Harhad Mehta- The Scam 1992 Summary

Harhad Mehta- The Scam
1992

हमारे देश के इतिहास में कुछ ऐसी भी घटनाएँ घटी
है जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. ऐसी
सनसनीखेज़ घटनाएँ जब घटती है तो लोगों को सोचने
पर मजबूर कर देती है और लोग इसके पीछे की वजह
जानने को बैचेन हो जाते है, ख़ासकर ऐसी घटनाएँ जब
पॉलिटिकल और फाईनेंशियल लेवल होती है तो मानो
पूरा सिस्टम ही लडखडा जाता है. कुछ ऐसी भी घटनाएँ
होती है जिससे देश की इकॉनमी को काफी झटका
लगता है और सिस्टम के लूप होल की पोल खुल जाती
है.
आज हम आपके सामने एक ऐसी ही सननीखेज़
घटना पेश करने जा रहे है जिसने ना सिर्फ़ हमारे देश
का सिस्टम बदल कर रख दिया था बल्कि इस घटना
के कारण देश की पॉलिटिकल माहौल में भी एक
जबर्दस्त भूचाल आ गया था. जिस इवेंट का हम यहाँ
जिक्र कर रहे है उसने इंटरनेशनल लेवल पर भी काफी
सुर्खियाँ बटोरी थी, ये सिर्फ एक इवेंट नहीं बल्कि
अच्छा-खासा स्कैम था जिसे स्कैम 1992 के नाम से
जाना जाता है. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है हम समझ
सकते है कि ये कोई महान काम नहीं था जिस पर
देश को नाज होता बल्कि उल्टा इसकी वजह से हमारे
देश की नटी नटनापी दर्द देश में टो ग्टे क तन

सपातहाफ पपाश्महान काम नहा या जिस पर
देश को नाज होता बल्कि उल्टा इसकी वजह से हमारे
देश की बड़ी बदनामी हुई. देश में हो रहे एक बहुत
बड़े घोटाले का पर्दाफाश क्या हुआ, बड़े-बड़े नाम और
पहुँच वालो पर भी ऊँगली उठनी शुरू हो गई. ये देश के
ईतिहास में अब तक का सबसे बड़ा फाईनेंशियल क्राइम
था जो अपने आप में अनूठा और अलग था.
क्या आपको पता है लोग क्यों बोलते है कि” एवरी डार्क
क्लाउड हैज़ अ सिल्वर लाईनिंग?” क्योंकि इस इवेंट
के साथ भी ऐसा ही कुछ था. खामी किसी भी सिस्टम
में हो सकती है. लेकिन इम्पोर्टेट ये है कि इन खामियों
को पहचानकर उन्हें दूर करने की कोशिश की जाए.
उस वक्त इंडियन फाइनेशियल सिस्टम में कई सारी
खामियां थी. सिस्टम के अंदर कई सारे ऐसे लूपहोल्स थे
कि लोग इन लूपहोल्स का फ़ायदा उठाकर सिस्टम की
नाक के नीचे अरबो-खरबों के घोटाले कर जाते थे और
किसी को कानो-कान खबर तक नहीं होती थी.
सिस्टम के अंदर करोड़ो रुपयों का हेर-फेर हो रहा था
जिसका कोई हिसाब लेने वाला नहीं था. पर आखिर
इसका मतलब क्या था ? जैसे एक्जाम्पल के लिए,
कई बार ऐसा होता है कि हमे अपने घर में कहीं सिक्के
पड़े मिल गये जो किसी को याद नहीं रहते और हमने
उठाकर अपनी जेब में रख लिए. हालांकि कुछ सिक्कों
के गुम हो जाने से घर की माली हालत में कोई फर्क
नहीं पड़ने वाला क्योंकि अमाउंट बहुत छोटा सा है.
ठीक यही चीज़ स्कैम ऑफ़ 1992 के साथ भी थी,

पड़े मिल गये जो किसी को याद नहीं रहते और हमने
उठाकर अपनी जेब में रख लिए. हालांकि कुछ सिक्कों
के गुम हो जाने से घर की माली हालत में कोई फर्क
नहीं पड़ने वाला क्योंकि अमाउंट बहुत छोटा सा है.
ठीक यही चीज़ स्कैम ऑफ़ 1992 के साथ भी थी,
फर्क बस इतना था कि यहाँ सिर्फ कुछ सिक्को का नहीं
बल्कि करोडो का मामला था. और ये पैसा हर किसी
के लिए अवलेबल था जिसे जल्द से जल्द अमीर बनना
था.
इंडिया कोई ऐसा देश नहीं है जहाँ कानून नहीं है.
हमारे सविंधान (constitution) में कई सारे कानून
है पर बात जब उन कानूनों को लागू करने की आये
तो वहां हम फेल हो जाते है. हमारे देश की गवर्नमेंट
पोलिसिज़ स्ट्रिक्ट है बल्कि कुछ ज़्यादा ही स्ट्रिक्ट
है लेकिन सिर्फ़ पेपर्स में. पर इसके साथ ही इन
पॉलिसीज़ में कई तरह की कमियां भी है. और इन्ही
कमियों के चलते स्कैम 1992 की शुरुवात हुई.
इस स्कैम में एक आदमी नहीं बल्कि कई लोग शामिल
थे. हालाँकि इनमे एक आदमी का नाम जो उछल का
सामने आया. यही वो आदमी था जिसने इस घोटाले
की सारी प्लानिंग की थी या यूं कह सकते है कि वो इस
खेल का मास्टरमाइंड था और उसका नाम था हर्षद
मेहता.

