वक्त बार बोरिंग भी लगने लगती है. ठीक वैसे ही जैसे कोई एक ही रेस्टोरेंट में रोज़-रोज़ खाना खाए, या एक ही सोंग बार-बार सुने या एक ही मूवी बार-बार देखे. यही वजह है कि गोल्डीलॉक्स की तरह हमे भी लाइफ की फेमिलीएरिटी और नोवेल्टी के बीच एक बेलेंस बना कर चलना है.

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Come on Baby, Light My Fire

1800 के आखिर में नार्मन ट्रिप्लेट सोशल साईंकोलोजी की फील्ड में एक लीडर की तरह उभरे थे. अपनी मास्टर की थीसिस में उन्होंने 2000 से भी ज्यादा साईंकिलिस्ट का डेटा स्टडी किया था. ट्रिप्लेट ने नोटिस किया था कि साइकिलिस्ट तब ज्यादा फास्ट चलते है जब उनके साथ कोई और साइकिलिस्ट भी साईंकल चला रहा हो, वर्ना अकेले में वो इतना फास्ट नहीं चलते. इस phenomena को सोशल फेसिलेशन बोला
जाता है. यानि दूसरों की प्रजेंस में इन्सान हो या जानवर हमेशा better परफॉर्म करने की कोशिश करते है बजाये इसके कि जब वो अकेले हो. जैसे अब बंदरो को ही ले लो. जब दूसरे बन्दर देख रहे होते है तो सिंपल टास्क में भी बन्दर काफी मेहनत करेगा. इसी तरह चूहे भी दूसरे चूहों के सामने और तेज़ दौड़ते है. कुत्ते भी अकेले के बजाए ग्रुप में ज्यादा तेज़ भागते है. चींटियाँ भी जब ग्रुप में होती है तो तीन गुना  ज्यादा सैंड खोद सकती है.

लेकिन कई बार दूसरों के सामने हमारी परफॉरमेंस में कमी भी आती है. क्या आपने भी ये बात नोटिस की
है? फेमिली या फ्रेंड्स आपकी परफॉरमेंस देखने आते है और आप सबके समाने कोई गलती कर बैठते है?
तो ऐसा क्यों होता है कि कभी तो दूसरों के सामने हमारी परफॉरमेंस इम्प्रूव होती है और कभी कमजोर
पड़ जाती है? बॉब जजोंक मिशिगन यूनीवरसिटी के एक जाने-माने सोशल साईंकोलोजिस्ट है. उन्होंने एक बेहद दिलचस्प विषय पर रिसर्च की थी. और उनकी इस रिसर्च का सब्जेक्ट थे कॉकरोच. ज़जोंक ने कॉकरोच के लिए एक स्टेडियम बनाया. एक प्लेक्सिग्लास क्यूब जहाँ से वो उनकी रेस देख सके.
क्यूब के राईट साइड पर एक डार्क स्टार्टिंग बॉक्स था जहाँ पहले जजोंक ने कॉकरोच को रखा. एक पतली
मेटल डोर से रेस कोर्स को सेपरेट किया गया था. क्यूब के लेफ्ट साइड में एक डार्क फिनिशिंग बॉक्स था.
अब ये बात सब जानते है कि कॉकरोच को रौशनी से नफरत है, वो हमेशा छुपने के लिए अँधेरे कोने ढूंढते
है.. जजोंक ने एक फ्लडलाईट का इस्तेमाल किया था. जब वो इसे खोलते और कॉकरोच को रेस कोर्स में छोड़ते, तो वो जल्द से जल्द दूसरी तरफ के अँधेरे कोने में छुपने के लिए दौड़ पड़ते.

