David and Goliath Malcolm Gladwell Books In Hindi Summary

David and Goliath Malcolm Gladwell इंट्रोडक्शन (Introduction) क्या आपने कभी सुना है कि एक पढ़ने लिखने की तकलीफ़ से जूझने वाला इंसान लॉयर बन गया हो ? क्या आपने कभी एक मामूली बकरी चराने वाले लड़के को एक ताकतवर योद्धा को हराते हुए देखा है? आप सोच रहे होंगे कि ऐसा तो बस मन को बहलाने वाली कहानियों में होता है, है ना? नहीं,ऐसा सिर्फ़ फ़िल्मों में नहीं होता, कभी-कभी ये असल जिंदगी में भी होता है. हमें जो अक्सर दिखता है वो हमेशा सच नहीं होता. एक कहावत है “लुक्स आर deceptive” यानीजो जैसा दिखता है वो हमेशा वैसा नहीं होता. छोटी सी चीज़ में भी कोई बड़ी बात छुपि हो सकती है.हमारी अपीयरेंस एक छलावा भी हो सकती है. ये एक इम्पोर्टेन्ट सबक है जो आप इस बुक के माध्यम से सीखेंगे. कुछ लोगों को देख कर ही हम अनुमान लगा लेते हैं कि वो तो हारने वाले हैं. कुछ लोग दिखने में फिजिकली इतने स्ट्रोंग नहीं होते और हम पहले से ही मान लेते हैं कि वो कभी जीत नहीं सकते. लेकिन ये underdog की तरह होते हैं जो अचानक जीत कर हमें चौंका देते हैं. डेविड और गोलिअथ की कहानी में आपको इसकी झलक दिखाई देगी. यह बुक आपको कई अनमोल बातें सिखाएगी. आप चीज़ों को अलग नज़रिए से देखने लगेंगे आप सोसाइटी में फैली मानसिकता को गहराई बातें सिखाएगी. आप चीज़ों को अलग नज़रिए से देखने लगेंगे. आप सोसाइटी में फ़ैली मानसिकता को गहराई से समझने लगेंगे. हम में से कई लोग हैं जो सोचते हैं कि किसी भी चीज़ का ज़्यादा से ज़्यादा होना हमेशा अच्छा होता है यानी ताकत हो तो बहुत होनी चाहिए, पैसा हो तो बहुत होना चाहिए. यानी ज़्यादा है तो अच्छा है, लेकिन एक ऐसा भी पॉइंट आता है जब ज़्यादा अति का रूप ले लेता है और किसी भी चीज़ की अति हमेशा विनाश का कारण बनती है. ये बुक आपको समझाएगी कि हमें कभी दूसरों को जज नहीं करना चाहिए, ये आपको किसी भी चैलेंज से उभरना सिखाएगी. आप माफ़ करना और चीज़ों को पकड़ कर रखने के बजाय उन्हें छोड़ना सीखेंगे. डेविड और गोलिअथ कि कहानी एक इंटरनेशनल बेस्ट सेलर है और मैलकॉम की हर बुक की तरह, ये बुक साइकोलॉजी और सोशियोलॉजी के फील्ड में उनकी गहरी समझ और सोच को दिखाती है. इसे पढ़ने के बाद में आपको समझ आएगा कि उन्हें एक महान थिंकर क्यों कहा जाता है. डेविड एंड गोलिअथ (David and Goliath) बहुत पुरानी बात है, इसरायली और फिलिस्तीनियों के बीच एक दूसरे के देश को जीतने की होड़ लगी हुई थी. इलाह वैली में बैटल फ्रंट था. इसरायली आर्मी ने नार्थ के हिस्से में कैंप लगाया और फिलिस्तीन आर्मी ने साउथ की ओर. दोनों तरफ़ के किसी भी सोल्जर ने इस लाइन को क्रॉस करने की जुर्रत नहीं की थी. लाइन को क्रॉस करने की जुर्रत नहीं की थी. लेकिन कुछ समय बाद फिलिस्तीनी बेचैन होने लगे. उन्होंने पहल की और अपने सबसे ताकतवर सोल्जर को आगे भेजा. उसका नाम गोलिअथ था. वो सात फुट का लंबा चौड़ा आदमी था. उसनेपूरे शरीर को कवच से ढक रहा था.उसके पास तीन हथियार थे तलवार, भाला(spear) और जेवलिन. उसने चिल्लाकर इसरायलीयों से कहा, “अपने सबसे ताकतवर और जांबाज़ सोल्जर को मेरा सामना करने भेजो. अगर वो जीत गया तो हम सब तुम्हारे गुलाम बन जाएँगे. लेकिन अगर मैं जीता तो तुम सब को हमारे आगे सर झुकाना होगा”. इसरायली काफ़ी घबरा गए.वो कैसे इस विशालकाय महा शक्तिशाली को हरा पाएँगे? तभी एक बकरियां चराने वाला चरवाहा (shepherd) सामने आया. उसका नाम डेविड था. इजराइल आर्मी के लीडर शाऊल डेविड को देख कर बड़े चिंतिति हुए.