Harshad Mehta- The Scam
1992

हर्षद मेहता का जन्म 29 जुलाई, 1954 में पनेली
मोती, राजकोट में हुआ था. हर्षद के पिता शांतिलाल
मेहता एक छोटे-मोटे व्यापारी थे जो टेक्सटाइल का
बिजनेस करते थे और उसकी माँ रसीलाबेन मेहता
हाउसवाइफ थी. हर्षद के तीन और भाई थे, अश्विन,
सुधीर और हितेष मेहता. हर्षद का जब जन्म हुआ तब
मेहता परिवार मुंबई में रह रहा था. यही पर हर्षद ने
अपनी जिंदगी के शुरुवाती दस साल बिताएं. लेकिन
जब हर्षद के पिता बीमार पड़े तो परिवार को रायपुर,
मध्य प्रदेश शिफ्ट होना पड़ा. वहां आकर पिता की
हालत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा. तब हर्षद जनता
पब्लिक स्कूल, कैंप 2, भिलाई में पढ़ रहे थे. क्रिकेट
हर्षद का फेवरेट गेम था जिसमे वो काफी अच्छा था.
एक तरह से वो क्रिकेट का दीवाना था. हर्षद मेहता
बचपन से ही काफी जिद्दी, घमंडी और एरोगेंट नैचर का
था. अपनी क्लास में भी वो सबको परेशान करता रहता
था. उसे संभालना टीचर्स के लिए मुश्किल होता जा रहा
था, उसके क्लासमेट्स और टीचर्स सब उससे परेशान
रहते थे.
हर्षद हिंदी में बड़ा कमज़ोर स्टूडेंट था. उसका होमवर्क
भी कभीपारा नहीं रहना शा .और ना टी रसके स्कल

हर्षद हिंदी में बड़ा कमज़ोर स्टूडेंट था. उसका होमवर्क
भी कभी पूरा नहीं रहता था और ना ही उसके स्कूल
असाईनमेंट्स ही कम्प्लीट रहते थे. उसके टीचर चाहे
उसे कितना भी डान्ठे-फटकारे उसके कान में जूं तक
नहीं रेगती थी. जब वो सोलह साल का था तो एक
दिन उसकी हिंदी टीचर ने उससे तंग आकर प्रिंसिपल से
उसकी शिकायत कर दी. प्रिंसिपल सर ने हर्षद से कहा
कि वो अपने फादर को लेकर
स्कूल
आये.
हर्षद बेशक घर के बाहर कितना भी बत्तमीज़ और
अड़ियल था पर घर अपने पिता से थर-थर काँपता था.
वो नहीं चाहता था कि उसके पिता स्कूल आये और उन्हें
उसकी हरकतों के बारे में कुछ भी पता चले. तो उस
दिन जब उसे इस मुसीबत
छुटकारा पाने का कोई
ऊपाय नहीं सूझा तो वो मूवी देखने चला गया. वहां
उसे एक आईडिया आया. उसने एक बूढ़े आदमी को
अपनी चिकनी-चुपड़ी बातो में फंसाकर अपना नकली
अंकल बनने के लिए मना लिया.
अगले दिन वो उसी बूढ़े को अंकल बनाकर स्कूल ले
गया और प्रिंसिपल को बोला कि उसके फादर शहर से
बाहर गए है इसलिए वो अपने अंकल को लेकर आया
है. प्रिंसिपल को जरा भी शक नहीं हुआ. प्रिंसिपल
उस बूढ़े से हर्षद की शिकायत कर रहे थे और वो बूढा
चुपचाप सबकुछ सुनता रहा. उसने प्रिंसिपल से वादा
किया कि वो इस बात का ध्यान रखेगा कि आईंदा से
उन्हें हर्षद की कोई शिकायत नहीं मिलेगी और वो मन

