FORTUNE The Greatest Business Decisions of All… Verne Harnish Books In Hindi Summary Pdf

FORTUNE The Greatest Business Decisions of All… Verne Harnish इंट्रोडक्शन क्या आप कभी किसी कंपनी के सीईओ बनने का सपना देखते हो? क्या आपने कभी सोचा कि कैसा होता अगर आप अपनी खुद की कंपनी के लीडर होते? इस समरी में आप पढ़ेंगे दुनिया की सबसे सक्सेसफुल कंपनियों की कहानियाँ. आप उनके उन डिसीजंस के बारे में भी जानेंगे जिसकी वजह से उन्हें एक ग्रेट कंपनी बनने में हेल्प मिली. इसमें आप टाटा स्टील के सेपरेशन स्कीम और नॉर्डस्ट्रॉम की return policy के बारे में सीखेंगे. साथ ही आप फ़ोर्ड की पे इनक्रीज के बारे में और वॉलमार्ट की saturday की morning मीटिंग के बारे में जानेगे और फाईनली आपको सैमसंग की regional स्पेशिलिस्ट के बारे में भी सीखने को मिलेगा. क्या आप स्टार्ट-अप फाउंडर है या एक एंटप्रेन्योर? क्या आप एक स्टूडेंट है या एम्प्लोई जो फ्यूचर में एक इन्फ्लुयेंशल लीडर बनने के सपने देखता है? अगर ऐसा है तो ये समरी सिर्फ आपके लिए ही बनाई गई है और आपको इसे जरूर पढ़ना चाहिए. ये आपको एक झलक दिखाएगी कि लाइफ में ऐसे बड़े-बड़े डिसिशन लेने से कैसा फील होता है जो इकॉनमी पर बड़ा इम्पैक्ट जाने और होंगी – पार झलक दिखाएगी कि लाइफ में ऐसे बड़े-बड़े डिसिशन लेने से कैसा फील होता है जो इकॉनमी पर बड़ा इम्पैक्ट डालते है और लाखों लोगों की जिंदगी को बदल सकते हैं. Tata Takes the Sting out of a Painful Situation जे. जे ईरानी जमेशदपुर, इंडिया में टाटा स्टील प्लांट में मैनेजर है. ये 1933 की बात है. एक quaterly मीटिंग के दौरान उन्हें अपने स्टाफ के साथ एक बुरी ख़बर शेयर करनी थी. असल में टाटा स्टील efficiency की वजह से काफी नुकसान झेल रहा था. इसलिए मजबूरन कंपनी को काफी बड़ी तादाद में वर्कर्स को जॉब से निकालने का डिसिशन लेना पड़ा. खुद कंपनी के लिए ये बेहद मुश्किल फैसले की घड़ी थी जोकि उसकी ट्रेडिशनल ईमेज के एकदम खिलाफ थी क्योंकि टाटा स्टील की इमेज एक ऐसी कंपनी की थी जो लोगों को जॉब देती है. एक बार आपको यहाँ जॉब मिल गई तो मतलब आप उम्र भर इसी कंपनी में काम करते रहेंगे. यही नहीं, कंपनी अपने वर्कर्स को कई तरह के बेनिफिट भी देती है. किसी एम्प्लोई के 25 साल पूरे होने पर उसके बेटे या बेटी को उसके बदले में जॉब मिल जाती थी. तो एक तरह से टाटा कंपनी लोगों को जॉब देती है. टाटा कंपनी में जॉब लाइफ टाइम के लिए नहीं बल्कि कई जेनरेशन तक चलती है. तो इस मीटिंग में अभी जे. जे, ईरानी अपनी बात शुरू भी नहीं कर पाए थे कि तभी एक एम्प्लोई जोरो से ता इस माम जमा ज.ज, इराना जपना बात शुरू भी नहीं कर पाए थे कि तभी एक एम्प्लोई जोरो से चिल्लाते हुए बोला, “आप हमारे बच्चों की जॉब छीन रहे हैं!” इस पर ईरानी ने जवाब दिया, “आप अपने बच्चों की जॉब के लिए परेशान है पर मैं तो अपनी और आपकी जॉब के लिए परेशान हूँ. अगर मैं ये सैक्रिफाइस नहीं करूंगा तो ना आपकी जॉब रहेगी और ना मेरी”. ये काफी मुश्किल की सिचुएशन थी, लेकिन कोई न कोई कदम तो उठाना ही था. 1950 से लेकर 1980 तक टाटा स्टील पर गवर्नमेंट का कण्ट्रोल हुआ करता था. तब इंडिया में बिजनेस की ओपन पॉलिसी नहीं चलती थी और इकॉनमी सोशलिस्ट पैटर्न पर चल रही थी. फॉरेन कॉम्पटीटर्स को मार्केट में नहीं आने दिया जाता था और जहाँ तक लोकल कॉम्पटीटर्स का सवाल था तो उन पर भी पूरी तरह से गवर्नमेंट का कण्ट्रोल था. तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि कंपनी एफिशिएंट है या नहीं. जैसा कि हमने बताया टाटा कंपनी भी गवर्नमेंट के अंडर थी तो टाटा की मेन ज़िम्मेदारी थी बहुत से लोगों को जॉब देना . लेबर कॉस्ट का खर्चा गवर्नमेंट उठा रही थी और वर्कस की सैलरी स्टील प्राइस के जरिये पे कर दी जाती थी. साथी ही गवर्नमेंट टाटा को ये भी ऑर्डर देती थी कि क्या manufacture करना है और कितनी quantity में करना है, किसे बेचना है और किस प्राइस पर बेचना है, ये सब गवर्नमेंट के अंडर में होता था. थारानी तम्रत गाटा टनर तना लेती थी कितना quality मकरना 6, किस षचना आर