DREAM WITH YOUR EYES OPEN- An Entrepreneuri… Ronnie Screwvala Books In Hindi Summary

DREAM WITH YOUR EYES
OPEN- An Entrepreneuri…
Ronnie Screwvala
इंट्रोडक्शन

इनोवेट और डिसरप्ट करने का क्या मतलब है? अगर आपको बिजनेस का जरा भी आईडिया नहीं है तो
आप स्टार्ट कैसे करोगे? स्केल करने का राईट टाइम क्या है? ये कुछ ऐसे सवाल है जिनके जवाब आपको
इस समरी में मिलेंगे. ये समरी ख़ुद रॉनी के शब्दों को बयान करती है. इससे आप उनके शुरुवाती बिजनेस के बारे में, यूटीवी में उनके प्रोडक्टिव सालों के बारे में और इसके अलावा बहुत कुछ जानेंगे. ये शायद आपके लिए वो बिजनेस बुक साबित हो सकती है जिसका आपको अब तक इंतज़ार था.
From Grant Road to Breach Candy मैं मुंबई में 1970 के दशक में पला-बढ़ा. मुंबई एक
ऐसा शहर है जो हमेशा जोश और रंगीनियत से भरा रहा है. जहाँ गाड़ियाँ और बसों की भीड़-भाड़ से सड़क
पर तिल भर भी जगह नहीं बचती. जहाँ की गलियों में ना जाने कितने ही किस्से छुपे हुए है. उस वक्त
भारत में एग्रीकल्चर और मैन्युफैक्चरिंग इकॉनमी का बोलबाला था. मुझे शुरू से ही बिजनेस में बड़ा इंटरेस्ट रहा है. मैंने बड़ी गहराई से ओब्ज़र्व किया है कि कैसे फेमिली बिजनेस पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है, कैसे कोई बिजनेस एकदम से आसमान की उंचाई छूकर फिर अचानक से जमीन पर आ गिरता है, कैसे सेम प्रोडक्ट बेचने वाले पांच स्टोर में से बस एक सक्सेसफुल होता है और बाकि चार फेल हो जाते है.

हमारा घर नोवेल्टी सिनेमा के पास था. हम एक अपार्टमेंट बिल्डिंग में रहते थे जहाँ पांच फ्लोर थे. हम
लोअर मिडल क्लास फेमिली से थे. हम अमीर नहीं थे लेकिन हाँ उतने गरीब भी नहीं थे. मेरी फेमिली में
मेरे पेरेंट्स, मेरा भाई, मेरी दो बुआ और मेरे दादा-दादी थे. मैं 16 साल का होने तक इसी घर में रहा. मेरे
क्लासमेट्स अपनी गाड़ियों से स्कूल आया करते थे जबकि मुझे बस के लिए पैंतालिस मिनट तक इंतज़ार
करना पड़ता था. सिनेमा हॉल हमारे बरामदे के ठीक सामने था. इसलिए  हम लोग रेड कारपेट प्रीमियर बड़े आराम से देख सकते थे. मुझे याद है दस साल की उम्र में मुझे आईडिया आया कि क्यों ना अपने बरामदे से फेमस सेलेब्रीटीज़ को देखने के लिए लोगों को टिकेट बेचूं और उनसे ज्यादा पैसे कमाने के लिए उन्हें स्नैक्स भी ऑफर करूं. लेकिन मेरा ये आईडिया मेरे दादा-दादी को पसंद नहीं आया. उन्होंने बस इतनी परमिशन दी कि मैं ज्यादा से ज्यादा पंद्रह लोगों को बुला सकता हूँ पर उन्हें ये मंजूर नहीं था कि मैं स्नैक्स बेचता फिरूं. मुझे हमेशा से ही एक एंटप्रेन्योर बनने का आईडिया attract करता था. मेरे पेरेंट्स मुझे लेकर बड़ी टेंशन में रहते थे कि मेरा क्या होगा. लेकिन बाकि पेरेंट्स की तरह उन्होंने कभी मुझे इस बात के लिए फ़ोर्स नहीं किया कि मैं कोई स्टेबल जॉब करूं बल्कि उन्होंने हमेशा ही मेरे सपनों की रिस्पेक्ट की है.

हो सकता है कि आप भी अपनी फेमिली के पहले एंटप्रेन्योर हो. शायद आपके पास भी कोई स्टेबल जॉब
हो और आपके पेरेंट्स या आपका लाइफ पार्टनर आपके आईडिया को लेकर ज्यादा कन्विंस ना हो.
लेकिन मैं आपको एक फैक्ट बता रहा हूँ. अपना बिजनेस स्टार्ट करने का कोई राईट टाइम या राईट उम्र
नहीं होती. जिस दिन आपको लगे कि आप ये कर सकते हो, आप में इतना कॉन्फिडेंस हो, बस तभी से
स्टार्ट कर दो.

DREAM WITH YOUR EYES
OPEN- An Entrepreneuri…
Ronnie Screwvala
Opportunity Knocks, Open the Door

मेरा सबसे पहला बिजनेस वेंचर था लेज़र ब्रश बनाने का जो मैंने 20 की उम्र के आसपास में स्टार्ट की थी.
तब मैं एक नौजवान, जोशीला लड़का था लेकिन बहुत सीधा और सिंपल भी था. लेकिन इसके बावजूद भी
बिना किसी एक्सपीरीएंस के मैं बिजनेस लाइन में कूद में पड़ा. मेरे डैड उस कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर थे जो नीवीया क्रीम, टूथब्रश और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स बनाती थी. हम लोग लंदन एक फैक्टरी के टूअर पर भी गए थे. वहां मैंने टूथब्रश लाइन में दो मशीनें लगी देखी. ऐसी चीज़ मैंने इण्डिया में कभी नहीं देखी थी. मुझे लगा वो मशीनें एकदम ब्रांड न्यू होंगी पर मुझे सुपरवाईज़र से पता चला कि ये तो अब कबाड़ में जाने वाली है. जिन मशीनों ने इन तीन सालों में ना जाने कितने लाख टूथब्रश बनाये होंगे उन्हें अब यहाँ से हटा दिया जायेगा. यूके में उन्हें already यूज़लेस मान लिया गया था. जबकि यहाँ इंडिया में ये एक मॉडर्न टेक्नोलोजी मानीजाएगी.