पापापा इस बात का ध्यान रखा जादा स
उन्हें हर्षद की कोई शिकायत नहीं मिलेगी और वो मन
लगाकर पढाई करेगा . और इसके बाद दोनों प्रिंसिपल
के ऑफिस से बाहर आ गए.
.
हर्षद को यकीन नहीं हो रहा था कि सब कुछ इतनी
आसानी से निपट जाएगा, उसने एक नकली अंकल की
मदद से अपने स्कूल के प्रिंसिपल को बेवकूफ बनाया
था. और उसे इस बात की भी ख़ुशी थी कि अब उसके
फादर को कुछ भी पता नहीं चल पायेंग. उसे अपने
किये पर जरा भी शर्मिंदगी नहीं थी बल्कि वो खुद को
बड़ा कूल समझ रहा था.
उसके जैसे सोलह साल के लडके के लिए प्रिंसिपल की
आँखों में धुल झोंकना बहुत बड़ी अचीवमेंट थी जिसके
बारे सिर्फ़ उसे पता था और उसके नकली अंकल को.
लेकिन हर्षद अपने इस महान कारनामे को पेट में पचा
नहीं पा रहा था, वो शुरू से ही बड़बोला रहा था तो
इस बार भी चुप कैसे बैठता, और यही पर वो गलती
कर बैठा. उसने क्लास में सबको बता दिया कीपिंग
कैसे उसने प्रिंसिपल को उल्लू बनाया. जल्दी ही ये बात
पूरे स्कूल में फ़ैल गई. और उसके एक क्लासमेट ने
प्रिंसिपल से जाकर शिकायत भी कर दी.
प्रिंसिपल को जब सच्चाई का पता चला तो उसने हर्षद
को उसी वक्त स्कूल से रुस्टीकेट कर दिया. उधर जब
हर्षद के फादर को भी सारा किस्सा पता तो उनका भी
मारे गुस्से के पारा चढ़ गया, अपने बेटे की हरकतों से

मारे गुस्से के पारा चढ़ गया, अपने बेटे की हरकतों से
वो बेहद नाराज़ थे. उन्होंने हर्षद को अपनी क्लॉथ शॉप
में बैठाना शुरू कर दिया. अब उसे रोज़ सुबह आठ बजे
दूकान खोलनी होती थी और पूरा दिन दूकान संभालनी
पडती थी. उसके मौज-मस्ती के दिन अब गुजर चुके थे.
अब ना तो वो अपने दोस्तों से मिल सकता था और ना
ही पहले की तरह सारा दिन आवारागर्दी कर सकता था.
सबसे बड़ी बात तो ये थी कि उसे क्रिकेट खेलने तक की
भी परमिशन नहीं थी.
क्योंकि स्कूल से उसे रस्टीकेट कर दिया गया था तो वो
वापस स्कूल ज्वाइन नहीं कर सकता था. इसलिए
उसने स्कूली पढाई छोड़ दी और प्राईवेट एक्जाम दे
दिए. फिर 1973 में हर्षद अपने मामा के पास रहने
मुंबई चला आया. उन्ही दिनों रायपुर में उसके फादर
को बिजनेस में काफी घाटा हुआ जिसकी वजह से
वो आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे. हर्षद इन सारी घरेलू
परेशानियों से तंग आ चुका था, इसीलिए वो अपनी
किस्मत आजमाने मुंबई चला आया था. मुंबई आकर
उसने लाला लाजपत राय कॉलेज में एडमिशन लिया.
पढाई-लिखाई में तो उसे कभी दिलचस्पी नहीं रही थी
पर क्योंकि वो अच्छा क्रिकेट खेलता था तो कॉलेज में
उसे सेलेक्शन हो गया. वो शुरू से ही एक अच्छा प्लेयर
रहा था, अगर वो मुंबई ना आया होता तो शायद मध्य
प्रदेश स्टेट टीम में उसे एंट्री मिल जाती.
लेकिन इस बार वो मुंबई खेलने या पढाई करने नहीं

उसने स्कूली पढाई छोड़ दी और प्राईवेट एक्जाम दे
दिए. फिर 1973 में हर्षद अपने मामा के पास रहने
मुंबई चला आया. उन्ही दिनों रायपुर में उसके फादर
को बिजनेस में काफी घाटा हुआ जिसकी वजह से
वो आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे. हर्षद इन सारी घरेलू
परेशानियों से तंग आ चुका था, इसीलिए वो अपनी
किस्मत आजमाने मुंबई चला आया था. मुंबई आकर
उसने लाला लाजपत राय कॉलेज में एडमिशन लिया.
पढाई-लिखाई में तो उसे कभी दिलचस्पी नहीं रही थी
पर क्योंकि वो अच्छा क्रिकेट खेलता था तो कॉलेज में
उसे सेलेक्शन हो गया. वो शुरू से ही एक अच्छा प्लेयर
रहा था, अगर वो मुंबई ना आया होता तो शायद मध्य
प्रदेश स्टेट टीम में उसे एंट्री मिल जाती.
लेकिन इस बार वो मुंबई खेलने या पढाई करने नहीं
आया था बल्कि पैसा कमाने के इरादे से आया था
और वो भी ढेर सारा पैसा, इसलिए कॉलेज में रहते हुए
उसने कभी कॉलेज टीम के लिए नहीं खेला. वो एक
साइड बिजनेस करने में बिजी था. पढाई में उसे इंटरेस्ट
नहीं था तो उसके मार्क्स भी कभी अच्छे नहीं आये.
जैसे-तैसे उसने कॉलेज पास किया. और फाईनली अब
उसके पास कॉमर्स में बैचलर की डिग्री थी. ये 1977
की बात है.

