Hooked: How to Build Habit-Forming Products Nir Eyal. Books In Hindi Summary Pdf

Hooked: How to Build Habit-Forming Products Nir Eyal इंट्रोडक्शन रिसर्च कहता है कि करीब 79% स्मार्टफोन यूजर्स को सुबह उठने के 15 मिनट बाद अपना फोन चेक करने की आदती है. एवरेज लेवल पर बात करे तो लोग आमतौर पर दिन में कोई 34 बाद अपना फोन ब्राउज़ करते है. लेकिन कुछ एक्सपर्ट्स ये भी कहते है कि दिन भर में लोग 150 बार तक अपना फोन चेक करते है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता आज ज़्यादातर लोग अपने स्मार्टफोन या सोशल मिडिया के हूक्ड यानी एडिक्टेड है. अक्सर हम खुद को बोलते है कि हम सिर्फ कुछ मिनट्स के लिए फेसबूक या इन्स्टाग्राम चेक करते है पर असल में हम घंटो तक ब्राउज़ करते रहते है और इस बात का हमे भी पता नहीं चलता. आज के इन्सान की सबसे लेटेस्ट हैबिट है इंटरनेट. कोगनिटिव साईंकोलोजिस्ट हैबिट को एक ऑटोमेटिक बिहेवियर मानते है जो खास सिचुएशन या कारणों से ट्रिगर होती है. ये वो हैबिट हैं जो हम unconscious वे में करते है. आज कंपनी डिज़ाइनर्स ये सीखने की कोशिश कर रहे है कि कैसे उनके प्रोडक्ट्स हमारी हैबिट और हमारे माइंड का पार्ट बन जाए. 1-1-A 4A 14

या कारणों से ट्रिगर होती है. ये वो हैबिट हैं जो हम unconscious वे में करते है. आज कंपनी डिज़ाइनर्स ये सीखने की कोशिश कर रहे है कि कैसे उनके प्रोडक्ट्स हमारी हैबिट और हमारे माइंड का पार्ट बन जाए. आज के दौर में सिर्फ एडवरटाईजिंग ही काफी नहीं है. कंपनीज़ हुक्स यूज़ करती है ताकि हमे उनके प्रोडक्ट्स इतने टेम्प्टिंग लगे कि हम खुद ब खुद उनकी तरफ खिंचते चले जाए. इस किताब में आप हुक मॉडल के बारे में पढोगे जिसे ऑथर नीर इयाल ने प्रोपोज़ किया है. इसमें चार फेज़ के बारे में बताया गया है जो कंपनीज़ हमारे अंदर हैबिट फॉर्म करने के लिए यूज़ करती है. क्योंकि कंपनीज़ ये गोल रखती है कि यूजर्स बिना किसी कॉस्टली एडवरटाईजिंग या मैसेजिंग के बिना ही उनके प्रोडक्ट्स के साथ लगातार एंगेज रहे यानी उनके प्रोडक्ट्स यूज़ करते रहे. हुक मॉडल के साथ यूजर्स हमेशा और ज्यादा की चाहत में वापस आता है. ये यूजर सोशल मिडिया और ऑनलाइन गेम के लिए लॉयल रहता है. हुक मॉडल के चार phase हैं – ट्रिगर्स, एक्शन, वेरिएबल रिवॉर्ड और इन्वेस्टमेंट. हर टाइम जब भी हम इन फेसेज़ से गुजरते है हमारी हैबिट्स बनती है और मजबूत होती चली जाती है. तो चलिए इन चारो फेसेज़ को एक-एक करके डिस्कस करते है. Hooked: How to Build Habit-Forming Products Nir Eyal ट्रिगर अपने सामने एक क्रोस या दो परपेंडीक्यूलर लाइन इमेजिन करो. इन लाइंस से हमे चार सेक्शन मिलेंगे. इसके फर्स्ट सेक्शन में ट्रिगर है. ट्रिगर एक्सटर्नल भी होते है और इंटरनल भी. इसके दूसरे सेक्शन में एक्शन है. तीसरे सेक्शन में वेरिएबल रिवॉर्ड है और चौथे सेक्शन में इन्वेस्टमेंट है. इस लाइन में एक एरो भी है जो क्लोकवाइज़ चलता है यानि ट्रिगर से इन्वेस्टमेंट की तरफ और फिर गोल-गोल घूमता है. यही है हमारा हुक मॉडल. तो टेक कंपनीज़ हमारे अंदर जो हैबिट डालती है उसका सीक्रेट है कि ये हैबिट ट्रिगर से स्टार्ट होती है. यिन स्टैंडफोर्ड यूनीवरसिटी में पढ़ती है. वो इस जाने-माने कॉलेज की एक टिपिकल स्टूडेंट है. लेकिन उसकी एक प्रॉब्लम है, यिन को इन्स्टाग्राम की लत लग गई है. इन्स्टाग्राम यानी फोटो और वीडियो शेयरिंग एप जिसे 2012 में फेसबुक ने $7 बिलियन में खरीद लिया था. तब से लेकर आज तक इन्स्टाग्राम ने 150 मिलियन से भी ज्यादा यूजर्स बना लिए है. यिन कहती है कि इन्स्टाग्राम उसे बड़ा मजेदार लगता है. वो हर मोमेंट को कैप्चर कर लेना चाहती है, इससे पहले कि वो उसकी IIT- हो A कैप्चर कर लेना चाहती है, इससे पहले कि वो उसकी नजरो से गायब हो जाए. चलिए डिस्कस करते है कि यिन और उसके जैसे बाकि