मैंने पूछा “ये मशीनें अभी और कितना चल सकती है?” तो सुपरवाईज़र ने कहा “दस या बीस साल और”.
मुझे एक अपोर्च्यूनिटी दिख रही थी और मेरे दिमाग ने सपने बुनने शुरू कर दिए. मैंने सुपरवाईज़र से कहा कि दो महीने के लिए ये मशीने मेरे लिए रख दो मेरी बात सुनकर सब मेरी तरफ देखने लगे क्योंकि मैं तब बीस साल का बच्चा ही था. लेकिन सुपरवाईजर मेरे पिता का सम्मान करता था शायद इसलिए वो तैयार हो गया. उस वक्त तो मुझे ज्यादा नॉलेज नहीं थी पर मुझे यकीन था कि मुझे बिजनेस ही करना है. जब आप
मौकों की तलाश में रहते हो तो मौके आपको खुद ब खुद मिलने लगते है. मेरी जेब में एक रुपया भी नहीं
था और ना ही मुझे टूथब्रश बनने का कोई आईडिया था. मुझे तो ये भी नहीं पता था कि मैं इन मशीनों को
इण्डिया कैसे लेकर जाऊँगा. लेकिन मैंने एक सपना देखा था और मुझे अपने सपने पर पूरा भरोसा था. मेरा
दिल कह रहा था कि ये मौका हाथ से मत जाने दो. मुझे ये बात पता चली कि कोलगेट और प्रॉक्टर
एंड गैम्बल जैसे मल्टीनेशनल ब्रैंड अपना प्रोडक्शन आउटसोर्स करते है. अब तो मुझे पक्का यकीन हो गया

कि मेरे प्रोडक्ट को एक मार्केट मिल सकता है. अब तो मैं एकदम सांड की तरह मैदान में कूद पड़ा
था. मैं अपना आईडिया लेकर मुंबई में कुछ कंपनियों के पास गया. सबको मेरा आईडिया अच्छा लगा क्योंकि उन्हें मशीन की एडवांस टेक्नोलॉजी पसंद आई थी. क्लाइंट ने मुझसे कहा कि जितना जल्द हो सके मशी  इनस्टॉल करके काम स्टार्ट कर दो. लेकिन प्रॉब्लम ये थी कि मशीनें वहां लन्दन की फैक्ट्री में पड़ी थी. मैंने क्लाइंट से एक परचेज ऑर्डर बनाने के लिए कहा लेकिन उन्होंने जवाब दिया कि अभी मैंने उनके साथ बिजनेस डील साईंन नहीं की है. इन्फैक्ट अभी तक तो मैंने अपनी कंपनी भी नहीं खोली थी. इसलिए कुछ भी करने से पहले मुझे अपनी कंपनी रजिस्टर करनी होगी. कभी भी आपको कोई डाउट लगे तो पूछने से डरिए मत. ये मत सोचिएगा कि लोग क्या कहेंगे या आप पर हँसेंगे या आपको रिजेक्ट कर देंगे. किसे परवाह है? जाने दीजिए. जो लोग बिल्कुल नए सिरे से शुरुआत करते है तो उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता.

तो परचेज ऑर्डर देने के बदले क्लाइंट ने मुझे लैटर ऑफ़ इंटेंट दिया जिसमें लिखा था कि अगर सैंपल
उनके स्टैण्डर्ड के होंगे तो हम टूथब्रश मेन्यूफेक्चर कर सकते है और आगे और भी ऑर्डर देते रहेंगे. इसका
मतलब था कि मुझे अभी भी प्रोडक्शन कॉस्ट अपनी जेब से लगानी थी. मैंने एडवांस पेमेंट माँगा तो उन्होंने मुझे सीधा मना दिया. मेरे पास बैंक जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था. मेरे पास कुल दो मशीने और बड़े क्लाइंट्स की गारंटी थी और बैंक ने मेरा लोन अप्रूव कर दिया.

अगले 120 दिनों के अंदर-अंदर मुझे एक को-फाउंडर और टेक्नीकल डायरेक्टर ढूंढना था. मुझे वर्कर्स की
एक टीम हायर करके उन्हें ट्रेन भी करना था. मुझे ब्रश बनाने की सारी जानकारी भी हासिल करनी थी जिसके बारे में मुझे कुछ पता नहीं था, एक फैक्टरी भी ढूंढनी थी और इसके अलावा सारे जरूरी परमिशन भी लेने थे. मैंने अक्सर लोगों को कहते सुना था “मुझे पहले रिसर्च करने की ज़रुरत है” या “मुझे इसके लिए
होमवर्क या तैयारी करनी पड़ेगी”. plan करना और स्टडी करना इम्पोर्टेन्ट है.
लेकिन मेरे हिसाब से तो इंसान तब तक नहीं सीख सकता जब तक वो सीधा काम में कूद ना पड़े और
में अपने हाथ गंदे ना कर ले. जैसा मैं पहले कह चुका हूँ अगर कोई डाउट है तो क्लियर कर लो, आपके
मन में सवाल है तो उनके जवाब ढूंढो लेकिन अपनी इनसिक्योरीटीज़ को अपने सपनों के आड़े मत आने
दो. आँखे खुली रखकर सपने देखने का मतलब है अपने चैलेंजेज को ना सिर्फ एक्सेप्ट करना बल्कि उनसे जीत कर आना.

DREAM WITH YOUR EYES
OPEN- An Entrepreneuri…
Ronnie Screwvala
The Outsider

ब्लॉकबस्टर मूवीज अचानक नहीं बन जाती. ये बात मैं खुद के अनुभव से कह सकता हूँ. यूटीवी जब मूवी
प्रोडक्शन में जा रही थी, उस वक्त मैं बहुत सारी फिल्में देखा करता था ताकि आईडिया मिल जाये कि हमें
क्या और कैसे करना चाहिए. 2006 में मैंने ‘गैंगस्टर’ देखी, अनुराग बासु की थ्रिलर मूवी. मैंने उन्हें उसी रात
कॉल करके मूवी की तारीफ की और हमने ये भी वादा किया कि आगे चलकर एक फिल्म साथ मिलकर
बनायेंगे. 2007 में ‘लाइफ इन अ मेट्रो’ रीलीज़ हुई. ये हमारी चार ब्रेकआउट मूवीज़ में से एक थी और इसने बॉलीवुड में यूटीवी की पहचान एक आउटसाईंडर के तौर पर और भी मजबूत कर दी थी. ‘लाइफ इन अ मेट्रो’ मुंबई में नौ लोगों की ज़िंदगी के बारे में बताती है. इनकी कहानियां कहीं ना कहीं आपस में जुड़ी हुई थीं. एक
सीन के बाद जब अगला सीन आने वाला होता तो एक म्यूज़िशियंस का बैंड म्यूजिक प्ले करता था. ये इस
मूवी की डिसरप्टिव डिटेल यानी ध्यान खींचने वाला. यूनीक और डिसरप्टिव – यूटीवी में हमारी फिल्मों का
यही टेडमार्क था. लाइफ इन अ मेटो कमर्शियली काफी सक्सेसफुल रही. पब्लिक और क्रिटिक्स की तरफ से भी इस मूवी को काफी पॉजिटिव रिव्यु मिला था.

