Investing the Templeton Way: The Market-Beatin… Lauren Templeton and Scott Phillips Books In Hindi Summary Pdf

Investing the Templeton Way: The Market-Beatin… Lauren Templeton and Scott Phillips इंट्रोडक्शन टेम्पलटन एंड फिलिप्स कैपिटल मैनेजमेंट के फाउंडर और प्रेसिडेंट, लॉरेन टेम्पलटन, अपने अंकल जॉन टेम्पलटन के सीक्रेट्स को शेयर कर रहे हैं! मार्केट पायनियर और इस सदी के सबसे बेस्ट ग्लोबल स्टॉक चुनने वालों में से एक जॉन टेम्पलटन के बारे में कौन नहीं जानता है? यह समरी आपको न सिर्फ अपने देश में बल्कि विदेशों में भी स्टॉक चुनना सिखाती है! देशों के बीच खींचे बॉउंड्री की वजह से आपको क्यों अपना मौका खोना पड़े? क्यों न वर्ल्ड मार्केट को एक्स्प्लोर करें और अपने चॉइस को बढ़ाएं? लॉरेन ने जॉन टेम्पलटन की कहानी सुनाकर ये बताया है कि कैसे वह अपनी सदी के सबसे बड़े वर्ल्ड स्टॉक पिकर बने. उनकी कहानी को सुनिए, अपने लिए बड़े मौके ढूंढिए और इन्वेस्ट कीजिए. A < ८ Investing the Templeton Way: The Market-Beatin… Lauren Templeton and Scott Phillips सबसे बड़े सौदागर का जन्म लॉरेन टेम्पलटन अपने अंकल, सर जॉन मार्क्स टेम्पलटन के बारे में बात करते हैं, जो अपनी सदी के सबसे बड़े वर्ल्ड स्टॉक पिकर्स में से एक बने! लॉरेन कुछ ऐसे बेसिक प्रिंसिपल्स के बारे में बात करते हैं जिन्हें अंकल जॉन फॉलो करते थे, जिसने उन्हें वो बनाया जिसके लिए वो फेमस हुए! मेरे अंकल सर जॉन मार्क्स टेम्पलटन को सबसे बड़े वर्ल्ड स्टॉक पिकर्स में से एक माना जाता था. वह ऐसे शख्स थे जिन्होंने न सिर्फ अमेरिका में स्टॉक चुने, बल्कि उन्होंने दुनिया की ओर देखा और दूसरों देशों में भी अच्छे stocks को चुना. अंकल जॉन एक वैल्यू इन्वेस्टर थे. एक वैल्यू इन्वेस्टर वह होता है जो किसी चीज़ को उसके असली वैल्यू से कम कीमत में खरीदता है. अगर आप इसका मतलब नहीं समझते हैं, तो आपको एक ऐसा एग्जाम्पल बताते हैं जो उन्होंने अपने पिता से सीखा था. अंकल जॉन के पिता, हार्वे सीनियर एक लॉयर थे. लॉ प्रैक्टिस करने के अलावा, वह अलग-अलग तरीकों से पैसा कमाते थे. वह कॉटन जिन चलाते थे, इंश्योरेंस बेचते थे और जमीनें भी खरीदते थे. उन दिनों, खेतों को ऑक्शन यानि नीलामी में बेचा TT ATT -ATTA2417 बेचते थे और जमीनें भी खरीदते थे. उन दिनों, खेतों को ऑक्शन यानि नीलामी में बेचा जाता था. जब नीलामी में बोली लगाने वाले आगे नहीं आते, तो हार्वे सीनियर उन प्रॉपर्टी को खरीद लेते थे. जब भी कोई ऑक्शन चलता था जहाँ कोई बोली लगाने वाले न आए, तो वो वहां पहुंच जाते थे. क्योकि बोली लगाने वाले ना के बराबर होते थे, इसलिए जिन वैल्यू पर इन प्रॉपर्टीस को बेचा जाता था , वह उनके असली वैल्यू से काफी कम होता था. इस तरह उन्होंने बहुत दौलत कमाई और एक वैल्यू इन्वेस्टर के तौर पर यह मेरे अंकल के लिए पहला लेसन था. वह उन चीजों को खरीदते थे जो उन्हें लगता था कि उसके असली दाम से कम दाम पर खरीदी जा सकती थी. यह सबक आपके लिए भी है क्योंकि इन खेतों की तरह, जब स्टॉक की कीमत गिरती हैं या सेल पर जाती हैं, तो बहुत कम खरीदार आते हैं और जब स्टॉक की कीमत बढ़ती हैं, तो बहुत से खरीदार आते हैं. अंकल जॉन ने अपना लेसन अच्छी तरह से सीखा था. वह जानते थे कि सिर्फ इसलिए कि कम लोग उन खेतों को खरीदने को तैयार थे, इसका मतलब यह नहीं था कि वे खेत सस्ते या बेकार थे. इसका मतलब सिर्फ इतना था कि उनकी असली वैल्यू उनके बेचे गए वैल्यू से कहीं ज़्यादा थी. लेकिन उन्होंने बचपन में सिर्फ यही एक सबक नहीं सीखा था. उन्होंने अपने पिता की गलतियों से भी सीखा. उनके पिता कॉटन एक्सचेंज में इन्वेस्ट करते थे. A < लेकिन उन्होंने बचपन में सिर्फ यही एक सबक नहीं सीखा था. उन्होंने अपने पिता की गलतियों से भी सीखा. उनके पिता कॉटन एक्सचेंज में इन्वेस्ट करते थे. एक दिन, हार्वे सीनियर कमरे में आए और अपने बच्चों से कहा कि वे इतने अमीर हो गए हैं कि उन्हें जिंदगी में फिर कभी काम नहीं करना पड़ेगा. पर अफसोस कि कुछ ही दिनों बाद, हार्वे सीनियर यह कहने फिर से कमरे में आए कि उन्होंने सब कुछ खो दिया है. दौलत होने से लेकर दौलत खोने तक के इस हादसे ने अंकल जॉन को एक सबक दी थी. उन्होंने रिस्क मैनेजमेंट और पेपर वेल्थ की कमजोरी के बारे में सीखा. करेंसी और बॉन्ड जैसे दूसरे कई इन्वेस्टमेंट की तरह ही शेयर्स में भी पेपर वेल्थ यानि कागज़ी संपत्ति होती है. पेपर वेल्थ का वैल्यू वो होता हैं जिस प्राइस में हमने इसे खरीदा हैं. यह प्राइस एक जैसा नहीं रहता. प्राइस में कोई भी बदलाव मार्केट के बदलाव पर डिपेंड करता हैं. आज जिसकी कीमत 150 डॉलर है, वह कल 5 डॉलर की हो सकती है. अंकल जॉन के लिए यह दूसरा सबक था जो उन्होंने अपने पिता से सीखा था. वह सीख गए थे कि शेयर मार्केट में कुछ भी पर्मानेंट नहीं होता. यह ज़रूरी नहीं है कि आपने आज जो खरीदा हैं जिसकी कीमत बहुत ज़्यादा हैं, उसकी कीमत कल भी वही रहेगी. उन्होंने शेयर मार्केट की इस डायनामिक नेचर को पहचान लिया था. अंकल जॉन यह बात मानते थे कि हमें इंटरेस्ट लेने रहगा. उन्हान शयर माकट का इस डायनामिक नचर का पहचान लिया था. अंकल जॉन यह बात मानते थे कि हमें इंटरेस्ट लेने वाला होना चाहिए, न कि इंटरेस्ट देने वाला. अंकल जॉन और उनकी पत्नी जूडिथ ऐसे शिकारी बन गए थे जो हमेशा अच्छे डील की तलाश में रहते थे. वे सबसे अच्छी डील ढूंढ़ने के बाद ही इन्वेस्टमेंट करते. एक के बार, उन्होंने 200 डॉलर का एक सोफा बेड सिर्फ 5 डॉलर में खरीदा! अंकल जॉन की इस सौदेबाजी की आदत ने उनका काफी पैसा बचाया जिससे वे इन्वेस्टमेंट कर पाते थे. वह कीमतों के कम होने का इंतजार करते थे या फिर कीमतों को कम करने के लिए बार्गेनिंग करते थे. वह हमेशा ये पक्का करते थे कि वह कभी भी कोई इंटरेस्ट न चुकाएँ. वह उन लोगों से इंटरेस्ट लेते थे जिन्हें वो पैसे उधार देते थे. वह कभी भी कोई ऐसा इन्वेस्टमेंट नहीं करते थे जहां उन्हें किसी भी तरह का इंटरेस्ट देना पड़े. लेकिन ये सब सीखने के अलावा, अंकल जॉन एक ऐसे शख्स थे