किस प्राइस पर बेचना है, ये सब गवर्नमेंट के अंडर में होता था. अगर कंपनी ज़रुरत से ज़्यादा प्रोडक्ट बना लेती थी तो उसे इसका जुर्माना भुगतना पड़ता था. टाटा को modern टेक्नोलॉजी या बदलने के लिए गवर्नमेंट ने कभी कोई स्टेप नहीं लिया. लेकीन फिर 1990 के दशक में भारी बदलाव आया. इण्डिया को वर्ल्ड इकॉनमी फेस करनी पड़ी. कई कम्यूनिस्ट देश आज़ाद हुए और उन्हें इकनोमिक बूम एक्सपीरिएंस करने को मिला. जबकि वही दूसरी तरफ इण्डिया में भुखमरी और गरीबी छाई थी. तो इस तरह वर्ल्ड इकॉनमी को देखते और समझते हुए इंडीयन गवर्नमेंट ने भी सोशलिज्म के बजाए कैपिटलिज्म पर फोकस करना शुरू किया यानी कंपनी का प्राइवेटीजेशन, डीरेगुलेशन और इंटरनेशल ट्रेड में इण्डिया की एंट्री हुई. टाटा स्टील भी अचानक आये इस बदलाव से कॉम्पटीशन में आ गया और उसने खुद को इम्प्रूव करने के लिए ज़ोरों-शोरों से कदम उठाने शुरू कर दिए ताकि बाकि स्टील मेकर्स से कहीं वो पीछे ना रह जाएँ. टाटा स्टील के प्रोसेस और फेसिलिटी काफी ओल्ड फैशंड थी. सबसे पहले तो कंपनी को ये पता करना था कि उनके पास टोटल कितने एम्प्लोईज़ है. एक्जेक्ट फिगर पता करने में कंपनी को पूरे तीन महीने लग गए तो पता चला कि कंपनी में टोटल 78,000 एम्प्लोईज है जिनमें से 3000 सेक्रेटरी और ऑफिस boys थे. अकेले नाटिंग दाटीटमेंटी 12 टार्टनर और रित्योरिटी प4 पापा 1ILVI /Uoo एन्सारण हाणन से 3000 सेक्रेटरी और ऑफिस boys थे. अकेले एकाउंटिंग डिपार्टमेंट में ही 32 ड्राईवर और सिक्योरिटी गार्ड थे. टाटा के पास एक डिपार्टमेंट था जहाँ पेंट बनता था. एक और डिपार्टमेंट था जहाँ पर आइस बनती थी. उनका खुद का डेयरी फार्म भी था. टाटा हर साल 100 टन स्टील प्रोड्यूस करता था जबकि अमेरिकन स्टील कंपनी साल में करीब 1000 टन स्टील बना रही थी. तो इस प्रॉब्लम का टाटा ने आखिर क्या सोल्यूशन निकाला? इसे अर्ली सेपरेशन स्कीम या ESS नाम दिया गया था जो स्टील प्लांट मैनेजर जे. जे, ईरानी का फ़ॉर्मूला था. इस स्कीम को उन्होंने 1994 में इम्प्लीमेंट करना स्टार्ट किया और नीचे इसकी एक झलक है कि ये आईडिया कैसे काम करता है. 40 साल से कम उम्र के वर्कस को तब तक फुल सैलरी मिलेगी जब तक कि वो 6] की उम्र यानि रिटायरमेंट तक ना पहुंच जाएं. भले ही वो तब तक टाटा स्टील छोड़ चुके हो. जबकि 40 से ऊपर की उम्र वाले एम्प्लोईज़ को काफी बड़ा अमाउंट मिलेगा और उनकी सैलरी का 20 से 50% तक एडिशनल पैसा मिलेगा और अगर किसी की 67 साल से पहले डेथ हो जाती है तो भी उनकी फेमिली को मन्थली सैलरी मिलती रहेगी. जो भी एम्प्लोई कंपनी के जमेशदपुर हाउसिंग क्वार्टर में रहेंगे उनकी और उनकी फेमिली को कंपनी की तरफ से फ्री मेडिकल हेल्प दी जाएगी. अगर वो जमशेदपुर से बाहर रहते है तो फिर उन्हें फ्री मेडिकल इंश्योरेंस दिया जागा दसके अलावा हर एक एमप्लोई किसी और घर और अगर किसी की 67 साल से पहले डेथ हो जाती है तो भी उनकी फेमिली को मन्थली सैलरी मिलती रहेगी. जो भी एम्प्लोई कंपनी के जमेशदपुर हाउसिंग क्वार्टर में रहेंगे उनकी और उनकी फेमिली को कंपनी की तरफ से फ्री मेडिकल हेल्प दी जाएगी. अगर वो जमशेदपुर से बाहर रहते है तो फिर उन्हें फ्री मेडिकल इंश्योरेंस दिया जाएगा. इसके अलावा हर एक एम्प्लोई किसी और घर में शिफ्ट होने से पहले तीन साल तक कंपनी के घर को यूज़ कर सकता है. यानि कुल मिलाकर ESS काफी अच्छी स्कीम थी. लेकिन इससे टाटा को पैसे बचाने और अपनी एफिशिएंसी लेवल इम्प्रूव करने में कैसे हेल्प मिली? अगर एम्प्लोईज़ कंपनी में बने रहते है तो सैलरी इनक्रीज होती रहेगी. लेकिन ESS स्कीम के साथ सैलरी अमाउंट हर महीने सेम मिलेगी जब तक कि एम्प्लोई 61 का नहीं हो जाता. साथ ही टाटा को अब और पेरोल टैक्स नहीं देना होगा और ना ही कोई रिटायरमेंट प्लान कोंट्रीब्यूशन बनाना पड़ेगा. लेबर कॉस्टभी धीरे-धीरे कम होती जाएगी. और वाकई में 2004 आते-आते टाटा के एम्प्लोईज़ 78000 से घटकर 47000 रह गए थे. कम लेबर कॉस्ट और $7 बिलियन के नए इन्वेस्टमेंट ने टाटा स्टील को अब पहले से ज्यादा कॉम्पटीटिव और एफिशिएंट ग्लोबल फर्म बना दिया था. FORTUNE