Inflection Point: How the Convergence of Cloud, M… Scott A. Stawski Books In Hindi Summary Pdf

Inflection Point: How the Convergence of Cloud, M… Scott A. Stawski इंट्रोडक्शन बिज़नेस वर्ल्ड में बड़ी तेज़ी से बदलाव आ रहा है. यहाँ हमेशा ही ऐसी अनप्रेडिक्टेबल चीज़े हो जाती है जिसके बारे में इंसान सोच भी नहीं सकता और पूरा बिज़नेस सिनेरियो ही बदल जाता है. ये बदलाव किसी भी तरह के हो सकते है चाहे वो कोई महामारी हो या नए कॉम्पटीटर या फिर नई टेक्नोलोज़ी के आने से हो. अब जैसे एक्जाम्पल के लिए कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को और बिज़नेस इंडस्ट्री को बुरी तरह से अफेक्ट किया है. आज लगभग हर सेक्टर के लोग वर्क फ्रॉम होम कर रहे है, खासकर आईटी इंडस्ट्री में काम करने वाले. इससे पता चलता है कि टेक्नोलोजी ने आज हमारी लाइफ कितनी चेंज कर दी है. ये इन्फ्लेक्शन पॉइंट का एक एक्जाम्पल है. कोई एक इवेंट या कुछ रीलेटेड इवेंट्स जो एक बहुत बड़ा फ़र्क लेकर आते हैं, ये उसका एक्जाम्पल है. ये बदलाव किसी भी कंपनी में, इंडस्ट्री या देश में हो सकते है. ऐसे में कुछ बिज़नेस तो टॉप पर पहुँच जाते है, जबकि बाकि पीछे रह जाते है. इन्फ्लेक्शन पॉइंट के हिसाब से आपका रीस्पोंस तय करेगा कि फ्यूचर में आपका बिज़नेस कैसा रहेगा. अब जैसे इन्फोर्मेशन टेक्नोलोज़ी (आईटी) इन्फ्लेक्शन YA-TITOT में 11 ये बदलाव किसी भी कंपनी में, इंडस्ट्री या देश में हो सकते है. ऐसे में कुछ बिज़नेस तो टॉप पर पहुँच जाते है, जबकि बाकि पीछे रह जाते है. इन्फ्लेक्शन पॉइंट के हिसाब से आपका रीस्पोंस तय करेगा कि फ्यूचर में आपका बिज़नेस कैसा रहेगा. अब जैसे इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी (आईटी) इन्फ्लेक्शन पॉइंटके हिसाब से इम्पोर्टेन्ट है. ये साथ में कैसे काम करेगी, इसका असर बिज़नेस और बिज़नेस मॉडल्स को अफेक्ट करेगा. क्लाउड कंप्यूटिंग, मोबिलिटी और एप्स की वजह से आज कंज्यूमर्स जो चाहते है वो कर सकते है और सबसे इम्पोर्टेट बात ये है कि उन्हें जो चाहिए, वो उन्हें घर बैठे-बिठाए आराम से मिल रहा है. इसका सोल्यूशन है आईटी. आज कोई भी बिज़नेस आईटी सिस्टम को सही तरीके से अपनाकर अपने बिज़नेस को ऊंचाइयो पर ले जा सकता है और प्रोडक्ट या सर्विस डिलीवर कर सकता है. इस समरी में आप जानेंगे कि आने वाले समय में आईटी डिपार्टमेंट काफी अलग होने वाले हैं वो पहले की तरह किसी कंपनी के सिर्फ डेटा सेंटर बनकर नहीं रहेंगे. उन्हें अपना सिस्टम बनाने और चलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी बल्कि वो क्लाउड कंप्यूटिंग, मोबिलिटी और एप्स यूज़ करके कंपनी को और भी एफिशिएंट तरीके से चलाने में मदद करेंगे. आप ये भी जानेंगे कि बिजनेस कैसे इन्फ्लेक्शन पॉइंटका strategically सामना कर सकते हैं. Inflection Point: How the Convergence of Cloud, M… Scott A. Stawski Intellectual “Ditch Bag” इन्फ्लेक्शन पॉइंट किसी भी कंपनी का फ्यूचर बना या बिगाड़ सकते है. अगर कंपनीज़ एडाप्ट करने में फेल होती है तो उन्हें बिज़नेस से हाथ धोना पड़ सकता है. लेकिन इन्फ्लेक्शन पॉइंट पलक झपकते ही हो जाता है जो पूरे मार्केट, सेक्टर या देश को अस्त-व्यस्त कर सकता है. इससे काफी बड़े-बड़े बदलाव आ सकते है. तो ऐसे में बिजनेस खुद को कैसे तैयार रखे और कैसे इन बदलावों की ओर रीस्पोंड करे? हर कंपनी जो इन्फ्लेक्शन पॉइंट फेस कर रही है, उसके पास एक इंटेलेक्चुअल डिच बैग होना चाहिए. डिच बैग यानि बैकअप टूल्स और इक्विपमेंट. इसमें वो चीज़े शामिल है जो आपको तब चाहिए जब आप किसी मुश्किल वक़्त या क्राइसिस का सामना कर हो. अब जैसे एक्जाम्पल के लिए एक्सपर्ट sailor के पास हमेशा डिच बैग होता है, चाहे वो कितने भी स्किल्ड या एक्सपर्ट क्यों ना हो. इस डिच बैग में उनका खाना, पानी, रेडियो और जीपीएस वगैरह होता है. अगर सेलर को कोई इमरजेंसी आ जाए तो उन्हें अपनी बोट छोडनी पड़ सकती है. हालाँकि सेलर डिच बैग अपने साथ ज़रूर लेकर जाएगा क्योंकि ज़िन्दा रहने के लिए यही उसके काम आएगा . 4- A ਰਜਜ ਹੈ ? घाना 4 सपा.