उन्होंने उस छोटे से दुबले पतले लड़के से कहा कि तुम ज़रा देर भी नहीं टिक पाओगे. लेकिन डेविड ये सुन कर निराश नहीं हुआ. उसने कहा कि वो उसकी बकरियों के पास आने वाले किसी भी शेर या भालू से लड़ने का जज़्बा रखता था. इस जवाब को सुन कर शाऊल ने आगे कुछ नहीं कहा. फ़िर डेविड ने कुछ छोटे छोटे पत्थर उठाए और गोलिअथ के सामने खड़ा हो गया. गोलिअथ ने जब ये देखा तो ठहाके मार कर हँसने लगा. उसने कहा, “क्या मैं तुम्हें राह चलता कुत्ता लग रहा हूँ, जिसे तुम अपनी मैं तुम्हें राह चलता कुत्ता लग रहा हूँ, जिसे तुम अपनी बकरियां चराने वाली लाठी से डरा कर भगा दोगे?” लेकिन इसके बाद जो हुआ वो इतिहास के पन्नों में अमर हो गया. डेविड ने अपनी गुलेल (slingshot) में एक पत्थर रखा और गोलिअथ के माथे के ठीक बीच बीच निशाना लगाया. पत्थर लगते ही वो विशालकाय आदमी ज़मीन पर धराशायी हो गया. डेविड जितना हो सकता था उतनी तेज़ी से आगे की ओर दौड़ा. उसने गोलिअथ की तलवार छीन कर उसका सर काट दिया. ये नज़ारा देख कर फिलिस्तियों के होश उड़ गए और वो सब वहाँ से भाग निकले. गोलिअथ ने सोचा था कि डेविड उससे आमने सामने लड़ाई करेगा. लेकिन अगर ऐसा होता तो डेविड का हारना तय था. डेविड बहुत होशियार और स्मार्ट था. उसने दूर से गोलिअथ पर निशाना लगाया. वो गुलेल चलाने में माहिर था, वो जानता था कि उसका निशाना चूकेगा नहीं. ऐसा करके उसने गोलिअथ को बिलकुल चौंका दिया था. इसे कहते हैं एक कमाल की बैटल स्ट्रेटेजी जिसमें सिर्फ बुद्धि की ज़रुरत थी ताकत की नहीं. हिस्टोरियंस का कहना है कि असल में गोलिअथ “एक्रोमीगेली” नाम के एक कंडीशन से पीड़ित था. इस बीमारी में पिट्यूटरी ग्लैंड ज़रुरत से ज़्यादा हॉर्मोन बनाने लगता है जिसकी वजह से इंसान के हाथ, पैर और हाइट abnormal तरीके से बढ़ने लगती है. इस कंडीशन की वजह से धुंधला दिखाई देने लगता है या एक ही चीज की दो तस्वीर आंखों के सामने बनने इस कारान का वजह स चुचला दिखाई दन लगता 6 या एक ही चीज़ की दो तस्वीर आंखों के सामने बनने लगती है. इससे ये बात सामने आई कि गोलिअथ बहुत बलवान और लंबा चौड़ाथा. उसने कवच भी पहन रखा था लेकिन उसकी एक कमज़ोरी थी. पहला, अपने बड़े शरीर के कारण वो काफ़ी स्लो था और दूसरा, उसे ठीक से दिखाई नहीं देता था. देखने वालों को यही लगा था कि डेविड कमज़ोर था. वो दुबला पतला छोटा सा एक मामूली लड़का था. लेकिन डेविड ने सबको गलत साबित कर दिया. वो बहुत बुद्धिमान, फुर्तीला और गुलेल चलाने की कला में माहिर था. तो यहाँ सबक ये है कि बाहरी रूप से धोखा ना खाएँ. सिर्फ इसलिए कि कोई दिखने में ज़्यादा ताकतवर नहीं है इसका ये मतलब नहीं होता कि वो आसानी से हार जाएगा.कई दिग्गजों ने इसे बार-बार युद्ध के मैदान में और स्पोर्ट्स के फील्ड में साबित किया है. कई बार आर्मी और स्पोर्ट्स टीम्स ने सामने वाले की किसी कमी को देख कर बस ये अनुमान लगा लिया कि वो तो आसानी से हार जाएंगे. इसका नतीजा ये हुआ कि वो लापरवाह हो गए और जिसे वो underdog समझ रहे थे जब उन्होंने अटैक कियातो वो ख़ुद संभल नहीं पाए और उन्हें मुंह की खानी पड़ी. ऐसे लोग अच्छी स्ट्रेटेजी और पक्के इरादे से एक ऐसी जीत हासिल करते हैं जिसकी किसी को उम्मीद नहीं होती और इनकी जीत ऐसी होती है कि ये आपको चौंकाती भी है और जारी करने पर पानतर भी करनी लेकिन उसकी एक कमज़ोरी थी. पहला, अपने बड़े शरीर के कारण वो काफ़ी स्लो था और दूसरा, उसे ठीक से दिखाई नहीं देता था. देखने वालों को यही लगा था कि डेविड कमज़ोर था. वो दुबला पतला छोटा सा एक मामूली लड़का था. लेकिन डेविड ने सबको गलत साबित कर दिया. वो बहुत बुद्धिमान, फुर्तीला और गुलेल चलाने की कला में माहिर था. तो यहाँ सबक ये है कि बाहरी रूप से धोखा ना खाएँ. सिर्फ इसलिए कि कोई दिखने में ज़्यादा ताकतवर नहीं है इसका ये मतलब नहीं होता कि वो आसानी से हार जाएगा.कई दिग्गजों ने इसे बार-बार युद्ध के मैदान में और स्पोर्ट्स के फील्ड में साबित किया है. कई बार आर्मी और स्पोर्ट्स टीम्स ने सामने वाले की किसी कमी को देख कर बस ये अनुमान लगा लिया कि ‘ वो तो आसानी से हार जाएंगे. इसका नतीजा ये हुआ कि वो लापरवाह हो गए और जिसे वो underdog समझ रहे थे जब उन्होंने अटैक कियातो वो ख़ुद संभल थे नहीं पाए और उन्हें मुंह की खानी पड़ी. ऐसे लोग अच्छी स्ट्रेटेजी और पक्के इरादे से एक ऐसी जीत हासिल करते हैं जिसकी किसी को उम्मीद नहीं होती और इनकी जीत ऐसी होती है कि ये आपको चौंकाती भी है और तारीफ़ करने पर मजबूर भी करती David and Goliath Malcolm Gladwell द एडवांटेज ऑफ़ डिसएडवांटेज (The Advantage of Disadvantage) तो आइए अब हम बात करते हैं कि हमारी सोसाइटी कितनी पार्शियल है. इस पार्ट में हम अमीरों की तरफ़ सोसाइटी का रवैया समझने