Built to Last : Successful Habits of Visionary Com… Jim Collins And Jerry I. Books in Hindi pdf Summary

Built to Last : Successful Habits of Visionary Com… Jim Collins And Jerry I. Porras इंट्रोडक्शन (Introduction) आप ऐसा क्या कर सकते है कि आपका नाम न्यूज़ में आए ? कैसे आप इतने लेजेंडरी बन सकते हो कि लोग आपको देखते ही पहचान ले? और हम ऐसा क्या करे कि हमेशा अपनी पोजीशन टॉप बनाए रखे? रिच और फेमस होना कौन नहीं चाहेगा? पर आपके लिए बेड न्यूज़ ये है कि आज हर कोई टॉप पर पहुँचने । की कोशिश कर रहा है. और गुड न्यूज़ ये है कि कोई भी नंबर 1 बन सकता है. अगर आपका गोल है अपने फील्ड की बेस्ट कंपनी बनकर दिखाना तो आपको रोक कौन रहा है? बात सिर्फ इतनी है कि आपको पता नही है कि शुरुवात कहाँ से करनी है और सक्सेस को सस्टेंन कैसे रखना है? ये बात हम पक्के तौर पर बोल सकते है कि जो सवाल आपके माइंड में है, वही सवाल विज़नरी कंपनीज के सीईओ भी सोचते थे. यहाँ तक कि जो फेमस ब्रांड आप जानते है, उन्हें भी कहीं न कहीं से शुरुवात करनी पड़ी थी यानी कि एकदम बॉटम से. मानो या ना मानो पर जिन सक्सेसफुल कंपनीज़ के बारे में आज आप जानते हो, उनकी शुरुवात सक्सेसफुल नहीं हुई थी. ये वही कंपनीज़ है जो कई सालो तक गुमनाम रही- कई डिकेड्स तक, उसके बाद जाकर कहीं वो आज इस – पसी 12 f-11 डिकेड्स तक, उसके बाद जाकर कहीं वो आज इस लेवल पर खड़ी है. पर इन्होने बहुत हार्ड वर्क किया, खुद को डिसप्लीन रखा और चेलेंजेस एक्सेप्ट किये. इस बुक के श्रू ऑथर्स ने अपनी 6 साल की रीसर्च प्रोजेक्ट की फाइंडिंग्स रीडर्स के साथ शेयर की है. ये रीसर्च प्रोजेक्ट ऑथर्स ने खुद कन्डक्ट की थी. जिम कॉलिंस और पोर्रस ने विज़नरी कंपनीज़ को स्टडी किया, एनलाईज किया कि उनमे क्या कॉमन है और कौन सी चीज़ उन्हें बेस्ट से भी बेस्ट बनाती है. इसमें आपको ये भी पढने को मिलेगा कि कैसे बाकि कम सक्सेसफुल कंपनीज़ इन विज़नरी कंपनीज़ के मुकाबले ठीक चल रही थी इस बुक से आप ये भी सीखेंगे कि एक कॉम्पटीटिव मार्किट में होने के बाद भी इन कंपनीज़ ने कुछ ही सालो में कितनी तरक्की की. अगर आप भी खुद का बिजनेस स्टार्ट करने की सोच रहे हो या अपने नये बिजनेस में स्ट्रगल कर रहे हो तो इस समरी को आगे जरूर पढ़िये और सीखिए कि कैसे आईबीएम, डिज्नी और सोनी जैसी कंपनीज़ आज टॉप पर है. द बेस्ट ऑफ़ द बेस्ट (The Best the Best) इस बुक के ऑथर्स ने एक बार श्योर की है वो ये कि बात अगर उन कंपनीज़ की हो जिन्हें उन्होंने स्टडी किया था तो वो “सक्सेसफुल” या एंड्यूरिंग” के बदले “विज़नरी” वर्ड यूज़ करेंगे. जिन विज़नरी कंपनीज पर उन्होंने 6 साल तक रीसर्च किया था, इसलिए विज़नरी थी क्योंकि उन्होंने खुद को इंडस्ट्री में सबसे बेस्ट प्रूव थी क्योंकि उन्होंने खुद को इंडस्ट्री में सबसे बेस्ट प्रूव किया था. इन्हें सक्सेसफुल या एड्यूरिंग से कहीं बढकर बोला जा सकता है. ये कंपनीज़ अपने फील्ड में बेस्ट ऑफ़ द बेस्ट मानी जाती है. ये आपके पैदा होने से भी पहले मार्किट में है और इन्होने टाइम के साथ हर चेलेंज, हर सेटबैक को फेस किया है. हालाँकि इन्हें विज़नरी माना जाता है पर ये कंपनीज़ परफेक्ट की डेफिनेशन पर एकदम खरी नहीं उतरती है. अब जैसे कि 1980 में वाल्ट डिज्नी की कंपनी उस वक्त बंद होने की कगार पर खड़ी थी जब कॉर्पोरेट रेडर्स ने उनकी कंपनी पर अपना क्लेम कर लिया था. सन 1930 से लेकर 1940 के दौरान बोइंग को कई सारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा था. और 1970 के शुरुवात सालो में उन्हें अपने 60,000 एम्प्लोईज़ निकालने पड़े. ऐसे ही सोनी कंपनी ने अपने