हा4 HO I७५५५ साथ ज़रूर लेकर जाएगा क्योंकि ज़िन्दा रहने के लिए यही उसके काम आएगा. कंपनीज़ के लिए एक इंटेलेक्चुअल डिच बैग में तीन चीजें होनी चाहिए. ये वो चीज़े है जो आपकी कंपनी को इन्फ्लेक्शन पॉइंट सर्वाइव करने में हेल्प करेंगी. ये है core competency, competitive advantage i continual transformation environment. तो कोर कॉम्पटीटेंसी किसी भी कंपनी में स्किल्स और रिसोर्सेज का एक परफेक्ट कॉम्बिनेशन होता है जो उस बिज़नेस को सबसे अलग यानि यूनिक बनाता है. जैसे नाइकी की कोर कॉम्पीटेंसी है स्पोर्ट्स शूज़ और स्पोर्ट्स वेयर. ह्यूलेट पैकार्ड की कोर कॉम्पीटेंसी है इन्फोर्मेशन टेक्नोलोज़ी और कंप्यूटर. तो एक बिज़नेस की कोर कॉम्पीटेंसी उसे बाकि बिजनेस से अलग करती है. उसे अपने कॉम्पटीटर से हटकर बनाती है. कोर कॉम्पीटेंसी में तीन क्राइटेरिया होने ज़रूरी है. पहला, आप कई प्रोडक्टया सर्विसदे सकते हो. दूसरा, आपकी सर्विसऐसी हो जो कस्टमर को ख़ासतौर पर हेल्प करे. तीसरी चीज़, आपकी सर्विस कोई दूसरा ईजिली कॉपी ना कर पाए. अब हौंडा को ही ले लीजिए. हौंडा की कोर कॉम्पीटेंसी है इंजन को डिजाईन और क्रिएट करना. इसे यूज़ करके वो कई प्रोडक्ट बना सकते है जिसमें कार, मोटरसाइकल, बोट यहाँ तक कि बगीचे की घास काटने की मशीन भी बनाते है. ये लोग generator डेवलप कर सकते है क्योंकि ये सारे आइटम इंजिन पर डिपेंडेंट मोटरसाइकल, बोट यहाँ तक कि बगीचे की घास काटने की मशीन भी बनाते है. ये लोग generator डेवलप कर सकते है क्योंकि ये सारे आइटम इंजिन पर डिपेंडेंट होते हैं. हौंडा की एक्सपर्टीज़ असल में इंजिन ही है. इसलिए उनकी एक्सपर्टीज़ आसानी से कोई कॉपी नहीं कर सकता और यही चीज़ उन्हें अपने कॉम्पटीटर से अलग करती है. कोर कॉम्पटीटेंसी ऐसी को समय के साथ इम्प्रूव करते रहना चाहिए नाकि एक ही दिन में उसे पूरी तरह बदला जाना चाहिए. अपनी कोर कॉम्पटीटेंसी पर फ़ोकस करने से बिजनेस खुद को इन्फ्लेक्शन पॉइंट के लिए तैयार कर सकते है ताकि जब मार्केट में चेंजेस आए तो ये चीज़ उन्हें सर्वाइव करने में हेल्प कर सके. दूसरा है कॉम्पटीटिव एडवांटेज. सही रीसोर्सेज़ के साथ बिज़नेस को एक कॉम्पटीटिव एडवांटेज मिलता है. कॉम्पटीटिव एडवांटेज उन्हें अपने कॉम्पटीटर को पछाड़ने में हेल्प करता है. तीन चीज़े है जो बिजनेस को कॉम्पटीटिव एडवांटेज प्रोवाइड कर सकती हैजो है नैचुरल रीसोर्सेज, स्किल्ड एम्प्लोईज़ और नई टेक्नोलोज़ी तक पहुँच. कंपनियों को चाहिए कि वो कॉम्पटीटिव एडवांटेज बनाने और उसे मेंटेन करने पर फ़ोकस करे जिसका मतलब है कि वो फ्यूचर में आने वाले चेंजेस को देख पा रहे हैं. फ्यूचर में बदलाव कुछ भी हो सकते है जैसे कोई और कंपनी उन्हें कॉम्पटीशन देने मार्केट में आ जाए. इसलिए आगे के बारे में सोचने का अप्रोच लेकर कोई और कंपनी उन्हें कॉम्पटीशन देने मार्केट में आ जाए. इसलिए आगे के बारे में सोचने का अप्रोच लेकर चलना जरूरी है जिससे कि कंपनी मार्केट में अपनी लीडरशिप मेंटेन रख सके. तीसरी चीज़ है continual transformation environment या CTE (सीटीई). इंटेलेक्चुअल डिच बैग का ये लास्ट कोम्पोनेंट है. सीटीई बिजनेस को फ्लेक्सीबिलिटी, ट्रांसफोर्मेशन और इनोवेशन पर फ़ोकस करने में हेल्प करता है जो कोर कॉम्पटीटेंसी को लगातार इम्प्रूव करते रहते है जिससे कि कंपनी किसी भी तरह के चेंजेस की तरफ तुरंत respond कर सके. इससे वो फ्लेक्सीबल हो जाती है ताकि मार्केट में होने वाले चेंजेस के अनुसार खुद को ढाल सके. इस बुक के ऑथर स्कॉट “द शिकागो ट्रिब्यून” में एक कन्सल्टेंट हुआ करते थे जो एक वर्ल्ड फेमस न्यूज़पेपर है जिसकी शुरुवात 1847 में हुई थी. इसमें कई पोपुलर राईटर के आर्टिकल पब्लिश होते है. यही नहीं इस न्यूज़पेपर को जर्नलिज्म बिज़नेस में एक्स्ट्राऑर्डिनरी परफॉरमेंस के लिए अब तक 25 पुलित्जर प्राइज मिल चुके है. ट्रिब्यून जिसने इतने सालों में लगातार अपनी एक पहचान बनाई है, आज एक बड़ा मीडिया कॉर्पोरशन बन चुका है. इसे आज “द ट्रिब्यून कंपनी” के नाम से जाना जाता है. इनके अपने 39 टीवी स्टेशन है, नौ न्यूज़पेपर है और शिकागो कब्स बेसबाल टीम भी इनकी ही है. 