The Greatest Business Decisions of All… Verne Harnish Extreme Customer Service at Nordstrom नॉर्डस्ट्रॉम एक सिएटल बेस्ड अमेरिकन क्लोथिंग कंपनी है. ये अपनी एक्स्ट्राओर्डीनेरी कस्टमर सर्विस के लिए काफी फेमस है. इस कंपनी की return policy बेहद लिबरल है. नॉर्डस्ट्रॉम अपने कस्टमर्स का लौटाया हुआ कोई भी प्रोडक्ट लेने को तैयार रहती है. यहाँ तक कि वो अपने कस्टमर्स के पैसे भी रिफंड कर देते है, चाहे आपने प्रोडक्ट किसी भी समय लिया हो या फिर आपके पास चाहे उसका बिल हो या ना हो, कंपनी आपसे कोई सवाल नहीं करती. क्या आपके पास ऐसे फटे-पुराने जूते है जो आप पिछले पांच सालों से पहन रहे है? नॉर्डस्ट्रॉम वो भी आपसे वापस ले लेगी. क्या आपने कल कोई जैकेट ली थी जिसे रात की पार्टी में पहनने के बाद अब आप वापस करना चाहते हो? नॉर्डस्ट्रॉम बिना किसी प्रॉब्लम के आपसे वो जैकेट वापस ले लेगी. तो देखा आपने! इस कंपनी की return policy किस हद तक लिबरल है, जिसकी तुलना आप किसी और कंपनी से कर ही नहीं सकते. नॉर्डस्ट्रॉम भाइयों ने काफी पहले ही डिप्रेशन के दौरान ये यूनीक डिसिशन लिया था. तब उनकी कंपनी एक लोटी कानी टया करती थी लॉन नॉर्टमॉग तलोशिंग नॉर्डस्ट्रॉम भाइयों ने काफी पहले ही डिप्रेशन के दौरान ये यूनीक डिसिशन लिया था. तब उनकी कंपनी एक छोटी कंपनी हुआ करती थी. जॉन नॉर्डस्ट्रॉम क्लोथिंग बिजनेस के फाउंडर थे, जिसे बाद में उनके तीन बेटे एवरेट, एल्मेर और लॉय्ड मिलकर संभालने लगे. जॉन नॉर्डस्ट्रॉम 16 साल की उम्र में स्वीडन से आए थे. शुरुआत में उन्हें लेबर और पोटैटो फार्मर की जॉब भी करनी पड़ी थी. फिर 1897 के गोल्ड रश के टाइम उन्होंने थोडा-बहुत पैसा कमाया. जॉन बाद में सीएटल लौट आये जहाँ उन्हें एक बिजनेस पार्टनर मिल गया था, कार्ल वॉलिन. साथ मिलकर दोनों ने फोर्थ एवेन्यू में एक शू स्टोर खोला “वॉलिन एंड नॉर्डस्ट्रॉम”. उनका शू स्टोर अच्छा चल निकला था जिसकी वजह से उन्होंने एक और स्टोर खोल लिया हालाँकि वो अभी भी छोटे स्केल पर लोकल बिजनेस कर रहे थे. फिर 1928 में जॉन ने अपने बेटों एवरेट और एल्मेर को अपने शेयर बेच दिए और 1929 में उनके बिजनेस पार्टनर कार्ल ने भी अपने शेयर बेच दिए और बिजनेस से अपना नाम हटा लिया. 1933 में जॉन नॉर्डस्ट्रॉम के सबसे छोटे बेटे लॉय्ड ने भी फेमिली बिजनेस ज्वाइन कर लिया और तीनो भाई मिलकर डिप्रेशन के बुरे दौर के बीच अपना फेमिली बिजनेस चलाते रहे. सीएटल दिवालिया हो चुका था. ऐसे में लोग नए जूते अफ़ोर्ड नहीं कर सकते थे. नॉर्डस्ट्रॉम एकदम बंद होने की कगार पर पहुँच गया था और यही वो पॉइंट था जब तीनो भाइयों ने ये एक्स्ट्राओर्डीनेरी policy अपनाने की सोची. था जब ताना माश्या नपएक्स्ट्राजाजानरा policy अपनाने की सोची. return किसी भी रिटेल बिजनेस का वो पार्ट है जो आप अवॉयड नहीं कर सकते, और तीनो भाई बार-बार यही प्रॉब्लम सोल्व करते-करते तंग आ चुके थे. तो इसलिए रिटर्न से बचने के बजाये उन्होंने इसे अपनी मेन policy बना लिया. नॉर्डस्ट्रॉम भाइयों ने अपने स्टाफ से कहा कि वो सारे रिटर्न होने वाले प्रोडक्ट्स को लेकर लिबरल रहे. अगर कस्टमर खुश नहीं है तो उन्हें वही दो जो उन्हें चाहिए. यानि अब कस्टमर जो चाहे, जब चाहे तब प्रोडक्ट return कर सकते थे. नॉर्डस्ट्रॉम के बारे में एक बड़ी फेमस कहानी है कि चाहे ये एक क्लोथिंग ब्रैड ही क्यों ना हो पर ये टायर भी return में ले सकती कहा जाता है कि 1970 में नॉर्डस्ट्रॉम की एक branch एक कमर्शियल स्पेस में शिफ्ट हो गई थी जहाँ पहले किसी टायर कंपनी की शॉप थी. तो एक कस्टमर आया और उसने कहा कि क्योंकि उसने इसी जगह से टायर खरीदा था इसलिए अब उसे ये टायर यहीं पर return करना है. तो जानते है नॉर्डस्ट्रॉम के एम्प्लोईज़ ने क्या किया? अपनी स्ट्रोंग return policy के चलते उन्होंने उस आदमी के पैसे रिफंड करने का फैसला किया. ये और बात है कि नॉर्डस्ट्रॉम ने कभी टायर बेचे ही नहीं. अपनी इस एक्सट्रीम कस्टमर सर्विस की वजह से ही नॉर्डस्ट्रॉम ने काफी ग्रो किया और उस वक्त भी सक्सेसफुल बिजनेस बनी रही जब उनके बाकि नॉसाठीर्ग थाना