यूजर्स को इन्स्टाग्राम की ये आदत कैसे लगी. क्या आपको मालूम है पर्ल यानी मोती कैसे बनते है? असल में ओएस्टर की बॉडी के अंदर एक डिफेंस सिस्टम होता है जो एक चमकीली कोटिंग रिलीज़ करता है. जब भी कोई अनवांटेड पैरासाइट या रेत का छोटा सा पार्टिकल इसकी बॉडी के अंदर आता है तो उसके चारो ओर चमकीली कोटिंग की परत जमती चली जाती है और कोटिंग की कई लेयर्स के बाद जाकर एक पर्ल बनता है. ठीक इसी तरह बार-बार एक ही बिहेवियर रिपीट करने पर वो हमारी हैबिट बन जाती है. अब ट्रिगर को आप अनवांटेड पैरासाइट या छोटा सा सैंड पार्टिकल मान लीजिए जिसके पर्ल के अंदर जाते ही ओएस्टर रिएक्ट करने लगता है. ट्रिगर्स दो टाइप के होते है. एक्स्टेनल और इंटरनल. एक्सटर्नल ट्रिगर्स वो स्टीमुली है जो हमारे एनवायरमेंट से हमे मिलते है. इन्हें हम क्लियर कॉल्स टू एक्शन भी बोल सकते है. इसके एक्साम्प्ल्स हो सकते है जैसे वो नोटीफिकेश्न जो हमे एप्स से आते रहते है या साईंन अप या स्बसक्राइब बटन जो हम ब्लोग या वेबसाईट में देखते है. अब एक कोका-कोला वेंडिंग मशीन इमेजिन करो जहाँ एक यंग मेन हाथ में कोक की बोटल पकडे दिखता है. और इसके नीचे लिखा है”थर्टी? और इसके साथ एक यंग मैन हाथ मे कोक की बोटल पकडे दिखता है. और इसके नीचे लिखा है”थर्टी? और इसके साथ ही एक गैप या होल टाइप बना है जिसमे आप पैसे इन्सर्ट करके अपनी ड्रिंक कलेक्ट कर सकते हो, ये सारे एक्स्टेनल ट्रिगर्स है. एक और एक्जाम्पल है ऑनलाइन बैंकिंग वेबसाईट मिंट.कॉम का. आप इनके होम पेज पर एक बड़ा सा चमकदार बटन देख सकते हो” लॉग इन टू मिंट” यहाँ आप अपना ई-मेल आईडी और पासवर्ड डालकर अपना बेलेंस पता कर सकते हो या क्रेडिट कार्ड डील चेक कर सकते हो. तो देखा आपने, कैसे ट्रिगर आपको एक्शन लेने पर तुरंत मजबूर करते है. लेकिन इंटर्नल ट्रिगर्स का क्या? क्या हमारी बोरडम या अकेलापन ही हमे अपना फोन ब्राउज़ करने के लिए मजबूर करती है. ये हमारे पहले के एक्जाम्पल की तरह है जहाँ यिन को डर है कि अगर उसने इन्स्टाग्राम अकाउंट पर अपनी पिक्चर पोस्ट नहीं की तो वो मोमेंट हमेशा के लिए चले जायेंगे. इंटर्नल ट्रिगर ईमोश्न्स है जो हमे कुछ करने के लिए उकसाते है. अब ये नेगेटिव इमोशंस भी हो सकते है जैसे गुस्सा, स्ट्रेस, फ्रस्ट्रेशन, कन्यूजन, बोरियत या अकेलापन वगैरह यानी जब ये इमोशंस हमारे अंदर चल रहे होते है, उस वक्त हम तुरंत अपने दर्द का कोई सोल्यूशन या ईलाज चाहते है. मिसौरी यूनीवरसिटी में 216 स्टूडेंट इस बात के लिए खुद से तैयार हुए कि उनकी इन्टरनेट हैबिट को 21 — उसने इन्स्टाग्राम अकाउंट पर अपनी पिक्चर पोस्ट नहीं की तो वो मोमेंट हमेशा के लिए चले जायेंगे. इंटर्नल ट्रिगर ईमोश्न्स है जो हमे कुछ करने के लिए उकसाते है. अब ये नेगेटिव इमोशंस भी हो सकते है जैसे गुस्सा, स्ट्रेस, फ्रस्ट्रेशन, कन्यूजन, बोरियत या अकेलापन वगैरह यानी जब ये इमोशंस हमारे अंदर चल रहे होते है, उस वक्त हम तुरंत अपने दर्द का कोई सोल्यूशन या ईलाज चाहते है. मिसौरी यूनीवरसिटी में 216 स्टूडेंट इस बात के लिए खुद से तैयार हुए कि उनकी इन्टरनेट हैबिट को ट्रेक किया जाए. एक साल तक ओब्ज़ेर्व करने के बाद रिसर्च र्स ने पाया कि जो स्टूडेंट डिप्रेस्ड थे, वो ऑनलाइन गेमिंग, बिंज watching या चैटिंग में ज्यादा वक्त गुजारते थे. खुद को रिलेक्स फील कराने के लिए ये लोग इंटरनेट का हद से ज्यादा यूज़ कर रहे थे. अब ज़रा सोचिये, आप एटीएम की लाइन में खड़े हो या किसी ट्रेन से जा रहे हो. आप बोर हो रहे हो इसलिए अपना फोन ब्राउज़ करना शुरू कर देते हो. लेकिन इंटर्नल ट्रिगर्स इतने इफेक्टिव क्यों होते है? . क्योंकि ये ठीक ऐसा ही है जैसे खुजली वाली जगह को खुजा देने के बाद आराम मिलता है. और हर बार जब आप कोई बिहेवियर रिपीट करते हो तो आप अपनी हैबिट को स्ट्रोंग बना रहे होते हो. . Hooked: How to