2008, में स्कॉट ने ट्रिब्यून कंपनी की हेल्प करने के न्यूज़पपर है आर शिकागा कब्स बसबाल टाम भा इनकी ही है. 2008, में स्कॉट ने ट्रिब्यून कंपनी की हेल्प करने के लिए कंपनी ज्वाइन की. आज की 21st सेंचुरी में जहाँ हर चीज़ डिज़िटल होती जा रही है, ऐसे में न्यूज़पेपर इंडस्ट्री के सामने एक बड़ा कॉम्पटीशन है जहाँ उनके लिए मार्केट में सर्वाइव करना मुश्किल होता जा रहा हैक्योंकि आज इंटरनेट सबसे पोपुलर सोर्स ऑफ़ इन्फोर्मेशन के तौर पर तेज़ी से उभर रहा है. ऐसे में स्कॉट ने ट्रिब्यून कंपनी को अपना इंटलेक्चुअल डिच बैग यूज़ करने की सलाह दी. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कंपनी को अपनी कोर कॉम्पीटेंसी, कॉम्पटीटिव एडवांटेज और CTE पर फ़ोकस करना चाहिए. उन्होंने एडवाइज़ दी कि जो न्यूज़पेपर ट्रिब्यून कंपनी के अंडर में चल रहे है, उन्हें अपने कंटेंट पर फोकस करना चाहिए क्योंकि कंटेंट ही उनकी कोर कॉम्पटीटेंसी है, चाहे उसे प्रिंट में डिलीवर किया जाए या डिज़िटल में, इससे फर्क नहीं पड़ता. दूसरे शब्दों में कहे तो कंटेंट ही कंपनी की असली प्रायोरीटी होनी चाहिए. इसका मतलब कि उनकी नॉन कोर कॉम्पीटेंसी वाली चीजें आउटसोर्स की जानी चाहिए—जैसे एक्जाम्पल के लिए फाईनेंसिंग, एकाउंटिंग और प्रिंटिंग. स्कॉट ने न्यूज़पेपर को एडवाइस दी कि इसके लिए उन्हें ट्रिब्यून से बाहर की सर्विस हायर करनी चाहिए. जो काम कंटेंट से डायरेक्टली जुड़ा हुआ नहीं है उसे आउटसोर्स करने में ही समझदारी है. तो ये कुछ स्टेप्स उन्होंने एडवाइज़ दी कि जो न्यूज़पेपर ट्रिब्यून कंपनी के अंडर में चल रहे है, उन्हें अपने कंटेंट पर फोकस करना चाहिए क्योंकि कंटेंट ही उनकी कोर कॉम्पटीटेंसी है, चाहे उसे प्रिंट में डिलीवर किया जाए या डिज़िटल में, इससे फर्क नहीं पड़ता. दूसरे शब्दों में कहे तो कंटेंट ही कंपनी की असली प्रायोरीटी होनी चाहिए. इसका मतलब कि उनकी नॉन कोर कॉम्पीटेंसी वाली चीजें आउटसोर्स की जानी चाहिए—जैसे एक्जाम्पल के लिए फाईनेंसिंग, एकाउंटिंग और प्रिंटिंग. स्कॉट ने न्यूज़पेपर को एडवाइस दी कि इसके लिए उन्हें ट्रिब्यून से बाहर की सर्विस हायर करनी चाहिए. जो काम कंटेंट से डायरेक्टली जुड़ा हुआ नहीं है उसे आउटसोर्स करने में ही समझदारी है. तो ये कुछ स्टेप्स थे जो इन्फ्लेक्शन पॉइंट से बचने के लिए ट्रिब्यून कंपनी को लेने की जरूरत थी. हालाँकि ट्रिब्यून ने तुरंत उनकी सलाह पर अमल नहीं किया. 2008, में ट्रिब्यून ने दिवालिया होने से बचने के लिए बैंकरप्सी प्रोटेक्शन के लिए फाइल कर दिया था, उनके 150 से भी ज्यादा लीडिंग न्यूज़पेपर आउट ऑफ़ बिज़नेस होने को मजबूर हो गए थे. कंपनी टेक्नोलोज़ी का इन्फ्लेक्शन पॉइंट सर्वाइव नहीं कर पाई थी-यानि इंटरनेट. अभी प्रेजेंट में ट्रिब्यून मीडियादिवालियापन की कगार से बाहर आ चुकी है और अब एक नए मैनेजमेंट के अंडर काम कर रही है. Inflection Point: How the Convergence of Cloud, M… Scott A. Stawski Cloud Computing अगर आप चाहते है कि आपका बिज़नेस फले-फूले तो क्लाउड कंप्यूटिंग का एडवांटेज लेना शुरू कर दो. लेकिन ये क्लाउड कंप्यूटिंग आखिर है क्या? क्लाउड कंप्यूटिंग यानि कंप्यूटिंग सर्विस को इंटरनेट के श्रू एक्सेस करना. इसमें फिर आपको अपने डिवाइस में डेटा स्टोर करने की जरूरत नहीं पड़ती यानि आप जब चाहे कहीं भी, कभी भी किसी भी फाइल को एक्सेस कर सकते हो. क्लाउड कंप्यूटिंग ने ट्रेडिशनल डेटा सेंटर की जगह ले ली है. आपको अब ऐसी किसी साईट की जरूरत नहीं पड़ेगी जिसमे कई सारे सर्वर या कंप्यूटर लगे हो. आपको खुद ये सब मैनेज नहीं करना पड़ेगा और डेटा क्लाउड में होने की वजह से किसी हार्डवेयर की जरूरत भी नहीं है. इससे आपका एक्स्ट्रा खर्च तो बचेगा ही, साथ में इलेक्ट्रिसिटी चले जाने या लिमिटेड कैपेसिटी जैसी प्रॉब्लम भी नहीं आएगी क्योंकि क्लाउड साइज़ में बढ़ाए या घटाए जा सकते है. ये आपकी ज़रुरत पर डिपेंड करता है यानी जितना आप इसे यूज़ करोगे, उतना ही आपको पे करना होगा. क्लाउड की हेल्प से आप per consumption के हिसाब से पे करते टोसे ने नि. निगा और भी शिांत उतना हा आपकाप करना होगा. क्लाउड का हल्प स आप per consumption के हिसाब से पे करते