जिन्हें सब कुछ सीखना था और आगे बढ़ना था. उन्होंने किसी से सुना था कि देश का सबसे अच्छा कॉलेज येल था तो उन्हें वहाँ किसी भी तरह पढ़ना था. लेकिन यह आईडिया नामुमकिन सा लग रहा था क्योंकि उन्होंने जिस हाई स्कूल में पढ़ाई की थी , वहां चार साल तक मैथ्स नहीं पढ़ाया गया था, जो कि ज़रूरी था. तो, अंकल जॉन सीधे प्रिंसिपल के पास गए. प्रिंसिपल ने उन्हें कहा कि उन्हें इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं रा 31+की A < ज़रूरी था. तो, अंकल जॉन सीधे प्रिंसिपल के पास गए. प्रिंसिपल ने उन्हें कहा कि उन्हें इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं हैं लेकिन उसके पास न तो इसके स्टूडेंट हैं और न ही टीचर. तो अंकल जॉन ने खुद ही क्लास को पढ़ाना शुरू किया! उन्होंने अपने आठ दोस्तों को इस क्लास को ज्वाइन करने के लिए राजी किया और उन सभी ने एग्जाम भी पास किया. उनके आगे बढ़ने के नेचर ने उन्हें अपने मंज़िल तक पहुंचा दिया था. इसके अलावा, उन दिनों, यह भी माना जाता था कि शेयर सिर्फ अमेरिका में ही खरीदने लायक थे. लेकिन, अंकल जॉन को पूरी दुनिया घूमने का शौक था, जो उन्हें अपनी मां से विरासत में मिला था. इसलिए उन्हें दुनिया के बारे में काफी अच्छी जानकारी थी और वे समझ पाए थे कि शेयर के बारे में ये बात सच नहीं थी. उन्हें सुनी-सुनाई बातों में भरोसा नहीं था और वह जानते थे कि वह किसमें इन्वेस्ट कर रहे हैं. वह किसी देश की बॉउंड्री से बंधे हुए नहीं थे और इसलिए उनके सामने बहुत बड़े-बड़े मौके आए. मार्केट के बारे में अंकल जॉन की समझ बहुत अच्छी थी. वह अक्सर कहते थे कि लोग उनसे हमेशा पूछते हैं कि बाजार अच्छा कहां है. वह कहते कि सही सवाल यह होगा कि बाज़ार कहाँ कमज़ोर हैं. वो समझ गए थे कि भीड़ जो करती हैं, वो न करना इन्वेस्टमेंट बिज़नस के लिए बहुत ही ज़रूरी हैं. ठीक उसी तरह जैसे उनके पिता ने खेतों में इन्वेस्ट किया था. जब ऑक्शन में बोली लगाने वाले कम लोग होते थे, तब हार्वे सीनियर खेतों को खरीद लेते. पाए थे कि शेयर के बारे में ये बात सच नहीं थी. उन्हें सुनी-सुनाई बातों में भरोसा नहीं था और वह जानते थे कि वह किसमें इन्वेस्ट कर रहे हैं. वह किसी देश की बॉउंड्री से बंधे हुए नहीं थे और इसलिए उनके सामने बहुत बड़े-बड़े मौके आए. मार्केट के बारे में अंकल जॉन की समझ बहुत अच्छी थी. वह अक्सर कहते थे कि लोग उनसे हमेशा पूछते हैं कि बाजार अच्छा कहां है. वह कहते कि सही सवाल यह होगा कि बाज़ार कहाँ कमज़ोर हैं. वो समझ गए थे कि भीड़ जो करती हैं, वो न करना इन्वेस्टमेंट बिज़नस के लिए बहुत ही ज़रूरी हैं. ठीक उसी तरह जैसे उनके पिता ने खेतों में इन्वेस्ट किया था. जब ऑक्शन में बोली लगाने वाले कम लोग होते थे, तब हार्वे सीनियर खेतों को खरीद लेते. सच तो यह है कि यही समझदारी आपको इन्वेस्टमेंट मार्केट में बहुत आगे तक ले जा सकती है. मार्केट को पछाड़ने के लिए थोड़ी सी समझ भी काफी है क्योंकि बाकी सभी लोग मार्केट से डरते हैं. बस याद रखिए कि आप जो कुछ भी खरीद रहे हैं, चाहे स्टॉक हो, म्यूच्यूअल फंड हो, या कुछ और, जैसे बाकी सब करते हैं, अगर आप भी वैसा ही करेंगे तो आपका रिटर्न भी उनके जैसा ही होगा. अगर आपको हर किसी से बेहतर परफॉर्म करना हैं, तो आपको भीड़ को फॉलो करना बंद करना होगा. A८ Investing the Templeton Way: The Market-Beatin… Lauren Templeton and Scott Phillips पहला ट्रेड – मैक्सिमम पेसिमिस्म लॉरेन टेम्पलटन कहते हैं कि स्टॉक हमेशा किसी कंपनी की सही वैल्यू नहीं बताती हैं. वह यह भी कहते हैं कि किसी भी स्टॉक को खरीदने का सही वक्त तब होता है जब उसकी कीमत कम हो. – ग्रेट डिप्रेशन की वजह से अमेरिकन इकॉनमी पिछड़ गई थी. जैसा अंदाज़ा लगाया गया था, इकॉनमी वैसी बिलकुल भी नहीं चल रही थी और लगातार उतार-चढ़ाव से गुज़र रही थी. पूरी दुनिया में मंदी थी. लेकिन आपको यह याद रखना चाहिए कि कंपनियों के शेयरों की जो भी कीमत हैं, वो उनकी असली कीमत नहीं होती . ग्रेट डिप्रेशन ने स्टॉक की कीमतों में उतार-चढ़ाव किया था और कंपनियों की वैल्यू उनके सही वैल्यू से काफी कम लग रही थी. ऐसा तब होता है जब खरीदार बहुत ज़्यादा किसी स्टॉक से उम्मीद लगा बैठते हैं और उसे खरीद लेते हैं. हर कोई इन शेयरों को तब तक खरीदने के लिए तैयार रहते है जब तक कि मार्केट overvalued यानि ज़रूरत से ज़्यादा कीमती न हो जाए. बस, इसके फौरन बाद, overvalue होने की वजह से लोग अपने पैसे खोने लगते हैं जिससे लोग निराश हो जाते हैं और अपने मॉम को तेजना शरू कर देते हैं और पार्ने नै overvalue होने की वजह से लोग अपने पैसे खोने लगते हैं जिससे लोग निराश हो जाते हैं और अपने स्टॉक को बेचना शुरू कर देते हैं, और फिर मार्केट कैश हो जाता है. किसी भी कंपनी की वैल्यू को सिर्फ उसके स्टॉक प्राइस से नापा नहीं जा सकता. स्टॉक प्राइस कभी भी किसी कंपनी के वैल्यू को सही तरीके से नहीं दिखा सकती. किसी भी कंपनी के स्टॉक की कीमत के पीछे कई वजह शामिल होते हैं जिनमें से कम्पनी की असली वैल्यू भी एक वजह हैं. जैसा कि पहले बताया गया है, स्टॉक खरीदने का सही वक्त तब होता है जब उसकी कीमत कम होती है. फिर चाहे आप स्टॉक खरीद रहे हों या स्टैम्प जैसी छोटी सी चीज़, यह स्ट्रेटेजी आपको गाइड करेगी. दूसरा मिशन हैं अच्छी डील को ढूंढ निकालना यानी एक बार्गेन हंटर बनना. इसका मतलब यह हैं कि आपको किसी एक्सपर्ट या किसी भी नौसिखिए को नहीं सुनना हैं. आपको सिर्फ अपने अस्सेस्मेंट पर भरोसा रखना हैं कि कोई स्टॉक अंडरप्राइस हैं या ओवरप्राइस. लेकिन आप कैसे पहचानेंगे कि किसी स्टॉक में आपको फायदा पहुंचाने की काबिलियत हैं या फिर वो बस एक कहानी है? सही स्टॉक पहचानने के लिए, नंबर को देखिए. स्टॉक प्राइस और उसकी earning per share का ratio कैलकुलेट कीजिए. अगर ये नंबर उस कम्पनी के कम्पीटीटर से ज़्यादा है, तो आप जिस स्टॉक को देख रहे हैं वह ओवरप्राइस ज़ोन में है. अगर उस कम्पनी के कम्पीटीटर से ज़्यादा है, तो आप जिस स्टॉक को देख रहे हैं वह ओवरप्राइस ज़ोन में