मेट्रो की सक्सेस के बाद अनुराग और मैंने साथ में कुछ और मूवीज़ बनाने का फैसला लिया. हालाँकि अनुराग अपने दूसरे प्रोजेक्ट्स में बिज़ी थे तो ये आईडिया पोस्टपोन हो गया और फिर कुछ सालों बाद वो एक नई मूवी का आईडिया लेकर आए. इतना छोटा मूवी plot मैंने आज तक नहीं सुना था. स्टोरी में थोडा बहुत एक्शन था और सिर्फ 40 लाइन के dialogue थे. अनुराग ने कहा मूवी में ज्यादा ईमोश्न्स होंगे. यही इस स्टोरी की फील थी. म्यूजिक इस चीज़ को हाईलाइट करेगा और उसके अलावा बाकि तीन लीड character की एक्टिंग पर डिपेंड करता था. अनुराग का आईडिया सुनकर मैं बड़ा हैरान हुआ. ये
मूवी यूटीवी का अगला डिसरप्टिव और यूनिक क्रिएशन बन सकता था और हमने चांस लिया क्योंकि यही तो हम हमेशा करते आ रहे थे, कुछ नया खोजना. और 2012 में रिजल्ट के तौर पर पेश की गई हमारी
फिल्म ‘बर्फ़ी’ जिसके लीड एक्टर्स थे प्रियंका चोपड़ा, रणबीर कपूर और इलियाना डीक्रूज़. इस मूवी में तीनों रणबीर कपूर और इलियाना डीक्रूज़. इस मूवी में तीनों की एक्टिंग ने उन्हें आइकॉन बना दिया था. हमारी बाकि फिल्मों की तरह हमें बर्फी के प्रोडक्शन में भी काफी चैलेंजेज फेस करने पड़े! शूटिंग के पहले दस दिनों तक तो लगातार बारिश होती रही. हम सीन चेक करते थे. तसल्ली ना होने पर फिर से सब कुछ नए सिरे से शूट किया जाता था.

शूटिंग का हर दिन बेहद लम्बा खिंच जाता था क्योंकि हमारा सारा फ़ोकस ईमोश्न्स पर होता था. इतनी टेलेंटेड कास्ट और प्रोफेशनल क्रू होने के बावजूद ये फिल्म हर किसी के लिए एक चैलेंज बन गई थी. लेकिन हमारी मेहनत रंग लाई क्योंकि बर्फी ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकार्ड तोड़ दिए, फिल्म सुपर-डुपर हिट साबित हुई. आज लोग ज्यादातर हमारी सक्सेस को याद करते है नाकि फेलियर को बॉलीवुड उन लोगों के लिए तो बिल्कुल नहीं है जो घबराकर मैदान छोड़ देते है. ये बेहद क्रूर और रफ दुनिया है. अगर हम किसी फिल्म के फ्लॉप होने पर हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाते तो शायद आज हमें एक respected मूवी स्टूडियो के तौर पर पहचान नहीं मिलती. आप अपने फेलियर की तरफ़ कैसे रियेक्ट करते हैं यही आपकी सक्सेस तय करती है. हमें इस बिजनेस के शुरुवाती चार साल काफी स्ट्रगल करना पड़ा. बेशक हम अपने काम को लेकर गर्व महसूस करते थे पर मुझे लग रहा था कि हमारी टीम हमारे स्टूडियो मॉडल की वजह से काफी स्ट्रेस में आ रही थी.

एक दिन हमारा सीऍफ़ओ मेरे पास आया और उसने सलाह दी कि हमें मूवी इंडस्ट्री में कोई पार्टनर ढूँढना
चाहिए. हम ऐसे लंबे समय तक खुद के भरोसे काम नहीं कर पाएंगे. उसने कहा कि हम फिल्म बिजनेस
में आउटसाइडर है इसलिए जब तक हम किसी से हाथ नहीं मिला लेते, हमेशा आउटसाइडर ही बने रहेंगे.
मैंने यश राज स्टूडियो और अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन से बातचीत करनी शुरू की. ये दोनों बॉलीवुड के बड़े
फेमिली बिजनेस थे. मैंने सोनी पिक्चर्स और 20th सेंचुरी फॉक्स से भी बात की क्योंकि ये दोनों भी इंडीया
में बिजनेस फ़ैलाने की सोच रहे थे. लेकिन अंत में कोई नतीजा नहीं निकल पाया. दोनों इन्डियन कंपनियों ने बड़े पोलाईटली हमें जता दिया था कि हम फिल्म बिजनेस में आउटसाइडर है और सोनी और फॉक्स ने भी हमें आउटसाइडर जैसा ही फील कराया था. मैंने बातचीत के दौरान अपना बेस्ट ऑफ़र दिया था
लेकिन मुझे कहीं ना कहीं तसल्ली भी थी कि मैंने बहुत ज्यादा पुश नहीं किया. मुझे नहीं लगता कि जॉइंट मैनेजमेंट मिलकर एक स्ट्रोंग पहचान और ब्रैंड क्रिएट कर पाते होंगे. अगर ऐसा होता तो शायद हम यूटीवी का यूनीक और डिसरप्टिव स्टाइल मेंटेन नहीं रख पाते. तो इस एक्सपीरीएंस से हमने क्या सीखा ?

जब आप किसी नए बिजनेस की शुरुआत करते हो तो हर कोई आपसे कहता है “ऐसा करो, वैसा मत
करो” लेकिन आपको अपनी गट फीलिंग फॉलो करनी चाहिए. मान लो आपको कोई एडवाईज़ दे रहा है. आप उस इंसान की दिल से रिस्पेक्ट करते हो लेकिन आप उससे सहमत नहीं हो तो ऐसे में आप क्या करोगे? तो अपने ख़ुद के फ़ैसले पर भरोसा करो, अपनी टीम पर भरोसा रखो. हमारी इस आउटसाइडर वाली पहचान ने ही यूटीवी का जोश बनाये रखा, क्योंकि हमें खुद को साबित करके दिखाना था. अगर हम बड़ी फिल्म कंपनियों के स्टूडियो मॉडल को कॉपी करते तो शायद कभी सक्सेसफुल ना होते. हमें अपने अलग होने पर और अपनी ताकत पर भरोसा था. ‘फेल फॉरवर्ड एंड फेल फ़ास्ट’, ये हमारा मंत्र है. हमने कई नॉन कन्वेंशनल फ़िल्में बनाई. हमने कमर्शियल सक्सेस के लिए उनकी मार्केटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन किया. ‘स्वदेस’ और ‘राजनीति’ जैसी हमारी फिल्मों का content ऑडियंस के लिए एकदम नया और हटकर था.