हो जो आपके बिज़नेस के लिए और भी एफिशिएंट साबित होता है इसलिए हमेशा अपना एप्लीकेशन क्लाउड में चलाना चाहिए. जैसे कि मान लो आपने अपनी कंपनी के लिए कोई Google suite खरीदा तो गूगल पर word एप्लीकेशन यूज़ करने से आपका सारा काम सेव और सिक्योर रहेगा. अगर पॉवर चली भी जाती है तो भी आपकी कोई फाइल डिलीट या डैमेज़ नहीं होगी. आईटी डिपार्टमेंट का काम अब सिर्फ कंप्यूटर या हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर खरीदने तक सीमित नहीं होगा बल्कि आईटी डिपार्टमेंट अब सर्विसका इकोसिस्टमऑनलाइन मैनेज किया करेंगे. इन सर्विसेज़ के अंडर क्लाउड कंप्यूटिंग, मोबाइल सॉफ्टवेयर और एप्लीकेश्न आते है. जैसे एक्जाम्पल के लिए पहले प्रिंटिंग बड़ा मुश्किल काम हुआ करता था. प्रिंटर को सेट करने में ही अच्छा-खासा टाइम लग जाता था पर अब टिपिकल प्रिंटर आपके घर के वाई-फाई से कनेक्ट हो सकता है, उसके बाद आप उसे तुरंत यूज़ कर सकते हो यानि मशीन सेट करने का टाइम और झंझट दोनों बच गए. अब कंपनियों के लिए जरूरी नहीं है कि उनके पास खुद के डेटा सेंटर हो. डेटा सेंटर एक फिजिकल साईट को बोलते है जहाँ मल्टीपल सर्वर लगे होते है, यहाँ पर आपके काम से रिलेटेड सारा डेटा स्टोर रहता है. जो कुछ आप ऑफिस सॉफ्टवेयर में करते हो, उन सबकी पालोन टोपी के निशान के गाटा में का बालत ह जहा मल्टापल सवर लग हात ह, यहा पर आपके काम से रिलेटेड सारा डेटा स्टोर रहता है. जो कुछ आप ऑफिस सॉफ्टवेयर में करते हो, उन सबकी यहाँ पर स्टोरेज होती है. लेकिन आज के टाइम में फिजिकल साईट की अब और जरूरत नहीं रह गई है. उससे भी बैटर फेसिलिटी आजकल आपको ये मिल जाती है कि अगर आप डेटा खुद हैंडल नहीं करना चाहते तो आप क्लाउड कंप्यूटिंग सर्विस आउटसोर्स कर सकते हो. इसके लिए आपको बस एक क्लाउड कंप्यूटिंग कंपनी को हायर करने की जरूरत है जिससे कि आपका पूरा फ़ोकस अपने कोर कॉम्पीटेंसी पर रहे. बदले में आप इंडस्ट्री के इन्फ्लेक्शन पॉइंट के लिए बेहतर तरीके से तैयार रह पाएँगे. आपके एम्प्लोईज़ कैसे अपने आउटपुट शेयर कर सकते है और कैसे दूसरे एम्प्लोईज़ के आउटपुट देख सकते है, इसके लिए दो टाइप के क्लाउड डिप्लोयमेंट मॉडलहोते है. ये है पब्लिक क्लाउड और प्राइवेट क्लाउड. ये दोनों कैसे काम करते है, इसे समझने के बाद ही आपको डिसाइड करना चाहिए कि आपकी कंपनी के लिए कौन सा बेस्ट रहेगा. पहला है पब्लिक क्लाउड, ये सबसे कॉमन टाइप का क्लाउड डिप्लॉयमेंट है. कई कंज्यूमर्स शायद इससे वाकिफ होंगे. ये शेयर्ड रीसोर्सेज़ यूज़ करके क्लाउड सर्विस प्रोवाइड कराता है. इसे आप पब्लिक नेटवर्क जैसे कि इंटरनेट के धू भी एक्सेस कर सकते हो. मल्टीपल क्लाइंट्स पब्लिक क्लाउड एक्सेस करते ਹੈ ਸ਼ੋ ਸੇ ਸ਼ਰਤ ਹੀ ਹੈ ਰ ਧ ਤੋਂ क्लाउड. ये दोनों कैसे काम करते है, इसे समझने के बाद ही आपको डिसाइड करना चाहिए कि आपकी कंपनी के लिए कौन सा बेस्ट रहेगा. पहला है पब्लिक क्लाउड, ये सबसे कॉमन टाइप का क्लाउड डिप्लॉयमेंट है. कई कंज्यूमर्स शायद इससे वाकिफ होंगे. ये शेयर्ड रीसोर्सेज़ यूज़ करके क्लाउड सर्विस प्रोवाइड कराता है. इसे आप पब्लिक नेटवर्क जैसे कि इंटरनेट के श्रू भी एक्सेस कर सकते हो. मल्टीपल क्लाइंट्स पब्लिक क्लाउड एक्सेस करते है. हालाँकि ये बहुत इफेक्टिव होते है पर आप इन्हें सेंसिटिव डेटा के लिए यूज़ नहीं कर सकते. वो इसलिए क्योंकि मल्टीपल यूजर्स या क्लाइंट इन्हें एक्सेस कर सकते है जो किसी भी तरह की प्राइवेट या इम्पोर्टेन्ट इन्फोमेशन के लिहाज़ से सेफ़ नहीं है. कहने का मतलब है कि ये सिर्फ एक ऑर्गेनाईजेशन के लिए सिक्योर नहीं है. हो सकता है आपकी कंपनी और दूसरी कंपनी इसे सेम टाइम पर यूज़ कर रही हो. पब्लिक क्लाउड के टिपिकल यूज़ में ई-मेल सर्विस और मैसेजिंग आते हैं. दूसरा है प्राइवेट क्लाउड. ये एक सिंगल ऑर्गेनाईजेशन के लिए एक्सक्लूसिव होता है और सेंसिटिव डेटा के लिए ये एक्स्ट्रा सिक्योरिटी भी प्रोवाइड कराते है. सेंसिटिव डेटा में पर्सनल इनफोर्मेशन और हेल्थ इन्फोर्मेशन के डेटा आते है. Inflection Point: How the Convergence of Cloud, M… Scott A. Stawski he Future is Mobile फ्यूचर के आईटी