है. अगर किसी शेयर की कीमत उसकी कमाई से बहुत ज़्यादा है, तो ये साफ़ हैं कि कंपनी को वह रिटर्न नहीं मिल पा रहा है जिसकी उसे उम्मीद है. यह बात स्टॉक प्राइस के मामले में ज़रूरी है लेकिन जैसा सोचा था वो वैसा रिटर्न भी नहीं दे रहा. अगर आप किसी ऐसे ratio वाली कंपनी में इन्वेस्ट करते हैं, तो आप शायद एक खराब इन्वेस्टमेन्ट करेंगे. ऐसे इन्वेस्टमेंट में, आप एक बार तो कामयाब हो सकते हैं, लेकिन लंबे वक्त में, आप नाकाम होंगे. दूसरी तरफ, जिन कंपनियों के सेल्स के साथ प्राइस ratio कम हैं, वो ही सबसे ज़्यादा रिवॉर्ड देने वाले शेयरों में से एक होते हैं. ये undervalued कंपनियां होती हैं. आपको उन कंपनी के कंडीशन के बारे में भी जानना चाहिए जिसमें आप इन्वेस्ट करना चाहते हैं. कंपनी की प्रॉब्लम को शेयर मार्केट तक पहुंचाना चाहिए. इसका मतलब यह है कि कंपनी में कोई छिपी हुई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए जो आप पर बाद में असर करें. कंपनी से जुड़ी हर बात साफ़ होनी चाहिए. कुछ प्रॉब्लम मामूली होते हैं; और कुछ बड़े. कभी-कभी शेयर मार्केट छोटी-छोटी न्यूज़ पर ओवर रिएक्ट करता है, जैसे, एक ऐसी कंपनी के बारे में सोचिए जो विजेट (widget) बेचने वाला प्लांट बनाने जा रही है. मान लीजिए कि कम्पनी एक साल में प्लांट लगाने मा || (widget) बेचने वाला प्लांट बनाने जा रही है. मान लीजिए कि कम्पनी एक साल में प्लांट लगाने और उसे शुरू करने का प्लान बनाती हैं. लेकिन किसी कारण से, प्रोडक्शन में देरी हो जाती है, और इस प्लांट को शुरू करने में उन्हें छह महीने का टाइम और लग जाता है . तो ऐसे हालात में क्या आपको अपना शेयर फ़ौरन बेच देना चाहिए? इसका जवाब इस बात पर डिपेंड करता है कि प्रॉब्लम परमानेंट है या टेम्पररी. अगर यह एक टेम्पररी प्रॉब्लम है, तो आप इस हालात का फायदा उठा सकते हैं और अपने शेयर को कायम रख सकते हैं क्योंकि बाकी सभी ऐसा नहीं करेंगे, जिससे कंपनी की वैल्यू कम हो जाएगी. दूसरी ओर, अगर प्रॉब्लम परमानेंट है, तो आप अपने शेयर बेच सकते हैं. एक और बात जो आपको याद रखनी चाहिए, वह है कि जब लोगों को मार्केट में अचानक धक्का लगता हैं तो लोग घबरा जाते हैं. शेयर मार्केट में ऐसे हालात बन सकते हैं जिससे लोगों को भारी नुकसान हो सकता है. लेकिन शेयर मार्केट में ऐसा हमेशा होता रहता है. आप मार्केट के हर तरह के रिस्क से बच नहीं सकते. इससे लोग घबराते हैं, लेकिन आपको शांत रहना चाहिए. मैं आपको एक मजेदार कहानी सुनाता हूं जो आपको मार्केट को और ज़्यादा समझने में मदद करेगी. एक लड़का था जो नींबू पानी बेचकर गर्मियों के दिन में करीब 200 डॉलर कमाता था. जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसने सोचा कि उसे नींबू पानी बेचने के बजाय अपना कर्ज उतारना चाहिए. इसलिए उसने अपना हुआ, उसने सोचा कि उसे नींबू पानी बेचने के बजाय अपना कर्ज उतारना चाहिए. इसलिए उसने अपना स्टॉल अपने एक दोस्त को बेचने का फैसला किया. उसके दोस्त ने उसे 200 डॉलर ऑफर की. उसके दोस्त ने स्कूल जाकर अपने दूसरे दोस्तों को अपने इन्वेस्टमेंट के बारे में बताया. अगले दिन जब वह स्टॉल खरीदने गया तो उसके सारे दोस्त भी स्टॉल खरीदने पहुंच गए! और इससे पहले कि यह अपने दोस्त को 200 डॉलर की ऑफर कर पाता, उसके दोस्तों ने ज़्यादा ऑफर देना शुरू कर दिया. इससे पहले कि लड़का अपने स्टॉल को सबसे ज़्यादा बोली लगाने वाले को बेच पाता, बारिश शुरू हो गई. फिर, अचानक सबका फैसला बदलने लगा. वे अब स्टॉल खरीदने के लिए तैयार नहीं थे और वहां से चल दिए. वहां खड़ा आखिरी शख्स भी वहां से चला गया क्योंकि उसने सोचा कि अगर दूसरे जा रहे हैं, तो ज़रूर कोई कारण होगा. कुछ वक्त बाद, एक और लड़का आया और उसने स्टॉल को सिर्फ 50 डॉलर में खरीदने की ऑफर दी. लड़के ने पहले तो आनाकानी की लेकिन फिर उसने स्टॉल बेचने का फैसला किया क्योंकि उसके लिए यही सबसे ज्यादा प्राइस का ऑफर था. शेयर मार्केट में ठीक ऐसा ही होता है. हर कोई वो चीज खरीदने के लिए दौड़ता है, जो सब खरीद रहे होते हैं, भले ही वह कितना भी महंगा क्यों न हो. जब मार्केट में हलचल होती है तो हर कोई उसे बेचना चाहता है, भले ही वो हलचल टेम्पररी क्यों ना हो. कोई भी शेयरों बदलने लगा. वे अब स्टॉल खरीदने के लिए तैयार नहीं थे और वहां से चल दिए. वहां खड़ा आखिरी शख्स भी वहां से चला गया क्योंकि उसने सोचा कि अगर दूसरे जा रहे हैं, तो ज़रूर कोई कारण होगा. कुछ वक्त बाद, एक और लड़का आया और उसने स्टॉल को सिर्फ 50 डॉलर में खरीदने की ऑफर दी. लड़के ने पहले तो आनाकानी की लेकिन फिर उसने स्टॉल बेचने का फैसला किया क्योंकि उसके लिए यही सबसे ज्यादा प्राइस का ऑफर था. शेयर मार्केट में ठीक ऐसा ही होता है. हर कोई वो चीज खरीदने के लिए दौड़ता है, जो सब खरीद रहे होते हैं, भले ही वह कितना भी महंगा क्यों न हो. जब मार्केट में हलचल होती है तो हर कोई उसे बेचना चाहता है, भले ही वो हलचल टेम्पररी क्यों ना हो, कोई भी शेयरों के undervalue होने पर खरीदना नहीं चाहता. जो लोग खरीदना चाहते हैं वे भी ऐसा नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर दूसरे नहीं खरीद रहे हैं, तो ऐसा नहीं करना ही अच्छा होगा. उस लड़के की तरह, आपको भी वक्त रहते पहले ही सिचुएशन को समझना होगा. आपको यह जानने की जरूरत है कि रिटर्न कम क्यों है और क्या ये प्रॉब्लम टेम्पररी है. अगर ऐसा है, तो आपको अपने शेयरों को रखना चाहिए. अगर ऐसा नहीं है तो आप अपने शेयर बेच सकते हैं. Investing the Templeton Way: The Market-Beatin… Lauren Templeton and Scott Phillips ग्लोबल इन्वेस्टमेंट पर पैर रखना इस चैप्टर में, लॉरेन टेम्पलटन ग्लोबल मार्केट के बारे में बात करते हैं. वह लोकल मार्केट के बजाय ग्लोबल मार्केट में इन्वेस्टमेंट करने के फायदों के बारे में बताते हैं. ग्लोबल मार्केट में पैसा लगाने से पहले जिन बातों पर ध्यान देना ज़रूरी हैं, उनके बारे में भी बताते हैं. आपको ग्लोबल मार्केट में इन्वेस्ट करना चाहिए. खुद को सिर्फ एक लोकल मार्केट तक