Harshad Mehta- The Scam
1992

हर्षद मेहता कोई खानदानी अमीर नहीं था इसलिए वो
जानता था कि अगर ढेर सारा पैसा कमाना है तो इसके
लिए बहुत मेहनत भी करनी पड़ेगी. उसके पास फूटी
कौड़ी भी नहीं थी जो वो कहीं इन्वेस्ट करता और
ना ही बड़े-बड़े लोगों से उसके कनेक्शन थे जो उसे
अमीर बनने में मदद करते. कुल मिलाकर हर्षद के पास
गिने-चुने ऑप्शन थे और वो ये बात अच्छी तरह जानता
था. कॉलेज में पॉकेट मनी कमाने के लिए वो घर-घर
जाकर प्लास्टिक, हौजरी का सामान, सीमेंट और ना
जाने क्या-क्या बेचा करता. और कभी मौका पड़ने पर
वो कंस्ट्रक्शन साईट्स पर जाकर कंस्ट्रक्शन मैटिरियल
भी डिलीवर कर आता था.
1976 में कॉलेज के दिनों में ही उसका भाई अश्विन
भी उसके पास मुंबई आकर रहने लगा क्योंकि उसे
आईसीआईसीआई बैंक में जॉब मिल गई थी. दो साल
बाद 1978 में फेमिली बिजनेस ठप्प पड़ गया और एक
बार फिर से पूरा परिवार वापस मुंबई आ गया.
उन्ही दिनों हर्षद को न्यू इण्डिया एश्यूरेन्स कंपनी में एक
क्लर्क की जॉब मिली और सेलेरी थी महीने के छह सौ
रुपये. उसका काम था मरीन इंश्योरेंस क्लेम्स हैंडल
करता

पापा ५ मा जो सारा पानापहला
रुपये. उसका काम था मरीन इंश्योरेंस क्लेम्स हैंडल
करना.
इसी कंपनी में काम करने के दौरान पहली बार हर्षद
का परिचय स्टॉक मार्किट से हुआ और वो इस जादुई
दुनिया से बड़ा फेसिनेट हो गया जहाँ पलक झपकते ही
इंसान की किस्मत बदल जाती थी. यही वो जरिया था
जो उसके अमीर बनने का सपना जल्द से जल्द पूरा
कर सकता था.
.
लेकिन तब तक उसने कोई इललीगल कदम उठाने
के बारे में नहीं सोचा था. बेशक स्टॉक मार्किट की
दुनिया उसे बहुत लुभावनी लगी थी. लेकिन उसने अब
तक कोई बड़ा दांव नहीं खेला था. अक्सर वो कुछ
सौ या हजार तक की बेट लगाता, इससे ज़्यादा कुछ
नहीं पैसा उसकी चाहत तो था पर अभी तक जुनून
नहीं बन पाया था. पर इसके बावजूद 1978 में उसने
अपनी कंपनी न्यू इंडिया एश्यूरेंस कंपनी से रिक्वेस्ट की
कि उसे इंश्योरेंस डिपार्टमेंट से इन्वेस्टमेंट डिपार्टमेंट में
ट्रांसफर कर दिया जाए. हर्षद की जॉब ठीक-ठाक चल
रही थी पर कुछ एक्स्ट्रा पैसे कमाने के लिए वो कोई ना
कोई साइड वर्क करता रहता था.
रोज़ शाम वो डायमंड मार्केट जाकर वहां से रफ़
डायमंड्स खरीद लेता और फिर सूरत जाकर उन हीरों
को polish करवाकर महंगे दाम पर बेच देता. इन
वीकेंड ट्रिप्स से उसे करीब दो हजार तक की कमाई

जापन परा५ II जा पार सूरत जापार 91 हारा
को polish करवाकर महंगे दाम पर बेच देता. इन
वीकेंड ट्रिप्स से उसे करीब दो हजार तक की कमाई
हो जाती थी. लेकिन हर्षद को जितने भी पैसे मिले
उतने कम थे. वो किसी भी तरह जल्द से जल्द अमीर
बनना चाहता था. इसके दिमाग में कई सारे बिजनेस
आईडिया थे पर ऐसा बिजनेस कोई नहीं था जहाँ उसे
करोड़ो की कमाई होती. स्टॉक मार्केट में बेशक उसकी
दिलचस्पी थी मगर अभी तक उसने इसे एक राईट
ऑप्शन के तौर पर नहीं लिया था . ये ये बात है 1979
की.
फिर एक दिन की बात है, हर्षद अपने परिवार के साथ
बैठकर अपने सपनों को पूरा करने के बारे में डिस्कस
कर रहा था. सबका यही मानना था कि अगर उनके
पास ढेर सारा पैसा होता और बड़े-बड़े लोगों से
कॉन्टेक्ट्स होते तो वो भी एक सक्सेसफुल बिजनेस
चला पाते पर उनके परिवार के पास दोनों में से
कुछ
भी
नहीं था.
हर्षद के भाई अश्विन ने कहा कि उन्हें अब स्टॉक
मार्किट में किस्मत आजमानी चाहिए.
दोनों भाई जॉब करते थे जिससे उनका गुज़ारा होता
था इसलिए उन्होंने फैसला किया कि वो अभी जॉब
नहीं छोड़ेंगे और स्टॉक मार्केट में भी ट्राई करते रहेंगे.
लेकिन स्टॉक मार्केट के बारे में उन्हें कोई नॉलेज नहीं
थी इसलिए उन्होंने सोचा क्यों ना पहले स्टॉक मार्केट