डिपार्टमेंटसिर्फ हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर हैंडल नहीं कर रहे होंगे बल्कि ये ऑनलाइन सर्विस प्रोवाईडर इकोसिस्टमके मैनेजर बन चुके होंगे. जैसे एक्जाम्पल के लिए, ये गूगल suite, ऑरेकल और किसी ऑर्गेनाइजेशन के Salesforce के लिए रीस्पोसिब्ल हुआ करेंगे. इसका मतलब इनके इकोसिस्टम को भी मोबाइल इनेबल्ड होना पड़ेगा. कंपनीज़ को किसी फिजिकल साईट से अटैच नहीं होना चाहिए. दूसरे शब्दों में कहें तो कंपनी का एक ऑफिस होना बहुत जरूरी है. ऑथर स्कॉट इसे जियोग्राफिक एंड डिवाइस इंडीपेंडेट आर्कीटेक्चर या जीडीआईए (CDIA) कहते हैं. बिज़नेस ओनर्स के पास ऐसी फेसिलिटी होनी चाहिए कि वो चाहे किसी भी जगह क्यों ना हो, पर उनका काम ना रुके यानि ऑफिस से दूर रहकर भी उनका काम चलना चाहिए. इसके लिए चाहे कोई भी डिवाइस हो, चाहे फोन हो या कंप्यूटर, फर्क नहीं पड़ता. और ये सब करने के लिए आपको एक स्मूद सिस्टम चाहिए. इसलिए नीचे दिए सिस्टम की जरूरत पड़ेगी: मोबाइल डिवाइस मैनेजमेंट एंड सर्विस ओरिएंटेड आर्कीटेक्चर (SOA). इसके अलावा आपको on 1 AD) ਹਾਰਮੇਸੀ A < पा०९.२सारा ना५।५५ ।सान 40 पा. मोबाइल डिवाइस मैनेजमेंट एंड सर्विस ओरिएंटेड आर्कीटेक्चर (SOA). इसके अलावा आपको एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (API), लाइब्रेरी, मोबाइल मिडलवेयर और सिक्योरिटी भी चाहिए. तो पहले देखते है मोबाइल डिवाइस मैनेजमेंट होता क्या है? ये मल्टीपल फंक्शन वाला एक सॉफ्टवेयर होता है. इसे आप policy, इन्वेंट्री, समार्टफोन और टेबलेट की सिक्योरीटी और सर्विसमैनेज करने के लिए यूज़ कर सकते है. एक अच्छे मोबाइल डिवाइस मैनेजमेंट प्रोग्राम की हेल्प से एम्प्लोईज़ अपने खुद के डिवाइस यूज़ कर सकते है जिससे कि वो अपना काम और ज्यादा एफिशिएंट तरीके से कर पाएं और उन्हें काम करने के लिए अलग से कंप्यूटर की जरूरत ना पड़े. दूसरा है सर्विस ओरिएंटेड आर्किटेक्चर और एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेज (एपीआई) लाइब्रेरी. ये साथ-साथ काम करते है. एप्पल ने जब एप डेवलप करने शुरू किये थे तो उन्होंने डेवलपर्स को एपीआई ऑफर किया था जिसकी हेल्प से डेवलपर एप क्रिएट ‘ कर सकते थे. फिर उन्होंने इन एप्स को एप्ल स्टोर में रखा और उनकी देखा-देखी बाकि कंपनीज़ ने भी यही किया. माइक्रोसॉफ्ट एपीआई ऑफर करता है ताकि डेवलपर उनके सॉफ्टवेयर के लिए एप क्रिएट कर सके. अब कंपनीज़ अपने आईटी और मोबिलिटी सिस्टम के लिए SOA के स्टैण्डर्ड सेट करती है जिससे कि एप ज्यादा ईजिली इंटीगेट किया जा सके यानि टसरे शब्दों में कहे A माइक्रोसॉफ्ट एपीआई ऑफर करता है ताकि डेवलपर उनके सॉफ्टवेयर के लिए एप क्रिएट कर सके. अब कंपनीज़ अपने आईटी और मोबिलिटी सिस्टम के लिए SOA के स्टैण्डर्ड सेट करती है जिससे कि एप ज्यादा ईजिली इंटीग्रेट किया जा सके. यानि दूसरे शब्दों में कहे तो एप एकदम सीमलेस होने चाहिए जहाँ आपको कोई एक्स्ट्रा सेटअप की जरूरत ना पड़े. एक बार कोई एप क्रिएट हो गया तो वो तुरंत कंपनी की आईटी के अंदर काम करने लायक हो जाए. तीसरा है मोबाइल मिडलवेयर. ये एक टाइप का सॉफ्टवेयर है जो इंडीविजुअल एप्स को उनके कॉर्पोरेट एप और सिस्टम से कनेक्ट करता है. इसे एक-दूसरे से बात करने के लिए लेंगुएज़ एप की तरह समझ लो, जैसे एक्जाम्पल के लिए मैसेजिंग सर्विस इनका एक इम्पोर्टेन्ट फंक्शन होता है. चौथा है सिक्योरिटी. मोबाइल की सिक्योरिटी बहुत इम्पोर्टेन्ट होती है. ऑलमोस्ट हर बिज़नेस और कंपनी अपना सारा काम मोबाइल के श्रू ही कर रही है. इसके ज़रिए लोग कम्यूनिकेट करते है और हमारी सारी पर्सनल इन्फोर्मेशन भी हमारे मोबाइल में ही स्टोर होती है. इसलिए आज मोबाइल सिक्योरिटी एक बहुत बड़ा कंसर्न भी बन गया है. जहाँ तक सेंसिटिव इन्फोर्मेशन एक्सेस का सवाल है तो उस पर कण्ट्रोल होना चाहिए जिससे कंपनीज़ और उनके एम्प्लोईज़ दोनों की सिक्योरिटी सेफ़ रहे और ये रीस्पोंसेबिलिटी है कंपनी के आईटी डिपार्टमेंट की. उन्हें डेटा प्राइवेसी के लिए स्टैण्डर्ड क्रिएट करने चाहिए. NA८ उनके एम्प्लोईज़ दोनों की सिक्योरिटी सेफ़ रहे और ये रीस्पोंसेबिलिटी है कंपनी के आईटी डिपार्टमेंट