सीमित रखने की कोई वजह नहीं हैं. इसकी दो वजह है. पहला, अगर आप एक अंडरवैल्यूड स्टॉक खरीदना चाहते हैं, जिसकी कीमत उसके कॉम्पिटिटर से कम हैं, तो आपके सामने और भी ज़्यादा ऑप्शन बढ़ेंगे जब आप ग्लोबल मार्केट की तरफ देखेंगे. इससे आपके कामयाब होने की पॉसिबिलिटी बढ़ जाएगी. दूसरा, आपको किसी दूसरे देश में अच्छी और बेहतर डील मिल सकती हैं. ऐसा करने से स्टॉक के बड़े से समुन्दर में आपको अच्छी कीमत ढूंढ़ने में आसानी रहेगी. लेकिन, आपको सही देश ढूंढ़ने की जरूरत है. अक्सर, जब अंकल जॉन किसी देश को दूसरे देश से बेहतर बताते थे , तो लोगों को लगता था कि उन्होंने Macroeconomics लेवल पर अपना रिसर्च fhan Marmornnnmire fnaf tatt 1 A < Macroeconomics लेवल पर अपना रिसर्च किया है. Macroeconomics किसी देश की economy यानि अर्थव्यवस्था से जुड़ी होती है, न कि उसके लोगों से. लोग मानते थे कि अंकल जॉन एक देश की इकॉनमी के बारे में गहराई से जानते हैं. लेकिन, वे नहीं जानते थे कि अंकल जॉन लोकल मार्केट को देखकर ही अपना रिसर्च करते थे. वह टॉप-डाउन एनालिसिस के बजाय बॉटम-अप एनालिसिस करते थे. अंकल जॉन निचले लेवल से शुरू करते थे और वे किसी स्टॉक या कंपनियों को ध्यान में रखकर फैसला लेते थे, न कि पूरे देश की इकॉनमी को. लोग लंबे वक्त तक ग्लोबल मार्केट में पैसा लगाने से डरते रहे. कुछ सालों पहले तक लोग कहते थे कि इन्वेस्टमेंट के लिए अमेरिका ही सबसे अच्छा मार्केट है. आजकल लोग कहते है कि उन्हें ग्लोबल मार्केट के बारे में ज़्यादा information नहीं हैं. लेकिन क्या यह बात फायदेमंद नहीं है? आपको लग सकता ये एक रुकावट है लेकिन क्या हर किसी को किसी बात में information की कमी नहीं है? दूसरे लोगों में information की कमी हैं, इसका फायदा उठाकर उनसे पहले ही आप ग्लोबल मार्केट में इन्वेस्ट करना शुरू क्यों नहीं करते. यह सब आपके नज़रिए पर डिपेंड करता है; आप ग्लास को आधा भरा देखना चाहते हैं या आधा खाली, इसका फैसला आपको करना हैं. इसके लिए आपको सच का पता करना होगा और इसके लिए आपको सच का पता करना होगा और उसके लिए आपको कोशिश करनी चाहिए. इसे समझने के लिए आइए अंकल जॉन का एक एग्जाम्पल लेते हैं. वह एक मैक्सिकन टेलीफोन कंपनी खरीदना चाहते थे. अंकल जॉन ने सोचा कि कंपनी की रिपोर्ट पर ज़्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता था, इसलिए उन्होंने मैन्युअली उस देश के पॉपुलेशन की गिनती की और लोग जितना रेट देते थे, दोनों को मल्टीप्लाई किया. इससे उन्हें कंपनी की कमाई का अंदाजा हो गया था. अंकल जॉन ने पाया कि कंपनी अंडरवैल्यू केटेगरी में थी और उन्होंने उसमें इन्वेस्ट करने का फैसला लिया. किसी भी कंपनी की असली वैल्यू का पता लगाने के लिए आपको भी रिसर्च करना होगा. आपको मैन्युअली हिसाब करना पड़ सकता है, न कि सिर्फ रिपोर्ट को देखकर फैसला लेना चाहिए. आपको गाइड करने के लिए P/E ratio है. P/E ratio किसी भी शेयर की कीमत और हर शेयर में कितनी कमाई हो रही हैं, उसका ratio हैं. अगर किसी कम्पनी की कमाई ज़्यादा हो, और उसके शेयर की कीमत कम हैं; इसका P/Eratio कम निकलेगा. कम P/E ratio वाली कंपनियां अच्छा फायदा दे सकती हैं, लेकिन हमेशा नहीं. ऐसी कंपनियों अंडरवैल्यू हो सकती हैं. इसके साथ-साथ, आपको ये याद रखना चाहिए कि जब भी टेम्पररी मुश्किल आए, तो आपको पीछे नहीं हटना है इसके बजाय, आपको ऐसी सिचुएशन का TIटा सामानातिनानेगानिस सटोरिया ATT हटना है इसके बजाय, आपको ऐसी सिचुएशन का फायदा उठाना चाहिए, जैसा कि उस लड़के ने किया था जिसने सिर्फ 50 डॉलर में नींबू पानी का स्टॉल खरीदा था. आपको कमियों को पहचानना होगा और उससे फायदा उठाना होगा . बारिश की वजह से दूसरे लड़कों ने स्टॉल को नहीं खरीदा लेकिन आपको याद रखना चाहिए कि बारिश टेम्पररी होती है. P/Eratio और रिसर्च के अलावा, अंकल जॉन को currency ने भी फैसला लेने में मदद की. वह कम रिस्क वाली उन करेंसी में इन्वेस्ट करते थे जिन्होंने कम पैसे उधार लिए थे और जिनकी सेविंग्स भी ज़्यादा थी. आज ऐसी कोई भी करेंसी मिलती नहीं हैं, लेकिन अगर आप वाकई में अच्छी तरह से रिसर्च करते हैं तो आप ढूंढकर निकाल सकते हैं. अगर किसी देश की गवर्नमेंट ने बड़ा लोन लिया हैं, तो उस देश की करेंसी में इन्वेस्ट करने से बचना चाहिए. अंकल जॉन उन देशों में भी इन्वेस्ट करते थे जहां एनवायरनमेंट रेगुलेशन कम थे. इससे लोगों को गवर्नमेंट की दखलंदाज़ी के बिना अपना फैसला लेने में मदद मिलती है . पॉलिटिक्स के नज़रिए से, अंकल जॉन उन देशों में इन्वेस्ट करना पसंद करते थे जहां एक फ्री मार्केट होता था, और वो देश कैपिटलिस्ट होता था. इसका मतलब यह है कि इन देशों में गवर्नमेंट के बीच में आए बिना लोगों को कुछ खरीदने या बेचने की पूरी आज़ादी थी. अंकल जॉन सोशलिस्ट देशों में इन्वेस्ट नहीं करने की सलाह देते थे, जहां कुछ खरीदना और बेचना. बिना गवर्नमेंट के ममकिन नहीं है. था. आपको कमियों को पहचानना होगा और उससे फायदा उठाना होगा . बारिश की वजह से दूसरे लड़कों ने स्टॉल को नहीं खरीदा लेकिन आपको याद रखना चाहिए कि बारिश टेम्पररी होती है. P/E ratio और रिसर्च के अलावा, अंकल जॉन को currency ने भी फैसला लेने में मदद की. वह कम रिस्क वाली उन करेंसी में इन्वेस्ट करते थे जिन्होंने कम पैसे उधार लिए थे और जिनकी सेविंग्स भी ज़्यादा थी. आज ऐसी कोई भी करेंसी मिलती नहीं हैं, लेकिन अगर आप वाकई में अच्छी तरह से रिसर्च करते हैं तो आप ढूंढकर निकाल सकते हैं. अगर किसी देश की गवर्नमेंट ने बड़ा लोन लिया हैं, तो उस देश की करेंसी में इन्वेस्ट करने से बचना चाहिए. अंकल जॉन उन देशों में भी इन्वेस्ट करते थे जहां एनवायरनमेंट रेगुलेशन कम थे. इससे लोगों को गवर्नमेंट की दखलंदाजी के बिना अपना फैसला लेने में मदद मिलती है . पॉलिटिक्स के नज़रिए से, अंकल जॉन उन देशों में इन्वेस्ट करना पसंद करते थे जहां एक फ्री मार्केट होता था, और वो देश कैपिटलिस्ट होता था. इसका मतलब यह है कि इन देशों में गवर्नमेंट के बीच में आए बिना लोगों को कुछ खरीदने या बेचने की पूरी आज़ादी थी. अंकल जॉन सोशलिस्ट देशों में इन्वेस्ट नहीं करने की सलाह देते थे, जहां कुछ खरीदना और बेचना, बिना गवर्नमेंट के मुमकिन नहीं है. Investing the Templeton Way: The Market-Beatin… Lauren Templeton and Scott Phillips उगते सूरज को सबसे पहले देखना ये चैप्टर उन स्टॉक्स के बारे में है जिन्हें नज़र अंदाज़ किया गया है, ये उन्हें पहचानने का तरीका बताता हैं. लॉरेन टेम्पलटन डिटेल में जापान में उनके इन्वेस्टमेंट के बारे में बताते हैं, जिसे सभी अमेरिकी इन्वेस्टर्स ने नज़र अंदाज किया था. 