Build Habit-Forming Products Nir Eyal एक्शन आपको ये कैसे पता चलेगा कि ट्रिगर एक्शन में बदल जाते है? क्या एक्स्टेनल और इंटरनल ट्रिगर्स ही काफी है किसी इन्सान को एक्ट और फॉलो करने के लिए? डॉक्टर बीजे फॉग (Dr. BJ Fogg,)स्टैंडफ़ोर्ड यूनीवरसिटी के Persuasive टेक्नोलजी लैब के डायरेक्टर ने एक फ़ॉर्मूला प्रोपोज़ किया है. वो कहते है कि तीन चीज़े हमारे बिहेवियर को इन्फ्लुएंस करती है. पहला है यूजर के पास अच्छी-खासी मोटिवेशन होनी चाहिए. दूसरा है, यूजर में डिजायर्ड एक्शन कम्प्लीट करने की एबिलिटी होनी चाहिए और तीसरा है, बिहेवियर को एक्टिवेट करने के लिए ट्रिगर प्रेजेंट होना चाहिए. अगर हम इसे एक फ़ॉर्मूला में रखे तो ये कुछ इस तरह होगा B=MAT. यहाँ B यानी बिहेवियर, M यानि मोटिवेशन, A यानी एक्शन और T है ट्रिगर. अगर एक ही टाइम में यूजर का मोटिवेशन, एक्शन और ट्रिगर तीनो प्रेजेंट हो और वो भी अच्छा-खासा तो ये यूजर के बिहेवियर को ड्राइव करेगा ही करेगा. यहाँ हम एक एक्जाम्पल लेंगे. मान लो आप सडक पर जा रहे हो और आपका फोन बजता है पर आप उठा नहीं पाते हो. – -4, नहीं पाते हा. अब एक रीजन ये हो सकता है कि आपका फोन आपके बैग के अंदर घुसा है जहाँ आपका हाथ नहीं पहुँच रहा या और आप फोन बैग से निकाल नहीं पाते हो.. दूसरा रीजन, आप ये सोचकर फोन नहीं उठाते कि शायद ये कोई टेलीमार्केटर का फोन होगा तो आप फोन उठाने की जरूरत नहीं समझते. तीसरा रीजन ये हो सकता है कि आपका फोन साइलेंस मोड पर हो और आपको रिंग ना सुनाई दी हो. तो इस तरह ऐसा कोई ट्रिगर यहाँ नहीं है जो आपको फोन चेक करने पर मजबूर करे. यानी आपने तीनो फैक्टर्स मिस कर दिए जो आपका बिहेवियर ड्राइव करते. इससे पहले वाले चैप्टर में हम आपको ट्रिगर्स के बारे में बता चुके है. अब हम मोटिवेशन और एबिलिटी के बारे में बात करेंगे. मोटिवेशन है यूजर का लेवल ऑफ़ डिजायर जो उसे एक्शन लेने के लिए मोटिवेट करता है. यानी एक्शन लेने की एनर्जी. डॉक्टर फोग कहते है कि इन्सान में तीन कोर मोटिवेटर्स होते है. पहला है प्लेजर चाहना और पेन को अवॉयड करना. दूसरा है उम्मीद रखना और डर को अवॉयड करना, और तीसरा है सोशल एक्सेप्टेंस की ईच्छा रखना और रिजेक्शन अवॉयड करना. एड्वरटाईजिंग में मोटिवेशन का एक एक्जाम्पल लेते है. 2008 में बराक ओबामा ने अपने प्रेजीडेंशीयल कैंपेन में एक इन्स्पाईरिंग और होपफुल बनाई थी. 6. ZUUO म बराक ओबामा नअपन प्रजाऽशायल कैंपेन में एक इन्स्पाईरिंग और होपफुल बनाई थी. ओबामा का वो आईकोनिक पोस्टर एक आर्टिस्ट शेपर्ड फिरे ने डिजाईन किया था. पोस्टर पर बोल्ड लैटर्स में एक वर्ड लिखा था” होप” जिसके ठीक ऊपर ओबामा की बड़ी इम्प्रेसिव फोटो बनी थी जो ऐसा लगता था आने वाले फ्यूचर की तरफ होपफूली देख रही है.. ये वो वक्त था जब अमेरिका में ईकोनोमिक और पोलिटिकल क्राइसिस के बीच लोगो को ओबामा में उम्मीद की एक किरण नजर आ रही थी. एक और एक्जाम्पल है बडवाइज़र और national टीम के लिए चीयर करते हुए तीन आदमियों का पोस्टर. इसमें दिखाए गए तीनो आदमी भाई-चारे की तस्वीर पेश करते है और पोस्टर में ये भी लिखा था कि बडवाइज़र 2010 फीफा वर्ल्ड कप की ऑफिशियल बियर है. बडवाइज़र की एडवरटाईजिंग सोशल एक्सेप्टेंश के जरिये लोगो को मोटिवेट करती है. ये मैसेज देती है कि बीयर का मतलब है अच्छे दोस्तों के साथ अच्छा वक्त बिताना. एक और स्ट्रोंग एक्जाम्पल है एक लडके की पिक्चर, जिसके सिर पर एक तरफ बड़े-बड़े स्टिच लगे है और एक बूढी औरत उस लडके को चम्मच से खाना खिला रही है. इस पोस्टर में लिखा था “I won’t wear a helmet. It makes me look stupid” यानी मैं हेलमेट नहीं पहनूंगा क्योंकि उसे पहनकर मैं बेवकूफ दिखता हूँ. दरअसल ये एड शो करता है कि हेलमेट ना पहनने से क्या नुकसान होता है. ਧਾ ਟਰੇ ਰਹ ਰਹੀ ਹਟ ਰਸ ਪਾ ? ਪੀਰ ਜੀ पहनने से क्या नुकसान होता