की. उन्हें डेटा प्राइवेसी के लिए स्टैण्डर्ड क्रिएट करने चाहिए. साथ ही वो इतने एफिशिएंट हो कि किसी भी तरह के malware और वाईरस को तुरंत डिटेक्ट कर सके. ज्यादातर चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर (CIO) जानते है कि मोबाइल एप आज की जरूरत है. हालाँकि उनमें से ज्यादातर इस बात पर ध्यान नहीं देते कि इसकी तुरंत ज़रुरत है क्योंकि ये चीज़े जल्द से जल्द इम्प्लीमेंट होनी चाहिए. इन शोर्ट, अगर आपका एप मोबाइल नहीं है तो यानि आप काफी पीछे है. क्लाउड कम्प्यूटिंग, मोबिलिटी और सिक्योरिटी, इन सबको एक साथ कम्बाइन करके आप अप टू डेट रहेंगे और आपको एक स्ट्रोंग CTE क्रिएट करने में भी हेल्प मिलेगी. याद रहे, CTE का होना आपको कॉम्पटीटिव एडवांटेज भी देता है जिससे कि आप कपनी कोर कॉम्पीटेंसी पर फोकस कर सके. इस बुक के ऑथर स्कॉट और उनकी वाइफ ने वाइन बनाने के लिए एक माइक्रो वाइनयार्ड खोलने का डिसीजन लिया. एक माइक्रो वाइनयार्ड दो ACRE ज़मीन जितना बड़ा होता है यानि ये एक हॉबी वाइनयार्ड और एक फुल स्केल बिज़नेस के बीच की चीज़ है. एक तो northern Texas जैसी जगह में वाइन उगाना ही एक बड़ा चेलेंज था और ऊपर से उन्हें ज्यादा हेल्प भी नहीं मिल पा रही थी. तो उन्होंने मोबाइल टेक्नोलोजी की हेल्प लेने की सोची. सबसे पहले स्कॉट ने ऑनलाइन कोर्स किया. उन्होंने चीज़ है. एक तो northern Texas जैसी जगह में वाइन उगाना ही एक बड़ा चेलेंज था और ऊपर से उन्हें ज्यादा हेल्प भी नहीं मिल पा रही थी. तो उन्होंने मोबाइल टेक्नोलोजी की हेल्प लेने की सोची. सबसे पहले स्कॉट ने ऑनलाइन कोर्स किया. उन्होंने विटीकल्चर की सारी बारीकियां सीखी. विटीकल्चर ग्रेपवाइन ग्रो करने का कोर्स है जहाँ आपको साइंटिफिक तरीके से ग्रेपवाइन बनाने का तरीका सिखाया जाता है. बदकिस्मती से स्कॉट काफी बिजी रहते थे, उनके पास किसी यूनिवर्सिटी में जाकर कोर्स करने का टाइम नहीं था तो उन्होंने यूसी डेविस के श्रू ऑनलाइन प्रोग्राम ज्वाइन किया. दूसरी प्रॉब्लम थी कि उन्हें एक ऐसा ग्रेपवाइन ढूँढना था जो उनकी जमीन पर उग सके. उनकी जमीन की मिटटी क्ले बेस्ड थी यानी सख्त चिकनी मिटटी थी और northern टेक्सास का मौसम भी थोडा अलग सा था तो ये उनके लिए एक बड़ा चेलेंज था. तो अब उन्हें एक दूसरा मोबाइल रीसोर्स ढूढना पड़ा. ये वाइनमेकर मैगजीन का डिजिटल वर्जन था. ये मैगजीन कैलिफ़ोर्निया और न्यू यॉर्क में सप्लायर्स प्रोवाइड कराती थी और अपने यूजर्स को काफी वैल्यूएबल इन्फोर्मेशन देती थी. जैसे एक्जाम्पल के लिए ये मैगज़ीन मिट्टी और मौसम के हिसाब से ग्रेपवाइन रेकमंड करती थी. इस इन्फोर्मेशन की वजह से ही स्कॉट को ये डिसीजन लेने में आसानी हुई कि उन्हें अपनी जमीन पर कौन सी ग्रेपवाइन उगानी चाहिए. रेकमंड करती थी. इस इन्फोर्मेशन की वजह से ही स्कॉट को ये डिसीजन लेने में आसानी हुई कि उन्हें अपनी जमीन पर कौन सी ग्रेपवाइन उगानी चाहिए. सारी इन्फोर्मेशन कलेक्ट करने के बाद ही उन्होंने Cabernet Sauvignon, Sauvignon Blanc और Chardonnay vines सिलेक्ट की जो उनकी जमीन और एन्वायरमेंट के हिसाब से एकदम सूट करती थी. तीसरी चीज़, उन्हें कीड़े मकौडों का भी ईलाज़ ढूंढना था. तो स्कॉट को पता चला कि Texas A&M University में एग्रीलाइफ विटीकल्चर और इनोलोज़ी का एक स्कूल है. इनोलोज़ी में वाइन की स्टडी की जाती है और इस तरह स्कॉट को अपने फोन पर ही पेस्टीसाइड स्प्रे करने के लिए एक शेड्यूल रेकमंड कर दिया गया. तो इस तरह टेक्नोलोज़ी की हेल्प से स्कॉट बड़े आराम से अपने वाइनयार्ड को मैनेज कर सकते थे. जैसे कि अगर उन्हें लगे कि उनकी वाइन में कीड़े लग रहे है या वो खराब हो रहे हैं तो उन्हें बस इतना करना था कि वो उसकी पिक्चर लेकर Texas A&M स्कूल को मेल कर देते थे और उन्हें स्कूल के प्रोफेशनल्स की तरफ से रेकमंडेशन मिल जाती थी. वो उन्हें एडवाईज़ देते थे कि ग्रेपवाइन को सही ढंग से कैसे ट्रीट किया जाए. स्कॉट और उनकी वाइफ को कभी वाइनयार्ड छोड़कर जाना ही नहीं पड़ा, उन्हें जो भी हेल्प चाहिए थी, फोन पर एक क्लिक की मदद से पलक झपकते ही मिल जाती थी. ना तो उन्हें किसी साइंटिस्ट के