शुरुवाती पांच सालो में जो भी प्रोडक्ट्स निकाले, सब फेल हुए. आईबीएम् 1914, 1921 और 1990 में ऑलमोस्ट बैंकरप्ट होने ही वाला था. लेकिन इस सबके बावजूद ये विज़नरी कंपनीज़ बंद नही हुई, इन्होने हार नहीं मानी बल्कि फलती-फूलती रही और आज भी एवरग्रीन है. क्योंकि चाहे कैसी भी प्रोब्लम्स आई हो, कैसी भी डिफिकल्ट सिचुएशन रही हो, ये कंपनीज अपनी जगह कायम रही. हर सेटबैक में रेजिस्ट करती रही. हर फेलर के बाद बाउंस बैक करके मार्किट में दुबारा लौटी. अपनी रेज़िलेंस पॉवर की वजह से ही ये कंपनी लॉन्ग टर्म परफोर्मेंस देती रही. आप देख सकते है कि ये अपनी रेज़िलेंस पॉवर की वजह से ही ये कंपनी लॉन्ग टर्म परफोर्मेंस देती रही. आप देख सकते है कि ये विज़नरी कंपनीज़ आज भी अपनी जगह उसी मजबूती से खड़ी है और हम शर्त लगा सकते है कि अगले 50 साल तक यूं ही खड़ी रहेंगी. इनके टॉप पर होने का मतलब ये भी है कि इनका फाईनेंशियल रिटर्न्स अच्छा होगा. अगर आप इन विज़नरी कंपनीज़ में से किसी एक में $7 भी इन्वेस्ट करते हो तो साल के एंड में आपका फंड $6,000 तक ग्रो कर जाएगा. एक बढिया इन्वेस्टमेंट होने के अलावा ये कंपनीज़ उस सोसाइटी पर भी इम्पेक्ट डालती है जिसमे हम रहते है. स्टूडेंट्स को जब अपने प्रोजेक्ट्स करने होते है या नोट लेने होते है तो 3 एम’स स्कॉच टेप और पोस्ट-इट नोट्स उनके बड़े काम आते है. सिटीकोर्प ने पैसे के लिए एटीएम मशींस को बड़े स्केल पर पब्लिक तक पहुंचाया ताकि लोग कभी भी, कहीं भी आसानी से अपने अकाउंट से पैसे निकाल सके. म्यूजिक को पोर्टेबल बनाने की बात हो तो सोनी के वाकमेन ने लोगो की लाइफ में बड़ा इम्पेक्ट डाला था. डिज्नी के मिकी माउस के साथ ना जाने कितने लोगो के बचपन की यादे जुड़ी है. इन विज़नरी नीज़ ने इस दुनिया पर अपनी छाप छोड़ी है. और इनके प्रोडक्ट्स उन प्रोडक्ट्स को काफी हद तक इन्फ्लुएंस करते है जो आज मार्किट में है या फ्यूचर में कभी आयेंगे. जैसा कि हमने बताया, इस बुक के ऑथर्स ने 6 साल तक इन कंपनीज़ को स्टडी किया है और इस बात का खास ध्यान रखा है कि कौन सी कंपनी सही मायनों में नोट लेने होते है तो 3 एम’स स्कॉच टेप और पोस्ट-इट नोट्स उनके बड़े काम आते है. सिटीकोर्प ने पैसे के लिए एटीएम मशींस को बड़े स्केल पर पब्लिक तक पहुंचाया ताकि लोग कभी भी, कहीं भी आसानी से अपने अकाउंट से पैसे निकाल सके. म्यूजिक को पोर्टेबल बनाने की बात हो तो सोनी के वाकमेन ने लोगो की लाइफ में बड़ा इम्पेक्ट डाला था. डिज्नी के मिकी माउस के साथ ना जाने कितने लोगो के बचपन की यादे जुड़ी है. इन विज़नरी कंपनीज़ ने इस दुनिया पर अपनी छाप छोड़ी है. और इनके प्रोडक्ट्स उन प्रोडक्ट्स को काफी हद तक इन्फ्लुएंस करते है जो आज मार्किट में है या फ्यूचर में कभी आयेंगे. जैसा कि हमने बताया, इस बुक के ऑथर्स ने 6 साल तक इन कंपनीज़ को स्टडी किया है और इस बात का खास ध्यान रखा है कि कौन सी कंपनी सही मायनों में विज़नरी कही जायेगी. साथ ही इन्होने कई सारे मिथ्स भी तोड़े है जैसे कि लीडर्स के अंदर करिज्मा होना ही चाहिए या बड़ी कंपनीज़ सिर्फ प्रोफिट्स बनाती है. ऑथर्स ने अपने रीसर्च से जो बहुत से बाते सीखी थी, उनमे से एक ये भी है कि विज़नरी कंपनी कोई भी स्टार्ट कर सकता है. तो अब आप ये नही बोल सकते” ये काम मेरे बस का नहीं है” क्योंकि 6 साल की रीसर्च ने प्रूव किया है कि कोई भी टॉप पर पहुँच सकता है और अपनी सक्सेस को ससटेन रख सकता है. Built to Last : Successful Habits of Visionary Com… Jim Collins And Jerry I. Porras मोर देन प्रोफिट्स (More Than Profits) जैसा कि हमने पहले के चैप्टर्स में बताया, सिर्फ प्रॉफिट