है. यानी उस लडके का बुरी तरह एक्सीडेंट हुआ है और वो इतना जख्मी है कि खुद से खा भी नहीं पा रहा. इस एड में नेगेटिव इमोशन यानी डर को मोटिवेटर के तौर पर इस्तेमाल किया गया है. ये बाकियों को चेतावनी देता है कि अगर हेलमेट नहीं पहना तो ये हाल होगा. तो ये थी मोटिवेशन की स्टोरी. अब हम बी एमएटी के अगले पार्ट यानी ए की बात करेंगे जिसका मतलब है एबिलिटी. एबिलिटी यानी कोई एक्शन लेने में कितना सिंपल और ईजी है. अगर फ्रिक्शन कम और रूकावटे भी ज्यादा नहीं है तो ज्यादा यूजर्स एक्ट करने के लिए मोटिवेट होंगे. जिसका एक्जाम्पल हम फेसबुक, ट्विटर, गूगल, एप्पल या पिंटरेस्ट से ले सकते है जो अपने प्रोडक्ट्स इम्प्रूव करते रहते है. एक नया अकाउंट खोलने के लिए कई स्टेप्स से होकर गुजरना पड़ता है. यूजर्स को ई-मेल एड्रेस की जरूरत पड़ती थी, फिर पासवर्ड और फ़ोन जैसी डिटेल देनी होती थी जिसेस यूजर्स साईंन-अप करने के लिए डिसकरेज होते है. जब भी यूजर को कोई नया प्लेटफॉर्म यूज़ करना होता है तो उसे यही स्टेप्स फॉलो करने पड़ते थे. लेकिन अब लोग फेसबुक या गूगल पर सीधे लोग-इन कर लेते है. एक क्लिक में ही यूजर नया अकाउंट खोल लेता है. ट्विटर तो लोगो को फोटो, वीडियो, आर्टिकल और किसी भी तरह का कंटेंट ओनलाइन शेयर करने की फ्रीडम देता है कई साल पहले कंपनी ने नोटिस किया दापटर ताला फाफाटा, पााऽपा, जाटिकल जार किसी भी तरह का कंटेंट ओनलाइन शेयर करने की फ्रीडम देता है. कई साल पहले, कंपनी ने नोटिस किया कि उनके 25% ट्वीट में किसी दूसरी साईट का लिंक एड होता है तो उन्होंने इस प्रॉब्लम को सोल्व करने के लिए अपने यूजर एक्सपीरिएंस को और ज्यादा ईजी और बैटर बना दिया. ट्विटर ने वेबसाईट्स पर जड़ा हुआ ट्वीट बटन क्रिएट कर दिया ताकि अगर कोई उस आर्टिकल को ट्वीट करना चाहे तो सिर्फ उन्हें बटन क्लिक करने की जरूरत पड़ेगी. अब कोई कॉपी पेस्ट या बाकि कोई और स्टेप लेने की जरूरत नहीं पडती. 1990 के अंतिम दौर में जब गूगल लांच हुआ था तब पहले से ही दूसरे सर्च इंजिन मार्किट में थे. जैसे कि Yahoo, AltaVista, Excite, Lycos वगैरह. ये सारे सर्च इंजिन डायरेक्टरी बेस्ट सर्च यूज कर रहे थे. तो गूगल ने क्या किया कि उन्होंने अपना होमपेज सिंपलीफाई कर दिया, फालतू के कंटेंट और एडवरटाईजिंग हटा दी. गूगल ने अपना सर्च इंजिन एकदम सिंपल और क्लीन रखा. और उनके सर्च रीजल्ट भी रेलेवेंट और क्लियर होते थे. बाद में गूगल ने यूजर एक्सपीरिएंस इम्प्रूव करने के लिए ऑटो-स्पेलिंग करेक्शन, प्रेडिक्टिव सर्च और जैसे ही यूजर टाइप करता था, उसके की-वर्ड्स पर बेस्ड रीज्ल्ट्स शो करना जैसे फीचर्स एड कर दिए और हुआ ये कि गूगल ने अपने कॉम्पटीटर्स को बहुत पीछे छोड़ दिया. लाटा केटोरेंट यजानकारे या था ताते तब पहले से ही दूसरे सर्च इंजिन मार्किट में थे. जैसे कि Yahoo, AltaVista, Excite, Lycos वगैरह. ये सारे सर्च इंजिन डायरेक्टरी बेस्ट सर्च यूज कर रहे थे. तो गूगल ने क्या किया कि उन्होंने अपना होमपेज सिंपलीफाई कर दिया, फालतू के कंटेंट और एडवरटाईजिंग हटा दी. गूगल ने अपना सर्च इंजिन एकदम सिंपल और क्लीन रखा. और उनके सर्च रीजल्ट भी रेलेवेंट और क्लियर होते थे. बाद में गूगल ने यूजर एक्सपीरिएंस इम्प्रूव करने के लिए ऑटो-स्पेलिंग करेक्शन, प्रेडिक्टिव सर्च और जैसे ही यूजर टाइप करता था, उसके की-वर्ड्स पर बेस्ड रीज्ल्ट्स शो करना जैसे फीचर्स एड कर दिए और हुआ ये कि गूगल ने अपने कॉम्पटीटर्स को बहुत पीछे छोड़ दिया. लाइफ के बेस्ट मोमेंट अचानक हमारे सामने आ जाते है और कई बार हम तुरंत उन मोमेंट को कैप्चर करने के लिए फोन तक नहीं पहुंच पाते. इसीलिए एप्पल ने अपना इनोवेशन यानि कैमरा एक्सेसिबल आईफोन के होम पेज स्क्रीन पर एड किया. अगर आईफोन की स्क्रीन लॉक भी है तो भी एप्पल यूजर कैमरा ओपन करके तुरंत पिक्चर ले लेगा. इसके लिए उन्हें