तिलग तंट कर रटे से गा किसी तो जानते है नॉर्डस्ट्रॉम के एम्प्लोईज़ ने क्या किया? अपनी स्ट्रोंग return policy के चलते उन्होंने उस आदमी के पैसे रिफंड करने का फैसला किया. ये और बात है कि नॉर्डस्ट्रॉम ने कभी टायर बेचे ही नहीं. अपनी इस एक्सट्रीम कस्टमर सर्विस की वजह से ही नॉर्डस्ट्रॉम ने काफी ग्रो किया और उस वक्त भी सक्सेसफुल बिजनेस बनी रही जब उनके बाकि कॉम्पटीटर्स अपना बिजनेस बंद कर रहे थे या किसी बड़ी कंपनी के अंडर में जा रहे थे. नॉर्डस्ट्रॉम में ये कल्चर आज तक कायम है. यहाँ नॉर्डस्ट्रॉम की return policy की कुछ और किस्से हैं. एक बार नॉर्डस्ट्रॉम का एक क्लर्क किसी कॉम्पटीटर के स्टोर से कुछ खरीदने गया क्योंकि उनके पास कस्टमर के साइज़ का प्रोडक्ट नहीं था. नॉर्डस्ट्रॉम के एक और क्लर्क ने कस्टमर के घर सूट आल्टर करने के लिए टेलर भेज दिया जो उसने नॉर्डस्ट्रॉम से खरीदा था. यही नहीं बाद में उस क्लर्क ने कस्टमर के पैसे भी रिफंड कर दिए क्योंकि उसे सूट पसंद नहीं आया था. ऐसे ही एक और कस्टमर की कहानी है जिसने एक शर्ट खरीदी थी जो धोने के बाद सिकुड़ गई थी क्योंकि उसने उसे धोने का इंस्ट्रक्शन ठीक से फॉलो नहीं किया था पर नॉर्डस्ट्रॉम के स्टाफ़ ने फिर भी उसके पैसे वापस कर दिए. FORTUNE The Greatest Business Decisions of All… Verne Harnish Henry Ford Doubles His Workers’ Wages 1913 में हेनरी फ़ोर्ड ने हाईलैंड पार्क, मिशिगन के अपने प्लांट में असेंबली लाइन इंट्रोड्यूस किया. मॉडल टी ज्यादा पोपुलर हो रहा था और फ़ोर्ड दिन ब दिन सक्सेसफुल कंपनी बनती जा रही थी. इसलिए हेनरी फ़ोर्ड को लगा कि उन्हें अपने मॉस प्रोडक्शन के आईडिया पर फिर से गौर करना चाहिए. असेंबली लाइन install होने से पहले फ़ोर्ड ने और भी ज़्यादा लोगों को हायर करके अपने मॉडल टी के प्रोडक्शन को डबल कर दिया था. असेंबली लाइन install होने के बाद मॉडल टी का प्रोडक्शन फिर से डबल हो गया लेकिन इस बार वर्कर्स का नंबर सेम था क्योंकि असेंबली लाइन ने मॉडल टी के प्रोडक्शन को इतना ज़्यादा एफिशिएंट बना दिया था. लेकिन प्रॉब्लम ये थी कि असेंबली लाइन पर काम काफी repetitive, फिजिकली थकाने वाला होने लगा. एम्प्लोईज़ मशीनी अंदाज में काम करते थे, उन्हें दिन-रात हाई क्वालिटी के मॉडल टी प्रोड्यूस करने के लिए सेम वही काम करना पड़ता था इसलिए बहुत से एम्प्लोईज़ ने जॉब छोड़ दी और बहुत से बिना वजह आए दिन छटी मार लिया करते थे. एम्प्लोईज़ ने जॉब छोड़ दी और बहुत से बिना वजह आए दिन छुट्टी मार लिया करते थे. तो हेनरी फ़ोर्ड ने इस प्रॉब्लम का क्या सोल्यूशन निकाला? 5 जनवरी 1914 के दिन उन्होंने न्यूज़ पेपर रिपोर्टर्स को बुलाकर एनाउंस किया कि वो अपनी कंपनी में कुछ बेहद जरूरी बदलाव लाने जा रहे है. ये वो तीन नई policy थी जो वो अपने एम्प्लोईज़ को मोटिवेट करने के लिए इम्प्लीमेंट करना चाहते थे. सबसे पहले तो, कंपनी काम के घंटे नौ से घटाकर आठ करने जा रही थी. दूसरी चीज़, अब काम पर दो के बजाये तीन वर्क शिफ्ट होने वाले थे और तीसरी चीज़, बेसिक पे डबल होने वाला था यानि $2.50 से बढ़ाकर कंपनी $5.00 देने जा रही थी. जिसका मतलब था कि फ़ोर्ड एक्स्ट्रा $10 मिलियन साल के अपनी प्रोडक्टीवीटी बढाने और अपने वर्कर्स की लाइफ इम्प्रूव करने पर खर्च करेगी. अगले ही दिन न्यूज़ पेपर की हेडलाइन कुछ इस तरह थी “हेनरी फ़ोर्ड 1914 के प्रोफिट में से $10,000,000 अपने एम्प्लोईज़ को देगी”. एक और न्यूज़ पेपर ने लिखा “ये काम बड़े दिल और उदारता का शानदार example” है. ये ख़बर आग की तरह पूरे मिशिगन में फ़ैल गई. हजारो लोग जॉब के लिए प्लांट में जमा हो गए. कहा जाता है कि करीब 12000 लोगों की भीड़ वहां पर जमा हो गई थी जो जॉब की उम्मीद में वहां आये थे. पुलिस को सिचुएशन कण्ट्रोल करने के लिए आना पड़ा क्योंकि लोग आपस में लड़ाई-झगड़े और मारपीट करने लगे थे. फ़ोर्ड को अलग से और मारपीट करने लगे थे. फ़ोर्ड को अलग से 14000 के करीब जॉब एप्लीकेशन मेल से भी मिली थी. तो क्या ये बिज़नेस डिसिशन काम आया? क्या इसका कुछ फ़ायदा हुआ? हां, $5.00 per डे वर्कर्स की लाइफ में काफी बड़ा चेंज लेकर आया. सिर्फ एक ही साल में एम्प्लोईज़ का टर्न ओवर रेट 370% से घटकर 16% तक रह गया था. इसका मतलब था कि फ़ोर्ड को नए एम्प्लोईज़ हायर या ट्रेन करने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि उनके पुराने एम्प्लोईज़ अब काफी खुश थे और फ़ोर्ड छोड़कर जाना नहीं चाहते थे. इससे प्रोडक्टीविटी रेट काफी इम्प्रूव हुआ, प्रोडक्शन रेट 40% से 70% बढ़ गया था. 