की कोशिश करेंगे. तो चलिए पहले बात करते हैं कि पढ़ाई लिखाई और पालन पोषण में पैसों से होने वाले कौन से नुक्सान हैं. आज कल हम ये मानने लगे हैं कि एक क्लास में जितने कम बच्चे होंगे, बच्चों की परफॉरमेंस उतनी ज़्यादा अच्छी होगी क्योंकि टीचर एक एक बच्चे पर ठीक से ध्यान दे पाएँगे. लेकिन क्या सच में ऐसा होता है? स्टेटिस्टिक्स और रिजल्ट तो कुछ और ही दिखाते हैं. मान लीजिये कि दो क्लास है, क्लास A और क्लास B. क्लास A में0 बच्चे हैं और B में 25. लोग इमेजिन कर लेते हैं हैं कि क्लास A के बच्चों के ज़्यादा अच्छे मार्क्स आएँगे. लेकिन सच्चाई तो ये है कि दोनों क्लास की परफॉरमेंस बिलकुल एक जैसी होगी. लेकिन ऐसा क्यों? क्योंकि जब क्लास की साइज़ छोटी हो जाती है तो टीचर एक्स्ट्रा एफर्ट नहीं देते. उनकी आदत रिलैक्स करने की हो जाती है. इसे इस तरह सोचिए.एक डॉक्टर आमतौर पर दिनभर में 25 पेशेंटस को चेक करते हैं. लेकिन अगर फ्राइडे इसे इस तरह सोचिए.एक डॉक्टर आमतौर पर दिनभर में 25 पेशेंट्स को चेक करते हैं. लेकिन अगर फ्राइडे को उनके पास सिर्फ़ 20 पेशेंट ही आए तो क्या आपको लगता है कि डॉक्टर हर पेशेंट को ज़्यादा समय देंगे, ये जानते हुए कि उन्हें उतने ही पैसे मिलने वाले हैं जितने हमेशा मिलते हैं? तो इसका जवाब एक बड़ा सा ना है. हर दिन के मुकाबले डॉक्टर अपना काम जल्दी ख़त्म कर के अपनी फॅमिली के साथ थोड़ा समय बिताने के लिए चले जाएँगे. बिलकुल ऐसा ही टीचर्स के साथ भी होता है. तो यहाँ ये समझने की ज़रुरत है कि अगर क्लास बहुत बड़ी हुई यानी 70 बच्चों का तो वो ठीक नहीं है. अगर क्लास बहुत छोटा हुआ यानी 10 बच्चों तक का तो वो भी बिलकुल ठीक नहीं है. सबसे अच्छा होता है एक मीडियम क्लास साइज़ सेलेक्ट करना जैसे कि 40 बच्चों तक का. इससे टीचर अपना पूरा एफर्ट लगाएंगे. ना उन्हें ज़्यादा थकान होगी और ना उन्हें ज़रुरत से ज़्यादा काम करना पड़ेगा. हर चीज़ में बैलेंस होना बहुत ज़रूरी है. बिलकुल ऐसा ही बच्चों की परवरिश में होता है. अक्सर गरीबी एक अच्छा पैरेंट बनने में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है.एक्जाम्पल के लिए, अगर आप एक पिता हैं और फैक्ट्री में वर्कर की पोस्ट पर काम करते हैं तो दिन ख़त्म होते होते आप इतने थक जाएंगे कि घर जाने के बाद अपने बच्चों के साथ खेलने के लिए आप में बिलकुल एनर्जी नहीं होगी. या अगर आप एक सिंगल वर्किंग मदर हैं तो आप या अगर आप एक सिंगल वर्किंग मदर हैं तो आप अनगिनत जिम्मेदारियों की वजह से हमेशा स्ट्रेस में रहेंगी. तब अपने बच्चों पर पूरा ध्यान देना आपके लिए काफ़ी मुश्किल होगा. लोगों को ये भ्रम है कि अगर आप अमीर हैं तो परवरिश करना बहुत आसान हो जाता है. लेकिन ये बिलकुल सच नहीं है. आइये इस कहानी से समझते हैं. जॉन एक फेमस हॉलीवुड एक्टर हैं. वो मिनीपोलिस, USA में पले बढ़े थे. उनका बचपन काफ़ी गरीबी में गुज़रा. छोटी उम्र में ही वो काम करने लगे. वो अपने आस पास के घरों में साफ़ सफ़ाई का काम करते जैसे बगीचे की घास काटना, सूखी पत्तियों का ढेर उठाना या सर्दियों के मौसम में रास्ते से बर्फ़ किनारे लगाना. उनके पिता काफ़ी स्ट्रिक्ट थे. अगर जॉन कुछ खरीदना चाहते जैसे बाइक या और कुछ तो वो उन्हें ख़ुद पैसे कमाने के लिए कहते. अगर वो अपने रूम की लाइट बंद करना भूल जाते तो उनके पिता उन्हें बिजली का बिल दिखाने लगते. वो जॉन को ताना मारते कि क्योंकि वो आलसी है इसलिए उन्हें बिजली के ज़्यादा पैसे भरने पड़ते हैं. कॉलेज में, जॉन अपने साथ पढने वाले अमीर दोस्तों के लिए लांड्री सर्विस का काम करते थे. वो उनके कपड़े लांड्री में ले जाते और वापस उन्हें डिलीवर करते जिसके लिए उन्हें पैसे मिलते थे. जॉन ने न्यू यॉर्क के बिज़नेस स्कूल से पढ़ाई पूरी की. फ़िर एक दिन उन्हें एक्टिंग के फील्ड में एक छोटे से रोल का ऑफर मिला.बस यहाँ से उनकी लाइफ बदलना शुरू हई. एक्टिंग के फील्ड में एक छोटे से रोल का ऑफर मिला.बस यहाँ से उनकी लाइफ बदलना शुरू हुई. इसके बाद उन्हें एक के बाद एक ऑफर मिलते चले गए. फ़िर एक समय आया जब जॉन हॉलीवुड के जाने माने स्टार बन गए. अब उनके पास एक Ferrari है और बेवर्ली हिल्स में आलिशान घर.