2008 में हमने ‘A Wednesday’ के साथ फिर कमाल कर दिखाया. ये फिल्म एक सस्पेक्टेड बॉम्बर के बारे में थी जो बाद में एक कॉमन मैन निकलता है. नसीरूद्दीन शाह ने एक आम आदमी के तौर
पर एक्टिंग की थी जबकि अनुमप खेर इसमें पुलिस कमिश्नर के रोल में थे. नीरज पांडे, एक टेलेंटेड नए
डायरेक्टर ने ये मूवी लिखी और डायरेक्ट की. A Wednesday को बेस्ट फर्स्ट फिल्म का इंदिरा गांधी
अवार्ड भी मिला. 2006 में ‘रंग दे बसंती’ और 2012 में ‘बर्फी’ की सक्सेस के बाद हमारी तीन फिल्मों ने ऑस्कर में इण्डिया की तरफ से ऑफीशीयल एंट्री की थी. यूटीवी को नौ फिल्मों के लिए 25 नेशनल अवार्ड मिले थे. फिम्ल इंडस्ट्री में ऐसा आज तक किसी ने नहीं किया था. हमें अपने अचीवमेंट पर गर्व है. हमने ऐसे-असे रिस्क लिए है जो कोई और स्टूडियो लेने को तैयार नहीं होता हमने कैम्पेन के जरिए नहीं बल्कि बल्कि अपने ग्राउंडब्रेकिंग आईडियाज़ के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई है. अगर हमें ऐसे क्रिएटिव दिमाग नहीं मिलते, जिन्हें लोग आउटसाइडर्स कहते है, तो हमारी  कहानियाँ भी शायद कभी बड़े पर्दे पर उतर नहीं पातीं.

DREAM WITH YOUR EYES
OPEN- An Entrepreneuri…
Ronnie Screwvala
Even If It Ain’t Broke, Fix It

इनोवेट एंड डिसरप्ट. हम अक्सर इन शब्दों को बुक्स में और बिजनेस के आर्टिकल्स में पढ़ते है लेकिन मुझे
लगता है कि इन शब्दों को कभी ठीक तरीके से समझा नहीं गया है. एक बिजनेस को खड़ा करने में कई
तरह के चैलेंज आते है. जैसे कि आप किसी हिलते हुए टारगेट पर निशाना साध रहे हो. अगर आप एक लॉन्ग
टर्म बिजनेस चाहते हो तो आपको हर हाल में बहुत इनोवेटिव और लगातार डिसरप्टिव होने की जरूरत
है. डिसरप्शन से हमारा मतलब यहाँ रैश डिसीजन लेना नहीं है बल्कि इसका मतलब है ऑरिजिनलिटी और
लॉन्ग टर्म आईडियाज़ के बारे में ध्यान से सोचना. कई ग्रोईंग बिजनेस इनोवेशन को सिर्फ एक ग्रेट आईडिया
क्रिएट करने के तौर पर देखते है लेकिन वो भूल जाते है कि इनोवेट करना रिस्की भी हो सकता है, जैसे
मार्केट में आपको गलत समझ लिया जाता है या फिर आप अपने टाइम से बहुत आगे की सोच रहे होते हो जो
लोगों को समझ नहीं आता. आपका गोल सिर्फ और पैसा रेज़ करना नहीं होना चाहिए बल्कि आपको वाकई में कुछ इनोवेट करना है. आपका फ़ोकस होना चाहिए एक सॉलिड, टिकाऊ और स्केलेबल बिजनेस सेट करना जिससे कि आपको इन्वेस्टर्स मिलने में दिक्कत ना हो.

जिस शो ने यूटीवी को टीवी प्रोडक्शन में एक इनोवेटर और डिसरप्टर के तौर पर पहचान दिलाई वो शो था
‘शांति’, तब 1994 में और कोई शो हफ्ते में 5 बार ब्रोडकास्ट नहीं किया जाता था ख़ासकर दोपहर के
समय पर. ये टाइम एजुकेशनल प्रोगाम के लिए बुक था. शांति इण्डिया का पहला डेली सोप ऑपेरा था.
हमने इसे डेली इसलिए किया था क्योंकि हम चाहते थे कि लोगों की इसकी आदत लग जाए. हर एपिसोड
एक क्लिफहैंगर की तरह बनाया जाता था जहाँ ऑडियंस को अगले एपिसोड का बेसब्री से इंतज़ार
रहता था और इसका टाइम स्लॉट भी हमने दोपहर का ही चुना था क्योंकि हमारा टारगेट ऑडियंस थी
हाउसवाइव्स जो घरेलू काम निपटाने के बाद दोपहर को अक्सर फ्री हो जाती थीं.
शांति के लिए हमें एक साल के अंदर 260 एपिसोड बनाने थे. हमने सब कुछ शुरुआत से स्टार्ट किया था.
हमारे पास डेली ऑपेरा के लिए कोई एक्सपीरीएंस्ड प्रोडक्शन स्टाफ नहीं था. हमें लोगों को ढूंढकर उन्हें
हायर और ट्रेन करना था. हमने एक बड़ा सा वेयरहाउस रेंट पर लिया और उसके अंदर 17 अलग-अलग सेट बनाए ताकि सारे के सारे एपिसोड वहीं शूट किये जा सके.

हमारे लॉयल व्यूवर्स का फीडबैंक हमें स्टोरी को और भी इनोवेटिंग और इंट्रेस्टिंग बनाने के लिए गाईड करता रहा. हमने अपना logistics भी एकदम रेडी रखा हुआ था ताकि हम डेली एक एपिसोड शूट कर सके. ये चीज़ टीवी इंडस्ट्री में पहली बार हो रही थी. हमारी टीम कमर कसकर तैयार खड़ी थी.
अब क्योंकि उन दिनों डेली सोप ऑपेरा का कॉन्सेप्ट नया था तो हमारे डायरेक्टर आदी पोचा, एडवरटाईजिंग
बैंकग्राउंड से थे. हमें एक्टर्स भी ऐसे मिल गए थे जो हफ्ते के छह दिन सुबह 7 से शाम के 7 बजे तक काम
करने को तैयार थे. शूटिंग से घर वापस आकर भी उन्हें स्क्रिप्ट पढ़नी होती थी और नेक्स्ट डे के डायलॉग याद करने होते थे. हमें शान्ति के फीमेल लीड रोल के लिए एक नए चेहरे की तलाश थी जिसे ढूंढने में हमें दो महीने लगे. कितने ही कैंडीडेट्स को फ़िल्टर करने के बाद आखिरकार हमने मंदिरा बेदी को चूज़ किया. एक एक्टर के तौर पर हमें मंदिरा में काफी पोटेंशियल दिखा पर फिर भी वो थोड़ी स्टिफ और सेल्फ-कांशस थी. हमारे डायरेक्टर ने एयरपोर्ट पर जब हम पहुंचे तो हमें लगा हम सिम्पली अपनी गाड़ी में बैठकर अपने होटल तक चले जायेंगे.

लेकिन नहीं, रास्ते में कई लोग हमारा वेट कर रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे कोई प्राइम मिनिस्टर अपने
देश में वापस लौटा हो. फैन्स अपने फेवरेट एक्टर्स को देखकर बेहद जोश में थे. एक चीज़ जो हमने यहाँ सीखी वो ये कि सच में इनोवेटिव और डिसरप्टिव होने के लिए पहले मार्केट को जानना बेहद जरूरी है.
हमारे डिसरप्टिव प्रोजेक्ट्स का एक और एक्जाम्पल है हंगामा, यूटीवी का किड्स चैनल. उस वक्त पहले
से ही छह किड्स चैनल चल रहे थे. ये सारे के सारे इंटरनेशनल कंपनियों के थे जो दुनिया भर के 160
देशों में दिखाए जा रहे थे. हमने रिसर्च की तो पता चला कि बच्चों को कार्टून नेटवर्क और उनके कई शोज़
बड़े पसंद थे. तब ऐसा लग रहा था मार्केट में एक और किड्स चैनल के लिए जगह नहीं है. लेकिन हम एक लोकल चैनल क्रिएट करना चाहते थे जो पूरी तरह से इन्डियन हो. हमारे पास पहले ही ‘शरारत’ और ‘शाका लाका बूम बूम’ जैसे शोज़ का एक्स्पीरीएंस था जो हमने दूसरे चैनल्स के लिए बनाये थे. अगर हम आउट ऑफ़ द बॉक्स सोचे तो 4 से 14 उम्र के बच्चों को परफेक्ट content दे सकते है.

तब ऐसा लग रहा था मार्केट में एक और किड्स चैनल के लिए जगह नहीं है. लेकिन हम एक लोकल चैनल
क्रिएट करना चाहते थे जो पूरी तरह से इन्डियन हो. हमारे पास पहले ही ‘शरारत’ और ‘शाका लाका बूम
बूम’ जैसे शोज़ का एक्स्पीरीएंस था जो हमने दूसरे चैनल्स के लिए बनाये थे. अगर हम आउट ऑफ़ द
बॉक्स सोचे तो 4 से 14 उम्र के बच्चों को परफेक्ट content दे सकते है. और इस तरह हमने जैपेन से कुछ एनिमेशन इम्पोर्ट किये जैसे ‘शिन चैन’ और ‘डोरेमोन’. तब से लेकर इतने सालों बाद भी ये शोज़ इन्डियन टेलीवीजन में उतने ही पॉपुलर बने हुए है. इसके अलावा हमने लोकली प्रोड्यूस्ड लाइव एक्शन शोज़ भी अपने चैनल में शामिल किये. शिन चैन के लिए हमें माओं की तरफ से नेगेटिव फीडबैक भी काफी मिला. लेकिन आज भी बच्चे इसे बड़े शौक से देखते है. डेढ़ साल बाद हंगामा इण्डिया में नंबर वन किड्स चैनल बन चुका था. डिज़्नी जो हमारा ग्लोबल कॉम्पटीटर है, बाद में उन्होंने हंगामा हमसे खरीद लिया था. ये डिज़्नी के साथ हमारे लंबे प्रोडक्टिव पार्टनरशिप की शुरुवात थी. कई साल बाद उन्होंने हमारी पूरी कंपनी ही खरीद ली.

DREAM WITH YOUR EYES
OPEN- An Entrepreneuri…
Ronnie Screwvala
Tipping the Scale

टू टिप द स्केल का मतलब है एक बड़ा और बैटर बिजनेस बनाना. इनोवेशन से लेकर डिसरप्शन और
ग्रोथ तक बिजनेस खुद को ही बढ़ाता जाएगा. एक बिजनेस को स्टार्ट करने, उसे ग्रो और स्केल करने के
लिए अलग तरह थिंकिंग की जरूरत होती है. आपको ये पता करना होगा कि आप स्टार्टर है, ग्रोअर हैं या
स्केलर या इन तीनों का मिक्स. जैसे एक्जाम्पल के लिए मान लो आप दस सालों से एक प्रोफेशनल है. आपको लगता है कि आप ग्रोअर और स्केलर है. फिर आपको एक को-फाउंडर मिलता है जो एक ग्रेट स्टार्ट-अप पर्सन है. तो आप दोनों मिलकर एक टीम बना सकते है. लेकिन आपको कैसे पता चलेगा कि स्केल करने का यही राईट टाइम है? इसे हम कहते है एक इन्फ्लेक्शन पॉइंट. एंटप्रेन्योर्स अक्सर ऐसी सिचुएशन में फंस जाते है कि जहाँ उन्हें कोई कम्फर्टेबल niche या फील्ड मिला तो वहीँ के वहीँ रह जाते है. आप कुछ बड़ा सोच ही नहीं पाते. जब कोई बिजनेस किसी small मार्केट में एस्टेबिलिश्ड हो जाता है तो अक्सर एंटप्रेन्योर उसे आगे स्केल ना करने के बहाने ढूँढने लगते है. लेकिन ये चीज़ यही दिखाती है कि उनके अंदर एम्बिशन और कॉन्फिडेंस की कितनी कमी है यानि एक एंटप्रेन्योर के तौर पर आपको खुद पर भरोसा नहीं है. शायद आपको इतनी ग्रोथ काफी लगती होगी पर आज से पांच साल बाद भी क्या आप वही करना चाहोगे जो आप आज कर रहे हो? शायद आपका जवाब ना होगा.

स्केल और स्ट्रेटेज़ी एक दूसरे से जुड़े हुए है. अगर आपने अपने बिजनेस को स्केल करने का गोल नहीं
रखा तो फिर आपको किसी स्ट्रेटेज़ी की जरूरत ही नहीं है क्योंकि स्केल करने के लिए आपको ये तय
करना होगा कि आपका डिफरेंशीएटर क्या है. ऐसा क्या है आपके प्रोडक्ट में जो उसे मार्केट में औरों से अलग
करता है. आप ये नहीं कह सकते कि मार्केट छोटा है या आपके कॉम्पटीटर्स आपसे ज्यादा बड़े है. अगर आपका प्रोडक्ट यूनिक और हटकर है, आपकी एक स्ट्रोंग पहचान और ब्रैंड है तो आपको एक स्केलेबल मार्केट हमेशा मिलता रहेगा.