1914 से लेकर 1916 तक कंपनी का प्रॉफिट डबल यानि $30 मिलियन से $60 मिलियन पहुँच गया. इन सारी इम्प्रूटमेंट्स की वजह से फ़ोर्ड अपने मॉडल टी का प्राइस $850 से घटाकर $350 करने में कामयाब रही. अपनी इसी policy की वजह से फ़ोर्ड दुनिया की ग्रेटेस्ट कार बनाना वाली कंपनी बन गई और फ़ोर्ड के मालिक एक बिलेनियर. अपनी बुक “माई लाइफ एंड वर्क” में हेनरी फ़ोर्ड कहते है कि “हमारी खुद की सेल वर्कर्स की सैलरी पर डिपेंड करती है जो हम उन्हें पे करते है. अगर हम उन्हें अच्छा पेमेंट देंगे तो हमारे एम्प्लोईज़ पैसा खर्च कर पाएंगे. वो अपने बिल्स पे करेंगे, शॉपकीपर, डिस्ट्रीब्यूटर और manufacturer को पे कर पाएँगे. दूसरी कंपनी के एम्प्लोईज़ भी फलेंगे-फूलेंगे यानि ज्यादा से ज्यादा लोग बनाना वाली कंपनी बन गई और फ़ोर्ड के मालिक एक बिलेनियर. अपनी बुक “माई लाइफ एंड वर्क” में हेनरी फ़ोर्ड कहते है कि “हमारी खुद की सेल वर्कर्स की सैलरी पर डिपेंड करती है जो हम उन्हें पे करते है. अगर हम उन्हें अच्छा पेमेंट देंगे तो हमारे एम्प्लोईज़ पैसा खर्च कर पाएंगे. वो अपने बिल्स पे करेंगे, शॉपकीपर, डिस्ट्रीब्यूटर और manufacturer को पे कर पाएँगे. दूसरी कंपनी के एम्प्लोईज़ भी फलेंगे-फूलेंगे यानि ज्यादा ज्यादा लोग गाड़ी खरीद सकेंगे और इस तरह एम्प्लोईज़ को हाई सैलरी देकर हम अपने पूरे देश के लिए खुशहाली और तरक्की का रास्ता खोलते है”. 1920 में फ़ोर्ड ने वर्कर्स की तनख्वाह बढाकर $6.00 per डे कर दी. 1930 में उन्होंने ये अमाउंट बढाकर $7.00 कर दिया. वो इस बात पर यकीन करते है कि सैलरी बढ़ाकर और लोगों की purchasing पॉवर इनक्रीज करने से इकॉनमी को बेहतर बनाया जा सकता है. फ़ोर्ड ये भी कहते है “जब तक मैं जिंदा हूँ, ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में highest सैलरी पे करता रहूँगा. अगर एम्प्लोई दिनभर हमारे लिए काम कर रहा है तो हम क्यों ना उसे पूरे दिन का मेहनताना दे. हर एम्प्लोई को इतना पैसा तो मिलना चाहिए कि वो खुद की गाड़ी और घर खरीद सके”. FORTUNE The Greatest Business Decisions of All… Verne Harnish Wal-Mart’s Saturday Morning Meeting 1962 से आज तक हर सैटरडे की सुबह wallmart के एम्प्लोईज़ बेंटनविल हेडक्वार्टर में जमा होते है, और इसकी शुरुवात की थी कंपनी के फाउंडर सैम walton ने. सैटरडे morning मीटिंग की वजह से wallmart को दुनिया की सबसे बड़ी और सक्सेसफुल कंपनी बनने में काफी मदद मिली है. Wallmart के दुनिया भर में 10,000 स्टोर है और $447 बिलियन के करीब annual सेल्स होती है. जब से सैम ने ये बिजनेस स्टार्ट किया है, वो खुद 24/7 काम करते रहे हैं. वो कहते है कि ये नाइंसाफी है कि स्टोर के स्टाफ़ वीकेंड पर काम करे और कंपनी के एक्जीक्यूटिव अपनी फेमिली के साथ छुट्टी मनाएँ. सैम मानते है कि रिटेल बिजनेस में ज्यादातर बिजनेस वीकेंड के दौरान होता है इसलिए छुट्टी वाले दिन उन्हें स्टोर में रहना चाहिए. हर सैटरडे की सुबह सैम अपने ऑफिस में बैठकर पिछले हफ्ते की सेल्स रिपोर्ट चेक किया करते थे. वो ये देखते थे कि कौन से प्रोडक्ट सबसे ज्यादा बिक रहे है और कौन से नहीं. वो हर हफ्ते की सेल्स को पिछले हफ्ते की sale से कम्प्येर करते शे की सेल्स को पिछले हफ्ते की sale से कम्प्येर करते थे. स्टोर खुलने से पहले सैम एम्प्लोईज़ के साथ एक मीटिंग भी करते थे. वो उनसे उनकी राय और सजेशन माँगा करते थे, और उन्हें जो जरूरी लगता है उनसे शेयर करते. इस तरह साथ मिलकर सब ये डिसाइड करते थे कि कौन से प्रोडक्ट बेचे जायेंगे और कौन से प्रोडक्ट फ्रंट में डिस्प्ले के लिए रखे जायेंगे. इन मीटिंग्स