की वजह से विज़नरी कंपनीज़ टॉप पर नही पहुँचती बल्कि अपनी कोर आईडीयोलोजी से ये अपने एम्प्लोईज़ को अपना बेस्ट देने के लिए गाइड और इंस्पायर करती है. इनकी यही कोर आईडीयोलोजी एम्प्लोईज़ को एक सेंस ऑफ़ पर्पज देती है ताकि लोग सिर्फ पैसे पर ही फोकस ना करे. प्रॉफिट से पहले ये कंपनीज़ आइडियल्स को इम्पोर्टेस देती है. अपनी कोर आईडीयोलोजी को फाउंडेशन बनाकर सोचो कि आप क्या हो, किस चीज़ के लिए स्टैंड करते हो, और आपकी कंपनी का गोल क्या है. ये कंपनीज़ विज़नरी इसलिए है क्योंकि ये जो भी करती है उसमे अपनी कोर वैल्यूज़ एड करती है. ये कंपनीज़ बातो में नहीं बल्कि एक्शन में बिलीव करती है. उनकी यही कोर वैल्यू उन्हें अपना बेस्ट करने के लिए ड्राइव करती है. इन कंपनी को पहले अपने कोर वैल्यू पर फोकस रहता है उसके बाद प्रॉफिट पर. एक फार्मासिटीकल कंपनी मेर्क एंड कंपनी (Merck & Co., a pharmaceutical company) की भी यही आईडीयोलोजी है. जब इन्हें 100 ईयर्स हुए तो इन्होने वैल्यूज़ एंड विज़न्स: अ मेर्क सेंचुरी नाम से पतन पनि जान *14-गाना- भी यही आईडीयोलोजी है. जब इन्हें 100 ईयर्स हुए तो इन्होने वैल्यूज़ एंड विज़न्स: अ मेर्क सेंचुरी नाम से एक बुक पब्लिश की. इस बुक में कंपनी ने इस बात पर जोर नही दिया था कि वो 100 साल पुराना एक फार्मासिटीकल ब्रांड है बल्कि उन्होंने कंपनी के कोर आईडीयोलोजी के बारे में बात की थी. जॉर्ज मेर्क || ने ये कहते हुए अपनी आईडीयोलोजी क्लियर की” वो वर्कर्स है जो एडवांस मेडिकल साइंस और इंसानियत की सेवा के थौट से इंस्पायर्ड है”. 1991 में मेर्क के चीफ एक्जीक्यूटिव रॉय वगेलोस (Roy Vagelos ) ने भी कहा था कि” जितनी भी सक्सेस उन्हें एक कंपनी के तौर पर मिली है, वो सिर्फ सक्सेस ही नहीं बल्कि बीमारियों के खिलाफ एक विक्ट्री है”. मेर्क एंड कंपनी (Merck & Co. ह्यूमेनिस्टिक एंगल लेकर चलती थी जो लोगो को बड़ी पसंद थी और इसमें उनका पर्पज भी पूरा होता था. अपने आईडीयल्स के साथ लगातार चलते हुए मेर्क ने “रिवर ब्लाइंडनेस” की दवाई बनाई. थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज़ के एक मिलियन से भी ज्यादा लोग इस बिमारी से इन्फेक्टेड थे. इस बिमारी में पेशेंट की बॉडी में पैरासाइट्स घुसकर इंसान को अंधा कर देते है. कंपनी को मालूम था कि इस बीमारी से अफेक्ट होने वाले ज्यादातर लोग दवाई का खर्चा अफोर्ड नहीं कर पाते. इसलिए मेर्क ने डिसाइड किया कि वो फ्री में दवाई देंगे. जब सीईओ वगेलोस ने उनके इस डिसीजन के बारे में पुछा तो उन्होंने कहा” अगर हमने हेल्प नहीं की तो ये मेर्क एंड कंपनी के साइंटिस्ट्स के लिए काफी को मालूम था कि इस बीमारी से अफेक्ट होने वाले ज्यादातर लोग दवाई का खर्चा अफोर्ड नहीं कर पाते. इसलिए मेर्क ने डिसाइड किया कि वो फ्री में दवाई देंगे. जब सीईओ वगेलोस ने उनके इस डिसीजन के बारे में पुछा तो उन्होंने कहा” अगर हमने हेल्प नहीं की तो ये मेर्क एंड कंपनी के साइंटिस्ट्स के लिए काफी डेमोरेलाइजिंग मोमेंट होगा. ख़ासकर जब कंपनी का कोर आईडीया ह्यूमन लाइफ को प्रीजेर्व और इम्प्रूव करने का हो. आप शायद ये सोचकर हैरान हो रहे होंगे कि उस वक्त मेर्क ने जो डिसीजन लिया, अपनी आईडीयोलोजी की वजह से लिया या उन्हें इससे कुछ फायदा हो रहा था? तो जवाब है दोनों वजहों से. मेक्र्क एक तीर से दो शिकार कर रहे थे क्योंकि ना सिर्फ वो रिवर ब्लाइंडनेस की बिमारी से लोगो की हेल्प कर रहे थे बल्कि अपनी एक गुड रेपूटेशन भी बना रहे थे. सीईओ वेगेलोस को चूज़ नही करना पड़ा क्योंकि मेर्क दोनों कर सकता था. वो जितना दे रहे थे, उतना ही ज्यादा कमा रहे थे. हालाँकि मेर्क ने जब फ्री