किसी पासवर्ड या एप की जरूरत नहीं पडती. आज अगर ज्यादा से ज्यादा लोग एप्पल के दीवाने है तो उसकी एक बड़ी वजह उनकी इनोवेशन भी है. Hooked: How to Build Habit-Forming Products Nir Eyal वेरिएबल रिवॉर्ड अब हम हुक मॉडल के थर्ड फेज़ की बात करते है- द वेरिएबल रिवॉर्ड . ये वो फेज़ है जहाँ कंपनी अपने प्रोमिस डिलीवर करती है और यूजर के प्रोब्लम्स सोल्व करती है. हम सिर्फ रिवॉर्ड की नहीं बल्कि वेरिएबल रिवॉर्ड की बात कर रहे है जो अनप्रेडिक्टेबल और अनएक्सपेक्टेड होती है, जो उस हुक को मजबूत करता है जो कंपनी अपने यूजर्स पर इस्तेमाल करती है. 1950 में जाने-माने साईंकोलोजिस्ट बी.एफ. स्किनर ने एक एक्सीपेरीमेंट किया था ये जानने के लिए कि वेरिएबल रिवॉर्ड एनिमल बिहेवियर को कैसे अफेक्ट करता है. स्किनर ने इस एक्सपेरीमेंट के लिए कुछ कबूतर लिए और उन्हें एक बॉक्स में रख दिया जहाँ एक लीवर था. जितनी बार लीवर प्रेस होता, बॉक्स में खाना आ जाता, जल्द ही कबूतर इस बात को समझ गए कि लीवर प्रेस करने का मतलब है खाना मिलना. अपने अगले एक्सपेरिमेंट के लिए स्किनर ने इसमें एक ट्विस्ट डाला. इस बार लीवर रेंडम प्रेस करने पर ही खाना आता था. यानी हर बार कबूतरों के लीवर प्रेस करने पर खाना नहीं आता था. कई बार बार-बार प्रेस करने के बाद ही खाना आता था. कई बार जल्दी आ जाता था और कई बार आता ही नहीं था. 1ि1AAI Aॉई में जाता था और कई बार आता ही नहीं था. स्किनर ने देखा कि वेरिएबल रिवॉर्ड कबूतरों को बार-बार लीवर प्रेस करने के लिए मोटिवेट कर रहा है. जब रिवॉर्ड प्रेडिक्टेबल होता है तो कबूतर बार-बार बिहेवियर रिपीट करते है. इस तरह कबूतर बार-बार लीवर प्रेस करके वेरिएबल रिवॉर्ड यानी खाने की उम्मीद कर रहे थे. अभी हाल की कुछ स्टडीज़ से ये पता चला है कि वेरिएबल रिवॉर्ड हमारे ब्रेन के उस हिस्से की एक्टिविटी बढ़ा देता है जो प्लेज़र यानी एन्जॉयमेंट फीलिंग से जुड़ा होता है. ब्रेन के इस हिस्से को नुक्लयूस अक्यूम्बेंसे कहते है. जब रिवॉर्ड प्रेडिक्टेबल और एक्सपेक्टेड होता है तो हमारा ब्रेन और ज्यादा डोपामाईन रिलीज़ करने लगता है. इसलिए वेरिएबल रिवॉर्ड हमे ज्यादा एडिक्टिव लगते है. टेक कंपनीज़ हमे हुक करने और हमारी हैबिट्स फॉर्म करने के लिए कई तरह के वेरिएबल रिवॉर्ड यूज़ करती है. इस किताब के ऑथर नीर इयाल कहते है कि वेरिएबल रीवार्ड्स तीन तरह के होते है,ट्राइब, द हंट और द सेल्फ. द ट्राइब का मतलब उस रिवॉर्ड से है जो सोशल एक्स्पेटेंस से जुडी है, जैसे फेसबुक पर लाईक्स और कोमेंट्स, इन्स्टाग्राम पर हार्ट्स मिलते है या ट्विटर पर रीट्वीट्स और यूट्यूब पर स्बसक्राइबर. यहाँ हम ऑनलाइन गेम LOL यानी League of Legends. का एक इंट्रेस्टिंग सा एक्जाम्पल लेंगे. 2009 में इस गेम को लांच किया गया और देखते ही 2009 में इस गेम को लांच किया गया और देखते ही देखते ये ऑनलाइन गेम्स की टॉप लिस्ट में आ गया था. लेकिन फिर जल्द ही LOL के मेकर्स को एक सिरियस प्रॉब्लम फेस करनी पड़ी. कुछ ट्रोल्स और बुलीज़ जो ये गेम खेलते थे, वो बाकी प्लेयर्स को वर्बली एब्यूज़ करने लगे और सबसे बड़ी बात तो ये थी कि ये लोग अपनी ऑनलाइन पहचान छुपा कर रखते थे जिसकी वजह से इन्हें पकड़ पाना भी मुश्किल था. नतीजा ये हुआ कि LOL की बदनामी होने लगी और इसे एक अब्यूजिव और डेंजरस प्लेयर्स कम्यूनिटी के तौर पर देखा जाने लगा. इस प्रॉब्लम को सोल्व करने के लिए LOL के मेकर्स ने एक हॉनर पॉइंट्स कांसेप्ट निकाला. इसमें प्लेयर्स को स्पोर्ट्समेनशिप, कोऑपरेशन और पॉजिटिव बिहेवियर शो करने पर पॉइंट्स मिलते थे जो उन्हें दूसरे प्लेयर्स दे सकते थे. जो लोग फ्रेंडली और हेल्पफुल वे में गेम खेलते थे उनकी गेम में एक पहचान बनती थी और कम्यूनिटी में रिस्पेक्ट मिलती थी. जबकि ट्रोल करने वालो को मार्क कर दिया जाता था और ज्यादा से ज्यादा