थी इसलिए उन्होंने सोचा क्यों ना पहले स्टॉक मार्केट
की थोड़ी-बहुत स्टडी की जाए. दोनों भाईयों ने डिसाइड
किया कि अपने लंच ब्रेक में दोनों बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज
जाया करेंगे.
स्टॉक मार्केट में हर किसी को आने की परमिशन नहीं
मिलती थी. अंदर सिर्फ़ वही लोग जा सकते थे जो
जॉबर्स या ब्रोकर्स थे. लेकिन हर्षद कब रुकने वाला
था. लोगों को झांसा देकर काम निकलवाना तो उसके
बाएं हाथ का खेल था. बड़े आराम से सिक्योरिटी गार्ड
को गच्चा देकर उसने अंदर जाने की परमिशन ले ली.
दोनों जब अंदर पहुंचे तो हर्षद का दिमाग चकरा गया,
उसी पल उसने फैसला कर लिया कि यही वो जगह है
जिसका उसे इंतज़ार था और जहाँ उसे होना चाहिए था.
और उसी वक्त उसने फैसला किया कि वो एक जॉबर
बनेगा. एक जॉबर की जॉब होती है बायर्स और सेलर्स
को आपस में मिलाना. लेकिन ये इतना आसान भी नहीं
था. जॉबर बनने के लिए किसी ब्रोकर का सपोर्ट चाहिए
था और एक जॉबर के पास एक बैज भी होता है जो
सिर्फ एक ब्रोकर् ही उसे दे सकता है.
अब हर्षद को किसी ब्रोकर की तलाश थी जो उसे
जॉबर बनने में मदद कर सके इसलिए वो कुछ ब्रोकर्स
के पास गया ताकि उसे बैज मिल सके पर बात नहीं
बनी. फिर उसे एक ब्रोकर मिला पर वो उसे बैज देने

के पास गया ताकि उसे बैज मिल सके पर बात नहीं
बनी. फिर उसे एक ब्रोकर मिला पर वो उसे बैज देने
में इसलिए हिचकिचा रहा था क्योंकि एक तो हर्षद
अजनबी था और दूसरा उसे स्टॉक मार्केट का कोई
एक्सपीरिएंस भी नहीं था. लेकिन जैसा कि हमने पहले
भी बताया हर्षद लोगों को कन्विंस करने में माहिर था
तो उसने इस ब्रोकर को भी अपनी लच्छेदार बातों में
फंसा लिया और बैज हासिल करने में कामयाब रहा.
काम के पहले ही दिन उसने एक बड़ा नुकसान कर
दिया था और ब्रोकर उसे जॉब से निकालने को तैयार
हो गया. लेकिन फिर उसने ब्रोकर के हाथ-पैर जोड़ते
हुए उससे वादा किया कि आईंदा से कभी इस तरह की
गलती नहीं होगी. और ये जॉब थी भी कुछ इसी तरह
की. तो ये डिसाइड किया गया कि हर्षद की नौकरी
उसके रोज़ की परफोर्मेंस के हिसाब से तय की जायेगी.
अगर उसने प्रॉफिट कमाया तो टिका रहेगा अगर नहीं
तो उसे कभी भी नौकरी से निकाला जा सकता है.
पर जल्द ही हर्षद ने इस फील्ड की नब्ज़ पकड़ ली थी.
उसने स्टॉक मार्केट का बेस्ट जॉबर बनके दिखाया. वो
इस काम में स्किल्ड हो चूका था लेकिन अभी उसके
सपनों के राह में बहुत सारी रूकावटे थी.

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1992
GIGL TEAM
हर्षद ने देखा कि स्टॉक मार्केट में हर कोई गैंबल खेल
रहा है. क्योंकि गैम्बलिंग की तरह ही यहाँ भी लोगों
को बिना छानबीन किये बेट लगाने की आदत है चाहे
बाद में फ़ायदा हो या नुकसान. जैसा कि सब जानते
है शेयर मार्केट बड़ा ही रिस्की बिजनेस माना जाता है
तो हर्षद ने सोचा कि अगर उसे सच में पैसे कमाने है
तो कोई ऐसा तरीका सोचना होगा जिससे वो राईट बेट
लगा सके जो प्रॉपर इन्फोर्मेशन पर बेस्ड हो. और अगर
प्रॉफिट चाहिए तो उसे एडवांस में इन्फोर्मेशन चाहिए
होगी.
वो उन कंपनियों के बारे में और ज़्यादा जानकारी
जुटाना चाहता था जिनके स्टॉक वो लेने की सोच रहे
थे ताकि उस कंपनी के स्टॉक लेने चाहिए या नहीं, ये
डिसाइड कर सके. अगर किसी तरह ये पता चल जाये
कि कंपनी के अंदर क्या चल रहा है तो उसका काम
आसान हो सकता था ताकि आसानी से प्रॉफिट और
loss का अंदाज़ा लग सके. इसे इनसाइडर ट्रेडिंग
कहते है जो फॉरेन कन्ट्री में इललीगल थी. लेकिन
इण्डिया में तब ये इललीगल नहीं थी और इस तरह
हर्षद ने इसका पूरा-पूरा फ़ायदा उठाया.
स्टॉक मार्केट में जॉबर बनकर उसकी कमाई के रास्ते तो