मेडीसिन प्रोवाईड करने का फैसला लिया तो सबको लगा कि उन्हें बड़ा नुकसान होगा पर उनके इस फैसले ने उन्हें फ्यूचर में बड़ा प्रॉफिट दिया. कंपनी की रेपूटेशन को बढ़ी ही साथ ही उन्हें खूब सारे इन्वेस्टर्स भी मिले. Built to Last : Successful Habits of Visionary Com… Jim Collins And Jerry I. Porras प्रीज़र्व द कोर/स्टीम्यूलेट प्रोग्रेस (Preserve the Core/Stimulate Progress) हालाँकि हर विज़नरी कंपनी की अपनी एक कोर वैल्यू होती है लेकिन सिर्फ यही चीज़ उन्हें बेस्ट ऑफ़ द बेस्ट नहीं बनाती. जब पके आस-पास चीज़े लगातार चेंज हो रही हो तो सिर्फ आपकी कोर आईडीयोलोजी ही आपको बचा सकती है. विज़नरी कंपनीज़ ठीक इसी फोर्मुले पर चलती है. कंपनी की बेशक हर चीज़ बदल जाए पर कोर वैल्यू कभी नही बदलती. अक्सर बाकि कंपनीज़ इससे कंफ्यूज़ होकर अपनी कोर आईडीयोलोजी तो चेंज कर देती है और नॉन कोर प्रेक्टिस कोंटीन्यू रखते है. वैसे स्टार्टिंग में कोर और नॉन कोर प्रेक्टिस के बीच का फर्क समझना थोडा मुश्किल हो सकता है. लेकिन आपको दोनों का फर्क मालूम होना चाहिए क्योंकि अगर नही होगा तो आप नॉन कोर प्रेक्टिस में टाइम वेस्ट करते रहेंगे. और अगर ऐसा ही रहा तो ना आप चेंज एडाप्ट कर पाओगे और ना ही आगे मूव कर पाओगे. एक विज़नरी कंपनी बनाने के लिए आपको हर हाल में अपनी कोर आईडीयोलोजी प्रीज़र्व करनी होगी. लेकिन आपकी आईडीयोलोजी ऐसी हो जो किसी भी न्यू चेंजेस के आरटकम को खले दिल से वेलकम कर सके आपकी आईडीयोलोजी ऐसी हो जो किसी भी न्यू चेंजेस के आउटकम को खुले दिल से वेलकम कर सके. ये आउटकम कल्चरल नॉर्स, स्ट्रेटेजीज, पॉलिसीज़, गोल्स, ऑर्गेनाइजेशन स्ट्रक्चर्स और रीवार्ड सिस्टम है. ये वो सब चीज़े है जो आप चेंज कर सकते हो ताकि आप बदलते वक्त के साथ एडाप्ट कर सको. यहाँ हम कंपनीज़ की कोर आईडीयोलोजी और उनके नॉन कोर प्रेक्टिस के कुछ एक्जाम्पल दे रहे है. एचपी की कोर आईडीयोलोजी है कि वो अपने हर एक एम्प्लोई की केयर और रिस्पेक्ट करती है जोकि उनकी मेन पॉलिसी है जो कभी चेंज नहीं होती. हालाँकि उनकी नॉन कोर प्रेक्टिस जैसे कि रोज़ सुबह 10 बजे एम्प्लोईज़ को फ्रूट्स और डोनट्स देने की प्रेक्टिस चेंज की जा सकती है. बोईंग की कोर आईडीयोलोजी है कि वो एविएशन में लीडिंग कंपनी के तौर पर जाने जाते है और पायोनियर्स है. तो ये चीज़ उनकी कभी चेंज नहीं होनी चाहिए. हालाँकि उनकी ये स्ट्रेटेज़ी कि वो सिर्फ जंबो जेट तक कमिट रहेंगे, चेंज की जा सकती है क्योंकि ये उनकी नॉन कोर प्रेक्टिस है. और लास्ट में वाल मार्ट की कोर आईडीयोलोजी है अपने कस्टमर्स की एक्सपेक्टेशंस पर हमेशा खरा उतरना. लेकिन कस्टमर्स को जो स्टोर के दरवाजे पर ग्रीट करने की उनकी जो नॉन कोर प्रेक्टिस है, वो चेंज की जा सकती है. तो इसके अलावा और कौन से बाकि फैक्टर्स है जो विज़नरी कंपनीज़ को बेस्ट बनाते है? कोर तो इसके अलावा और कौन से बाकि फैक्टर्स है जो विज़नरी कंपनीज़ को बेस्ट बनाते है? कोर आईडीयोलोजी के साथ उनमे प्रोग्रेस को लेकर एक जूनून या नशा होता है. विज़नरी कंपनीज़ क्रिएट, एक्प्लोर, चेंज और लगातार इम्प्रूव करने के लिए हमेशा इंस्पायर्ड और मोटीवेटेड रहती है. ये कंपनीज़ ईज़िली सेटिसफाई नहीं होती और ना ही ज्यादा प्रॉफिट के चक्कर में रहती है. विज़नरी कंपनीज़ अपनी प्रोग्रेस प्रॉफिट से मेजर नही करती. इन्हें आगे बढ़ने और कुछ रेवोल्यूशनरी करने का नशा रहता है जैसे कोई ईचिंग आसानी से मिटती नहीं, ऐसे ही ये कंपनीज़ भी कुछ न कुछ करती रहती है. इसके पीछे रीजन है कि इन कंपनीज़ को हमेंशा यही लगता है कि ये और आगे जा सकती है, न्यू पोसिबिलिटीज़ एक्सप्लोर कर