की वजह से wallmart को कई फ़ायदे हुए. सबसे पहली चीज़ तो ये कि इन मीटिंग्स की वजह से एम्प्लोईज़ काफी मोटिवेट हुए थे. उन्हें फील हुआ कि एक वर्कर के तौर पर उनकी बात सुनी जा रही है और और उनकी ओपिनियन भी उतनी ही इम्पोर्टेट है जितनी कि कंपनी के मालिक की. इस तरह सैम ने अपने एम्पलोईज़ का भरोसा जीत लिया था. दूसरी चीज़, ये बात साबित हुई कि सैम उनके साथ मिलकर पूरी मेहनत करने और बिजनेस को उंचाईयों पर ले जाने के लिए कमिटेड है. सैम इस मंत्र में यकीन करते है कि अपने एम्प्लोईज़ को खुश रखोगे तो आपके कस्टमर्स खुश रहेंगे और फिर इन्वेस्टर्स भी अपने आप ही खुश हो जायेंगे. हालाँकि वॉलमार्ट अच्छा बिजनेस कर रहा था तो भी सैटरडे morning मीटिंग का सिलसिला बरकरार रहा. सैम अपने एम्प्लोईज़ के साथ वीकली सेल्स रिजल्ट शेयर करते थे और उनसे सलाह लेकर ही आने वाले वीक की प्लानिंग करते थे. इन मीटिंग्स में एम्प्लोईज़ को प्रोडक्ट बेचने के गुर सिखाये जाते और रिजल्ट रापर करत यार उनससलाह लकर हा आने वाले वीक की प्लानिंग करते थे. इन मीटिंग्स में एम्प्लोईज़ को प्रोडक्ट बेचने के गुर सिखाये जाते और उन्हें एंटप्रेन्योरशिप की भी ट्रेनिंग दी जाती थी. इन मीटिंग्स ने wallmart को ना सिर्फ सबसे बड़ा ग्रोसरी स्टोर चेन बना दिया था बल्कि उन्हें अपने कॉम्पटीटर्स को पछाड़ने में भी हेल्प की. wallmart की एक और एडवांटेज थी, स्पीड. जैसे एक्जाम्पल के लिए, अगर बैटरी की सेल कम हो रही हो तो ये पॉलिसी थी कि मंडे morning को हर wallmart के ब्रांच उसे अपने डिस्प्ले में अलग-अलग जगह रखना शुरू करेगा ताकि वो कस्टमर्स की नज़र में तुरंत आ जाए. एक और स्ट्रेटेज़ी थी जो वॉलमार्ट ने अपनाई. मंडे से लेकर थर्सडे तक एम्प्लोईज़ को दूसरे wallmart की ब्रांच में भेजा जाता था ताकि वो दूसरी लोकेशन का भी वर्क एन्वायरमेंट observe कर सके. यही नहीं उन्हें कई बार कॉम्पटीटर्स के स्टोर भेजकर वहां के कामकाज का जायजा लेने को कहा जाता था. फिर सैटरडे morning सारे एम्प्लोईज़ बेंटनविल में जमा होकर स्ट्रेटेज़ी डिस्कस किया करते थे. हर किसी को बताया जाता था कि उनके कॉम्पटीटर्स किस तरह का वर्क कल्चर मेंटेन रखते है और कैसे सेल्स इम्प्रूव करने की कोशिश करते है. regional मैनेजर्स डिस्ट्रिक्ट मैनेजर्स को कॉल करके आपस में डिस्कस करते थे कि क्या जरूरी स्टेप्स लेने चाहिए और क्या-क्या चेंजेस होने चाहिए. सैटरडे टाटा नत या तरी नटलान गा वर्ट रेती भी वर्क एन्वायरमेंट observe कर सके. यही नहीं उन्हें कई बार कॉम्पटीटर्स के स्टोर भेजकर वहां के कामकाज का जायजा लेने को कहा जाता था. फिर सैटरडे morning सारे एम्प्लोईज़ बेंटनविल में जमा होकर स्ट्रेटेज़ी डिस्कस किया करते थे. हर किसी को बताया जाता था कि उनके कॉम्पटीटर्स किस तरह का वर्क कल्चर मेंटेन रखते है और कैसे सेल्स इम्प्रूव करने की कोशिश करते है. regional मैनेजर्स डिस्ट्रिक्ट मैनेजर्स को कॉल करके आपस में डिस्कस करते थे कि क्या जरूरी स्टेप्स लेने चाहिए और क्या-क्या चेंजेस होने चाहिए. सैटरडे दोपहर तक सारे जरूरी बदलाव या नई स्ट्रेटेज़ी तैयार हो जाती थी. जैसे अगर किसी प्रोडक्ट को फ्रंट में रखने का डिसिशन लिया गया है तो वो पहले से रख दिया जाता है. अगर किसी खास ब्रैड का डॉग फूड अच्छा बिक रहा है तो एक्जीक्यूटीव्स ये श्योर कर लेते थे कि स्टोर में वो बराबर quantity में मौजूद रहे यानि कस्टमर जब चाहे उसे वो चीज़ मिल सके. वही दूसरी तरफ wallmart के कॉम्पटीटर्स उनसे दस दिन पीछे होते है. wallmart ने अपनी बेस्ट प्रेक्टिस सीखी और उसे वक्त के साथ और भी बेहतर बनाया. तो इस तरह स्पीड और एंटप्रेन्योरीयल स्पिरिट wallmart का सीक्रेट बन गई जिसकी वजह से आज ये अपने फील्ड की नंबर वन कंपनी है. FORTUNE The Greatest Business Decisions of All… Verne Harnish Samsung Pays its Stars to Goof Off स्टेग्नेशन और मीडियोक्रीटी- यही वो चीज़े है जो सैमसंग के चेयरमेन ली कुन ने अपनी कंपनी में नोटिस की. जब उन्हें महसूस हुआ कि कंपनी की फाउंडेशन कमज़ोर हो रही है और तुरंत एक बदलाव लाने की सख्त