1980 के दशक में अमरिकियों को दिखा कि जापान की इकॉनमी बहुत बढ़िया चल रही थी. लेकिन, अंकल जॉन ने उससे काफी पहले से ही जापान में इन्वेस्ट करना शुरू कर दिया था. तब लोगों ने उनके फैसले की तारीफ नहीं की थी, लेकिन बाद में उनका फैसला काफी फायदेमंद साबित हुआ. लोगों को लगता था कि जापान सस्ते सामान बनाता है और कम पैसे में सामान बनाता है. अगर लोग थोड़ा और ध्यान देते, तो उन्हें पता चलता कि जापान जल्दी ही एक पावरफुल इंडस्ट्रियल देश बनने वाला था. जिन शेयरों को नज़रअंदाज़ किया जाता हैं, उनके साथ भी यही होता है. लोग गलतफहमियों से घिर जाते हैं और मार्केट को पूरी तरह से अनदेखा कर देते हैं. वे जमीनी हकीकत को देखने की कोशिश नहीं करते और सिर्फ अफवाहों को सुनकर अपना फैसला ले लेते हैं. तो लोग नहीं चाहते कि था ये शेगर्यको स्तरीदें तो 60 A 3 ।। एपगपारा । ५।।NNICI पासा। सिर्फ अफवाहों को सुनकर अपना फैसला ले लेते हैं. जो लोग नहीं चाहते कि आप ऐसे शेयर्स को ख़रीदें, वो ही ऐसी अफवाहों को फैलाते हैं. ऐसे नज़रअंदाज़ किए हुए शेयरों के साथ पेशेंस से काम लेना चाहिए. ये इंतजार कई सालों का भी हो सकता है. ये शेयर समुद्र में मछली की तरह होते हैं. सकता है कि आपको पता हो कि ये मछलियां कहाँ हैं और आपके पास सही चारा है, लेकिन हो सकता हैं कि अभी के हालात के कारण ये मछलियाँ चारा लेने से बच रही हैं. इसलिए आपको बस इंतज़ार करना हैं. गलत information भी काफी खतरनाक हो सकती है. कुछ देशों के एकाउंटिंग रेगुलेशन गलत information या गलतफहमी की वजह भी बन सकते हैं जिसकी वजह से आप गलत फैसला ले सकते हैं. कैसे? आइए समझते हैं. अंकल जॉन ने जब हिताची नाम के एक जापानी कंपनी में इन्वेस्ट किया था तो उन्होंने इसी गलतफहमी का फायदा उठाया था, हिताची, एक इलेक्ट्रॉनिक कंपनी थी जो असल में कई कंपनियों को मिलकर बनी थी. इसकी पैरेंट कंपनी हिताची के पास कई कंपनियों की ओनरशिप थी. उस वक्त के अकाउंट रेगुलेशन की वजह से रिपोर्ट में कुछ गलतफहमी फैली थी. पेपर पर, कंपनी नुकसान दिखा रही थी. लेकिन यह सच नहीं था. हिताची की कमाई में उसके नीचे आने वाली बाकी कंपनियों की कमाई नहीं दी गई थी. P/E ratio बहुत ज्यादा दिख रहा था जबकी कंपनी की कमाई काफी कंपनियों की कमाई नहीं दी गई थी. P/E ratio बहुत ज़्यादा दिख रहा था, जबकी कंपनी की कमाई काफी अच्छी थी. जो लोग सोचते हैं कि एक ज़्यादा P/ E ratio यह तय करने के लिए काफी है कि कंपनी खराब परफॉर्म करेगी, उन लोगों ने हिताची की इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ किया था. अंकल जॉन ने इसी गलत information का फायदा उठाया, वे जानते थे कि वह कहां इन्वेस्ट कर रहे हैं. जैसा कि पहले ही हमने बात की, ऐसा जानकारी की कमी के कारण हो सकता है. आप शायद जापान के नियम को नहीं जानते होंगे. लेकिन और कोई भी नहीं जानता है , और आपको इसका फायदा उठाना चाहिए. अपने शेयरों को कम्पेयर कीजिए और एक बेहतर डील ढूंढिए. अगर आप इस सवाल से परेशान हैं कि आपको अपने शेयरों को बेचना चाहिए या नहीं, तो आपको खुद से सवाल पूछना चाहिए कि क्या इनके बदले कोई बेहतर स्टॉक मिल सकता है? अगर जवाब हाँ है, तो यह आपको पुराने स्टॉक को बेचने का और एक नया स्टॉक खरीदने का वक्त है. अंकल जॉन ने ऐसा ही किया. उन्होंने अपने जापान के शेयर को तब बेचा जब उन्हें canada के बेहतर शेयर मिलें. किसी भी गलत फैसले पर हिम्मत मत हारिए. आप स्टॉक बिज़नस में नुकसान से पूरी तरह से बच नहीं सकते. स्टॉक पिकिंग एथलेटिक्स की तरह है. हर कोई आपको आपके पिछली परफॉरमेंस के आधार पर आंकते है, लेकिन आपको सिर्फ अपने फ्यूचर के परफॉरमेंस को ठीक करना चाहिए. अपनी गलतियों को A खराब परफॉर्म करेगी, उन लोगों ने हिताची की इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ किया था. अंकल जॉन ने इसी गलत information का फायदा उठाया, वे जानते थे कि वह कहां इन्वेस्ट कर रहे हैं. जैसा कि पहले ही हमने बात की, ऐसा जानकारी की कमी के कारण हो सकता है. आप शायद जापान के नियम को नहीं जानते होंगे. लेकिन और कोई भी नहीं जानता है , और आपको इसका फायदा उठाना चाहिए. अपने शेयरों को कम्पेयर कीजिए और एक बेहतर डील ढूंढिए. अगर आप इस सवाल से परेशान हैं कि आपको अपने शेयरों को बेचना चाहिए या नहीं, तो आपको खुद से सवाल पूछना चाहिए कि क्या इनके बदले कोई बेहतर स्टॉक मिल सकता है? अगर जवाब हाँ है, तो यह आपको पुराने स्टॉक को बेचने का और एक नया स्टॉक खरीदने का वक्त है. अंकल जॉन ने ऐसा ही किया. उन्होंने अपने जापान के शेयर को तब बेचा जब उन्हें canada के बेहतर शेयर मिलें. किसी भी गलत फैसले पर हिम्मत मत हारिए. आप स्टॉक बिज़नस में नुकसान से पूरी तरह से बच नहीं सकते. स्टॉक पिकिंग एथलेटिक्स की तरह है. हर कोई आपको आपके पिछली परफॉरमेंस के आधार पर आंकते है, लेकिन आपको सिर्फ अपने फ्यूचर के परफॉरमेंस को ठीक करना चाहिए. अपनी गलतियों को भूल जाइए लेकिन उनसे ज़रूर सीखिए. Investing the Templeton Way: The Market-Beatin… Lauren Templeton and Scott Phillips इक्विटी की मौत या बुल मार्केट का जन्म? इन चैप्टर्स में, लॉरेन टेम्पलटन 1970 के दशक में “इक्विटी की मौत” के बारे में बात करते हैं. इसमें प्राइस/बुक ratio को एक्सप्लेन किया गया हैं, और टेक कम्पनीस में इन्वेस्टमेंट पर अंकल जॉन की राय पर भी चर्चा की गई है. 