सकते है. यही ड्राइव सिटीकोर्प में भी था जब उन्होंने अपना एक गोल सेट किया था कि वो दुनिया की मोस्ट वाइडस्प्रेड फाईनेंशियल इंस्टीट्यूशन बनकर दिखाएगा, हालाँकि कंपनी छोटी सी थी. यही ड्राइव वाल्ट डिज्नी में भी नजर आता है जब उन्होंने डिज्नीलैंड क्रिएट किया था हालाँकि उनके पास ऐसा कोई डेटा नहीं था जो प्रूव कर सके कि उनका ये वाइल्ड ड्रीम सक्सेसफुल होगा. असल में बात जब एक्सपेरिमेंट, एवोल्व या चेंज की हो तो विज़नरी कंपनीज़ अपने कोर आईडीयोलोजी पर डिपेंड रहती है. और जब कंपनी अपने कोर वैल्यूज़ असल में बात जब एक्सपेरिमेंट, एवोल्व या चेंज की हो तो विज़नरी कंपनीज़ अपने कोर आईडीयोलोजी पर डिपेंड रहती है. और जब कंपनी अपने कोर वैल्यूज़ को लेकर क्लियर थौट रखती है तो फिर इन्हें अपने नॉन कोर प्रेक्टिस की स्ट्रेटेजी या मूवमेंट चेंज करने में प्रोब्लम नहीं होती. कोर आईडीयोलोजी के साथ-साथ प्रोग्रेस का जूनून होना भी ज़रूरी है. क्योंकि बिना आगे बढे, बिना कोई चेंज लाए कोई कंपनी इस फास्ट मूविंग वर्ल्ड में सर्वाइव नहीं कर सकती. अब आपने जब अपनी कोर आईडीयोलोजी सेट कर ली है और आपके अंदर प्रोग्रेस की ड्राइव भी है तो अब वक्त है इसे इंस्टीट्यूशनलाइज करने का. यानी आप इन दोनों को अपनी ऑर्गेनाइजेशन में अप्लाई करे. ये सिर्फ आपका कल्चर नहीं है. बल्कि ये वो चीज़ होगी जो आपकी आईडीयोलोजी को प्रीज़र्व करेगी और कंपनी में प्रोग्रेस लेकर आएगी. जैसे एक्जाम्पल के लिए वाल्ट डिज्नी ने डिज्नी यूनिवरसिटी बनाई है जो उनके हर एक एम्प्लोई को अटैंड करनी पड़ती है. ये लोग अपने सेमिनार्स को डिज्नी ट्रेडिशंस बोलते है. मैरियट होटल्स के फाउंडर मैरियट ने ना सिर्फ कंपनी के कोर वैल्यू रट लिए थे जैसे कि वो किसी टेक्स्ट बुक से पढ़ रहे हो बल्कि उन्होंने कस्टमर्स फीडबैक के लिए काफी बड़े लेवल पर एम्प्लोई स्क्रीनिंग मैकेनिज्म और सिस्टम भी लगावाये थे. Built to Last : Successful Habits of Visionary Com… Jim Collins And Jerry I. Porras बिग हेयरी ओडासियस गोल्स (Big Hairy Audacious Goals) एक और चीज़ जो ऑथर्स ने विज़नरी कंपनीज़ के अंदर ओब्ज़ेर्व की है वो ये कि वो सिर्फ अपने गोल्स सेट नहीं करती बल्कि उनके बिग हेयरी ओडासियस गोल्स यानी बीएचएजी होते है. बीएचएजी एक ऐसी चीज़ है जो लोगो को आगे बढ़ने के लिए इंस्पायर करती है फिर चाहे टास्क कितना ही इम्पॉसिबल क्यों ना हो. ये एक क्लियर फिनिश लाइन के साथ एक स्ट्रोंग टीम स्पिरिट क्रिएट करती है. 1960 के मून मिशन को याद कीजिए. शायद आपने इसके बारे में कभी सोचा नहीं होगा क्योंकि आज इंसान ने स्पेस एंड टेक्नोलोजी में काफी एडवांस प्रोग्रेस कर ली है. हालाँकि 1960 में ऐसा नही था. आज जो टेक्नोलोजी हम यूज़ करते है, उस वक्त वो किसी कॉमिक बुक की इमेजिनेशन लगती थी. उस टाइम नासा के लिए मून मिशन किसी सपने जैसा ही था. लोगो को चाँद में जाने का ख्याल एक पागलपन लगता था. हालाँकि जब केनेडी प्रेजिडेंट थे तो उन्होंने मून मिशन को गवर्नमेंट का मिशन बना दिया था कि एक आदमी चाँद पर पहुँच कर सही सलामत धरती पर लौट आएगा. इस तरह की कमिटमेंट काफी शोकिंग थी लेनिन नाया है जाँट ताने मी सान ली श्री लौट आएगा. इस तरह की कमिटमेंट काफी शोकिंग थी लेकिन नासा ने चाँद पर जाने की ठान ली थी. मून मिशन BHAG का एक्जाम्पल है. एक ऐसा प्रोजेक्ट जो बिल्कुल इम्पॉसिबल लग रहा था लेकिन लोग इसे पूरा करने के लिए मोटिवेटेड थे. भाग की एक और इम्पोर्टेट क्वालिटी है कि इसमें आसानी से लोगो को कन्विंस किया जा सकता है यानी आपका आईडिया दुसरे ईजिली एक्सेप्ट कर लेते है. जैसे कि मून मिशन के दौरान जब केनेडी