समय के साथ उन्होंने शादी की और पिता बने. उन्हें अपने बच्चों से बहुत प्यार है लेकिन वो इस बात से चिंतित थे कि क्योंकि वो पैसे वाले थे तो उनके बच्चों की वैसी परवरिश नहीं होगी जैसी उनकी हुई थी. उन्हें पैसे कमाने के लिए कड़ी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी. लेकिन यही तो चिंता का कारण था क्योंकि बिना किसी स्ट्रगल और तंगी को महसूस किये बिना एक स्ट्रोंग कैरेक्टर बनना बहुत मुश्किल है. इकोनॉमिस्टस ने इस ट्रेंड को स्टडी किया है. अगर पेरेंट्स की इनकम साल में 75,000 $ से ज़्यादा है तो बच्चों की परवरिश करना उतना ही मुश्किल हो जाता है जितना की मुश्किल एक गरीब के लिए होता है. पैसा कोई एडवांटेज नहीं देता. बल्कि ये देखा गया है कि अमीर माँ-बाप के लिए अपने बच्चों को डिसिप्लिन करना बेहद मुश्किल काम है. उन्हें ज़्यादा एफर्ट लगाने की ज़रुरत होती है. जब किसी अमीर घराने का बच्चा कुछ खरीदने की ज़िद करे तो पेरेंट्स ये नहीं कह सकते कि “हम इसे अफ्फोर्ड नहीं कर सकते” बल्कि उन्हें ये कहना चाहिए कि “हम नहीं खरीदेंगे” और अपनी बात पर अडिग का कारण था क्योंकि बिना किसी स्ट्रगल और तंगी को महसूस किये बिना एक स्ट्रोंग कैरेक्टर बनना बहुत मुश्किल है. इकोनॉमिस्टस ने इस ट्रेंड को स्टडी किया है. अगर पेरेंट्स की इनकम साल में 75,000 $ से ज़्यादा है तो बच्चों की परवरिश करना उतना ही मुश्किल हो जाता है जितना की मुश्किल एक गरीब के लिए होता है. पैसा कोई एडवांटेज नहीं देता. बल्कि ये देखा गया है कि अमीर माँ-बाप के लिए अपने बच्चों को डिसिप्लिन करना बेहद मुश्किल काम है. उन्हें ज़्यादा एफर्ट लगाने की ज़रुरत होती है. जब किसी अमीर घराने का बच्चा कुछ खरीदने की ज़िद करे तो पेरेंट्स ये नहीं कह सकते कि “हम इसे अफ्फोर्ड नहीं कर सकते” बल्कि उन्हें ये कहना चाहिए कि “हम नहीं खरीदेंगे” और अपनी बात पर अडिग रहना चाहिए. हाँ, उनके पास खरीदने के पैसे हैं लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि बच्चा पैसों की अहमियत ही ना सक्झे, अपनी पसंद की हर चीज़ खरीद ले. अमीर पेरेंट्स को स्ट्रिक्ट होकर एक लिमिट सेट करनी चाहिए. उन्हें अपने बच्चों को समझाना होगा कि वो सब खरीद सकते हैं लेकिन एक अच्छे कैरेक्टर डेवलपमेंट के लिए उन्हें चीज़ों की और पैसों की कदर करना सीखना होगा, जहां उन्हें इजी मनी मिलने लगा वो बिगड़ते चले जाएँगे. David and Goliath Malcolm Gladwell द थ्योरी ऑफ़ डिजायरेबल डिफिकल्टी (The Theory of Desirable Difficulty) कभी-कभी हमारी लाइफ में ये विशालकाय दानव यानी की जायंट कोई इंसान नहीं होता. यहाँ दानव का मतलब है कोई भी चैलेंज जो हम लाइफ में एक्सपीरियंस करते हैं. कभी ये गरीबी होती है, कभी बाड़ और तूफ़ान, कभी महामारी और कभी फिजिकल या मेंटल डिसेबिलिटी. डिस्लेक्सिया एक ऐसी कंडीशन है जिसमें इंसान को अल्फाबेट को समझने में और शब्दों को पढ़ने में दिक्कत होती है. जैसे अगर एक शब्द है “cat” तो एक डिस्लेक्सिक इंसान इसे “tac” की तरह पढ़ता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ब्रेन का जो हिस्सा हमें पढ़ने लिखने में मदद करता है वो ठीक से काम नहीं करता. सब यही सोचने लगते हैं कि डिस्लेक्सिया से जूझ रहा बच्चा स्कूल में कभी अच्छा परफॉर्म नहीं कर सकता. इस वजह से उसे जिंदगी भर पैसों की तंगी का सामना करना पड़ेगा और एक डिस्लेक्सिक इंसान कभी सक्सेसफुल नहीं हो सकता. लेकिन डेविड बोइज़ ने इसे गलत साबित किया. डेविड इलिनोइस के एक छोटे शहर से हैं. जब वो 9 साल के थे तब उनके पेरेंट्स को पता चला कि डेविड को डिस्लेक्सिया है. उन्हें पढ़ने में बहुत दिक्कत होती थी. इसके बजाय उन्हें कॉमिक बक्स और मवीज को डिस्लेक्सिया है. उन्हें पढ़ने में बहुत दिक्कत होती में थी. इसके बजाय उन्हें कॉमिक बुक्स और मूवीज अच्छे लगते थे क्योंकि वो पिक्चर को देख कर कहानी समझ जाते थे. डेविड ज़्यादा बोलते नहीं थे और जब भी बोलते तो छोटे छोटे सेंटेंस में बात करते थे. उन्होंने किसी तरह हाई स्कूल कम्पलीट किया . उस समय उनके कोई सपने नहीं थे. स्कूल में उनका परफॉरमेंस अक्सर ख़राब