जरूरत है तो उन्होंने कुछ स्टेप्स लेने का फैसला किया. ये 1990 के दशक की बात है, सैमसंग काफी प्रोडक्ट्स बनाती थी पर उनके सारे प्रोडक्ट अनइंस्पाईरिंग हुआ करते थे. जैसे कि कॉपीकेट माइक्रोवेव मशीन और बाकि इलेक्ट्रोनिक्स जो काफी प्राइस में बिक रहे थे. दरअसल सैमसंग कंपनी merchandising यानि फेमिली बिजनेस कन्फ्यूशिएनिज्म यानि कि hierarchy और seniority के हिसाब से चल रही थी. सैमसंग एक रुकी हुई बनती जा रही थी. ऐसे में ली कुन ने एक सिंपल सोल्यूशन निकाला. उनके पास एक आईडिया था, उन्होंने कंपनी से बेस्ट एम्प्लोईज़ को चुनकर उन्हें दूसरे देशों में भेजने का डिसिशन लिया ताकि उनके वर्कर्स दूसरे देशों में जाकर वहां के कल्चर और वर्क सिस्टम से रूबरू हो सके. ये “रीज़नल स्पेशलिस्ट्स” किसी दूसरे देश में एक साल बिताकर कई बाते सीखते और समझते थे. TITOTी में भी और जाति की एक साल बिताकर कई बाते सीखते और समझते थे. साथ ही उन्हें अपनी फुल सैलरी और बाकि बेनेफिट भी मिलते रहते थे. लेकिन सैमसंग के कुछ एक्जीक्यूटीव्स को ये आईडिया कुछ खास पसंद नहीं आया. उन दिनों साउथ कोरिया में अब्रोड बिजनेस ट्रिप पर जाना काफी रेयर था, ऐसे में एम्प्लोईज़ को एक साल तक बाहर भेजने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था. साथ ही इसमें खर्चा भी काफी था इसलिए एक्जीक्यूटीव्स ने इस बात पर काफी एतराज़ जताया. एक रीज़नल स्पेशलिस्ट को भेजने का मतलब था $700,000 का खर्च, ऊपर से मन्थली सैलरी और साल भर दिए जाने वाले benefit अलग से थे. एक और डर ये भी था कि कहीं कंपनी के बेस्ट performers हाथ से ना निकल जाये, या उन्हें कोई और कंपनी हायर ना कर ले. लेकिन चेयरमेन ली ने किसी की नहीं सुनी. वो अपने फैसले पर कायम रहे. कंपनी के अच्छे-बुरे हर दौर में ये प्रोग्राम लगातार चलता रहा जिसे आज दो दशक से भी ज्यादा समय हो चुका है. क्योंकि ली शोर्ट टर्म नहीं बल्कि लॉन्ग टर्म फ़ायदों पर यकीन रखते है. रीज़नल स्पेशलिस्ट को एक साल के लिए अब्रोड भेजने से पहले उन्हें कंपनी के मैसिव फेसिलिटी में तीन महीनों के लिए बूट कैंप में भेजा जाता है. यहाँ पर वो उस कंट्री की लेंगुएज सीखते है जहाँ उन्हें जाना होता है. इसके की लेंगुएज सीखते है जहाँ उन्हें जाना होता है. इसके अलावा उन्हें टेबल मैनर्स, डांसिंग भी सिखाई जाती है और सेक्सुअल हैरासमेंट अवॉयड करने के तरीके भी सिखाये जाते है. उन्हें यहाँ सुबह 6 बजे उठना पड़ता है जिसके बाद पहले जॉगिंग और फिर मेडीटेशन करवाया जाता है. इनमे से कुछ रीज़नल सेलिस्ट को US और यूरोप भेजा गया. हाल ही में कई सारे एक्जीक्यूटिव्स ऐसे देशो में भेजे गए जहाँ सैमसंग के प्रोडक्ट्स की भारी डिमांड है. इस प्रोग्राम का मिशन था दूसरे देशो के कल्चर को जानना, समझना, वहां के लोगों के साथ दोस्ती बढाना और इस दौरान जो कुछ सीखने को मिला उस पर एक रिपोर्ट तैयार करके हेडऑफिस में भेजना. पार्क क्वांग मू जो एक रीज़नल स्पेशलिस्ट है, उन्हें ट्रेनिंग के लिए रशिया भेजा गया था. वो अपने एक्सपीरिएंस शेयर करते हुए बताते है कि वो रशियंस के साथ रहे, उनके साथ खाना-पीना किया और वहां के कल्चर की कई बातों से रूबरू हुए. उन्होंने देखा कि रशियन सिस्टम में नीचे से लेकर ऊपर तक रिश्वतखोरी चलती है. प्लेन टिकेट बुक कराने से लेकर गेसोलिन लेने तक हर जगह आपको रिश्वत देकर काम निकलवाना पड़ता है. पार्क ने एक और एक्सपीरिएंस शेयर करते हुए बताया कि एक बार उनकी फ्लाईट डिले हो गई थी और उन्हें दस घंटे एयरपोर्ट में बिताने पड़े. उनके साथ और भी कई रशियंस थे जो उनकी तरह ही परेशान हो रहे थे. पार्क कहते है कि उस वक्त रशियंस के साथ अपनी परेशानी बांटते हुए उन्हें ऐसा देखा कि रशियन सिस्टम में नीचे से लेकर ऊपर तक रिश्वतखोरी चलती है. प्लेन टिकेट बुक कराने से लेकर गेसोलिन लेने तक हर जगह आपको रिश्वत देकर काम निकलवाना पड़ता है. पार्क ने एक और एक्सपीरिएंस शेयर करते हुए बताया कि एक बार उनकी फ्लाईट डिले हो गई थी और उन्हें दस घंटे एयरपोर्ट में बिताने पड़े. उनके साथ और भी कई रशियंस थे जो उनकी तरह ही परेशान हो रहे थे. पार्क