पास कंसल्ट DA ८ की जो उनकी जमीन और एन्वायरमेंट के हिसाब से एकदम सूट करती थी. तीसरी चीज़, उन्हें कीड़े मकौडों का भी ईलाज़ ढूंढना था. तो स्कॉट को पता चला कि Texas A&M University में एग्रीलाइफ विटीकल्चर और इनोलोज़ी का एक स्कूल है. इनोलोज़ी में वाइन की स्टडी की जाती है और इस तरह स्कॉट को अपने फोन पर ही पेस्टीसाइड स्प्रे करने के लिए एक शेड्यूल रेकमंड कर दिया गया. तो इस तरह टेक्नोलोज़ी की हेल्प से स्कॉट बड़े आराम से अपने वाइनयार्ड को मैनेज कर सकते थे. जैसे कि अगर उन्हें लगे कि उनकी वाइन में कीड़े लग रहे है या वो खराब हो रहे हैं तो उन्हें बस इतना करना था कि वो उसकी पिक्चर लेकर Texas A&M स्कूल को मेल कर देते थे और उन्हें स्कूल के प्रोफेशनल्स की तरफ से रेकमंडेशन मिल जाती थी. वो उन्हें एडवाईज़ देते थे कि ग्रेपवाइन को सही ढंग से कैसे ट्रीट किया जाए. स्कॉट और उनकी वाइफ को कभी वाइनयार्ड छोड़कर जाना ही नहीं पड़ा, उन्हें जो भी हेल्प चाहिए थी, फोन पर एक क्लिक की मदद से पलक झपकते ही मिल जाती थी. ना तो उन्हें किसी साइंटिस्ट के पास कंसल्ट करने जाना पड़ा और ना ही कोई प्रोफेशनल कोर्स अटेंड करने की जरूरत पड़ी. घर बैठे-बैठे वो मिटटी, पानी और ग्रेपवाइन की देखभाल कर सकते थे और ये कमाल था मोबाइल टेक्नोलोजी का. Inflection Point: How the Convergence of Cloud, M… Scott A. Stawski The Big Data क्लाउड, मोबिलिटी और app सब कैसे साथ मिलकर काम करते है, ये इस दौर का इन्फ्लेक्शन पॉइंट है जिससे आपके बिज़नेस को बड़े डेटा यूज़ करने में हेल्प मिलती है. बड़ा डेटा से बिजनेस को काफी इन्फोर्मेशन मिलती है जिससे कंपनी को मार्केट को समझने में हेल्प मिलती है. कंज्यूमर्स क्या चाहता है, उनकी ज़रूरतें क्या है, ये सारी इन्फोर्मेशन पलक झपकते ही कंपनी को मिल जाती है. इससे बिजनेस के लिए ये प्रेडिक्ट करना भी ईजी हो जाता है कि मार्केट में आगे क्या होगा. अगले साल कंज्यूमर्स क्या डिमांड करेंगे? आज की सेल की बेसिस पर आने वाले कल की सेल का हिसाब कैसे लगाया जा सकता है ? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब आज के टाइम में बिजनेस को बड़ी जल्दी और ईजिली मिल सकते हैं और ये सब करामात है बिग डेटा की. बिग डेटा की शुरुवात तब हुई थी जब बिजनेस ने कस्टमर्स के बिहेवियर को ट्रेक करना शुरू किया. जैसे कि एक्जाम्पल के लिए” कस्टमर्स कौन सी वेबसाइट All Done? Finished कस्टमर्स के बिहेवियर को ट्रेक करना शुरू किया. जैसे कि एक्जाम्पल के लिए” कस्टमर्स कौन सी वेबसाइट पर जाते है, वहां क्या ढूंढते है और कितना टाइम बिताते है, इसे “क्लिक श्रू डेटा” कहा जाता है. ये चीज़ लगातार ईवोल्व होती जा रही है. ज्यादातर मशीन जो आप यूज़ करते हो, आपके कपडे, कार या मोबाइल सब कनेक्टेड होंगे. जैसे एक्जाम्पल के लिए 2015 में जितनी कार का मेन्यूफेक्चर हुआ सबमें वाई-फाई एनेबल सिस्टम लगा था. आज आप जीपीएस सिस्टम से अपनी गाड़ी की लोकेशन ट्रैक कर सकते हो, अपने पेट्रोल या डीजल की माईलेज़ केलकुलेट कर सकते हो. आप एप डाउनलोड करके पता लगा सकते हो कि आपकी कार अच्छी कंडिशन में है या नहीं, कहीं आपको तेल चेंज की जरूरत तो नहीं है वगैरह-वगैरह. और तो और आपका घर भी इंटीग्रेटेड हो सकता है. जैसे एक्जाम्पल के लिए आपका फ़ोन, अलार्म और कॉफ़ी मशीन सब इंटरनेट से कनेक्ट हो सकते है. आप चाहो तो कॉफ़ी मशीन में अपने हिसाब से कॉफ़ी तैयार करने के लिए टाइम शेड्यूल फिक्स कर सकते हो. फिटनेस watch आपकी हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर यहाँ तक कि आपने कितने स्टेप्स लिए, सबका रिकॉर्ड रखती है. आज हर एक चीज़ इंटरकनेक्टेड है. यही वो यहाँ तक कि आपने कितने स्टेप्स लिए, सबका रिकॉर्ड रखती है. आज हर एक चीज़ इंटरकनेक्टेड है. यही वो चीज़ है जिसे हम इंटरनेट ऑफ थिंग्स कहते है. (IOT). आईओटी काफी बड़े पैमाने पर डेटा प्रोड्यूस करती है. बिग डेटा काफी बड़ा डेटा सेट है जिसे आप पैटर्न, ट्रेंड और एसोशिएंशन एनालाईज करने के लिए यूज़ कर सकते हो. कंपनीज़ इसे अपने कस्टमर्स की ज़रूरतों और डिमांड को समझने के लिए काम में ला सकती है. जैसे कि