एक एंटप्रेन्योर के तौर पर मैंने खुद बहुत बार इन्फ्लेक्शन पॉइंट को फेस किया है. लेकिन मैंने ये
सीखा है कि ग्रोथ के ऐसे मौके बार-बार नहीं मिलते इसलिए ऐसी अपोर्च्यूनिटीज़ हाथ से मत जाने दो.
अपना स्टैण्डर्ड हमेशा हाई रखो. एक ऐसी टीम और कल्चर बनाओ जो स्केल पर फोकस रखे. सही टाइम
पर सही मौके का फायदा उठाने में ही समझदारी है. लेकिन सबसे इम्पोर्टेंट है पूरी तैयारी और हार्डवर्क के
साथ इसे नेक्स्ट लेवल तक लेकर जाना. यूटीवी के शुरुवाती दिनों में हमने मौजूदा चैनल्स के
लिए टीवी शोज़ भी बनाये. गल्फ़ वॉर से पहले इण्डिया में सिर्फ एक चैनल हुआ करता था, स्टेट ब्रोडकास्टर
दूरदर्शन. हम मैक्सिमम 26 एपिसोड तक प्रोड्यूस कर सकते थे और उसमे भी कुछ महीनों का गैप होता था.
1992 में इण्डिया को अपना पहला सैटेलाईट चैनल मिला ज़ी टीवी. ये हमारे लिए एक बड़ी अपोर्च्यूनिटी
थी. हमने उन्हें 52 एपिसोड वाले 10 शो ऑफर किये. ये सारे वीकली शोज़ एक साल की ड्यूरेशन वाले थे.
हम अपनी कंपनी को स्केल करने की कोशिश कर रहे थे और ये मौका हमारे हाथ लगा था.
लेकिन ज़ी टीवी का इसमें क्या फायदा है ? अगर वो हमारे साथ स्केल करते है तो उन्हें अलग-अलग प्रोडक्शन कंपनीज़ के साथ डील करने की जरूरत नहीं पड़ेगी और एडिशनल कॉस्ट नहीं देना पड़ेगा और हमारे लिए यूटीवी में, 520 एपिसोड बनाना दूरदर्शन के जमाने में एक बहुत बड़ा कदम था.

इस तरह हम 6 स्टूडियो बेस्ड शोज़ जिसमें गेम्स, क्विज़ और टॉक शोज़ शामिल थे और उसके बाद
चार ड्रामा और सोप ऑपेरा बनाने के लिए रेडी हो गए. स्टूडियो बेस्ड शोज़ के लिए हमने प्लान किया था
कि हम एक दिन में 5 एपिसोड शूट करेंगे जो आज से पहले कभी किसी और ने नहीं किया था.
इससे पहले इंडियन टेलीविज़न में किसी ने भी इतने बड़े पैमाने पर content प्रोड्यूस नहीं किया था
लेकिन हम एम्बिशीएस थे. हमें एक गोल्डन चांस दिखा था जो हमने तुरंत लपक लिया. उस एक साल के अंदर यूटीवी में हमें ऐसा लग रहा था जैसे हम प्रेशर कूकर के अंदर है. हमारे ऊपर काम का इतना ज्यादा प्रेशर था कि हम बता नहीं सकते. हम दिन-रात मेहनत कर रहे थे. टेंशन के मारे रात-रात भर सो नहीं पाते थे. अपने प्रोजेक्ट्स को टाइम और बजट में पूरा करने के लिए हम जी-जान से जुटे हुए थे.

लेकिन चीज़े इतनी आसान नहीं थी. लोजिस्टिक्स में ही इतनी प्रॉब्लम आ रही थी. ये बिल्कुल ऐसा ही था
जैसे एक साथ दस अलग-अलग फैक्टरी बनाने का काम चल रहा हो. मेरी क्रिएटिव टीम मुझे चौबीस घंटे
घेरे रहती थी. हम अपनी लिमिट से बढ़कर काम कर रहे थे. कोई काम पहले कभी नहीं हुआ तो इसका
मतलब नहीं है कि आगे भी नहीं होगा. अपने वादे के मुताबिक़ हमने 520 एपिसोड बनाकर दिखा दिए थे.
दो साल बाद, 1994 में हमने इण्डिया का पहला डेली सोप ऑपेरा बनाया “शान्ति”. स्केल करने के लिए आपकी लिमिट सिर्फ उतनी है जितना आप सोचते हो. चाहे आप B2B में हो या B2C, आप हर रुकावट को तोड़कर आगे निकलने की कैपेसिटी रखते हो. आपके अंदर हमेशा स्केल करने की भूख होनी चाहिए.

DREAM WITH YOUR EYES
OPEN- An Entrepreneuri…
Ronnie Screwvala
Exit Stage Left?

जब हमने मलेशिया में हंगामा को ब्रोडकास्ट किया तो हमारे मलेशीयन पार्टनर ने हमारे किड्स चैनल में
26% इन्वेस्ट करने का ऑफ़र दिया. हमारी डील अभी साईन भी नहीं हुई थी कि मीडिया में ये खबर आग की
तरह फ़ैल गई. इसके कुछ ही दिनों बाद मुझे डिज़्नी इंटरनेशनल के चेयरमैन एंडी बर्ड की तरफ से कॉल आया. उन्होंने कहा कि डिज़्नी हंगामा चैनल को पूरा 100% लेना चाहते है. लेकिन मैंने कहा कि हम सिर्फ इन्वेस्टर ढूंढ रहे है. ये एक इत्तेफाक ही समझ लो कि उस वक्त मैं लॉस एंजेलेस में था. एंडी ने मुझे केविन मेयर से मिलने को कहा जो डिज़्नी के हेड ऑफ़ स्ट्रेटेज़ी थे. हमारी मीटिंग के दौरान केविन ने बताया कि डिज़्नी इण्डिया में अपना बिजनेस बढ़ाना चाहती है. उन्हें यूटीवी का मॉडल पसंद आया था और वो अब हंगामा के अलावा कुछ और पार्टनरशिप भी करना चाहते थे. डिज़्नी का प्रपोज़ल था कि वो हंगामा चैनल को 100% खरीदना चाहते थे और यूटीवी में और 14% इन्वेस्ट करने की सोच रहे थे. मेरे लिए ये सिर्फ एक चैनल को बेचने की बात नहीं थी बल्कि मैं इस बात को लेकर काफी एक्साईटेड था कि हमें एक स्ट्रेटेज़िक पार्टनर मिलेगा जिससे हमारे बिजेनस को ग्रो करने का अच्छा मौका मिलेगा.