रहता था. इसके बाद उन्होंने एक कंस्ट्रक्शन वर्कर के रूप में काम किया. उन्हें अपना काम पसंद था क्योंकि इसमें कुछ पढ़ने की ज़रुरत नहीं पड़ती थी. जब डेविड के पहले बच्चे का जन्म हुआ तो उनकी वाइफ उसके फ्यूचर को लेकर चिंतित रहने लगी. उन्होंने डेविड को एक लोकल कॉलेज ज्वाइन करने के लिए encourage किया. जब डेविड छोटे थे तो उन्हें लॉ काफ़ी दिलचस्प लगता था इसलिए उन्होंने अप्लाई करने का फ़ैसला किया. आप सोच रहे होंगे कि डिस्लेक्सिया जैसी कंडीशन के साथ लॉयर बनने का सपना देखना तो पागलपन है. लेकिन डेविड ने इसे कर के दिखाया. डेविड ने हर सब्जेक्ट में टॉप किया सिवाय उन सब्जेक्ट्स में जिसमें बहुत ज़्यादा पढ़ने की ज़रुरत पड़ती थी. लॉ स्कूल में, डेविड ने एक कमाल के technique के बारे में सोचा. हर इम्पोर्टेन्ट केस की समरी होती थी. ये कुछ ही पन्नों की होती थी जिनमें सुप्रीम कोर्ट के डिसिशन को इम्पोर्टेन्ट पॉइंट्स के रूप में लिखा जाता था. डेविड को ये पढ़ना ज़्यादा प्रैक्टिकल लगा. था. डेविड को ये पढ़ना ज़्यादा प्रैक्टिकल लगा. इसके अलावा, डेविड के कमाल के listener थे. वो बहुत ध्यान लगा कर सब कुछ सुनते थे. उनकी listening पॉवर कमाल की थी. लोग जो भी कहते उन्हें सब आसानी से याद हो जाता था. लोग जिस शब्द और टोन का इस्तेमाल करते डेविड को वो exactly वैसा का वैसा याद रहता था. इस तरह सुनते सुनते वो एक एक्सपर्ट बन गए. एक ओर स्टूडेंट्स थे जो लेक्चर सुनने के बाद उसे लिख कर नोट्स बनाते ,तो दूसरी तरफ़ डेविड बड़े गौर से प्रोफेसर के एक एक शब्द को सुनते और उसे रट कर अपने दिमाग में बैठा लेते थे. वो एक स्लो रीडर ज़रूर थे लेकिन उनकी मेमोरी बहुत शार्प थी.अंत में, डेविड लॉ स्कूल फिनिश करने में सफल रहे. एक प्रोफेशनल के रूप में कॉर्पोरेट लॉयर बनना बेवकूफ़ी का डिसिशन होता क्योंकि उसमें हज़ारों डाक्यूमेंट्स को स्टडी करने की ज़रुरत होती है. इसलिए उन्होंने एक litigator बनना चुना. Litigator भी लॉयर होते हैं जिनका काम होता है किसी के खिलाफ़ लीगल एक्शन लेना या किसी के खिलाफ़ मुक़दमा करना. डेविड डिबेट करने में उस्ताद थे. उनके arguments बहुत पावरफुल और टू द पॉइंट होते थे. उन्होंने Microsoft के खिलाफ़ एक हाई प्रोफाइल केस हैंडल किया था. वो “anti-trust violation” का मामला था. डेविड “login” शब्द को “lojin” पढ़ रहे थे लेकिन ये इतनी भी बडी बात नहीं थी. उन्होंने Microsoft के खिलाफ़ एक हाई प्रोफाइल केस हैंडल किया था. वो “anti-trust violation” का मामला था. डेविड “login” शब्द को “lojin” पढ़ रहे थे लेकिन ये इतनी भी बड़ी बात नहीं थी. केस के दौरान डिफेंडर सवालों का जवाब देते समय एक ट्रिक यूज़ करते थे. वो जानबूझ कर जवाब देने की स्पीड को स्लो कर देते ताकि examiner पकड़ ना पाए कि वो सच बोल रहा है या झूठ. जैसे, जब कोई आपसे आपकी बर्थ डे पूछता है तब आप जल्दी से डे जवाब दे देते हैं क्योंकि आप उसके बारे में sure होते हैं. लेकिन डिफेंडर हर सवाल का जवाब देने में काफ़ी वक़्त लगाते हैं ताकि जब उनसे कोई मुश्किल सवाल पूछा जाए तो वो सोच समझ कर एक ऐसी कहानी सुना सकें जिस पर आसानी से सब विश्वास कर लें. लेकिन डेविड हर शब्द और टोन को समझने में माहिर थे इसलिए डिफेंडर उनसे बच नहीं पाया, वो अपने ही जाल में फँस गया था. डेविड ने उसके रुक रुक कर बोलने, उसके टोन और शब्दों के ज़रिए उसे पकड़ लिया था. डिफेंडर को उनके सवालों का जवाब देने में घबराहट हो रही थी. डेविड आख़िर उसके मुँह से उसकी गलती उगलवाने में सफ़ल हुए और इस तरह उन्होंने इस इम्पोर्टेन्ट केस को ने जीता. किसने सोचा था कि एक डिस्लेक्सिक बच्चा आगे चल कर इतना सक्सेसफुल और एक्सपर्ट लॉयर बनेगा? वक़्त लगाते हैं ताकि जब उनसे कोई मुश्किल सवाल पूछा जाए तो वो सोच समझ कर एक ऐसी कहानी सुना सकें जिस पर आसानी से सब विश्वास कर लें. लेकिन डेविड हर शब्द और टोन को समझने में माहिर थे इसलिए डिफेंडर उनसे बच नहीं पाया, वो अपने ही जाल में फंस गया था. डेविड ने उसके रुक रुक कर बोलने, उसके टोन और शब्दों के ज़रिए उसे पकड़ लिया था. डिफेंडर को उनके सवालों का जवाब देने में घबराहट हो रही थी. डेविड आख़िर उसके मुँह से उसकी गलती उगलवाने में सफल हुए और इस तरह उन्होंने इस इम्पोर्टेन्ट केस को ने जीता. किसने सोचा था कि एक डिस्लेक्सिक बच्चा आगे चल कर इतना सक्सेसफुल और एक्सपर्ट लॉयर बनेगा? एक कमी होने के बावजूद उन्होंने अपने दम पर सोसाइटी में ख़ुद का रूतबा बनाया और बहुत इज्जत कमाई. डेविड की लाइफ में जो सबसे बड़ी बाधा थी उन्होंने उसे हरा दिया था. उन्होंने इस कंडीशन को ख़ुद पर हावी नहीं होने दिया. ये बीमारी उन्हें पीछे पकड़ कर नहीं रख पाई.