कहते है कि उस वक्त रशियंस के साथ अपनी परेशानी बांटते हुए उन्हें ऐसा लगा जैसे वो खुद एक रशियन है. तो अपने बेस्ट एम्प्लोईज़ को ओवरसीज़ भेजने के क्या-क्या फायदे होंगे? कौन जाने, कल आपकी कंपनी किसी फॉरेन कंट्री में अपनी एक ब्रांच खोल ले. तब यही रीज़नल स्पेशलिस्ट आपके काम आएंगे क्योंकि इन्हें पता होगा कि वहां का कल्चर क्या है और वहाँ कैसे कम्यूनिकेट करना है. ऐसे में आपके लिए एक नए देश में अपना बिजनेस चलाना और भी आसान हो जायेगा. बाद में कोरिया की कई दूसरी कंपनियों ने भी सैमसंग के इस प्रोग्राम को अपनाया. सैमसंग आज एक जाना-माना एलीट ग्लोबल ब्रैंड बन गया है जिसका क्लोज़ कॉम्पटीशन एप्पल से है. 2011 में एक Interbrand Poll में सैमसंग कंपनी वर्ल्ड की 17वे नंबर की मोस्ट वैल्यूएबल ब्रैड डिक्लेयर की गई थी. FORTUNE The Greatest Business Decisions of All… Verne Harnish Conclusion तो आपने टाटा स्टील और उनकी अर्ली सेपरेशन स्कीम के बारे में पढ़ा. ESS का बर्ताव अपने एम्प्लोईज़ के साथ काफी फ्रेंडली है, यही वजह है कि टाटा कंपनी की मार्केट में इतनी अच्छी रेपुटेशन है. कंपनी की इनएफिशीएंसी प्रॉब्लम सोल्व हुई तो टाटा और भी ज्यादा स्ट्रोंग कंपनी बनकर उभरी. आपने नॉर्डस्ट्रॉम और उसकी लिबरल return policy के बारे में पढ़ा. कंपनी ने साबित करके दिखा दिया कि एक्सीलेंट कस्टमर सर्विस ही सक्सेस का असली सीक्रेट है. आपने इसमें हेनरी फ़ोर्ड के बारे में जाना कि कैसे उन्होंने अपने एम्प्लोईज़ को मोटिवेट करने के लिए उनकी सैलरी डबल कर दी थी क्योंकि फ़ोर्ड इस बात पर बिलीव करता है कि अगर आप अपने एम्प्लोईज़ की पेमेंट बढ़ाएंगे तो वो भी इकॉनमी को पे बैक करेंगे और इस तरह पूरा देश तरक्की करेगा. आपने वॉलमार्ट और उनकी सैटरडे morning आपने वॉलमार्ट और उनकी सैटरडे morning मीटिंग्स के बारे में पढ़ा. सैम walton ने हमेशा यही दिखाया कि उनके एम्प्लोईज़ सिर्फ उनके अंडर काम करने वाले लोग नहीं बल्कि उनके पार्टनर है और सब साथ मिलकर बिजनेस इम्पूव करने के लिए नए-नए आईडिया सोचते है. सैम मानते है कि अगर एम्प्लोईज़ खुश है तो कस्टमर्स भी अपने-आप ही ख़ुश हो जायेंगे और इसकी वजह से इन्वेस्टर्स भी खुश रहेंगे. फाईनली आपने सैमसंग और उनके रीज़नल स्पेशलिस्ट के बारे में पढ़ा. इसमें कंपनी अपने बेस्ट एम्प्लोईज़ को साल भर के लिए दूसरे देशों में भेजती है. इसके पीछे उनका मिशन दूसरी कंट्रीज़ के कल्चर को जानना और वहां के लोगों के साथ कनेक्शन बनाना होता है. अपनी इसी policy की वजह से सैमसंग को एक ग्लोबल बैंड बनने में बेहद मदद मिली. तो अब आप बताइए आपकी कंपनी में क्या होता है? वहां का वर्क कल्चर कैसा है? क्या कुछ ऐसा है जो आप अपने वर्क प्लेस में चेंज करना चाहते है? क्या कुछ ऐसा है जो आप वाकई में बदलना चाहते है? क्या आपके पास भी कोई ऐसा आईडिया है जो वाकई में हेल्पफुल है? अगर ऐसा है तो इसे शेयर करने से डरिए मत, बिना किसी हिचक के अपनी बात रखिए. अगर आप एंटप्रेन्योर या मैनेजर है तो आप अपने एम्प्लोर्डज बनाना होता है. अपनी इसी policy की वजह से सैमसंग को एक ग्लोबल ब्रैड बनने में बेहद मदद मिली. तो अब आप बताइए आपकी कंपनी में क्या होता है? वहां का वर्क कल्चर कैसा है? क्या कुछ ऐसा है जो आप अपने वर्क प्लेस में चेंज करना चाहते है? क्या कुछ ऐसा है जो आप वाकई में बदलना चाहते है? क्या आपके पास भी कोई ऐसा आईडिया है जो वाकई में हेल्पफुल है? अगर ऐसा है तो इसे शेयर करने से डरिए मत, बिना किसी हिचक के अपनी बात रखिए. अगर आप एंटप्रेन्योर या मैनेजर है तो आप अपने एम्प्लोईज़ को एनकरेज कर सकते है कि वो अपनी बात रखे और अपने ओपिनियन शेयर करे. कौन जाने आपका ये टीमवर्क अब तक का सबसे ग्रेट बिज़नेस डिसिशन साबित हो. याद रहे, अपने एम्प्लोईज़ के साथ आपका बर्ताव हमेशा अच्छा होना चाहिए. एक्सीलेंट कस्टमर सर्विस की प्रेक्टिस करे. नए आईडिया को लेकर एक ओपन माइंड रखे और हमेशा कुछ न कुछ नया सीखते रहे. इस तरह एक दिन आप और आपकी कंपनी जरूर सक्सेसफुल होगी.

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