प्लेयर्स उन्हें अवॉयड करते थे. इस तरह LOL फिर से एक सेफ और फन गेमिंग प्लेटफॉर्म बन गया. चलिए अब सेकंड टाइप के वेरिएबल रिवॉर्ड की तरफ चलते है जो है हंट. अक्सर हम बोर होने पर या अकेलेपन में हम इंटरनेट पर इंट्रेस्टिंग फ़ोटो, वीडियो या ऐसे इंट्रेस्टिंग आर्टिकल ढूंढते है जिससे हमारा टाइम पास हो जाए. ऐसा करके हमे एक तरह की ख़ुशी मिलती है या यं कहे हमारा वक्त कट जाता है. यही पाएस२पा ५०० सतनासान पास हो जाए. ऐसा करके हमे एक तरह की ख़ुशी मिलती है या यूं कहे हमारा वक्त कट जाता है. यही वजह है कि हम कंटेंट हंट करते है. अब फोटोज, वीडियोज या आर्टिकल्स जो हम देखते है, रेंडम होते है. इनमे से कुछ हमे पसंद आते है और कुछ नहीं . यही वजह है कि हंट एक वेरिएबल रिवॉर्ड है. और जो कंटेंट हम देखते है, वो मजेदार और इंट्रेस्टिंग हो, ये जरूरी नहीं है पर हम ऐसे कंटेंट ब्राउज करते रहते है जो मजेदार और फनी हो. जैसे ट्विटर में होम पेज़ की कुछ पोस्ट हमे रेलेवेंट लगती है तो कुछ नहीं लगती. कई बार हमे इंट्रेस्टिंग पोस्ट भी मिल जाती है और कई बार कुछ चीज़े हम इग्नोर कर देते है. लेकिन जो भी हो हम घंटो अपने फोन पर स्क्रोलिंग करते है और हंट करते रहते है. पिंटरेस्ट के साथ भी कुछ ऐसा ही केस है. इसमें इन्फिनाईट स्क्रोलिंग का फीचर है जहाँ यूजर्स को कोई टैब ओपन नहीं करना पड़ता है. यूजर जब पेज के बॉटम में पहुँचता है तो पिंस का एक नया बैच शुरू हो जाता है. पिंटरेस्ट वेरिएबल रिवार्ड्स का एक ऐसा ही एंडलेस सर्च है. आपको फिर से याद दिला दे कि हर वो चीज़ जो आप स्क्रॉल करके देखते हो, जरूरी नहीं कि आपको इंट्रेस्टिंग या रेलेवेंट लगे. एप डिज़ाइनर्स कुछ इस तरह से एप्स बनाते है कि यूजर्स घंटो स्क्रोल करता जाता है. फाइनली, तीसरी टाइप का जो वेरिएबल रिवॉर्ड है, वो है सेल्फ. जब हम कुछ अचीव करते है तो हमे एक पर्सनल सेटिसफेक्शन की फीलिंग आती है अगर बॉटम में पहुँचता है तो पिंस का एक नया बैच शुरू हो जाता है. पिंटरेस्ट वेरिएबल रिवार्ड्स का एक ऐसा ही एंडलेस सर्च है. आपको फिर से याद दिला दे कि हर वो चीज़ जो आप स्क्रॉल करके देखते हो, जरूरी नहीं कि आपको इंट्रेस्टिंग या रेलेवेंट लगे. एप डिज़ाइनर्स कुछ इस तरह से एप्स बनाते है कि यूजर्स घंटो स्क्रोल करता जाता है. फाइनली, तीसरी टाइप का जो वेरिएबल रिवॉर्ड है, वो है सेल्फ. जब हम कुछ अचीव करते है तो हमे एक पर्सनल सेटिसफेक्शन की फीलिंग आती है. अगर आप उन लोगो में से है जो हमेशा अपना ईमेल क्लीन करके इनबॉक्स जीरो रखते है तो यहाँ ही आपकी बात हो रही है. अपना इनबॉक्स क्लीन करके आपको एक सेटिसफेक्शन मिलती है. लेकिन ये हैबिट एडिक्टिव भी हो सकती है क्योंकि आप बार-बार अपना मेल बॉक्स चेक करते रहोगे. एक और एक्जाम्पल है ऑनलाइन गेम वॉरक्राफ्ट. इस गेम को कम्पलीट करने के लिए आपको कुछ स्किल्स में मास्टर होना पड़ता है. इसलिए यूजर हमेशा लेवल अप करके स्पेशल पावर्स अनलॉक करता है, एडवांस्ड वीपंस हासिल करके दूर-दराज़ की लोकेशन तक पहुँचता है. हालाँकि जब प्लेयर्स एडवांस लेवल तक पहुंचने लगते है तो उनके गेमिंग की टाइमिंग भी बढती चली जाती है और यूजर्स एक तयशुदा वक्त से ज्यादा वक्त ऑनलाइन रहने लगते है. Hooked: How to Build Habit-Forming Products Nir Eyal इन्वेस्टमेंट जितने ज्यादा यूजर्स किसी प्रोडक्ट पर अपना टाइम अरु एफर्ट इन्वेस्ट करेंगे उतना ही ज्यादा वो उसे वैल्यू करते है. इसे इन्वेस्टमेंट बोलते है जहाँ यूजर्स को थोडा सा काम इन्वेस्ट करने या सिस्टम में वैल्यू एड करने को बोला जाता है. ये इस बात की संभावना बढ़ा देता है कि यूजर फिर से प्रोडक्ट यूज़ करेगा. जैसे एक्जाम्पल के लिए ट्विटर में आप किसी दूसरे यूजर को फॉलो करके इन्वेस्ट करते हो. तो अगली बार जब आप अपने होम पेज में दुबारा ब्राउज़ करोगे तो उस यूजर की पोस्ट आपके फीड में आ जायेगी. यानी आप थोड़ी देर और ट्विटर में टाइम रहोगे, ये एक तरह से हुक है आपका टाइम बढाने के लिए.. एप्पल के आई ट्यून में आप सोंग्स एड करके या अपनी प्लेलिस्ट ऑर्गेनाईज़ करके इन्वेस्ट करते हो जो आपको फ्यूचर में और ज्यादा सेटिसफाईड यूजर एक्सपिरिएंस देता है और आपकी म्यूजिक लाईब्रेरी में और ज्यादा वैल्यू एड हो जाती है. अब क्योंकि आपने इतना कुछ दन्वेस्त किया है तो आप अब किसी टसरे म्यजिक इन्वेस्ट किया है तो आप अब किसी दूसरे म्यूज़िक प्लेटफॉर्म जैसे स्पॉटीफाई या यूट्यूब म्यूज़िक में इन्वेस्ट करने की नहीं सोचोगे. ई-बे या एयरबीएनबी जैसे ऑनलाइन मार्केट प्लेस में रेपूटेशन बड़ी इम्पोर्टेट होती है. बेचने वाला और खरीदने वाला दोनों ही पॉजिटिव रीव्यूज़ मेंटेन करने की कोशिश करते है. ये उस प्लेटफॉर्म पर उनका इन्वेस्टमेंट है ताकि बिजनेस अच्छा चलता रहे. एडोब फोटोशॉप में यूजर्स स्किल पर इन्वेस्ट करते है. फोटोशॉप दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला ग्राफिक्स एडिटिंग प्रोग्राम है. इस सॉफ्टवेयर में इमेजेस क्रिएट और इम्प्रूव करने के लिए एड्वास्ड फीचर्स अवलेबल है. वैसे तो एडोब फोटोशॉप सीखने में काफी मुश्किल है पर जो यूजर्स इसे सीखने में अपना टाइम और एफर्ट इन्वेस्ट करते है या इसके ट्यूटोरियल्स देखकर एडिटिंग की प्रेक्टिस करते है, वो इसमे एक्सपर्ट हो जाते है. इन्वेस्टमेंट ना सिर्फ बैटर यूजर एक्सपिरिएंस देता है बल्कि जैसा कि हमने पहले भी कहा ये यूजर्स के लिए एक हुक है ताकि यूजर्स ज्यादा से ज्यादा टाइम प्रोडक्ट पर खर्च करे. अगर हम वापस हुक मॉडल पर जाए तो इसमें ट्रिगर, एक्शन और वेरिएबल रिवॉर्ड और . पर खर्च करे. अगर हम वापस हुक मॉडल पर जाए तो इसमें ट्रिगर, एक्शन और वेरिएबल रिवॉर्ड और इन्वेस्टमेंट मिलकर एक लूप ऑफ़ साईकल क्रिएट करते है. जो इन्वेस्टमेंट हम लाईक्स, फॉलो , रिव्यु वगैरह के श्रू करते है, वो रीमाइंडर्स और अनलिमिटेड नोटीफिकेश्न के एक्स्टर्नल ट्रिगर बन जाते है. जो यूजर्स को फिर से यही साईकल स्टार्ट करने को मज़बूर कर देता है. इन्वेस्टमेंट लूप्स वापस फिर से ट्रिगर, एक्शन, वेरिएबल रिवॉर्ड और इन्वेस्टमेंट पर जाते है और इस तरह ये हमारी हैबिट बन जाती है. हर बार यूजर जब भी इस साईकल को रिपीट करता है, उसकी हैबिट स्ट्रोंग होती चली जाती है. यहाँ तक कि बोरडम या अकेलापन जैसे इंटरनल ट्रिगर्स हो तो भी वेरिएबल रिवॉर्ड और इन्वेस्टमेंट के बाद जो एक्शन लिए जाते है, वो हमारी हैबिट स्ट्रोंग बनाते चले जाते है, इतने स्ट्रोंग कि हम चाह कर भी छोड़ नहीं पाते. यही हैबिट हमे एडिक्टिव बनाती है. Conclusion अब आपको वो सीक्रेट मालूम है जो टेक कंपनीज़ अपने प्रोडक्ट्स के जरिये हमे हुक करने यानी फंसाने के लिए इस्तेमाल करती है. सोशल मिडिया, ऑनलाइन गेम्स, ऑनलाइन मार्केट प्लेस वगैरह इस तरह से निताई कि सा है कि दोसने दिए टोना गेम्स, ऑनलाइन मार्केट प्लेस वगैरह इस तरह से डिजाईन किये गए है कि हमे उनके एडिक्ट हो जाए. आपने इस किताब में हुक मॉडल के बारे में पढ़ा कि कैसे ये कंपनीयां हमारे यानी अपने कंज्यूमर्स को हैबिट्स डलवा देती है जिससे हमे उनके प्रोडक्ट्स इतने टेम्प्टिंग लगते है कि उन्हें छोड़ना मुश्किल हो जाता है. आपने इस किताब में हुक मॉडल के चार फेज़ेज़ के बारे में पढ़ा जो है ट्रिगर, एक्शन, वेरिएबल रिवॉर्ड और इन्वेस्टमेंट. आपने इस किताब में पढ़ा कि ट्रिगर दो टाइप के होते है, एक्स्टर्नल ट्रिगर जो प्रोम्प्ट्स होते है जैसे साईन अप या सब्सक्राइब, फिर आते है इंटरनल ट्रिगर जो हमारी ईमोशंस या अकेलेपन को टारगेट करते है जैसे बोरडम. वो एक्शन और फार्मूला जो हमारा बिहेवियर ड्राइव करता है यानी इन्फ्लुएंस करता है, उसके बारे में आपने इस किताब में पढ़ा जिसे हम बोलते है बी =एमएटी. यहाँ बी यानी बिहेवियर, एम यानी मोटिवेशन, ए