इसके बजाय अगर वो हार मान लेते तो शायद पूरी जिंदगी एक कंस्ट्रक्शन वर्कर का ही काम करते रहते. लेकिन उन्होंने चैलेंज का डट कर सामना किया और उसे अपने सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. A < David and Goliath Malcolm Gladwell द लिमिट्स ऑफ़ पॉवर (The Limits of Power) तो हमने discuss किया था कि ज़्यादा महंगा एजुकेशन का ये मतलब नहीं है कि बच्चे की परफॉरमेंस अच्छी होगी या अमीर पेरेंट्स होने का ये मतलब नहीं है कि परवरिश करना आसान हो जाता है. ये तो लोगों का भ्रम है कि अगर कुछ ज़्यादा है तो वो अच्छा ही होगा. यही बात क्राइम और पनिशमेंट में भी लागू होती है. आजकल ये सोच बन गई है कि अगर क्रिमिनल को ज़्यादा सज़ा दे दी जाए तो क्राइम का रेट कम हो जाएगा. सोसाइटी में शांति और आर्डर का माहौल बन जाएगा. लेकिन क्या सच में ऐसा होता है? आइए देखते हैं. किम्बर 18 साल की थी. एक रात, वो अपने दोस्त के साथ रेस्टोरेंट में डिनर कर रही थी. रात 11:30 बजे दोनों घर जाने के लिए निकले. किम्बर बाहर निकली और उसने अपनी गाड़ी का दरवाज़ा खोला. तभी अचानक एक मोटरसाइकिल से दो लड़के उतरे और उस पर हमला कर दिया. एक ने किम्बर से उसका पर्स छीना फिर अपनी गन निकाल कर उसके कान के पास गोली चला दी. दो घंटे बाद किम्बर की मौत हो गई. टायल के दौरान ये बात सामने आई कि दोनों बाद किम्बर की मौत हो गई. ट्रायल के दौरान ये बात सामने आई कि दोनों क्रिमिनल्स, जो डेविस और डगलस वॉकर, को ड्रग्स की लत थी. उन्होंने इससे पहले भी कई क्राइम किये थे. उनका जेल में आना जाना लगा रहता था. किम्बर के पिता माइक रीनोल्ड्स को जब अपनी बेटी के साथ हुए हादसे के बारे में पता चला तो वो गुस्से से बौखला गए. उन्होंने अपनी जान पहचान के सारे पावरफुल लोगों को कांटेक्ट किया और एक मीटिंग बुलाई. इनमें लॉ ऑफिसर, तीन जज,लॉयर और पुलिस वाले शामिल थे. वो सब कैलिफ़ोर्निया में बढ़ते क्राइम रेट से चिंतित थे. इसकी चर्चा करने के बाद वो सब इस नतीजे पर पहुंचे कि उन क्रिमिनल्स को जितना ज़्यादा समय तक जेल में बंद रखा जाएगा तब तक बाहर लोग सेफ रहेंगे. इसलिए उन्होंने Three Strikes Law का बिल बनाया.इसमें ये लिखा गया था कि हर तरह के क्राइम चाहे वो रेप हो, मर्डर हो या चोरी और लूटमार, जेल की सज़ा डबल कर दी जाएगी. अगर किसी क्रिमिनल को तीसरी बार पकड़ा जाता है तो उसे जेल में कम से कम 25 साल की सज़ा काटनी होगी. इस बिल को कैलिफ़ोर्निया के 70% लोगों ने सपोर्ट किया जिसके बाद ये लॉ बन गया था. लेकिन क्या इससे कोई फ़र्क आया? क्या इससे क्राइम की घटनाएँ कम होने लगी? नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इस लॉ को ये सोच कर बनाया गया था कि सज़ा के डर इस लॉ को ये सोच कर बनाया गया था कि सज़ा के डर से क्रिमिनल्स की हिम्मत कम हो जाएगी. लेकिन जिन्हें नशे की लत होती है उन पर इसका कोई असर नहीं होता. क्रिमिनल्स अक्सर कोई क्राइम करने से पहले ड्रग्स लेते हैं ताकि उन्हें डर ना लगे, ताकि वो नर्वस ना हो जाएँ. वैसे भी क्रिमिनल्स उलटे दिमाग के होते हैं. वो एक के बाद एक क्राइम करते चले जाते हैं लेकिन उन्हें कुछ महसूस नहीं होता. नार्मल लोगों के लिए तो ये लॉ भी बहुत असरदार होता है क्योंकि वो चाहते हैं कि सोसाइटी में उन्हें अपनाया जाए. लेकिन जो लोग टीनएज की उम्र में ही क्राइम की दुनिया में कदम रख देते हैं उन्हें कुछ खोने का डर नहीं होता या देखा जाए तो उन्हें किसी चीज़ का डर नहीं होता. वो सज़ा के नाम से घबराते नहीं है क्योंकि उनकी तो जिंदगी वैसे भी बर्बाद हो चुकी होती है. ज़रा सोचिए जिस आदमी