स्टॉक मार्केट में जॉबर बनकर उसकी कमाई के रास्ते तो
खुले ही साथ ही उसे मार्केट को समझने का मौका भी
मिला. उसे इस फील्ड का अच्छा-खासा एक्सपीरिएंस
हो चुका था इसलिए अब उसे खुद ट्रेडिंग करने से कोई
डर नहीं था. इसके लिए उसे एक ट्रेडिंग अकाउंट की
जरूरत थी. यानि अब उसे जो भी फ़ायदा या नुकसान
होगा वो सब उसका था. हर्षद बड़े-बड़े रिस्क ले रहा
था और उसकी किस्मत अच्छी थी कि 1982 में स्टॉक
मार्केट उंचाइयो पर था. नतीजा ये हुआ कि हर्षद के
पास अब इतना पैसा था कि वो ऐशो-आराम से भरी
लाइफ जा सकता था.
लेकिन जैसे-जैसे उसकी कमाई बढती जा रही थी,
उसका रिस्क टेकिंग का शौक भी बढ़ता जा रहा था. वो
कम से कम टाइम में ज़्यादा से ज़्यादा प्रॉफिट कमाने
की फ़िराक में रहता था. लेकिन इसके लिए उसने क्या
प्लान किया था? दरअसल वो काफी ज़्यादा स्टॉक
खरीद कर रख लेता ताकि उसके दाम बढ़ जाये, और
जैसे ही प्राइस बढ़ते वो स्टॉक बेच देता. उसने अपने
साथ के एक स्टॉक ब्रोकर के साथ टीम बनाई जो उसी
की तरह चालाक और इंटेलिजेंट था. दोनों मिलकर
किन्ही दो कंपनीज़ के ज़्यादा से ज़्यादा स्टॉक खरीद
लिया करते थे हालाँकि इसके बावजूद उन्हें उतना
प्रॉफिट नहीं हो पा रहा था जितनी उन्हें उम्मीद थी.
जितना उन्होंने सोचा था, उस हिसाब से प्राइस ज़्यादा
– ..
ना
गा

जितना उन्होंने सोचा था, उस हिसाब से प्राइस ज़्यादा
नहीं बढ़े थे हाँ थोड़े-बहुत ऊपर चढ़े थे पर हर्षद इससे
कहीं ज़्यादा की उम्मीद लगाये बैठा था. दोनों ज़्यादा
से ज़्यादा स्टॉक खरीदते जा रहे थे पर उन्हें तसल्ली
नहीं हो पा रही थी. हर्षद प्रॉफिट और लोस के गेम
का माहिर खिलाड़ी बन चूका था. उसकी स्किल्स दिन
ब दिन शार्प होती जा रही थी जो आने वाले वक्त में
उसे बहुत बड़ा फ़ायदा पहुंचाने वाली थी. लेकिन अभी
1982 में ऐसा भारी उलट फेर होने वाला था जिसका
अंदाज़ा किसी को नहीं था. 18 मार्च, 1982 को
सुबह मार्केट एकदम प्लेन नोट पर खुली, कहीं कोई
ख़ास हलचल नहीं थी पर दोपहर होते-होते मार्केट में
बड़ा भारी उतार आया. किसी को कुछ समझ नहीं आ
रहा था कि क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है लेकिन
स्टॉक प्राईसेस लगातार गिरते जा रहे थे. इस दिन को
स्टॉक मार्केट की हिस्ट्री में ब्लैक थर्सडे के नाम से भी
जाना जाता है.
हर्षद को बड़ा भारी नुकसान उठाना पड़ा. वो स्टॉक
प्राइस इनक्रीज होने की थ्योरी पर काम कर रहा था
ताकि ज़्यादा प्रॉफिट कमा सके पर यहाँ पूरी बाजी ही
पलट गई थी. उसने पहले से ही ज़्यादा शेयर्स खरीद
कर रखे थे यानि उसे एक तगड़ा झटका लग चूका था.
वो अभी एक जॉबर ही था और अच्छा कमा रहा था
लेकिन उस दिन उस पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा था.
लेकिन हर्षद ने पहले से काफी पैसा सेव कर रखा था