1970 के पूरे दशक में, मार्केट ने बहुत कम रिटर्न दिया. हालत इतनी बुरी थी कि बिजनस वीक के कवर पर “द डेथ ऑफ इक्विटीज (स्टॉक्स) ” लिखा गया. लोगों को लगा कि शेयर्स का चलन खत्म हो जाएगा और वो पुरानी बात बनकर रह जाएगी. तीस साल बाद, मैगज़ीन का वो एडिशन एक मजाक सा लगने लगा. आपको यह जानना चाहिए कि उन दिनों शेयर खरीदने वाला कोई नहीं था. सिर्फ आप ही खरीदार थे. अगर आप दूसरों की देखा-देखी न करते तो बाद में आपको ज़्यादा रिटर्न मिल सकता था. इसके लिए बस आपको पेशेंस दिखाने की ज़रूरत पड़ती. लेकिन मैं समझ सकता हूँ ऐसे वक्त में इन्वेस्ट करना मुश्किल होता है जब एक बिज़नस मैगज़ीन कहती हैं कि शेयरों का दौर अब खत्म हो गया है” और लोग यह । A म समझ सकता हूएस पराम इन्पस्ट करना मुरिफल होता है जब एक बिज़नस मैगज़ीन कहती हैं कि ‘ शेयरों का दौर अब ख़त्म हो गया है”, और लोग यह मानने लगे कि स्टॉक का चलन खत्म हो रहा हैं. ऐसे में शायद, आपको बार-बार ये ख़याल आए कि “क्या होगा अगर मैं अपना सारा पैसा खो दूं तो?” लेकिन अगर आप फ्यूचर में कभी इस तरह की बातें सुनते हैं, तो याद रखिए कि मार्केट undervalued है. इन्वेस्ट करने के लिए यही सही वक्त हैं. अमरिकी स्टॉक मार्केट जिस बात को अंकल जॉन सबसे ज़्यादा पसंद करते थे, वो यह थी कि मार्केट वैल्यू, फाइनेंसियल स्टेटमेंट में बताए गए एसेट वैल्यू से काफी कम होते थे. मतलब यह कि कंपनी की सही वैल्यू कागज़ों में नहीं लिखी होती थी. इन फाइनेंसियल स्टेटमेंट को देखकर आपको लग सकता है कि यह इन्वेस्ट करने के लिए एक बेकार कंपनी है, लेकिन यह बिल्कुल भी सच नहीं होगा Asset value और market value की तुलना करने के लिए, आप price/book index का यूज़ कर सकते हैं. आसान भाषा में, price/book ratio में, कंपनी के market price को total assets से divide कर, liabilities को minus किया जाता है. अच्छी डील ढूंढ़ने वाले लोग उन कंपनियों को ढूंढना चाहते हैं, जिनका बुक प्राइस ratio एक या उससे भी कम है. Price/book ratio के कम होने का मतलब है कि किसी कंपनी की total assets, जो कम्पनी के शार मा भी दियान नती है रगती लग कागत Price/book ratio के कम होने का मतलब है कि किसी कंपनी की total assets, जो कम्पनी के उधार का भी हिसाब रखती है, उसकी वैल्यू कागज पर दिखाए गए वैल्यू से कहीं ज़्यादा होती है. यही वो कंपनियां हैं जिनकी आप तलाश कर रहे हैं, और जिनकी वाकई में काफी वैल्यू हैं, लेकिन पब्लिक इसके बारे में नहीं जानती. मैंने एक बार अंकल जॉन से पूछा कि वह टेक कंपनियों में इन्वेस्ट करने के बारे में क्या सोचते हैं. मुझे उनसे यह सवाल पूछने का अफसोस है. जवाब में उन्होंने एक कहानी सुनाई. उन्होंने बताया याद है कि जब वह छोटे थे, वह सड़क पार कर एक घर के आँगन की ओर भागे जहाँ भीड़ जमा थी. घर का मालिक अंदर गया और एक स्विच को झटका दिया जिससे पूरा घर जगमगा उठा और सभी लोग खुशी से झूम उठे. यह था इलेक्ट्रिसिटी का फैलना, कहानी सुनाने के बाद, अंकल जॉन ने मुझे कई फाइनेंसियल मार्केट के bubble यानी बुलबुले के बारे में बताया. मार्केट bubble एक ऐसी घटना है जब कीमतें बढ़ जाती है और उसके बाद अचानक मार्केट क्रैश हो जाता है. ऐसे टेक मार्केट के bubble में वायरलेस रेडियो कम्युनिकेशन से लेकर टेलीविज़न, कार जैसे bubble शामिल हैं. टेक इंडस्ट्री के साथ अक्सर यह होता है कि पब्लिक इनके शुरु होने से पहले ही इसे ओवरवैल्यू केटेगरी में पहुंचा देते है. वैसे, हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि ऑटोमोबाइल और इंटरनेट ने दुनिया को पूरी तरह से ओवरवैल्यू केटेगरी में पहुंचा देते है. वैसे, हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि ऑटोमोबाइल और इंटरनेट ने दुनिया को पूरी तरह से बदल दिया है. लेकिन एक डील ढूंढ़ते हुए आपको सिर्फ यह जानना है कि क्या यह ओवरवैल्यू केटेगरी में है या नहीं, जोकि ज्यादातर होते हैं. यहां तक कि महान साइंटिस्ट आइजैक न्यूटन भी मार्केट bubble का शिकार हो गए थे और अपना काफी पैसा खो दिया था. तो क्या आपको टेक कंपनियों में बिल्कुल भी इन्वेस्ट नहीं करना चाहिए? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. आपको जरूर इन्वेस्ट करना चाहिए, लेकिन कैसे? 1999 के क्रिसमस के दौरान, अंकल जॉन ने मुझे टेक्नोलॉजी के शेयरों की एक लिस्ट भेजी, जिसमें उन्होंने उसे short sell करने के लिए कहा था. शॉर्ट सेलिंग एक ऐसी टेक्निक है जिसमें स्टॉक की कीमत बढ़ने के बजाय उसके गिरने की उम्मीद की जाती है. आप अपने ब्रोकर को बताते हैं कि आप किन शेयरों की short selling करना चाहते हैं. ब्रोकर इन शेयरों को आपकी ओर से किसी और से उधार लेता है; आप इन शेयरों के मालिक नहीं होते. फिर इन शेयरों को फ़ौरन बेच दिया जाता है. लेकिन आप अपने कर्जदार को क्या लौटाएंगे? इस technique में मार्केट में गिरावट आने के बाद अब आपका प्लान उन्हीं शेयरों को खरीदने का होता हैं. इसलिए आप उन शेयरों के गिरने की उम्मीद रखते हैं. आप इन स्टॉक को ज़्यादा कीमत पर बेचते हैं और उन्हें उनके मालिक को वापस देने के लिए कम कीमत पर या नहीं, जोकि ज्यादातर होते हैं. यहां तक कि महान साइंटिस्ट आइजैक न्यूटन भी मार्केट bubble का शिकार हो गए थे और अपना काफी पैसा खो दिया था. तो क्या आपको टेक कंपनियों में बिल्कुल भी इन्वेस्ट नहीं करना चाहिए? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. आपको जरूर इन्वेस्ट करना चाहिए, लेकिन कैसे? 