एक्जाम्पल के लिए फेसबुक अपने करोड़ो यूजर्स का डेटा एनालाईज़ करती है और उस डेटा को यूज़ करके मार्केटिंग को टारगेट करती है. मान लो आप अपना फेसबुक पेज स्क्रोल कर रहे हो और आपके एक फ्रेंड ने पोस्ट किया कि वो अभी स्टारबक्स में है. आपने स्टारबक्स की कॉफ़ी को लाइक किया था तो नेक्स्ट टाइम जब आप फेसबुक ओपन करोगे, आपको अपने होमपेज पर स्टारबक्स के ad नजर आएँगे. दूसरा एक्जाम्पल है शॉपिंग का. मान लो आपने गूगल पर व्हाईट शूज़ सर्च किया. अब आप अपने फेसबुक पेज पर जाओगे तो आपको व्हाईट शूज़ के ad मिलेंगे. ये एक तरीका है जिससे पता चलता है कि कंपनीज़ बिग डेटा यूज़ कर रही है. दूसरा एक्जाम्पल है शॉपिंग का. मान लो आपने गूगल पर व्हाईट शूज़ सर्च किया. अब आप अपने फेसबुक पेज पर जाओगे तो आपको व्हाईट शूज़ के ad मिलेंगे. ये एक तरीका है जिससे पता चलता है कि कंपनीज़ बिग डेटा यूज़ कर रही है. Conclusion तो सबसे पहले अपने इन्फ्लेक्शन पॉइंट के बारे में जाना. जो लोग अपने बिज़नेस को आगे बढ़ाना चाहते है, उन्हें इन्फ्लेक्शन पॉइंट के हिसाब से रीस्पोंड करना सीखना होगा क्योंकि जो बिजनेस रीस्पोंड और एडाप्ट नहीं कर सकते, वो फ्यूचर में सर्वाइव नहीं कर पाएँगे. रीस्पोंड करने के लिए कंपनीज़ को तीन स्पेशिफिक चीज़ों पर फोकस करना होगा जो इंटेलेक्चुअल डिच बैग बनाते है. कोर कोम्पेटेंसी पर फोकस करो यानि अपना सारा फोकस और एफ वहां लगाओ जिसमें आप बेस्ट हो और जिस चीज़ का आपके प्रोडक्ट से कोई लेना-देना नहीं है उस पर मेहनत करना बेकार होगा. अपना कॉम्पटीटिव एडवांटेज ढूंढो. खुद को औरों से यूनिक बनाने के लिए अपनी कोर कॉम्पीटेंसी यूज़ करो. सोचो आपमें ऐसी कौन सी यूनिक स्किल है, आप किसमें एक्सपर्ट हो? ऐसा क्या है जो आप प्रोड्यूस कर A < करो. सोचो आपमें ऐसी कौन सी यूनिक स्किल है, आप किसमें एक्सपर्ट हो? ऐसा क्या है जो आप प्रोड्यूस कर सकते हो जो दूसरे नहीं कर सकते ? यही एक चीज़ आपकी कॉम्पटीटिव एडवांटेज बन सकती है. कोशिश करो कि आपके बिज़नेस में continuous transformationका माहौल बना रहे. इसके साथ ही राईट टेक्नोलोज़ी को अपनाना भी जरूरी है. अपने आईटी सिस्टम को हमेशा अपग्रेड रखे और ज्यादा से ज्यादा कंप्यूटिंग, मोबिलिटी और एप्स को use करें. मार्केट को समझने के लिए डेटा यूज़ करे. इसे यूज़ करके आप आने वाले चेंजेस की प्रेडिक्शन कर सकते हो. दूसरी चीज़ आपने सीखी कि क्लाउड कंप्यूटिंग, मोबिलिटी और app कैसे साथ मिलकर काम करते है. जिस तरीके से ये कनेक्ट करते है, उससे कंपनी को काम करने के नए-नए तरीके पता चलते है. साथ ही इससे आपके बिज़नेस को इंडस्ट्री में होने वाले चेंजेस को अपनाने में भी हेल्प मिलती है. दूसरे शब्दों में कहे तो लेटेस्ट टेक्नोलोजीको एडाप्ट करना आपके लिए काफी फायदेमंद होता है जिससे आपको इन्फ्लेक्शन पॉइंट को प्रेडिक्ट करने और उसके लिए तैयार रहने में हेल्प मिलती है क्योंकि आने वाले वक्त में क्लाउड कंप्यूटिंग फिजीकल डेटा सेंटर्स को A < ५। पणापाससा रीप्लेस करने वाले हैं और लेटेस्ट एप्स और मोबिलिटी से आपके कामकाज में और भी ज्यादा एफिशिएंसी आएगी. तीसरी चीज़, आपने सीखा कि बिजनेस तभी प्रॉफिट कमाते है जब वो टेक्नोलोज़ी का इस्तेमाल करते है क्योंकि आज हर जगह टेक्नोलोज़ी का बोलबाला है. इसलिए बिजनेस या कंपनियों को अगर मार्केट में अप टू डेट रहना है तो उन्हें लेटेस्ट टेक्नोलोज़ी अडॉप्ट करनी ही होगी ताकि वो किसी से पीछे ना रह जाएं. बेशक कुछ ओल्ड फैंशड कंपनियों को ये एक कॉम्पलीकेट काम लग सकता है इसलिए जितना जल्दी आप इसके आदि होंगे, उतना बेहतर होगा. कम्पीटेंट सीईओ और सीआईओ काफी दूर की सोचते है. वो डेटा पर बेस्ड डिसीजन लेते है और अपने एम्प्लोईज़ की एडवाइज़ भी लेते है. सबसे इम्पोर्टेट बात ये कि ये इनोवेटिव आईडियाज़ एडाप्ट के लिए हमेशा रेडी रहते है. तो ये कुछ मेन आईडिया है जो इस समरी में दिए है. आपने जो प्रिंसिपल्स इसमें जानें, उन्हें अपने बिज़नेस में अप्लाई करें और देखें कि कैसे अगला इन्फ्लेक्शन पॉइंट आने पर आपकी कंपनी उसका सामना करने में कामयाब होगी.

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