ने 25 साल जेल में बिता दिए उसके परिवार पर इसका क्या असर होता होगा, ख़ासकर उसके बच्चों पर. उनका बचपन बिना पिता के गुज़रेगा, उनकी परवरिश और देखरेख करने वाला कोई नहीं होगा. उन्हें फाइनेंसियल और इमोशनल सपोर्ट देने वाला कोई नहीं होगा. स्टेटिस्टिक्स से ये बात सामने आई है कि अगर एक भी पैरेंट जेल में हो तो बच्चे में मानसिक रोग या साइकियाट्रिक tendency 250% बढ़ जाती है. इससे एक 18 साल से कम उम्र के बच्चे की क्राइम करने की संभावना भी 400% बढ़ जाती है. इसका ये करने की संभावना भी 400% बढ़ जाती है. इसका ये मतलब हुआ कि बहुत हाई चांस है कि एक क्रिमिनल का बच्चा भी क्राइम कर के जेल की सज़ा काट सकता है. कई स्टडी इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अगर बहुत सारे लोगों को लंबे समय तक जेल में बंद रखा जाएगा तो फ़ायदे से ज़्यादा नुक्सान ही होता है. अगर किसी सोसाइटी के 2% जनता भी जेल में हुई तो वहाँ के सिटिज़न्स का हौसला टूटने लगेगा. क्रिमिनल्स को जेल में रख कर लोगों की जान बचाने के चक्कर में वो सोसाइटी धीरे धीरे बर्बाद होने लगती है. यहाँ पर ज़्यादा होना बहुत ख़राब है. अब हम एक अलग कहानी की ओर चलते हैं. क्या होगा अगर आपने माफ़ करना सीख लिया तो? क्या होगा अगर आपने कोर्ट जाने की जगह किसी को माफ़ कर दिया और उसे भुला कर जिंदगी में आगे बढ़ गए तो? आइए इसे समझते हैं. कैनडेस 13 साल की थी जब उसका रेप कर के उसे मार दिया गया था. सर्दियों का दिन था, उसने अपनी मम्मी विल्मा को कॉल कर के उसे पिक करने के लिए कहा. विल्मा ने कहा कि उसे अपने छोटे बच्चों के पास रहना होगा इसलिए वो नहीं आ सकती. उन्होंने कैनडेस से कहा कि वो बस से घर आ जाए. कई घंटे गुज़र गए लेकिन कनडेस घर नहीं पहुँची. विल्मा और उनके पति उसे ढूँढने निकले. फ़िर उन्होंने पुलिस की मदद ली. उन्होंने सड़कों पर उसके लापता होने के पोस्टर लगाए. उन्होंने उसके टीचर्स उन्होंने पुलिस की मदद ली. उन्होंने सड़कों पर उसके लापता होने के पोस्टर लगाए. उन्होंने उसके टीचर्स, classmates और ना जाने किस किस को फ़ोन किया. दो महीने बाद पुलिस को कैनडेस की बॉडी एक झोंपड़े में मिली. उसके हाथ और पैर बंधे हुए थे. जिसने उसका रेप किया था उसने उसे ठिठुरती हुई ठंड में मरने के लिए छोड़ दिया था. विल्मा ने उसके अंतिम संस्कार की तैयारी की. उस दिन उनका दुःख बाँटने कई रिश्तेदार और दोस्त आए. वो सब करीब रात 10 बजे वापस गए. सबके चले जाने के बाद अचानक किसी ने दरवाज़ा खटखटाया. विल्मा ने सोचा कि शायद कोई अपना सामन उनके घर भूल गया है. लेकिन दरवाज़े पर एक अजनबी था. उसने सिर्फ इतना कहा, “मेरी बेटी को भी किसी ने मार डाला था”. फ़िर उसने उन्हें अपनी कहानी बताई. उसने उन्हें केस में हुए तीनों ट्रायल के बारे में बताया. उस क्रिमिनल को चार साल की सज़ा हुई थी. उसके बाद, कोर्ट ने उसकी अपील को स्वीकार कर लिया था और उसे छोड़ दिया गया. उस अजनबी के चेहरे पर गुस्से और बदले की भावना साफ़ दिखाई दे रही थी. उसने अपनी बेटी को खोया था और उसे इंसाफ के नाम पर क्या दिया गया. उसकी हेल्थ दिन ब दिन ख़राब होने लगी थी, उसकी नौकरी छूट गई, वो और उसकी बीवी एक दूसरे से अलग हो गए. इंसाफ की तलाश ने उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद कर छूट गई, वा आर उसका बावा एक दूसरस अलग हा गए. इंसाफ की तलाश ने उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी थी. उसने विल्मा से कहा, “जो मैं कह रहा हूँ उसे एक वार्निंग समझना ताकि आपको एहसास हो कि आगे आपके सामने क्या क्या आने वाला है.” उसके बाद वो उठा और वहाँ से चला गया. विल्मा ने बहुत सोचा और अंत में उस आदमी को माफ़ कर आगे बढ़ने का फ़ैसला किया. उस पर दो छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी थी. वो और उसका पति फ़िर साथ रहने लगे और अपनी बिखरी हुई जिंदगी को समेटने की कोशिश करने लगे. समय के साथ धीरे धीरे उनका घाव भरने लगा था. 