पहली चीज़ जो मैंने की वो ये कि अपने मलेशीयन पार्टनर को इन्फॉर्म करके अपने प्लान के चेंज के बारे
में बता दिया. उन्हें ये खबर सुनकर बड़ी मायूसी हुई लेकिन उन्हें भी इस डिसीजन में हमारे बिजनेस की
भलाई दिख रही थी इसलिए उन्होंने पूरे दिल से हमारे फैसले को रिस्पेक्ट देते हुए इसे सपोर्ट किया.
हमारे सामने थोड़ी दिक्कत ये आ रही थी कि डिज़्नी डील नेगोशियेट करना चाहता था जबकि मैं इस बात
के लिए तैयार नहीं था. आखिरकार केविन और मैंने अपने-अपने नज़रिए को डिस्कस किया और एक
एग्रीमेंट कर लिया. ये शायद एक पैटर्न जैसा लगे. मैंने स्क्रैच से बिजनेस स्टार्ट किया था और उसे सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचा कर बाद में उसे किसी और को बेच दिया. लेकिन मैं आपको बता दूं कि कोई भी एग्जिट पूरी तरह से प्लांड नहीं होता. जब आप एक बिजनेस से बाहर निकलते हो तो इसका ये मतलब नहीं है कि आपने उसे पूरी तरह छोड़ दिया है बल्कि आप उसे फ्यूचर ग्रोथ के लिए आगे पास कर रहे हो.

अगर हम हंगामा को मलेशिया में ब्रोडकास्ट करने का नहीं सोचते तो हमें मलेशियन पार्टनर भी नहीं मिलते
जो हमें 26% इन्वेस्टमेंट का ऑफर देते और ना ही डिज़्नी जैसी बड़ी कंपनी हमारे चैनल को खरीदने का
ऑफर देती. अगर यूटीवी में हम खुद को यही कहते “चलो एक बच्चों का चैनल बनाये” और तीन साल बाद इसे डिज़्नी या निकलोडियन को बेच देते तो शायद हम बहुत बड़ी गलती कर बैठते. तब शायद हम खुद को डिज़्नी या निकलोडियन के स्टैंडर्ड का बनाने की कोशिश करते रहते और इस चक्कर में हम हंगामा चैनल को इतना यूनिक और डिसरप्टिव नहीं बना पाते. हम शायद अपने चैनल को कोई वेस्टर्न नाम देते और उसमें जैपनीज एनिमेशन के बजाए वेस्टर्न शोज़ ही दिखाते. डिज़्नी जैसी कंपनी हमेशा लॉन्ग टर्म के बारे में
सोचती है. ये पांच, दस या पन्द्रह साल आगे की प्लानिंग करके चलती है. जैस-जैसे हम डिज़्नी के
साथ डिस्कस करते गए वैसे-वैसे हमें एहसास होता गया हमारा विज़न सेम है. यूटीवी ने डिज़्नी के साथ मिलकर इंडस्ट्री में एक डाईवर्स प्रेजेंस क्रिएट कर दी थी. साथ ही इसकी वजह से दोनों तरफ बढ़िया टीम भी बनी और एक स्ट्रोंग कल्चर की भी नींव पड़ी. एक एंटप्रेन्योर के तौर पर आपके करियर में आपको कई बार ऐसे एग्जिट पॉइंट्स मिलेंगे जहाँ आप खुद से ही पूछोगे “क्या मुझे इससे बाहर निकल जाना चाहिए या रहना चाहिए”. लेकिन एग्जिट चूज़ करने का ये मतलब नहीं है कि आप कमिटेड नहीं हो बल्कि ये सोचो कि आप एग्जिट करके एक वैल्यू क्रिएट कर रहे हो, ख़ासकर तब इसकी ज़रुरत हो या अपोर्च्यूनिटी मिल रही हो.

जैसे मान लो आपको अपना फेमिली बिजनेस विरासत में मिलता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है. अब ये
पॉसिबल है कि आपको इस काम में जरा भी इंटरेस्ट नहीं है और आप इसे हैंडल नहीं कर पा रहे. तो ऐसे
में वही करो जो बिजनेस के लिए सही है. सिर्फ लेगसी के नाम पर बिजनेस चलाने का कोई लॉजिक नहीं है.
हो सकता है कि कोई और इसे आपसे बैटर हैंडल कर पाए तो ऐसे में बिजनेस की भलाई के लिए उसे बेचना
ही सही डिसीजन होगा. अगर आप अपनी कंपनी बेच रहे हो या उसे छोड़कर जा रहे हो तो अपने एम्प्लोईज़ के साथ कम्यूनिकेशन करना बेहद इम्पोर्टेंट है. एक लीडर के तौर पर आपकी ड्यूटी है कि आप ब्रैंड और टीम को स्ट्रोंग बनाये. सिर्फ एग्जिट के बारे में ना सोचकर लॉन्ग टर्म बिजनेस स्ट्रेटेज़ी के बारे में सोचो.

DREAM WITH YOUR EYES
OPEN- An Entrepreneuri…
Ronnie Screwvala
Second Innings

मुझे गर्व है कि मैं मीडिया और एंटरटेंमेंट का एक हिस्सा हूँ जो आज इण्डिया की तेज़ी से उभरती इंडस्ट्री बन गई है. मुझे हमेशा से ही रोज़ कुछ ना कुछ नया करने का शौक रहा है या फिर कोई यूनिक आईडिया जो मैं सच करके दिखा सकूं. अब जबकि मैंने अपनी लाइफ का एक नया चैप्टर स्टार्ट किया है, तो मैं ऐसे प्रोजेक्ट चूज़ कर सकता हूँ जिनका लोगों की जिंदगी में एक लाइफ चेंजिंग इम्पैक्ट पड़े. अगर आपने कुछ सालों पहले मुझसे ये सवाल पूछा होता कि “क्या मैं एंट्प्रेन्योर के तौर पर अपने करियर पर कोई बुक लिखना चाहूंगा तो मेरा जवाब शायद ये होता “पागल हो क्या”? 2014 में मुझे एक एंटप्रेन्योर के तौर पर अपनी रोलर
कोस्टर जर्नी जो मैंने 25 साल पहले शुरू की थी, के बारे में सोचने का मौका मिला. मेरे एक फ्रेंड ने मुझे “अब जबकि तुम क्रोसरोड पर पहुँच चुके हो, तो अब काम से ब्रेक लेकर थोडा रिलैक्स क्यों नहीं करते ?’

कहा लेकिन मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मैंने बहुत काम कर लिया है और अब मुझे हिमालय पर जाकर तपस्या करनी चाहिए. लेकिन मेरे दिमाग में ये सवाल घूमता रहा. क्या मैं रोज़ वही सेम चीज़ करता रहूँगा? वही ग्रोथ, इनोवेशन, टीम बिल्डिंग और क्राइसिस मैनेजमेंट वगैरह के पीछे भागना? तो इस बात पर बेशक मैं वही जवाब दूंगा जो एक एंटप्रेन्योर से उम्मीद की जाती है. ये आपके डीएनए में है कि आपको कुछ ना कुछ क्रिएट करना ही है. आपको पैशनेट और एक ड्राइव के साथ आगे बढ़ना ही होगा. कुछ ऐसा करना होगा जो वर्थ हो. एक चैप्टर क्लोज़ हो गया, अब आपको नेक्स्ट चैप्टर खोलना है. मैं कम्बाइंड डिज़्नी यूटीवी इण्डिया का मैनेजिंग डायरेक्टर बन गया. इस एक्सपीरीएंस ने ब्रैंड, इनोवेशन और स्केल पर मेरे यकीन को और भी मजबूत कर दिया था. हालाँकि अपने सेकंड ईयर में ही मेरे दिमाग में ये सवाल बार-बार मंडराने लगा था कि क्या मैं इस पोजीशन पर अगले पांच साल और रह सकता हूँ, इस पोस्ट के लिए मैं सही कैंडीडेट हूँ भी या नहीं? बस, अब मैंने डिसाइड किया कि मैं कंपनी छोड़कर आगे बदूंगा.