1999 के क्रिसमस के दौरान, अंकल जॉन ने मुझे टेक्नोलॉजी के शेयरों की एक लिस्ट भेजी, जिसमें उन्होंने उसे short sell करने के लिए कहा था. शॉर्ट सेलिंग एक ऐसी टेक्निक है जिसमें स्टॉक की कीमत बढ़ने के बजाय उसके गिरने की उम्मीद की जाती है. आप अपने ब्रोकर को बताते हैं कि आप किन शेयरों की short selling करना चाहते हैं. ब्रोकर इन शेयरों को आपकी ओर से किसी और से उधार लेता है; आप इन शेयरों के मालिक नहीं होते. फिर इन शेयरों को फ़ौरन बेच दिया जाता है. लेकिन आप अपने कर्जदार को क्या लौटाएंगे? इस technique में मार्केट में गिरावट आने के बाद अब आपका प्लान उन्हीं शेयरों को खरीदने का होता हैं. इसलिए आप उन शेयरों के गिरने की उम्मीद रखते हैं. आप इन स्टॉक को ज़्यादा कीमत पर बेचते हैं और उन्हें उनके मालिक को वापस देने के लिए कम कीमत पर फिर से खरीदते हैं. इसके बीच में आपको प्रॉफिट होता है. A < Investing the Templeton Way: The Market-Beatin… Lauren Templeton and Scott Phillips क्राइसिस का मतलब हैं मौका यह चैप्टर बताता है कि हम किसी भी क्राइसिस और panic selling को अपना फायदा बना सकते हैं. लॉरेन टेम्पलटन एशिया के फाइनेंशियल क्राइसिस के बारे में भी बात करते हैं जहां से उन्होंने सबक भी सीखा था. मार्केट के बारे में एक पुरानी कहावत है, “जब सड़कों पर खून हो, खरीदारी करने का वही सबसे सही मौका होता हैं.” यहाँ, खून से मतलब किसी खून खराबे से नहीं बल्कि मार्केट के क्राइसिस से है जिससे लोगों को डर लगता हैं. लोग अक्सर शार्ट-टर्म के बारे में सोचते हैं और किसी भी क्राइसिस में शेयर बेचने को मजबूर हो जाते हैं. 17 September को न्यूयॉर्क में हुए हमले में यही हुआ था. मार्केट 17 सितंबर को खुला और सभी ने इस क्राइसिस से घबराते हुए अपने शेयर को बेचना शुरू कर दिया. यह बात अंकल जॉन ने बहुत पहले ही समझ ली थी. वह जानते थे कि कैसे शार्ट-टर्म नज़रिए ने लोगों को गलत फैसला लेने पर मजबूर किया था और वह इस मौके का फायदा उठा सकते थे. आपको भी ऐसे मौकों को पहचानना चाहिए. ये एक पॉलिटिकल घटना हो सकती हैं जैसे कि कोर्ट तंग गा निगी देश के तट माक का फायदा उठा सकत थ. आपका भा एस माका को पहचानना चाहिए. ये एक पॉलिटिकल घटना हो सकती हैं जैसे कि कोई जंग या किसी देश के गवर्नमेंट के लिए खतरा. नेगेटिव खबरें पॉजिटिव खबरों से ज्यादा मीडिया को अपनी तरफ खींचते हैं. नेगेटिव न्यूज़ की वजह से लोग घबराहट में अपने शेयर बेचना शुरू कर देते हैं, और यही आपके लिए एक मौका होता है. एक और चीज जिसके बारे में आपको पता होना चाहिए और उससे सबक लेना चाहिए, वह है एशिया का फाइनेंसियल क्राइसिस. 1997 में एशिया में फाइनेंसियल क्राइसिस आया. इसकी शुरुआत थाईलैंड की करेंसी के devaluation से हुई. अमेरिका द्वारा दिए गए लोन बढ़ते ही रहे, और बहुत से बैंक दिवालिया हो गए. थाईलैंड कर्ज में डूब गया. ज़्यादातर एशिया के देशों में असल में बाहर से बहुत ज़्यादा इन्वेस्टमेंट हुए थे और देश में बहुत ज़्यादा पैसा आया था. इसके कारण देश में ओवर डेवलपमेंट हुआ था . ओवर डेवलपमेंट होने की वजह से इतना return generate नहीं हो पाया था कि उसे पैसा लगाने वाले इन्वेस्टर्स को दिया जा सके. नतीजा ये हुआ कि इन देशों ने बेचना शुरू किया और इन्वेस्टर्स ने भी अपना पैसा निकाल लिया. इसका शिकार हुए सभी एशियाई देशों में से, साउथ कोरिया ने अंकल जॉन का ध्यान अपनी ओर खींचा. साउथ कोरिया की इकॉनमी जापान के बराबर ही थी. जापान की ही तरह, यह ऐसा देश था जिसने खुद नोटोनाग विटारिया 97 होमों पानी जापान की ही तरह, यह ऐसा देश था जिसने खुद को दोबारा खड़ा किया था. ये दोनों देश गरीबी से निकलकर एक इंडस्ट्रियल पावर बन गए थे. गरीबी से निकलने के लिए दोनों देशों ने दो बातों पर ध्यान दिया. पहला, उन्होंने अपने इन्वेस्टर का पैसा लौटाने के लिए भारी सेविंग की और दूसरा कि वे एक्सपोर्ट करना चाहते थे. लेकिन एक जैसे बैकग्राउंड के बावजूद, अंकल जॉन ने कभी साउथ कोरिया में इन्वेस्टमेंट नहीं की. इसके पीछे वजह थी साउथ कोरिया की अपने फाइनेंसियल मार्केट में सीमित पहुँच. 1992 के बाद ही foreign investors को देश में पैसा लगाने की परसमीशन मिली. साउथ कोरिया के लोगों को भी विदेशों से पैसे उधार लेने की इज़ाज़त नहीं थी. ऐसे देश में इन्वेस्ट करना काफी रिस्की होता है. साउथ कोरिया में इन्वेस्ट करने के लिए अंकल जॉन ने एक अलग स्ट्रेटेजी बनाई. साउथ कोरिया के गिरे हुए मार्केट में पैसे लगाने के लिए उन्होंने म्यूचुअल फंड को चुना. आप भी ऐसा कर सकते हैं. आपको बस एक सही म्यूचुअल फंड मैनेजर को ढूंढना है जो आपके जैसा ही सोचता हो. म्यूचुअल फंड में इन्वेस्ट करने के लिए यही स्ट्रेटेजी होनी चाहिए. यह शख्स ऐसा होना चाहिए जो आपकी टेक्निक को ही आगे बढ़ाए. ये शख्स आपके पहले से तैयार की गई planning को ठीक से पूरा करे, ज़्यादा रिटर्न की उम्मीद रखने का यही सबसे अच्छा तरीका है. Investing the Templeton Way: The Market-Beatin… Lauren Templeton and Scott Phillips जब बॉन्ड बोरिंग नहीं होते हैं यह चैप्टर बॉन्ड मार्केट के बारे में है और ये भी कि क्या हम इस तरह के इन्वेस्टमेंट अच्छे रिटर्न की उम्मीद कर सकते हैं. इसमें हमें जापान और साउथ कोरिया के बाद अगली बड़ी संभावना के बारे में भी पता चलता है. तो बॉन्ड मार्केट के बारे में क्या है?शुरू करने से पहले, ये जानते हैं कि बॉन्ड क्या होते हैं. बॉन्ड एक तरह का लोन है जो इन्वेस्टर देते हैं और इसके बदले उसे लोन लेने वालों से इंटरेस्ट मिलता है. आपको बॉन्ड के बारे में एक बात जाननी चाहिए: बॉन्ड की कीमत और इंटरेस्ट रेट opposite डायरेक्शन में चलती हैं. अगर बॉन्ड की कीमत बढ़ती हैं, तो इंटरेस्ट रेट नीचे जाता हैं और अगर बॉन्ड की कीमत घटती हैं तो इंटरेस्ट रेट बढ़ जाता हैं. मार्च 2000 में, अंकल जॉन ने बॉन्ड लेने की हिदायत दी. इसकी एक वजह यह भी थी कि अच्छे डील की A इंटरेस्ट रेट बढ़ जाता हैं. मार्च 2000 में, अंकल जॉन ने बॉन्ड लेने की हिदायत दी. इसकी एक वजह यह भी थी कि अच्छे डील की तलाश करने वालों के लिए यही सबसे बेहतरीन ऑप्शन था. मार्केट में ज़्यादा ऑप्शन था ही नहीं. मार्केट बहुत ज़्यादा ओवरवैल्यूड था. इसलिए बॉन्ड लेना ही बेहतर था. दूसरी वजह थी, फेडरल रिजर्व बैंक और अमेरिकी इकॉनमी के ऊपर मंडरा रहे खतरे की तरफ़ उसके रिएक्शन के बीच का रिलेशनशिप. इंटरनेट का bubble लंबे वक्त तक चला. यह तब शुरू हुआ था जब लोग इंटरनेट की शुरुआत में टेक कंपनियों में ज़रूरत से ज़्यादा इन्वेस्ट करने लगे थे जिसकी वजह से ये ओवरवैल्यूड हो गया था. जब इंटरनेट का bubble आखिरकार क्रैश हो गया, तो कई अमरिकियों ने खुद को