20 साल बाद पुलिस ने उन्हें एक बार फ़िर कांटेक्ट किया. उन्होंने कैनडेस के मर्डरर को पकड़ लिया था. उसका नाम मार्क ग्रांट था. वो उनके आस पास के इलाके में ही रहने वाला लड़का था. केनडेस के पहले भी उसने कई लड़कियों की जिंदगी बर्बाद की थी. उसने अपना आधा जीवन जेल में ही बिताया था. हालांकि ये बहुत मुश्किल था लेकिन विल्मा ने अपनी बेटी के साथ हुए दर्दनाक हादसे को स्वीकार कर लिया था. वो चाहती तो माइक की तरह कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकती थी और उसे जिंदगी भर के लिए जेल में बंद करवा सकती थी. लेकिन विल्मा ने माफ़ करना सीख लिया था. विल्मा ने सोचा कि अगर वो बदले की भावना को दिल में जगाए रखेगी तो उन सब की जिंदगी तबाह हो रानी जो शानियोरोगों नलों को टोका कर आगे बढ़ने का फ़ैसला किया. उस पर दो छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी थी. वो और उसका पति फ़िर साथ रहने लगे और अपनी बिखरी हुई जिंदगी को समेटने की कोशिश करने लगे. समय के साथ धीरे धीरे उनका घाव भरने लगा था. 20 साल बाद पुलिस ने उन्हें एक बार फ़िर कांटेक्ट किया. उन्होंने कैनडेस के मर्डरर को पकड़ लिया था. उसका नाम मार्क ग्रांट था. वो उनके आस पास के इलाके में ही रहने वाला लड़का था. केनडेस के पहले भी उसने कई लड़कियों की जिंदगी बर्बाद की थी. उसने अपना आधा जीवन जेल में ही बिताया था. हालांकि ये बहुत मुश्किल था लेकिन विल्मा ने अपनी बेटी के साथ हुए दर्दनाक हादसे को स्वीकार कर लिया था. वो चाहती तो माइक की तरह कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकती थी और उसे जिंदगी भर के लिए जेल में बंद करवा सकती थी. लेकिन विल्मा ने माफ़ करना सीख लिया था. विल्मा ने सोचा कि अगर वो बदले की भावना को दिल में जगाए रखेगी तो उन सब की जिंदगी तबाह हो सकती थी. वो अपने पति और दोनों बच्चों को हमेशा के लिए खो देती. वो अनजाने में दूसरों के साथ वही अन्याय करती जो कैनडेस के साथ हुआ था. इसके बजाय, विल्मा ने अतीत को पीछे छोड़ कर आज में जीने का फैसला किया. David and Goliath Malcolm Gladwell Corctalya (Conclusion) तो आपने जाना कि एक डिसएडवांटेज में भी कहीं ना कहीं एक एडवांटेज छुपा होता है. जो हमें जैसा दिखता है ज़रूरी नहीं कि वो वैसा ही हो.दिखाई देने वाली एडवांटेज भी सक्सेस की गैरंटी नहीं देता. आपने थ्योरी ऑफ़ डिफिकल्टी के बारे में सीखा. जिस इंसान की विल पॉवर स्ट्रोंग होती है वो जिंदगी के किसी भी चैलेंज से विनर बन कर उभरता है. आपने लिमिट्स ऑफ़ पॉवर के बारे में समझा. ज़्यादा होना हमेशा अच्छा नहीं होता. कभी-कभी ये अति हो जाता और अति हमेशा विनाश करता है. आपने माफ़ करने के फायदों के बारे में भी जाना. कभी-कभी ऐसा वक़्त भी आता है जब बदला लेने से ज़्यादा अच्छा माफ़ करना होता है नहीं तो ये बदले की भावना आपको बर्बाद कर सकती है. हमारी लाइफ में ये विशालकाय दानव सिर्फ हमारे दुश्मन नहीं होते. कई बार वो फिजिकल और मेंटल डिसेबिलिटी के रूप में हमें तोड़ने चले आते हैं. हमारा डर, गुस्सा, बदले की भावना, गरीबी ये सब एक जायंट हैं जिन्हें हमें हराना है. All Done? Finished भावना आपको बर्बाद कर सकती है. हमारी लाइफ में ये विशालकाय दानव सिर्फ हमारे दुश्मन नहीं होते. कई बार वो फिजिकल और मेंटल डिसेबिलिटी के रूप में हमें तोड़ने चले आते हैं. हमारा डर, गुस्सा, बदले की भावना, गरीबी ये सब एक जायंट हैं जिन्हें हमें हराना है. जितने भी challenges हम लाइफ में फेस करते हैं वो सब एक विशालकाय दानव ही तो है. हम सब इनसे लड़ने की कोशिश में लगे रहते हैं. इस बुक ने हमें समझाया है कि चाहे जितनी भी बड़ी प्रॉब्लम आपके सामने क्यों ना हो, आप फ़िर भी जीत सकते हैं. चाहे सिचुएशन आपके कितनी भी खिलाफ़ हो, चाहे आपको जीत के आसार ना दिखें लेकिन आप पेशेंस और बुद्दिमानी से फ़िर भी जीत सकते हैं. किसी ने खूब कहा है कि “कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं हो सकता, ज़रा तबियत से एक पत्थर तो उछालो दोस्तों”. कोशिश करेंगे तो इम्पॉसिबल भी पॉसिबल हो सकता है, बस आपमें वो जज़्बा और विश्वास होना चाहिए.एक स्ट्रोंग विल पॉवर और मन में पक्के इरादे के साथ आप अपनी लाइफ के किसी भी जायंट को धराशायी कर सकते हैं. All Done? Finished

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