का मतलब है एबिलिटी और टी यानी ट्रिगर. मोटिवेशन, एबिलिटी और ट्रिगर जितना ज्यादा होगा, उतना ही ज्यादा हम रिएक्ट करेंगे. मोटिवेशन का एक एक्जाम्पल है एडवरटीज़मेंट. जबकि एबिलिटी का एक्जाम्पल हम ले सकते है ईज़ी जबकि एबिलिटी का एक्जाम्पल हम ले सकते है ईज़ी एक्सेस से जैसे कि गूगल, ट्विटर और फेसबुक अपने प्रोडक्ट्स पर अप्लाई करते है. ये प्रोडक्ट्स सबको आसानी से अवलेबल हो जाते है इसलिए इनका यूज़ ज्यादा से ज्यादा लोग कर रहे है. आपने इस किताब में वेरिएबल रिवॉर्ड के बारे में पढ़ा. जब रिवॉर्ड अनप्रेडिक्टेबल होता है तो हमारा बिहेवियर और ज्यादा एडिक्टेड हो जाता है जो हमारे ब्रेन के प्लेज़र सेण्टर नुक्लयूस एक्यूम्बेंस को एक्टिवेट करता है और साथ ही ब्रेन में डोपामाईन भी ज्यादा रिलीज़ होने लगता है. टेक कंपनीज़ इसी चीज़ का फायदा उठाते अपने प्रोडक्ट्स में यूज़ करती है जैसे कि हमारी पोस्ट और आर्टिकल्स पर जो लाईक्स मिलते है, उन पर ये वेरिएबल रिवार्ड्स अप्लाई करती है. इससे होता ये कि यूजर्स नेक्स्ट इंट्रेस्टिंग फीड यानी वेरिएबल रिवार्ड के चक्कर में देर तक ब्राउज़िंग करते रहते है. फाईनली आपने इस किताब में इन्वेस्टमेंट के बारे में भी पढ़ा. जितना ज्यादा टाइम और एफर्ट हम प्रोडक्ट पर देंगे उतना ही ज्यादा हमे उसकी वैल्यू होती है. तभी तो आप अपने लिंकएडीन अकाउंट की डिटेल्स बढ़ा देते हो या फिर अपने आईट्यून प्लेलिस्ट में ज्यादा सोंग्स हो या फिर अपने आईट्यून प्लेलिस्ट में ज्यादा सोंग्स एड कर लेते हो और नतीज़ा ये होता है कि हमे ज्यादा नोटीफिकेश्न्स आने लगती है. तो ये आपके लिए एक एक्स्टेनल ट्रिगर बन जाता है ताकि आप एप को फिर से यूज़ करे. इसलिए इन्वेस्टमेंट वापस ट्रिगर पर जाती है और एक बार फिर से ये सिलसिला शुरू हो जाता है. सेम यही चीज़ इंटरनल ट्रिगर जैसे बोरडम के साथ भी अप्लाई होती है. ट्रिगर, एक्शन, वेरिएबल रिवॉर्ड और इन्वेस्टमेंट एक कंटीन्यूअस लूप है यानी एक लगातार घूमने वाली साईंकल. जैसे आप साइकिल रिपीट करते है हैबिट बनती चली जाती है. फिर वो प्रोडक्ट आपके डेली रूटीन का हिस्सा बन जाता है. इस तरह कंपनी ज्यादा से ज्यादा यूजर्स बनाती है. अब सवाल उठता है कि हम खुद को हूक्ड होने से कैसे रोके? जो टाइम और एफर्ट हम इन एप्स में वेस्ट करते है, उसे किसी और इम्पोर्टेट काम में कैसे इन्वेस्ट करे? इन एप्स को अपग्रेट करने या लेवल अप पर पैसा खर्च करने से खुद को कैसे रोके? कैसे हम खुद को इंटरनेट और सोशल मिडिया के इस जला से बचाए? अब वक्त आ गया है कि हम गहराई से इस प्रॉब्लम के बारे में सोचे जो देखने में तो बेहद मामूली लगती है पर असल में ये काफी बुरी तरह हमारी लाइफ और हेल्थ कंटीन्यूअस लूप है यानी एक लगातार घूमने वाली साईंकल. जैसे आप साइकिल रिपीट करते है हैबिट बनती चली जाती है. फिर वो प्रोडक्ट आपके डेली रूटीन का हिस्सा बन जाता है. इस तरह कंपनी ज्यादा से ज्यादा यूजर्स बनाती है. अब सवाल उठता है कि हम खुद को हूक्ड होने से कैसे रोके? जो टाइम और एफर्ट हम इन एप्स में वेस्ट करते है, उसे किसी और इम्पोर्टेट काम में कैसे इन्वेस्ट करे? इन एप्स को अपग्रेट करने या लेवल अप पर पैसा खर्च करने से खुद को कैसे रोके? कैसे हम खुद को इंटरनेट और सोशल मिडिया के इस जला से बचाए? अब वक्त आ गया है कि हम गहराई से इस प्रॉब्लम के बारे में सोचे जो देखने में तो बेहद मामूली लगती है पर असल में ये काफी बुरी तरह हमारी लाइफ और हेल्थ को इम्पेक्ट कर रही है. अब आप हुक मॉडल के बारे में सब कुछ जानते हो तो आप इस साइकिल को रोककर अपनी हैबिट छुड़ा सकते हो. ऐसे प्रोडक्ट्स के शिकार होने से बचिए जो आपको हुक करने के लिए ख़ासतौर पर डिजाईन किये गए है. तो इसलिए आज और अभी से चौक्कने हो जाएँ और एक हूक्ड फ्री लाइफ जिएँ.

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