एडमिनिस्ट्रेशन ने अनाउसमेंट किया कि वो मून पर आदमी भेजेंगे तो लोगो ने आसानी से मान लिया. उन्हें कोई ऐसी मुश्किल स्टेटमेंट देने की जरूरत नही पड़ी जो लोगो को समझ ना आये. केनेडी ने क्लियर वर्ड्स में अपना मैसेज दिया था. भाग इतना मोटिवेट होता है कि आप इसे चाहे डिफरेंट वर्ड्स में बोलो तो भी लोग समझ जाते है. इसका एक और एक्जाम्पल है जर्नल इलेक्ट्रिक और वेस्टिंगहाउस. जीई का विज़न स्टेटमेंट था मार्केट में या तो नंबर ] पे रहे या नंबर 2 पे. और जहाँ तक वेस्टिंगहाउस का सवाल है, उनका विज़न स्टेटमेंट था टोटल क्वालिटी, मार्किट लीडरशिप, टेक्नोलोजी ड्राइव, फोकस्ड ग्लोबल ग्रोथ और डाइवरसिफेक्शन. जीई का भाग क्लियर और अट्रेक्टिव था पर वेस्टिंगहाउस के साथ ऐसा कुछ भी नहीं था. जीई के स्टेटमेंट ने प्रोग्रेस जेनरेट की, एक मोमेंटम क्रिएट करके एम्प्लोईज़ को अपनी बेस्ट परफोर्मेंस देने के लिए एंकरेज किया था. और यही भाग का मोस्ट इम्पोर्टेट फीचर है. वेस्टिंगहाउस का गोल भी कछ गलत क्रिएट करक एम्प्लाइज़ का अपना बस्ट परफामस दन के लिए एंकरेज किया था. और यही भाग का मोस्ट इम्पोर्टेट फ़ीचर है. वेस्टिंगहाउस का गोल भी कुछ गलत नही था पर इसने लोगो को मोटिवेट नही किया. भाग को हमेशा अपने गोल्स क्लियर रखने चाहिए- चाहे अचीव करने में कितना ही टाइम लगे- और ये कंपनी की कोर आईडीयोलोजी से भी मैच होना चाहिए. पोजीशन रेंकिंग में टॉप से लेकर बौटम तक सारे एम्प्लोईज़ को कंपनी के गोल्स और उन्हें अचीव करने की नॉलेज होनी चाहिए. अब ज़रा फिलिप मोरिस और आर. जे. रेनोल्ड्स पर भी एक नजर डालते है. दोनों टोबैको मेन्यूफेक्चरिंग इंडस्ट्रीज़ है. आर. जे. रेनोल्ड्स जब टोबैको इंडस्ट्री में आई तो टॉप पर थी जबकि फिलिप मोरिस 6वे नंबर पर था. हालाँकि मोरिस के पास दो चीज़े ऐसी थी जो रेनोल्ड्स के पास नही थी. फिलिप मोरिस ने मार्लबोरो की इमेज ठीक की जोकि उनके लिए काफी बड़ी सक्सेस साबित हुई और सबसे बढ़कर मोरिस के पास भाग था. और उनके इसी भाग ने रेनोल्ड्स को फर्स्ट पोजीशन से हटाकर खुद उसकी जगह ले ली थी. बेशक बाकि लोगो को ये थोडा अजीब लग सकता था क्योंकि जो छठे नंबर पर था, वो नंबर वन बनने की कोशिश कर रहा था. जबकि दुसरे और पांचवे नंबर की कंपनीज़ इस बात के लिए मोरिस का मजाक उड़ा रही थी. पर फिलिप मोरिस ना सिर्फ नंबर 1 टोबैको कंपनी बनी बल्कि उसने रेनोल्ड्स को भी रीप्लेस कर दिया था. वाल्ट डिज्नी की कंपनी में भी भाग अप्लाई होता है. 107/20 4 इंडस्ट्रीज़ है. आर. जे. रेनोल्ड्स जब टोबैको इंडस्ट्री में आई तो टॉप पर थी जबकि फिलिप मोरिस 6वे नंबर पर था. हालाँकि मोरिस के पास दो चीज़े ऐसी थी जो रेनोल्ड्स के पास नही थी. फिलिप मोरिस ने मार्लबोरो की इमेज ठीक की जोकि उनके लिए काफी बड़ी सक्सेस साबित हुई और सबसे बढ़कर मोरिस के पास भाग था. और उनके इसी भाग ने रेनोल्ड्स को फर्स्ट पोजीशन से हटाकर खुद उसकी जगह ले ली थी. बेशक बाकि लोगो को ये थोडा अजीब लग सकता था क्योंकि जो छठे नंबर पर था, वो नंबर वन बनने की कोशिश कर रहा था. जबकि दुसरे और पांचवे नंबर की कंपनीज़ इस बात के लिए मोरिस का मजाक उड़ा रही थी. पर फिलिप मोरिस ना सिर्फ नंबर 1 टोबैको कंपनी बनी बल्कि उसने रेनोल्ड्स को भी रीप्लेस कर दिया था. वाल्ट डिज्नी की कंपनी में भी भाग अप्लाई होता है. 1934 में डिज्नी ने एक गोल सेट किया कि कंपनी एक फुल लेंग्थ एनिमेटेड फिल्म स्नो वाइट बनाएगी. लेकिन उस वक्त हर कोई इस आईडिया के खिलाफ था. कुछ लोगो ने पुछा” कौन एक फुल लेंग्थ कार्टून मूवी देखना चाहेगा?’ इसके दो दशक बाद यानी बीस साल बाद डिज्नी ने कुछ और एनिमेटेड मूवीज़ बनाई गई जैसे कि पिनोकियो और बाम्बी जिसे पब्लिक ने खूब पसंद किया. और तब से आज तक लोग इन एनिमेटेड मूवीज के रीलीज़ होने का बेसब्री से वेट करते है. Built to Last : Successful Habits of Visionary Com… Jim Collins And Jerry I. Porras कल्ट लाइक कल्चर्स (Cult-like Cultures) यूं तो ऑथर्स ने यहाँ जिन कंपनीज़ को मेंशन किया है, उन्हें वो विज़नरी कंपनीज़ के नाम से बुलाते है लेकिन इस बात के भी पूरे चांसेस है कि इन कंपनीज़ में जॉब मिलना उतना भी ईज़ी नहीं है. लेकिन आप ये कैसे डिसाइड करेंगे कि आप इन विज़नरी कंपनीज़ के लायक है या नहीं? तो पहले इन कंपनीज़ की कोर आईडीयोलोजी चेक करो और आपको जवाब मिल जाएगा. अगर आप एचपी के तरीके से एडजस्ट नही कर सकते तो समझ लो आप इन कंपनीज़ के लायक नहीं हो. अगर आपको वालमार्ट का अपने कस्टमर्स को लेकर डेडीकेशन पागलपन लगता है तो अप्लाई करने की भी मत सोचना. अगर आपको डिज्नी की मेक बिलीव और व्हूलसमनेस पोलिसी पर हज़म नहीं होती तो शायद आपको वहां जॉब करना बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा. ये कंपनीज़ क्यों विज़नरी कंपनीज़ है, इसका एक रीजन ये भी है कि ये अपने एम्प्लोईज़ से कुछ ज्यादा ही एक्स्पेक्र करते है क्योंकि ये कंपनीज अपने बारे All Done? Finished रीजन ये भी है कि ये अपने एम्प्लोईज़ से कुछ ज्यादा ही एक्स्पेक्ट करते है. क्योंकि ये कंपनीज अपने बारे में एक क्लियर थौट लेकर चलती है कि ये कौन है और किसलिए स्टैंड करती है, और क्या अचीव करना चाहती है इसलिए ये अपने एम्प्लोईज़ से यही उम्मीद करती है कि वो अपने स्टैण्डर्ड से आगे बढ़कर काम करे. विज़नरी कंपनीज़ एक टाईट निट ग्रुप लेकर चलने में यकीन रखती है जहाँ सारे के सारे डेडीकेटेड मेंबर्स हो. अगर आप कंपनी के कोर वैल्यूज़ से सेटिसफाई नहीं हो तो शायद आप वहां फिट नही हो पाओगे या शायद कंपनी खुद आपको निकाल दे. हालाँकि अगर आप अपनी डेडीकेशन अपनी गुड परफोर्मेंस के श्रू शो करते हो तो शायद आप यहाँ मन लगाकर काम कर सकते है. बेस्ट ऑफ़ द बेस्ट के लिए कोई मिडल ग्रुप नहीं है. या द तो आप कंपनी में फिट हो या फिर नहीं हो. ऑथर्स बताते है कि इन विज़नरी कंपनीज़ में कल्ट लाइक कल्चर होता है. ऑथर्स को विज़नरी कंपनीज और कल्ट्स के बीच चार चीज़े कॉमन लगी. पहली है एक स्ट्रोंग कोर आईडीयोलोजी, दूसरी है इंडोक्ट्रीनेशन, तीसरा है टाईटनेस ऑफ़ फिट और चौथा है एलिटीज्म, अब हम इसे समझने लिए अमेरिकन लक्ज़री डिपार्टमेंट स्टोर नोर्डस्ट्रोम का एक्जाम्पल लेंगे. नोर्डस्ट्रोम की कोर आईडीयोलोजी है आउटस्टैंडिंग डिपार्टमेंट स्टोर नोर्डस्ट्रोम का एक्जाम्पल लेंगे. नोर्डस्ट्रोम की कोर आईडीयोलोजी है आउटस्टैंडिंग कस्टमर सर्विस डिलीवर करना. और जिस तरीके से वो अपने एम्प्लोईज़ को ट्रीट करते है, उसमें ये बात साफ़ झलकती है. नोर्डस्ट्रोम के एम्प्लोईज़ एक दुसरे को स्टोरीज़ सुनाते है कि कैसे उन्होंने कस्टमर्स को सर्व किया. उनके बैक रूम में रीमाइंडर्स भी होते है जो उन्हें हाई सेल्स के लिए अपने गोल्स रीमाइंड कराते है. नोर्डस्ट्रोम एक टाईट फिट वर्क एन्वायरमेंट क्रिएट करता है जहाँ अच्छा काम करने पर एम्प्लोईज़ को रीवार्ड्स और रेकोगनाइजेशन भी दिया जाता है. लेकिन अगर आप उनकी कोर आईडीयोलोजी के साथ नही चलेंगे तो आपको पेनेल्टीज़ भी भरनी पड़ सकती है. नोर्डस्ट्रोम की आईडीयोलोजी के साथ जो एम्प्लोईज़ फिट होते है, उनके अंदर खुद ब खुद लॉयल्टी और डेडीकेशन की फीलिंग आ जाती है. लेकिन अगर आप आउटस्टैंडिंग कस्टमर सर्विस नहीं दे सकते तो आप आउट हो. यहाँ ऑथर्स ये नही बोल रहे कि विज़नरी कंपनीज कल्ट्स है बल्कि ये कंपनीज़ प्रेक्टिस में किसी कल्ट से कम नही है. इसे समझने के लिए हम आईबीएम और इसके कल्ट जैसे कल्चर का एक्जाम्पल ले रहे है. 