गरीब महसूस किया और ज्यादा खर्च करना बंद किया. नतीजा यह हुआ कि देश में economic रिसेशन यानि आर्थिक मंदी छा गई. लोगों को खर्च करने के लिए बढ़ावा देने के लिए ,और पैसे को सस्ता बनाने के लिए, अंकल जॉन का मानना था कि फेडरल रिजर्व ज़रूर इंटरेस्ट रेट को कम करेगा और इंटरेस्ट रेट में कमी आती हैं, तो क्या होता हैं? आइए बॉन्ड के बारे जानते है! और इंटरेस्ट रेट में कमी आती हैं, तो क्या होता हैं? आइए बॉन्ड के बारे जानते है! बॉन्ड की कीमत और इंटरेस्ट रेट opposite direction में चलते हैं. अगर इंटरेस्ट रेट कम होंगे, तो इसका मतलब है कि बॉन्ड की कीमत बढ़ने वाली हैं. इसका मतलब हैं ज़्यादा रिटर्न, इस तरह, बॉन्ड न सिर्फ आपके पैसे को सेफ रखने का ऑप्शन हैं, बल्कि यह ज़्यादा कमाई का एक तरीका भी है! अब जबकि हम काफी कुछ सीख चुके हैं तो आपको क्या लगता है कि आप क्या कर सकते हैं? आपको किस ओर देखना चाहिए? याद रखिए कि कैसे अंकल जॉन ने जापान और साउथ कोरिया की ओर रुख किया था? जब एक रिपोर्टर ने उनसे पूछा कि उन्हें कौन से देश में अपने लिए बड़ा मौका दिखता है तो अंकल जॉन ने कहा था -“चाइना”. उनका अंदाज़ा था कि चाइना का हांगकांग के साथ जुड़ना हांगकांग को दुनिया में एक फाइनेंसियल सेंटर बना देगा. तो अंकल जॉन चाइना की ओर क्यों मुड़े? आइए जापान और साउथ कोरिया वापस चलते हैं. तीनों देश काफी बुरे हालात में चले गए थे और उन्होंने खुद को वहां से उबारा था. सेकंड वर्ल्ड वॉर की वजह से जापान को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा. लड़ाई के बाद, जापान ने खुद खुद को वहां से उबारा था. सेकंड वर्ल्ड वॉर की वजह से जापान को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा. लड़ाई के बाद, जापान ने खुद को अपने पैरों पर खड़ा किया, लेकिन इन्वेस्टर उन्हें सीरियसली नहीं ले रहे थे. इसी तरह साउथ कोरिया, कोरियाई वॉर की वजह से बुरी हालत में था. इसने डेवलप्ड देशों की मदद से 1960 के सालों में खुद को फिर से बनाया. जब इसने अपना डेवलपमेंट का सफर शुरू किया था, तो बहुत कम लोग ही इसकी काबिलियत पर भरोसा कर पाए थे. और चाइना के पिछड़ने के पीछे कोई लड़ाई नहीं थी, लेकिन देश की पॉलिटिक्स ने इकॉनमी को कमज़ोर कर दिया था. इसके लिए दो घटनाएं ज़िम्मेदार थीं- ग्रेट लीप फॉरवर्ड और कल्चरल रेवोल्यूशन, जिनके लीडर थे चाइना के फाउंडर लीडर माओ त्से- तुंग (Mao Tse-Tung). 1958 में, माओ ने joint industrial and agricultural development की स्ट्रेटेजी डेवलप की. प्लान था कि सरकार ही एग्रीकल्चर की प्रोसेस देखेगी, और उसमें से आने वाला पैसा स्टील इंडस्ट्री में लगाया जाएगा. इसका मतलब था लोगों की प्राइवेट प्रॉपर्टी पर सरकार का कंट्रोल होना. जैसा कि साहले ठीनगागा पाया है गोवानिय और तारिख नाए जा प्रोसेस देखेगी, और उसमें से आने वाला पैसा स्टील इंडस्ट्री में लगाया जाएगा. इसका मतलब था लोगों की प्राइवेट प्रॉपर्टी पर सरकार का कंट्रोल होना. जैसा कि पहले ही बताया गया है, सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट देशों में जहां फ्री मार्केट नहीं होता है और ना ही प्रॉपर्टी प्राइवेट होती है, वहां इन्वेस्ट करना फायदेमंद नहीं होता. बल्कि, वो देश जहां फ्री मार्केट है और लोग गवर्नमेंट के कंट्रोल के बिना कुछ भी खरीद और बेच सकते है, वहां इन्वेस्ट करना बेहतर ऑप्शन साबित होता है. इसके साथ-साथ, कल्चरल रेवोल्यूशन ने चाइना की इकॉनमी को नुकसान पहुँचाया. रेड गार्ड्स ने माओ को अपना सपोर्ट दिया था, ये वो स्टूडेंट ग्रुप था जिन्होंने माओवादी विचारों का साथ दिया था. इन रेड गार्ड्स को माओवादी विचारों को लोगों तक फ़ैलाने के लिए बेहिसाब authority या पॉवर दी गई. इससे देश की इकोनॉमिक एक्टिविटी बंद हो गई थी. इससे देश और भी बेहाल हो गया था. लेकिन इकॉनमी में गिरावट आने के बाद, जापान और साउथ कोरिया की तरह ही चाइना ने भी अपने इन्वेस्टमेंट में हेल्प के लिए भारी सेविंग्स की. धीरे-धीरे चाइना कैपिटलिस्ट देश बनने की तरफ बड़ा. लेकिन अंकल जॉन जितना चाइना को पसंद करते थे धीरे-धीरे चाइना कैपिटलिस्ट देश बनने की तरफ बड़ा. लेकिन अंकल जॉन जितना चाइना को पसंद करते थे और उसकी तारीफ करते थे, वह उतनी अच्छी डील भी चाहते थे. वह तभी इन्वेस्ट करते थे जब उन्हें दमदार डील मिलती थी, किसी और हालत में नहीं. अंकल जॉन की तरह, अगर आप परफेक्ट डील करना चाहते हैं, तो आपको इन्वेस्टमेंट को दूसरों की तरह नहीं, बल्कि अलग तरह से देखना चाहिए. अपने आप को भीड़ से अलग रखिए और कभी भी भीड़ को कॉपी मत कीजिए. अब तक, आप समझ चुके होंगे कि जब हर कोई शेयर खरीद रहा है, तो आपको शायद शेयर बेचना चाहिए, और जब हर कोई उसे बेच रहा हो, तो आपको उन शेयरों को खरीदना चाहिए. बेहतर परफॉरमेंस के लिए आपको भीड़ से अलग सोचना होगा. कन्क्लूज़न तो इस बुक के ज़रिए लॉरेन टेम्पलटन ने अपने अंकल जॉन टेम्पलटन की कहानियों को सुनाकर ग्लोबल स्टॉक-पिकिंग के बारे में सिखाया. आपने न सिर्फ उनके अंकल के शेयर मार्केट के एक्सपीरियंस के बारे में जाना बल्कि ये समरी आपको ग्लोबल शेयर मार्केट में अपने लिए नए मौके ढूंढ़ने में मत कीजिए. अब तक, आप समझ चुके होंगे कि जब हर कोई शेयर खरीद रहा है, तो आपको शायद शेयर बेचना चाहिए, और जब हर कोई उसे बेच रहा हो, तो आपको उन शेयरों को खरीदना चाहिए. बेहतर परफॉरमेंस के लिए आपको भीड़ से अलग सोचना होगा. कन्क्लूज़न तो इस बुक के ज़रिए लॉरेन टेम्पलटन ने अपने अंकल जॉन टेम्पलटन की कहानियों को सुनाकर ग्लोबल स्टॉक-पिकिंग के बारे में सिखाया. आपने न सिर्फ उनके अंकल के शेयर मार्केट के एक्सपीरियंस के बारे में जाना बल्कि ये समरी आपको ग्लोबल शेयर मार्केट में अपने लिए नए मौके ढूंढ़ने में आपकी हेल्प भी करती है. इस समरी ने आपको कई नए टर्स और स्ट्रेटेजी के बारे में बताया जो आपको ज़रूर अच्छे रिटर्न देने में मदद करेंगे! अब आप ग्लोबल शेयर मार्केट में ट्रेड करने के लिए पहले से कहीं ज़्यादा तैयार हैं!

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