अब जजोंक ने कॉकरोच की परफॉरमेंस में दूसरे कॉकरोच की प्रेजेंस का इफेक्ट जानने की कोशिश की.
तो उन्होंने ऑडियंस के लिए छोटा कॉकरोच स्टैंड् भी बनाया जिसे उन्होंने प्लेक्सिग्लास क्यूब के साइड में
जोड़ दिया ताकि बाकि कॉकरोच भी ये रेस देख सके. जजोंक की एक थ्योरी थी, और यही वो डिफ़रेंस था जो
डिसाइड करता था कि हम दूसरों की प्रजेंस में अच्छा परफोर्म करेंगे या बुरा. उन्होंने एक्सप्लेन किया कि जब
टास्क आसान होता है या हमारा जाना-पहचाना होता है तो दूसरों के सामने हमारी परफॉरमेंस अच्छी हो जाती है. लेकिन जब टास्क मुश्किल हो या हमे कुछ नया लगे तो दूसरों के आगे हम उतना बढिया परफॉर्म नहीं कर पाते. तो इसलिए जजोंक ने रेस कोर्स का एक और वर्जन क्रिएट किया. पहला वाला एक स्ट्रेट लाइन में था जहाँ कॉकरोच को सीधे दौडकर दूसरी तरफ पहुंचना था. दूसरा रेस कोर्स एक परपेंडीक्यूलर रेस कोर्स बनाया गया था. ये ऊपर से कंपास जैसा लगता था जहाँ फिनिशिंग लाइन ईस्ट पर थी. कॉकरोच पहले स्ट्रेट भागने की कोशिश करते, या बाएं मुड़ते जाकर फिनिश लाइन ढूंढ पाते. इससे उन्हें रेस पूरी
करने में थोडा टाइम लगता था. ज़जोंक को यकीन हो गया कि उनकी हाइपोथीसिस सही है. कॉकरोच काफी तेज़ दौड़ते थे और जब दूसरे कॉकरोच उन्हें स्ट्रेट लाइन में देख रहे होते तो वो और तेज़ दौडकर खुद का ही रिकॉर्ड तोड़ रहे थे. लेकिन परपेंडीक्यूलर रेस ट्रेक में उन्हें रेस फिनिश करने में पहले से तीन गुना ज्यादा टाइम लगा. ऐसा लग रहा था जैसे कि वो नर्वस हो या डिस्ट्रेक्ट हो गए हो. दूसरे कॉकरोच की प्रेजेंस और नए ट्रेक की वजह उनकी परफॉरमेंस में काफी फर्क पड़ रहा था.

Conclusion
इस किताब में अपने थ्री लाइन और डॉट एक्सपेरीमेंट्स के बारे में पढ़ा. यहाँ तक कि जब आपको सही जवाब
मालूम होता है तो भी आप दूसरों को ही फ़ोलो करते है. आपने इस किताब में सिबलिंग राईवलरी यानी
भाई-बहनों के बीच कॉम्पटीशन के बारे में भी पढ़ा. भाई-बहनों के बीच भी कई बातो में फर्क होता है,
क्योंकि हर किसी की एक अलग पर्सनेलिटी होती है. और हम अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहते है.
इस किताब में आपने रिस्टबैंड और स्टैंडफोर्ड के गीक्स के बारे में पढ़ा. हम अपनी लाइफ में कुछ आदते या
चीज़े इसलिए छोड़ देते है क्योंकि हम किसी एक खास ग्रुप या लेबल से खुद को जोड़ना नहीं चाहते. आपने इस किताब में बच्चो के नाम और हरिकेन कटरीना के बारे में भी पढ़ा. लोग कटरीना नाम तो अवॉयड करते है पर के और के साउंड से शुरू होने वाले नाम आज भी काफी पोपुलर है. आपने इस किताब में गोल्डीलॉक्स इफेक्ट के बारे में भी पढ़ा. जब कोई चीज हम बार-बार करते है तो वो काफी बोरिंग लगने लगती है. और कोई चीज़ जब नई होती है तो हमे उसे जानने की इच्छा होती है . तो इसे बेलेंस करने का एक ही तरीका है कि हमे बीच का रास्ता अपनाना है. हमे फेमिलिएरिटी और नोवेल्टी के बीच एक बेलेंस बनाकर चलना होगा. आपने इस किताब में प्रोफेसर जजोंक और उनके कॉकरोच एक्सपेरिमेंट के बारे में भी पढ़ा. जब टास्क ईजी होता है तो हम दूसरों के सामने भी अच्छा परफॉर्म कर लेते है. लेकिन जब टास्क मुश्किल होता है तो हम खराब परफॉरमेंस देने लगते है.क्योंकि किसी के सामने होने से हमारी सोच में काफी फर्क पड़ता है. अब आप सोशल साईंकोलोजी के बारे में जानते है. हमारे डिसीजन और ओपिनियन दूसरों से काफी हद तक प्रभावित होते है. इसलिए कहा गया है कि इन्सान को सोच समझ कर दोस्त बनाने चाहिए. अगर कभी आपको ऐसा लगे तो इनविज़िबल इन्फ्लुएंस के बारे में सोचना कि वो आपका अफेक्ट कर रहा है

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