लेकिन हर्षद ने पहले से काफी पैसा सेव कर रखा था
इसलिए वो और उसका परिवार दिवालिया होने से बच
गए थे. लेकिन अब वो पहले की तरह गरीब हो चुके थे.
आने वाले कुछ महीने हर्षद और उसके परिवार पर कई
तरह की मुसीबते आई. 7 जून, 1982 का दिन था जब
हर्षद मेहता के पिता इस दुनिया को अलविदा कह गए.
पिता की मौत से हर्षद बुरी तरह टूट गया था.
लेकिन हर्षद ज़िंदगी की मुश्किलों से हार मान कर
बैठने वालो में से नहीं था. उसके लिए अब एक्शन
लेने का टाइम आ चूका था. उसे एहसास हुआ कि अब
उसे किसी ब्रोकर के अंडर में और काम नहीं करना
है. उसने अपने भाई अश्विन के साथ मिलकर ग्रोमोर
कन्सल्टेंट्स के लिए काम करना शुरू कर दिया.
हर्षद इस बात को लेकर श्योर था कि वो अपने
क्लाइंट्स को हाई रिटर्न्स दे सकता है. और उसने ऐसा
किया भी. दोनों भाई मिलकर महीने का कोई 2000
कमा लेते थे और हर महीने उनकी पहले से ज़्यादा
कमाई हो रही थी. हर्षद को रियेलाईज़ हुआ कि उन्हें
अपने ब्रोकर्स को अपने प्रोफिट्स में से एक बड़ा हिस्सा
देना पड़ता है जो ग्रोमोर के मालिक थे जबकि दोनों
भाई सब-ब्रोकर्स थे.
तो हर्षद ने डिसाइड किया कि अब उन्हें खुद बॉम्बे
स्टॉक एक्सचेंज में ब्रोकर की हैसियत से काम करना
चाहिए. हर्षद ने एक मेंबरशिप कार्ड खरीद लिया और

किया भी. दोनों भाई मिलकर महीने का कोई 2000
कमा लेते थे और हर महीने उनकी पहले से ज़्यादा
कमाई हो रही थी. हर्षद को रियेलाईज़ हुआ कि उन्हें
अपने ब्रोकर्स को अपने प्रोफिट्स में से एक बड़ा हिस्सा
देना पड़ता है जो ग्रोमोर के मालिक थे जबकि दोनों
भाई सब-ब्रोकर्स थे.
तो हर्षद ने डिसाइड किया कि अब उन्हें खुद बॉम्बे
स्टॉक एक्सचेंज में ब्रोकर की हैसियत से काम करना
चाहिए. हर्षद ने एक मेंबरशिप कार्ड खरीद लिया और
ऑपरेट करना शुरू कर दिया. ये सब कुछ 12 दिसम्बर,
1982 के वक्त शुरू हुआ था.
हर्षद की ज़िंदगी अब किसी रेल की तरह तेज़ रफ्तार
से दौड़ रही थी. आखिरकार उसके सपने अब पूरे हो
रहे थे. वो कंपनियों के बारे में रिसर्च करके स्टॉक लेता
और बेचता था जिससे वो बेहिसाब पैसे कमा रहा था,
तब तक हर्षद मेहता स्टॉक मार्केट की दुनिया का एक
बड़ा प्लेयर बन चुका था. उसे बड़े-बड़े रिस्क लेने का
शौक था और उसके फैसले कभी गलत नहीं होते थे
शायद इसीलिए उसे स्टॉक मार्केट में “बिग बुल” का
टाईटल मिल गया था. ये उसके लिए एक बहुत बड़ी
अचीवमेंट थी.