बॉब आइगर, जो डिज़्नी के सीईओ थे, उन्होंने मेरे डिसीजन को एक्सेप्ट किया. अपने फेयरवेल लैटर में
उन्होंने लिखा था “मुझे मालूम है कारपोरेशन में काम करना इतना ईज़ी नहीं है लेकिन मैंने अपनी इस
पार्टनरशिप को हमेशा एन्जॉय किया है. मुझे उम्मीद है तुम्हारी स्पिरिट और एनर्जी हमेशा यहाँ रहेगी.”
अपनी सेकंड inning के लिए मैं अपने पहल, स्वदेश फाउंडेशन के लिए पूरी तरह से कमिटेड था. इसके
साथ ही मैं यू स्पोर्ट्स और अपनी कबड्डी टीम यू मुम्बा का को-फाउंडर भी बना.

Conclusion
इस समरी में आपने जाना कि रॉनी स्क्रूवाला बचपन से ही एक बिजनेसमैन बनना चाहते थे. वो लोगों को
बरामदे से प्रीमियर नाइट्स देखने के लिए टिकेट बेचा करते थे. बिजनेस स्टार्ट करने की कोई उम्र नहीं होती. जब भी आपको लगे आप बिजनेस करना चाहते हो, आप स्टार्ट कर सकते हो. आपने ये भी जाना कि रॉनी ने अपना पहला बिजनेस लेज़र ब्रश से शुरू किया था. उन्हें एक अपोर्च्यूनिटी से मिली जो उन्होंने फौरन लपक ली. उन्होंने अपने एक्स्पीरीएंस से काफी कुछ सीखा. किसी भी बिजनेस के लिए प्लानिंग बेहद इम्पोर्टेंट होती है पर आप उसे प्रेक्टिल में करते है तो काफी कुछ सीखते है. कोई भी नया काम शुरू करने से पहले अपने डाउट्स हमेशा क्लियर कर ले. आपके मन में जो भी सवाल है, पहले उनके जवाब ढूंढना जरूरी है. फिल्म बिजनेस की अगर बात करे तो ये यूटीवी के लिए एक नई फील्ड थी पर उन्होंने इस लाइन में अपनी एक अलग और अनोखी पहचान बनाई. उन्होंने कुछ ऐसी फ़िल्में प्रोड्यूस की जो लीक से हटकर थी. इनमें रंग दे बसंती, अ वेडनेसडे, बर्फी’ जैसी फ़िल्में शामिल है. इनका मोटो था कि अपने फ़ैसले पर यकीन करो.

अपना एक अलग ब्रैंड बनाओ लेकिन प्रमोशन के ज़रिए नहीं बल्कि हाई क्वालिटी प्रोडक्ट्स के ज़रिए
अपनी एक इनोवेटिव और यूनिक पहचान बनाओ. बिजनेस ग्रो करने का यही एक सीक्रेट है. यूटीवी ने
इण्डिया में पहली बार शान्ति सीरियल के साथ डेली सोप की शुरुवात की और बच्चों के लिए एक लोकल
चैनल हंगमा भी लॉन्च किया. इन्होने बड़ी-बड़ी कंपनीज़ के मॉडल को कॉपी करने के बजाए अपने
खुद के आईडिया को फॉलो किया जिसके कारण यूटीवी ने टेलिविज़न इंडस्ट्री में सफलता की ऊँचाइयों
को छू लिया था. इस स्केल का सीक्रेट था एकदम लीक से हटकर नए प्रोडक्ट बनाना. अगर आपको अपने टारगेट कस्टमर के बारे में पता है और आपके पास एक स्ट्रोंग पहचान और ब्रैंड नेम है तो आपको हमेशा ग्रो करने के मौके मिलते रहेंगे और यूटीवी ने ये कर दिखाया जब उन्होंने एक साल में ही ज़ी टीवी के लिए दस शो प्रोड्यूस और ब्रैंड नेम है तो आपको हमेशा ग्रो करने के मौके मिलते रहेंगे और यूटीवी ने ये कर दिखाया जब उन्होंने एक साल में ही ज़ी टीवी के लिए दस शो प्रोड्यूस किये.

बिज़नस से एक्जिस्ट कभी प्रीप्लांड नहीं होते. कई बार एंटप्रेन्योर को ना चाहते हुए भी चीज़े छोडनी पड़
जाती है पर इसका ये मतलब नहीं है कि उनके अंदर कमिटमेंट की कमी है. रॉनी ने यूटीवी डिज़्नी को
इसलिए बेचा क्योंकि ये ग्रोथ के लिहाज़ से एक बड़ा मौका था. सबसे इम्पोर्टेंट बात ये है कि डिज़्नी और
उनका विज़न सेम है.
यूटीवी के बाद रॉनी अपने बाकि प्रोजेक्ट्स साथ बिज़ी हो गए. उन्होंने स्वदेश फाउंडेशन और यू स्पोर्ट्सकी नींव रखी. वो आज भी ऐसे प्रोजेक्ट्स कर रहे है जो लाइफ चेजिंग इम्पैक्ट रखते है. एक एंटप्रेन्योर कीहमेशा यही कोशिश होनी चाहिए कि वो वैल्यू क्रिएट करता रहे, एक चैप्टर खत्म हुआ नहीं कि वो दूसरे

बड़े प्रोजेक्ट की तरफ बढ़ जाए. एक डेवलपमेंट कंट्री के तौर पर हमारे देश में नए-नए सेक्टर उभरकर सामने आ रहे है जहाँ हमारे लिए कुछ अलग और यूनिक करने के कई मौके है. इसलिए
आज चाहे टेक्नोलॉजी हो, हेल्थ, एजुकेशन या टूरिज्म सेक्टर हो, हमें और ज्यादा क्रिएटिव थिंकर्स की
जरूरत है. आज हमारे पास वो सब कुछ है जो इस देश को बदल सकता है. हमारे पास दुनिया के सबसे ज्यादा यंग और पैशनेट लोग है और हम अपने ऑप्टीमिज्म और होप के साथ कुछ भी अचीव करने की ताकत रखते है. इसलिए हम ये कह सकते है कि खुली आँखों से सपने देखो, वो जरूर सच होंगे! 

Leave a Reply