1914 में थॉमस वाटसन ने कसम खाई थी कि वो एक ले रहे है. 1914 में थॉमस वाटसन ने कसम खाई थी कि वो एक ऐसी कंपनी खोलेंगे जिसमे डेडीकेटेड जीलोट्स हो” “dedicated zealots”. वाट्सन ने एक स्ट्रिक्ट पॉलिसी बनाई थी कि सेल्स डिपार्टमेंट के लोग अच्छे पढ़े-लिखे होंगे उन्हें डार्क बिजनेस सूट पहनना होगा. और वो सेल्स डिपार्टमेंट के लोगो को शादी करने के लिए एंकरेज करते थे क्योंकि उन पर फेमिली की जिम्मेदारी होती है तो वो ज्यादा लॉयल होते है. एक और स्ट्रिक्ट रुल ये था कि सेल्स के लोग एल्कोहल नही पियेंगे. तो अब अगर आप आईबीएम् का ये हायरिंग प्रोसेस पास कर लेते हो तो आपको उनका कल्ट लाइक प्रेक्टिस फोलो करनी पड़ेगी. उनका एक स्कूल हाउस भी है जहाँ एम्प्लोईज़ को ट्रेन किया जाता है और हर सुबह उन्हें आईबीएम सोंग गाना पड़ता है जोकि कंपनी के सोंगबुक में से लिया गया है जिसे सोंग्स ऑफ़ आईबीएम् बोला जाता है. नोर्डस्ट्रोम की तरह ही आईबीएम् भी अपने एम्प्लोईज़ को गुड परफोर्मेंस देने पर रीवार्ड देता है और उनके नाम पर कॉर्पोरेट सोंग भी गया जाता है. अगर आपमें वो डेडीकेशन है कि आप आईबीएम् की कोर आईडीयोलोजी के साथ फिट बैठ सके तो ये बात श्योर आईडीयोलोजी के साथ फिट बैठ सके तो ये बात श्योर है कि आप उनके साथ एक लॉन्ग टाइम तक काम करते रहोगे. कनक्ल्यूजन (Conclusion) इस बुक में आपने पढ़ा कि कैसे विज़नरी कंपनीज लगातार अपना बेस्ट ऑफ़ द बेस्ट परफोर्मेंस देती है. हालाँकि विज़नरी कंपनीज एक जैसी नहीं होती. सब डिफरेंट इंडस्ट्रीज़ से बिलोंग करती है जो डिफरेंट लोगो को सर्विस देती है पर उनके एक चीज कॉमन होती है. विज़नरी कंपनीज़ कभी गिव अप नहीं करती चाहे उन्हें कितनी ही बार फेलर्स फेस करने पड़े. ये कंपनीज़ हर सिचुएशन में रेसिलिएंट होती है और अपनी हर मिस्टेक कुछ ना कुछ सबक लेती है. हालाँकि ये कंपनीज़ खूब सारा प्रॉफिट कमाती है पर सिर्फ पैसे कमाना इनका गोल नही होता बल्कि इनका मेन फोकस रहता है अपने हर प्लान को सस्केसफूल तरीके से अंजाम देना. और उनके हर प्रोजेक्ट में उनकी कोर आईडीईयोलोजी नजर आती है. बेशक ये कंपनीज़ प्रॉफिट पर भी ध्यान देती है पर कोर वैल्यू उनकी फर्स्ट प्रायोरिटी होती है. अपनी कोर आइडियोलोजी के बेस पर ही कोई इम्प्रूवमेंट करती है या क्या चेंजेस करने या और क्या नही करने, ये भी डिसाइड करती है. कितनी ही बार फेलर्स फेस करने पड़े. ये कंपनीज़ हर सिचुएशन में रेसिलिएंट होती है और अपनी हर मिस्टेक से कुछ ना कुछ सबक लेती है. हालाँकि ये कंपनीज़ खूब सारा प्रॉफिट कमाती है पर सिर्फ पैसे कमाना इनका गोल नही होता बल्कि इनका मेन फोकस रहता है अपने हर प्लान को सस्केसफूल तरीके से अंजाम देना, और उनके हर प्रोजेक्ट में उनकी कोर आईडीईयोलोजी नजर आती है. बेशक ये कंपनीज़ प्रॉफिट पर भी ध्यान देती है पर कोर वैल्यू उनकी फर्स्ट प्रायोरिटी होती है. अपनी कोर आइडियोलोजी के बेस पर ही कोई इम्प्रूवमेंट करती है या क्या चेंजेस करने या और क्या नही करने, ये भी डिसाइड करती है. आप लाइफ में जो भी पोजीशन अचीव करना चाहते हो शायद आपको वहां तक पहुँचने में थोडा वक्त लगे पर आप इन विज़नरी कंपनीज से इन्सिपिरेशन ले सकते है. ये कंपनीज रातो-रात सक्सेसफुल नही हुई थी इन्हें भी कई तरह के स्ट्रगल फेस करने पड़े, एक के बाद एक. लेकिन फिर भी ये टिकी रही. इसलिए आप भी इम्प्रूवमेंट का कोई मौका मत छोड़ो क्योंकि ये टॉप कंपनीज़ भी लगातार खुद को इम्प्रूव करती आई है.

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