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1992
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हर्षद पैसों में खेल रहा था, उसके पास इतनी पॉवर थी
कि वो जब चाहे मार्केट प्राइस को बढ़ा या घटा सकता
था. सन 1991-92 में जब उसने स्कैम किया था, इन दो
सालो में स्टॉक मार्केट अपने पीक पर थी. इससे पहले
स्टॉक मार्केट में इतना बड़ा उछाल पहले कभी देखने
को नहीं मिला था. लेकिन मार्केट में सब्सटेंशियल
प्रॉफिटेबल इन्वेस्टमेंट के लिए काफी बड़ी रकम की
जरूरत थी. लेकिन हर्षद मेहता के पास खानदानी पैसा
या कोई फाइनेशियल बैकिंग नहीं थी.
उसने पैसे का इंतजाम करने के लिए जुगत लगानी
शुरू कर दी. उसने डिसाइड किया कि वो बैंक से लोन
लेगा. उसने क्या किया कि वो बैंक से पैसा ले लेता था
और फिर नकली बैंक रीसीट और SCL बनाता जिसमे
लिखा होता कि बैंक ने उससे सिक्योरिटी खरीदी है.
लेकिन इसके लिए उसे बैंक के ही किसी आदमी की
हेल्प चाहिए थी जो इस धोखाघड़ी में उसका साथ दे.
और मजे की बात तो ये थी कि उसे एक नहीं बल्कि
कई लोग मिल गए जो पैसे के लालच में उसका साथ
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जार नपा पार || ५ पास ९५ पहा पाएप
कई लोग मिल गए जो पैसे के लालच में उसका साथ
देने को तैयार थे.
तो बेसिक प्लान ये था कि हर्षद को बैंक से लोन पर
पैसा लेना था और उस पैसे को प्रॉफिट कमाने के लिए
कहीं इन्वेस्ट करना था. अब लोन वापस ना करना
पड़े इसके लिए वो ऐसे पेपर रिसीट तैयार करवाता
था जिनमे नकली transaction दिखाई जाती थी.
यानी इसका मतलब बैंक्स हर्षद को सिक्योरिटी के लिए
पैसा दे रहे है जो असल में उन्हें कभी मिलता ही नहीं
था और ये पैसा कोई छोटी-मोटी रकम नहीं थी बल्कि
करोड़ो में था.
दरअसल फाइनेंस की दुनिया में कई तरह के सीक्रेट्स
होते है और जिन्हें फाईनेंस की जानकरी नहीं होती
उन्हें मुश्किल से इस बारे में कोई जानकारी होती है.
बेशक हर्षद मेहता को बिग बुल का ख़िताब मिला था
पर उस दुनिया के बाहर शायद ही कोई उसे जानता हो.
ब्रोकर्स काफी सारा पैसा कमाते है पर उसे ज़्यादा शो
नहीं करते. लेकिन हर्षद औरो की तरह नहीं था. वो
शानो-शौकत से जीने का शौकीन था. उसे शो-ऑफ़
करने का शौक था ठीक उसी तरह जैसे उसने अपने
प्रिंसिपल को बेवकूफ बनाने का कारनामा दोस्तों को
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प्रिंसिपल को बेवकूफ बनाने का कारनामा दोस्तों को
सुनाया था जब वो सोलह साल का था. और तब लोगों
को उस पर शक होने लगा. लोग हैरान थे कि आखिर
उसके पास इतना सारा पैसा आया कहाँ से. इनकम
डिपार्टमेंट को उस पर शक हो गया था.
आरबीआई को जल्दी ही इस गडबड घोटाले की
भनक लग गई. और फिर जब स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया
को जहाँ से वो लोन लिया करता था, उसकी इस
सच्चाई का खुलासा हुआ तो उनके होश उड़ गए,
transaction में 500 करोडो से भी ज़्यादा का
फर्क पाया गया. और इस तरह 1992 में अप्रैल के एंड
तक इस पूरे स्कैम का खुलासा हो चूका था. ये देश के
इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा फाईनेंशियल क्राइम
था. जिसमें पूरे 5000 करोड़ का दांव खेला गया था.
स्कैम के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने हर्षद
मेहता को इस घोटाले का जिम्मेदार मानकर मुजरिम
करार देते हुए पांच साल जेल की सजा सुनाई.
37 दिसम्बर, 2007 के दिन ठाणे, महाराष्ट्रा में 47 साल
की उम्र में हर्षद मेहता की अचानक हार्ट अटैक आने
की वजह से मौत हो गई. उसके खिलाफ 27 क्रिमिनल
चार्ज लगे थे जिनमे से उसकी मौत से पहले उसे चार
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चार्ज लगे थे जिनमे से उसकी मौत से पहले उसे चार
का दोषी पाया गया था.
इस स्कैम के खुलासे के बाद तेज़ी से कई घटनाएँ घटी.
क्योंकि ज्यादातर transaction हर्षद मेहता के नाम
पर थे तो स्टॉक मार्केट में एकदम से मंदी आ गई थी.
आम जनता में एक पैनिक का माहौल फ़ैल गया था.
कई लोगों की पूरी जिंदगी ही तबाह हो गई. कई सारे
बैंक ऑफिसर जो इस स्कैम का हिस्सा बने थे, उनकी
नौकरी चली गई. यानी पूरा का पूरा बैंकिंग सिस्टम ही
एक तरह से चरमरा गया था.
गवर्नमेंट को एहसास हुआ कि सिस्टम में लूपहोल्स होने
की वजह से हर्षद मेहता और उसके साथी इस घोटाले
को अंजाम देने में कामयाब रहे. फाईनेंशियल स्ट्रक्चर
बुरी तरह चरमराया हुआ था. सिस्टम में कई तरह
के रीफोर्म लाने की जरूरत थी ताकि जल्द से जल्द
लडखडाती अर्थ-व्यवस्था एक बार फिर से खड़ी हो
सके.
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना की गई जिसकी
देखरेख की जिम्मेदारी सिक्योरिटज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड
ऑफ़ इण्डिया की थी और जिसका काम है एनएसई के
तान को यातादन करना
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के रीफोर्म लाने की जरूरत थी ताकि जल्द से जल्द
लडखडाती अर्थ-व्यवस्था एक बार फिर से खड़ी हो
सके.
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना की गई जिसकी
देखरेख की जिम्मेदारी सिक्योरिटज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड
ऑफ़ इण्डिया की थी और जिसका काम है एनएसई के
कामकाज को सुपरवाइज़ करना.
ये हमारे देश का सबसे बड़ा मनी स्कैंडल माना जाता है.
लेकिन इसकी वजह से इण्डिया के फाइनेंशियल सेक्टर
में काफी कुछ जरूरी बदलाव भी लाये गए ताकि फिर
कभी इस तरह की दुर्घटना ना घटे. ये स्टोरी हर किसी
के लिए एक रीमाइंडर है कि पैसे कमाना गलत नहीं
है बल्कि गलत तरीको से पैसा कमाना गलत है. जो
लोग शोर्ट कट से पैसा कमाने के चक्कर में गलत और
गैर-कानूनी काम करते है, बेशक कुछ वक्त तो उन्हें
कामयाबी मिल जाती है पर ऐसे लोग क़ानून के शिकंजे
में कभी ना कभी जरूर फंसते है और उनके ताश के
पत्तो का बना महल भरभरा कर टूट जाता है.

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